Dialogue with loved ones – October 2025

अपनों से अपनी बात…

मेरे प्रिय आत्मीय,

शुभाशीर्वाद,

    शक्ति के सम्बन्ध में हम बार-बार चर्चा करते है और यह कहते है कि शक्ति ही जीवन का आधार है। शक्ति के बिना जीवन में कोई कार्य नहीं हो सकता है। शक्तिहीन होना मरण तुल्य जीवन जीने के समान है। इसलिये हर व्यक्ति को येन-केन प्रकारेण शक्ति की आराधना करनी चाहिये। शक्ति प्राप्त करना ही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है। मनुष्य हर दृष्टि से शक्तिमान हो और मनुष्य पूरे जीवन शक्ति प्राप्ति के लिये ही निरन्तर उद्यम करता रहता है और इसी शक्ति के नाम हमने अलग-अलग दिये है। शरीर की शक्ति, मन की शक्ति, बुद्धि की शक्ति और यही चाहते है कि हम शारीरिक, मानसिक और भौतिक रूप से शक्तिशाली हो।

    एक प्रश्न आज मैं सभी साधकों से पूछना चाहता हूं कि संसार में सबसे बड़ी शक्ति कौनसी है? मैं दैवीय शक्तियों की बात नहीं कर रहा हूं। भाव शक्तियों के बारे में आपसे प्रश्न पूछ रहा हूं।

    क्या उत्तर होगा यह हर व्यक्ति के लिये अलग-अलग हो सकता है लेकिन मैंने अपने अनुभव में जाना है कि संसार में सबसे बड़ी शक्ति मोह की शक्ति है। इस मोह की शक्ति में ही उसे इस जीवन में रस आता है और जैसे-जैसे जीवन बढ़ता है वैसे-वैसे मोह बढ़ता ही जाता है। संसार सागर में वह आशा के साथ और अधिक मोह ग्रस्त होता रहता है।

    मोह के बारे में एक सुन्दर श्लोक है –

रात्रिर्गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातं भास्वानुदयति हसिष्यति पंकज श्रीः।
इत्थं विचिन्तयति कोशगते द्विरेफे हा हन्त हन्त नलिनी गज उज्जहार॥

    कमल पुष्प की गन्ध में आसक्त भौंरा शाम में उसी पुष्प में बंद हो जाता है और सोचता है कि रात बीत जायेगी तो सुबह होगी, सूर्य का उदय होगा, फिर कमल पुष्प खिल जायेगा तो निकल जाऊंगा। तब तक तो इस पराग का आनन्द ले लूं। परन्तु इतने में ही एक हाथी जो जल में स्नान कर रहा था, उस फूल को तोड़ कर खा जाता है। यही दशा है मानव मन की, जो वर्तमान का सदुपयोग नहीं कर भविष्य की आशा लगाये रहता है।

    क्या यही स्थिति मनुष्य के मन की नहीं है जो सोचता रहता है कि जीवन भर मोह में मस्त रहूं और मैं इस रस का आस्वादन करता रहूं। मोह से मुक्ति की कोई प्रार्थना नहीं करता है। धीरे-धीरे मोह से ग्रस्त हुआ मनुष्य अपने वास्तविक स्वभाव को ही भूल जाता है। कई लोग इसे जिम्मेदारी, गृहस्थी, परिवार पालन का नाम दे देते है और कहते है कि यह तो मेरा कर्त्तव्य है। यदि आप कर्त्तव्य करते है तो इसका अर्थ है आप कर्म कर रहे है लेकिन मोह ग्रस्त होकर कर्म करेंगे तो उस कर्म के फल का आनन्द भी नहीं ले सकेंगे क्योंकि मोह एक ओर आनन्द देता है और एक ओर बंधन में भी बांधता रहता है। मोह का धागा बड़ा ही सूक्ष्म होता है लेकिन इसकी पकड़ इतनी मजबूत हो जाती है कि मकड़ी की तरह जो अपनी रक्षा के लिये जाल बुनती है और फिर स्वयं उस जाल से निकल नहीं पाती है और उसका अन्त स्वयं के बुने हुए जाल में ही हो जाता है।

    मोह के सम्बन्ध में मुझे एक ओर दृष्टान्त याद आता है। विदुर बड़े ही ज्ञानी और कृष्ण भक्त थे। नीति ज्ञाता थे। जब महाभारत के युद्ध की तैयारियां चल रही थी तब धृतराष्ट्र ने विदुर से कहा कि आप मेरे भ्राता भी है और मंत्री भी है आप मुझे ज्ञान दीजिये।

    विदुर ने धर्मशास्त्र, नीतिशास्त्र की व्याख्या करते हुए धृतराष्ट्र को बहुत समझाया कि जो तुम कर रहे हो वह उचित नहीं है और जो तुम्हारे पुत्र कर रहे है वह तो अत्यधिक अनुचित है। धृतराष्ट्र ने सारी बात सुनकर सिर झुका कर कहा कि –

सा तु बुद्धिः कृताप्येवं पाण्डवान्प्रति मे सदा।
दुर्योधनं समासाद्य पुनर्विपरिवर्तते॥

    यद्यपि मैं पाण्डवों के प्रति सदैव इसी प्रकार के विचार रखता हूं, परन्तु दुर्योधन से मिलने के बाद मेरी बुद्धि फिर बदल जाती है। मैं दुर्योधन के मोह में और कुछ भी नहीं देख पाता हूं।

न दिष्टमभ्यतिक्रान्तुं शक्यं भूतेन केनचित्‌‍।
दिष्टमेव ध्रुवं मन्ये पौरुषं तु निरर्थकम्‌‍॥

    हे विदुर, मेरा विचार है, जो भाग्य में लिखा है, उसका उल्लंघन करने की शक्ति किसी प्राणी में नहीं। इस कारण मैं अपने भाग्य अर्थात्‌‍ प्रारब्ध को नित्य और अचल मानता हूं, पुरुषार्थ तो अनावश्यक और व्यर्थ है।

    इसी मोह के कारण धृतराष्ट्र और सभी कौरवों का पतन हुआ और मोह के विपरीत पुरुषार्थ के कारण पाण्डवों की विजयी हुई। यह है मोह की पराकाष्ठा जब व्यक्ति सोचता है कि जो भाग्य में लिखा है वह हो जायेगा, मोह में भगवान ने ही बांधा है, भगवान ही मुझे मुक्ति देंगे। क्या यह संभव है? जबकि साधक के मन की भावना होनी चाहिये कि –

मैं उन्मुक्त गगन का पंछी, मैं अजस्र अमृत की धारा।
मैं प्रशान्त सामोद सनातन, मैं खुशियों का दीप्त सितारा॥

    क्या आपको भी मोह बंधन में आनन्द आता है या आप उन्मुक्त गगन के पंछी बनना चाहते है। उन्मुक्त गगन के पंछी बनना चाहते हो तो आपके विचार, आपकी भावनाएं, आपके कार्य और आपकी कामनाएं स्वतंत्र होनी चाहिये। स्वयं के तंत्र का विकास करना चाहिये। आप संसार के अद्भुत प्राणी है। आपकी शक्तियों का विकास आप ही कर सकते है। आप ही अपनी ‘प्रवृत्ति’ को ‘निवृत्ति’ की ओर ले जा सकते है। आप ही अपनी भावना को अपने भावों को सही दिशा प्रदान कर सकते है। सदैव एक बात याद रखियें, आपका स्वयं का एक व्यक्तित्व है। स्वतंत्र व्यक्तित्व है। इस हेतु स्वयं के तंत्र का विकास करना है, न कि दूसरे के तंत्र के अधीन हो जाना है। स्वयं का तंत्र मुक्ति देगा, आनन्द देगा, भावना और भक्ति देगा, भावों की प्रबलता प्रदान करेगा।

    स्वयं के तंत्र का विकास करोगे तो भौतिक उन्नति अपने आप होगी, साथ में आध्यात्मिक उन्नति भी होगी जिससे मन के सारे तनाव समाप्त हो जायेंगे और पुरुषार्थ जाग्रत होगा और जहां पुरुषार्थ होता है वहां श्री और लक्ष्मी स्वयं आकर वरण करते है।

    दीपावली की शुभकामनाएं…

-नन्द किशोर श्रीमाली 

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