कर्मयोगी गुरुदेव नन्द किशोर श्रीमाली

उन्नत भाल, विशाल व्यक्तित्व, स्मित हास्य, गंभीर वाणी और सदा कर्म साधना में लीन एवं मिलनसार और लाखों-लाखों परिवारों को मंत्र साधना के मार्ग से जोड़ने वाले गुरुदेव नन्दकिशोर श्रीमाली कर्मयोगी हैं, जिनका पूरा जीवन दादा गुरुदेव के मार्ग पर चलते हुए साधकों और शिष्यों को समर्पित है। 

अपने कार्यों के प्रति पूर्ण निष्ठा, जीवन मूल्यों की रक्षा और भारतीय मूल्यों एवं वैदिक संस्कृति को पुनः स्थापित करना ही गुरुदेव के जीवन ध्येय है। कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी वे शांत, अविचल, धैर्य के साथ दृढ़ प्रतिज्ञ होकर अपने मार्ग पर निरन्तर चल रहे हैंै। धन्य हैं उनके सहयोगी, सखा, मित्र और शिष्य जिन्हें गुरुदेव का सान्निध्य, दीक्षा प्राप्त हुई है, धन्य हैं वे शिष्य जिन्हें गुरुदेव को देखने, सुनने और उनसे शक्तिपात दीक्षा ग्रहण करने का अवसर प्राप्त हो रहा है। हजारों-लाखों लोगों की जीवन धारा को अपने ज्ञान से प्रकाशित करते हुए गुरुदेव इस संसार में एक सरल और मिलनसार व्यक्तित्व हैं, जिनमें किसी भी प्रकार का कोई गर्व नहीं, हर एक के प्रति अपनापन और हर एक को ज्ञान का प्रकाश देने का भाव ही गुरुदेव के जीवन का लक्ष्य है। 

दादा गुरुदेव डॉ. नारायण दत्त श्रीमाली जिन्हें संन्यासी परमहंस स्वामी निखिलेश्‍वरानन्द के नाम से भी जाना जाता है, उनके ज्येष्ठ पुत्र श्री नन्द किशोर श्रीमाली जी का जन्म 16 दिसम्बर 1955 की शुभ गोधूली वेला में जोधपुर के पास लूणी ग्राम में हुआ। मां भगवती और पिता नारायण की संतान को ‘नन्दकिशोर’ होना ही था।

 
  •  जन्म से ही गुरुदेव सरल और सात्विक भावों से ओतप्रोत हैं। शिक्षा-दीक्षा, मंत्र ज्ञान, वेद-उपनिषदों का स्वाध्याय एवं विभिन्न साधनाओं का ज्ञान उन्हें पूज्य दादा गुरुदेव के श्रीमुख से घर के कड़े अनुशासन में निरन्तर प्राप्त हुआ। आध्यात्मिक संस्कार और ज्ञान की धारा घर में निरन्तर प्रवाहित थी। ईश्‍वर का यही प्रयोजन था इसलिये बाल्यकाल में ही गुरुदेव ने वेद-उपनिषदों का ज्ञान शीघ्र प्राप्त कर लिया साथ ही अपनी आधुनिक शिक्षा को भी यथावत् जारी रखा। 14 वर्ष की आयु में मैट्रिक 19 वर्ष की आयु में विज्ञान स्नातक (इ.डल) और सन् 1976 में जोधपुर विश्‍वविद्यालय से कानून की उपाधि (ङङइ) प्राप्त की, लेकिन भौतिक शिक्षा-दीक्षा में उनका मन नहीं रमता था, यद्यपि उन्होंने अपने स्कूल-कॉलेज के दिनों में कविता, लेखन, साहित्य रचना, वाद-विवाद आदि में भी स्वयं को संलग्न रखा लेकिन अध्यात्म के प्रति एक हूक, एक लगन के कारण वे सदैव स्वयं को बेचैन पाते और उस बेचैनी से आराम, साधनाओं में रत होने पर ही मिलता था।
  •  गुरुदेव का मन सदैव अध्यात्म में प्रवृत्त था, इसीलिये सन् 1975 से ही दादा गुरुदेव डॉ. नारायण दत्त श्रीमाली के सहयोगी, सहकर्मी और शिष्य बनकर उनका कार्यभार एक आजीवन कर्म संन्यासी की भांति संभाल लिया और सदैव उनके निर्देशन में कार्य का विस्तार कर रहे थे। 
  •  बहुत दुष्कर है कर्म संन्यास का मार्ग। कर्म और संन्यास में समन्वय बनाना। इस संसार के सारे भौतिक कार्यों को करते हुए साधना के मार्ग पर चलना और अपने अन्तर्मन में सिद्धियों को स्थापित करना। दादा गुरुदेव द्वारा स्थापित ‘भारतीय ज्योतिष अध्ययन अनुसंधान केन्द्र’ एवं ‘मनस चेतना केन्द्र’ का कार्य गुरुदेव नन्द किशोर जी श्रीमाली प्रारम्भ से ही करते रहे। इस प्रकार दादा गुरु की जिम्मेदारियों को अपने कंधों पर लेते हुए कर्म-साधना में लीन हो गए, जिससे दादा गुरुदेव निश्‍चिन्त होकर पूरे भारत वर्ष में शिविरों, दीक्षा कार्यक्रमों का आयोजन कर सके। 
  •  एक बार गुरुदेव नन्द किशोर जी श्रीमाली किसी साधना में रत थे, साधना का विधान शरीर को थका देने वाला था और किशोरवय सद्गुरु के शरीर पर भी उस थकान का असर स्पष्ट दिख रहा था तब दादा गुरुदेव ने पुत्रमोह से ऊपर उठकर एक सच्चे गुरु की भांति कड़े शब्दों में कहा – ‘यदि साधनाओं को सम्पन्न करते हुए, तुम्हारे शरीर का मांस भी सूख जाए तो भी विचार मत करना क्योंकि तप, कर्म और साधना का बल तुम्हें जीवनभर कर्मपथ पर आलोकित करेगा।’
  •  सन् 1981 में दादा गुरुदेव ने साधनात्मक पत्रिका ‘मंत्र-तंत्र-यंत्र विज्ञान’ का प्रकाशन प्रारम्भ किया। गुरुदेव ने एक अटल सहयोगी बनकर उस पत्रिका का लेखन, संकलन एवं सम्पादकीय भार अपने कंधों पर ले लिया और उसे बखूबी संभाला। जोधपुर ही गुरुदेव की कर्मभूमि बन गया। पिताश्री महीने में 25 दिन बाहर रहते और ‘मंत्र-तंत्र-यंत्र विज्ञान’ हर माह शिष्यों को समय-समय पर भेजनी ही थी। उस समय वह कार्य बड़ा ही दुरूह था और गुरुदेव श्रेष्ठतम् शिष्य की भांति गुरु आज्ञा का पालन करते हुए सादगी, सौम्यता और सदाचार के साथ निरन्तर कर्म-संन्यास के पथ पर अग्रसर हो गए। 
  •  गुरुदेव के जीवन का एक विशेष उपहार 16 दिसम्बर 1982 को जन्म दिवस के अवसर पर प्राप्त हुआ। दादा गुरुदेव ने उर्ध्वपात संस्कार कर उन्हें आध्यात्मिक साधनाओं की ऊंचाईयों को छूने के लिये प्रवृत्त किया। गुरुदेव ने उस उर्ध्वपात को ग्रहण करते हुए अपने पिता के तपोबल को ग्रहण किया एवं भौतिक सुख सुविधाओं को ताक पर रखकर तीव्र साधनाओं के क्षेत्र में प्रवृत्त हो गये और करीब दो माह तक निरन्तर साधनाओं हेतु एकान्तवास के लिये चले गए। दीक्षा के बाद 11 दिन पुष्कर स्थित ब्रह्मा मन्दिर में ब्रह्म साधना सम्पन्न की, फिर 11 दिन बनारस में काशी विश्‍वनाथ में शिव साधना सम्पन्न की और फिर बद्रीनाथ में 11 दिन विष्णु साधना कर धारणा शक्ति साधना को सफलता पूर्वक सम्पन्न किया। 
  •  दो महीनों के इस तीक्ष्ण साधना वृत्त के पश्‍चात् गुरुदेव ने अपने भीतर त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु, महेश का दिव्य आलोक स्थापित पाया। उस साधनाकाल में तीन बार सिद्धियां प्राप्त कर गुरुदेव ने अपने तपोबल को प्रबल बनाया और उस तपोबल को संचित भी किया। 
  •  निरन्तर लेखन और मंत्र-तंत्र-यंत्र विज्ञान पत्रिका का संचालन दोगुने जोश से पुनः संभाला। उस साधना का ऐसा प्रभाव गुरुदेव के व्यक्तित्व पर पड़ा कि पत्रिका के अंक एक के बाद एक निखरने लगे और लोग अधिक से अधिक संख्या में जुड़ने लगे। मंत्र-तंत्र और यंत्र के माध्यम से लुप्त प्रायः साधना विधियां और व्यावहारिक साधनाएं सात सौ वर्षों के बाद पुनः भारत ही नहीं अपितु समूचे विश्‍व की मानव जाति को उपलब्ध हो सकीं, जो वैदिक काल से लेकर सात सौ वर्ष पहले तक भारत की धरोहर थी। 
  •  ‘मंत्र-तंत्र-यंत्र विज्ञान’ का कार्य चल रहा था और दादा गुरुदेव के साधनात्मक साहित्य को सम्पादित कर उन्हें प्रकाशित करने की जिम्मेदारी भी गुरुदेव ने संभाल ली थी और सन् 1983 में दादा गुरु की साधनात्मक पुस्तकों का प्रकाशन प्रारम्भ हो चुका था। वह समय युवा गुरुदेव के जीवन का व्यस्ततम काल था, घर-परिवार के साथ-साथ जोधपुर कार्यालय की जिम्मेदारी और साथ ही साथ सारे सामाजिक दायित्वों को पूरा करना। गुरुदेव सारा कार्य नेपथ्य में रहकर करते रहे जिससे दादा गुरु पूरे विश्‍व में मंत्र-तंत्र की ज्योति को निश्‍चिन्त होकर आलोकित कर सके। 
  •  24 मार्च 1993 को दादा गुरु ने गुरुदेव को हजारों शिष्यों के समक्ष सार्वजनिक तौर पर उर्ध्वपात दीक्षा प्रदान कर अपने उत्तराधिकार का दायित्व सौंपा और अपना तपोबल पूर्ण रूप से प्रदान किया। इसी कड़ी में 1995 के निखिल जन्मोत्सव शिविर, भोपाल में दादा गुरु ने अपने कंधे पर रखा गमछा गुरुदेव को प्रदान करते हुए शिष्यों को कहा कि – ‘आज से मुझमें और नन्द किशोर में कोई भेद नहीं। यही मेरे ज्ञान एवं कार्य को आगे विस्तारित करेगा। यह इसका दायित्व है जो इसे सौंप रहा हूं।’
  •  दादा गुरु द्वारा सौंपी गई उस जिम्मेदारी को शिरोधार्य करते हुए और उनके आदर्शों पर चलते हुए गुरुदेव, निखिल कार्यों में तल्लीन हो गए और मंत्र-तंत्र-यंत्र विज्ञान का प्रसार बढ़ता ही गया। 
  •  दादा गुरु का स्वास्थ्य थोड़ा कमजोर हो रहा था और गुरुदेव के कंधों पर सारी जिम्मेदारियां आ गईं। उन्होंने ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते पत्रिका लेखन, जोधपुर कार्यालय व्यवस्था, दिल्ली कार्यालय व्यवस्था के साथ-साथ एकल शिविरों की व्यवस्था भी खुशी-खुशी संभाल ली। 
  •  काल की गति को कौन रोक सका है। 3 जुलाई 1998 को दादा गुरु निखिलेश्‍वरानन्द जी ने सिद्धाश्रम हेतु महाप्रयाण किया और 3 सितम्बर 1998 को उनके अस्थि पुष्प हरिद्वार गंगा में समर्पित करते हुए गुरुदेव ने संकल्प लिया कि अब से मेरा जीवन पूर्ण रूप से साधना मार्ग को समर्पित है और सिद्धाश्रम साधक परिवार ही मेरा परिवार है और गुरुदेव शिष्यों को कल्याण मार्ग पर अग्रसरित करने के लिये संलग्न हो गए।
  •  साधना-प्रवचन, लेखन और शक्तिपात दीक्षा गुरुदेव के जीवन के तीन आधार स्तम्भ बन गए। गुरुदेव का प्रत्येक प्रवचन आध्यात्मिक भावना से ओत-प्रोत होता है जो साधक को मंत्र-साधना के साथ-साथ उनकी भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति में संलग्न करता है। गुरुदेव का संकल्प है कि निखिलेश्‍वरानन्द का विचार मंत्र-तंत्र का विशुद्ध ज्ञान प्रत्येक भारतवासी के घर में स्थापित हो। इस विराट संकल्प के साथ अगस्त 2010 में गुरुदेव ने ‘निखिल मंत्र विज्ञान’ की स्थापना की। सन् 1981 में ‘मंत्र-तंत्र-यंत्र विज्ञान’ की यात्रा प्रारम्भ हुई थी, जिसने बढ़ते-बढ़ते पचास हजार साधकों के घर में शंकराचार्य द्वारा प्रणीत मंत्र और तंत्र के प्रति दृढ़ आस्था का भाव स्थापित किया और आगे ‘निखिल मंत्र विज्ञान’ के साथ यह संख्या पांच लाख से ऊपर हो गई है और निखिल परिवार का आकार अनवरत गति से बढ़ रहा है। लाखों साधक निखिल मंत्र विज्ञान को अपने जीवन की ‘कर्म गीता’ मानते हुए सद्गुरु के व्यावहारिक साधनात्मक मार्ग पर उनके साथ चल रहे हैं।
  •  गुरुदेव द्वारा शक्तिपात, दीक्षा-संस्कार और साधना शिष्यों में तपोबल की ऊर्जा प्रदान करते हैं। शक्तिपात एक क्रांति का सूत्रपात है और इस मानस क्रान्ति से साधक कर्म संन्यास के पथ अपने दायित्वों का निर्वाह करते हुए, अपने भौतिक जीवन के सभी आयामों को प्राप्त करता है।
  •  गुरुदेव का जीवन समाज हेतु ही है। वे निरन्तर और निरन्तर सामाजिक कार्यों में संलग्न रहते हैं। जोधपुर शहर में गुरुदेव ने रोटरी ब्लड बैंक का निर्माण कराया, साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित तीन सरकारी स्कूलों को गोद लेकर उनका विकास किया। इसी कड़ी में गुरुदेव ने अपने जन्म स्थान लूणी ग्राम में विशाल शिव मन्दिर का निर्माण करवाया। दादा गुरु का एक स्वप्न था दिल्ली में एक इन्ट्रीग्रेटेड अस्पताल बने और गुरुदेव ने इस पर कार्य प्रारम्भ कर दिया है। आगामी दो वर्षों में 600 बेड का यह अस्पताल दिल्ली स्थित पीतमपुरा आश्रम में पूर्ण हो जाएगा।
  •  गुरुदेव नन्द किशोर जी श्रीमाली सादगी के पर्याय हैं वे सदैव श्‍वेत परिधानों को धारण करते हैं। मुख पर शान्त स्मित और निरन्तर कर्मशीलता उनके जीवन का हिस्सा है उनके जीवन का ध्येय है कि आर्यावर्त में शिव द्वारा प्रतिपादित मंत्र, तंत्र, यंत्र के ज्ञान को प्रत्येक घर में स्थापित किया जाए क्योंकि तंत्र में प्रत्येक बाधा का समाधान है और मंत्र जप से साधक में ऊर्जा के ऐसे स्पन्दन पैदा होने लगते हैं जिनसे उसकी सुप्त कुण्डलिनी शक्ति में ऊर्जा स्पन्दित होना प्रारम्भ हो जाती है। 
  •  प्रत्येक साधक ऊर्जा के उस स्तर पर नहीं होता है और गुरुदेव उसके नेत्रों में झांककर उसे शक्तिपात द्वारा ऊर्जा के ऊंचे मुकाम पर ले जाते हैं, उसमें अपना तपोबल प्रवाहित करते हैं। 
  •  साधना एवं ध्यान गुरुदेव का स्वभाव है, क्योंकि उससे उनके तार ब्रह्म से जुड़ते हैं जिससे उन्हें शिष्यों एवं साधकों की बाधाओं को हरने की ऊर्जा एवं शक्ति मिलती है।
  •  प्रत्येक मासिक शिवरात्रि कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को गुरुदेव देवाधिदेव शिव का अभिषेक करते हैं क्योंकि गुरु परम्परा की शुरूआत शिव से ही है। वे शिव ही हैं जो उन्हें ऊर्जा देते हैं जिससे वे प्रतिपल शिष्यों के जीवन का हलाहल, विष पी पाते हैं।
  •  हर तीन महीनों में गुरुदेव एकान्तवास में रहकर साधनाएं तपस्या सम्पन्न करते हैं, उनका कथन है कि मैं स्वयं साधनाएं करके तप अर्जित करता हूं और वह तपोबल अपने शिष्यों को प्रदान करता हूं। 
  •  शिव की परम्परा का निर्वाह करते हुए गुरुदेव की घोषणा है कि ‘मैं आश्रम का निर्माण नहीं करूंगा क्योंकि मेरे प्रत्येक शिष्य का घर एक आश्रम सदृश है जहां मंत्रों की ध्वनि, साधनाओं के सूत्र और आनन्द का प्रवाह निरन्तर होता रहता है।’
  •  नमन है दादा गुरु निखिलेश्‍वरानन्द जी को, नमन है गुरुदेव नन्द किशोर जी श्रीमाली को जिनके द्वारा शंकराचार्य परम्परा और वैदिक ज्ञान की धारा आज पुनः भारतवर्ष में प्रवाहित हो रही है। मंत्र और तंत्र का विशुद्ध ज्ञान स्थापित हो रहा है, गुरु शिष्य परम्परा की ज्ञान गंगा प्रवाहित हो रही है।
  •  – जय गुरुदेव जय निखिलं।
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