Dialogue with loved ones – September 2025

अपनों से अपनी बात…

मेरे प्रिय आत्मीय,

शुभाशीर्वाद,

    प्रत्येक मंत्र-साधना, यज्ञ-साधना और तो और प्रत्येक कार्य कामनापरक ही होता है। हमारी कामनाओं का हमें फल प्राप्त हो। वर्तमान काल में हम सभी देवी-देवताओं की स्तुति, स्तोत्र, आरती पाठ के अंत में फल प्राप्ति की कामना करते है। शिव आरती हो, जगदीश आरती हो, दुर्गा आरती हो, श्रीसुक्त हो, लक्ष्मी स्तोत्र हो अंत में यही कहते है – जो कोई आरती गाये, सुख सम्पत्ति पाये, मनोवांछित फल पाये।

    बार-बार यही प्रार्थना रहती है कि हे देव! मैं आपकी स्तुति, प्रार्थना कर रहा हूं आप प्रसन्न होकर हमें धन प्रदान करें। हमारी कामनाओं को पूर्ण करें।

    विचार योग्य बात यह है कि क्या हमारी कामनाओं का कोई अंत है? मुझे तो नहीं लगता, क्योंकि कामनाओं का भंवरजाल और अधिक कामनाओं के गहरे सागर में ले जाता था और यह एक अंतहीन यात्रा हो जाती है।

    वैदिककाल में भी हम शक्ति से, देवों से प्रार्थना अवश्य करते थे उस समय प्रार्थना का भाव क्या रहता था –

भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥
ॠग्वेद सुक्त 89 मंत्र 8 –

    हे देव! हम अपने कानों से कल्याणमय वचन सुनें, हे देव! हम अपने नेत्रों से मंगलमय घटित होता देखें। हे देव हम निरोग इन्द्रियों और स्वस्थ देह के माध्यम से आपकी स्तुति करते हुए प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा हमारे हितार्थ सौ वर्ष या उससे अधिक जो भी आयु निर्धारित की गई है उसे प्राप्त करें। सारभूत में हमारे शरीर के सभी अंग और इन्द्रिय स्वस्थ और क्रियाशील रहे।

    इसी के साथ किसी भी यज्ञ, साधना, कर्म की पूर्णता के पश्चात्‌‍ समर्पण में कहा जाता था –

ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष (गूं) शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्व (गूं) शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि।
ॐ शान्तिः। शान्तिः॥ शांतिः॥।

    हे परमेश्वर, मेरे लिसे द्युलोक, अन्तरिक्ष लोक, पृथ्वी लोक, जल, औषधियां, वनस्पतियां, विश्वदेव, ब्रह्मा, सभी शांतिकारक हों। मुझे प्रकृति की शांति प्राप्त हो। शांन्ति की शांति प्राप्त हो। वास्तविक शांति प्राप्ति हो।

    कहां से यात्रा प्रारम्भ की थी, जीवन में, शांति प्राप्त हो, आयु-आरोग्य प्राप्त हो और कहां पहुंच गये – हो गई अब कामना सुख-सम्पति की। मनोवांछित फल मिले। जो हम चाहे, वैसा हो जाये।

    कहीं न कहीं थोड़ा विरोधाभास लग रहा है, आप भी अपने मन में सोचना। मन की शांति, मन का रस, मन और तन का आरोग्य महत्वपूर्ण है या निरन्तर धन प्राप्त हो, धन प्राप्त हो, मैं बलशाली होकर शत्रुओं का नाश कर सकूं। मेरे भीतर असीम शक्ति हो।

    आप मुझे बताओं आप शक्ति का क्या करोंगे? आपके लिये शक्ति का उपयोग क्या है? इससे भी पहले यह विचार करो, कि आप महत्वपूर्ण हो या आपके लिये संसार महत्वपूर्ण है। यदि आप स्वयं ही स्वस्थ, प्रसन्न और आनन्द से युक्त नहीं रहे तो जगत का सारा वैभव भी आपके क्या काम आ सकता है? मूल बात है, मन की शांति, मन की प्रसन्नता और मन सदैव रस से युक्त रहे। उस मन में शुष्कता न रहे। हृदय सदैव श्रेष्ठ भावों से भरा हुआ रहे। श्रेष्ठ भावना और आद्याशक्ति के प्रति समर्पण

अब सौंप दिया सब भार तुम्हारे हाथों में….

    इस सूत्र का बार-बार विचार करने से ही आप निश्चित, निर्द्वंद्व एवं सहज भाव से संसार चक्र में अपना कार्य कर सकते है।

    फिर वही बात आती है, जीवन में रस कैसे प्राप्त करे? हम अपने आप में मनमौजी कैसे रहे? हमें प्रसन्नता के लिये दूसरे उपकरण की आवश्यकता ही क्यों रहे? क्या हम इतने समर्थ नहीं है कि हम अपने आपमें प्रसन्न रह सके। यह बिल्कुल संभव है। जब हम ध्यान में बैठकर अपने सहस्रार और आज्ञाचक्र में स्थित अमृत बिन्दुओं को हमारे शरीर के अन्य चक्रों में प्रवाहित करे और यह विद्या सबके लिये सहज, सरल उपलब्ध है। ध्यान के ये क्षण जिसमें आप सबकुछ भुलकर ध्यानस्थ हो जाते हो। जगत का कोई ध्यान नहीं रहता, वे क्षण आपके जीवन के रस सींचन के क्षण है। जैसे – एक पौधे को निरन्तर जल देने की आवश्यकता नहीं है। कुछ क्षण ही पर्याप्त है उसी प्रकार अपने सहस्रार से किसी भी मुद्रा में ॐकार करना, योगियों के लिये जो खेचरी मुद्रा है, साधारण जन के लिये मंत्र जप है। आप अपने भीतर रस का प्रवाह तीव्र कर सकते है और जिसके जीवन में रस है उसका जीवन ही सरस है, जीवन्त है। रसदार फल हो, रसदार वृक्ष हो, उसे सभी चाहते है।

    शुष्क जीवन तो एकाकी जीवन है जिसमें सबकुछ है लेकिन रस रूपी शांति, संतोष और आनन्द नहीं है। जिस गृहस्थी में रस है वह देवों का स्थान है। जिस मनुष्य के हृदय में रस का अवगाहन है वहां देवताओं का निवास है।

    यह सब आपके हाथ में है, इसके लिये कोई कठोर तप नहीं करना है। अपनी भावनाओं को प्रेममय बनाना है। देव आशीर्वाद, शक्ति आशीर्वाद अपने आप प्राप्त हो जायेगा।

    इसके साथ-साथ निरन्तर कर्म करना भी आवश्यक है। कर्म से ही कर्मफल और रस की प्राप्ति होती है। इसीलिये भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कह दिया है –

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्‌‍।
कार्यते ह्यश: कर्म सर्व प्रकृतिजैर्गुणै:॥

    इस संसार में कोई भी व्यक्ति क्षणमात्र के लिये भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता है क्योंकि प्रकृति अपनी क्रियाओं द्वारा व्यक्ति से कर्म करवा ही लेती है। अतः इस संसार में कर्म करने के लिये प्रत्येक व्यक्ति बाध्य है।

    निरन्तर कर्म करो, रस से सिक्त रहो, आनन्द को जाग्रत करो, प्रेममय जीवन ही सरस जीवन है। अपने आपसे प्रेम करो, अपने इष्ट से प्रेम करो।

    नवरात्रि पर्व की शुभकामनाएं…

-नन्द किशोर श्रीमाली 

error: Jai Gurudev!