
Dialogue with loved ones – November 2025
अपनों से अपनी बात…
मेरे प्रिय आत्मीय,
शुभाशीर्वाद,
दीपावली पर्व आपने पूर्ण विधि विधान और साधना के साथ सम्पन्न किया। इस ज्योति पर्व की ज्योति आपके मन में सदैव प्रकाशित रहे और आप ऊर्जा, शाक्ति से सम्पूर्ण रहे। घर में भी प्रसन्नता का वातावरण रहे, ऐसी ही शुभेच्छा आप सबके लिये मैं रखता हूं। मेरी यही कामना है कि मेरा प्रत्येक शिष्य अपने जीवन में निरन्तर उन्नति करें और प्रतिक्षण आनन्द की स्थिति मन में व्याप्त रहे।
यह आनन्द बहुत गहरा शब्द है क्योंकि संसार जगत में सारा व्यवहार लेन-देन पर ही चलता है। आपको कुछ लोगों से अपेक्षा रहती है कि वे आपके लिये कार्य करें, सहयोग दें और कुछ लोगों को यह अपेक्षा रहती है कि आप उन्हें सहयोग दे, उनका कार्य करें। इसे अपेक्षा कहा जाता है।
पर अपेक्षा का जाल बहुत ही विस्तृत है। इसे उपकार, अपकार में बांटा गया है।
आप किसी के लिये कितना भी कर दो जैसे कहावत में कहा गया है कि सिर काट कर दे दो तो भी वह कहेगा कि टेढ़ा था। जो अपकारी व्यक्ति होते है वे कभी भी आपका एहसान नहीं मानेंगे सदैव आपसे मांग ही मांग करते रहेंगे।
देखों भाई! ये जो जगत की आपके प्रति अपेक्षा है उसकी सीमा अवश्य तय कर लो।
हम सब क्या करते है अपना सारा संघर्ष दूसरों की अपेक्षा पूरी करने में ही लगा देते है। संसार में सबके सामने अच्छा दिखने और अच्छा बनने की चाह में आप अपनी क्षमता से अधिक बोझ उठा लेते है। फिर क्या होगा? भीतर ही भीतर थक जायेंगे। संतोष भी प्राप्त नहीं होगा।
श्रेष्ठ जीवन जीने का मूलभूत सिद्धान्त है – अपनी सीमा को पहचानना और दूसरों से स्पष्ट संवाद करना। कुछ देर के लिये उसे खराब अवश्य लगेगा लेकिन आपकी बात में स्प्ष्टता और सच्चाई होगी तो आपको किसी प्रकार का अपराध बोध नहीं रहेगा।
बच्चों को भी हम शुरु से दबाव में भर देते है। अपेक्षाओं का बोझ लाद देते है। मेरा बेटा बहुत अच्छे नम्बर लाये, मेरा बेटा यह बनें, वह बनें। इधर अध्यापक भी प्रेशर डालते है। मित्र भी खेल-कूद के लिये प्रेशर डालते है। बच्चा, इन सबके चक्रव्यूह में स्वयं की क्षमता पहचानने से चूक जाता है। बार-बार कम्पीटिशन का प्रेशर डालने से क्या होगा? बच्चों को स्वभाविक गति से उन्हें ज्ञान अर्जित करने दो।
घर-गृहस्थी में भी पति-पत्नी के बीच बहुत अपेक्षाएं रहती है। पति चाहता है कि वह हर समय उसका साथ दे, पत्नी चाहती है कि पति उसकी हर बात को समझें और सहयोग दे और घर में बच्चों और बूढ़ों की अलग अपेक्षा रहती है। अब सबकी अपेक्षाएं पूरी करेंगे तो भीतर ही भीतर टूट जायेंगे। इसलिये सन्तुलन बनायें रखना आवश्यक है। जिससे स्वयं के लिये समय और शांति बची रहे।
सोचों आप दिनभर में कितना समय स्वयं के लिये निकालते है? सबसे महत्वपूर्ण है स्वयं के लिये समय निकालना, तब आप शांति के साथ कार्य कर सकेंगे।
व्यापार में, ऑफिस में भी यही हालत है, आपके ऑफिस में बॉस यही चाहते है कि बहुत काम करो, बहुत काम करो। सहकर्मी चाहते है उनका काम भी करो। अरे भाई! आप मशीन तो हो नहीं। सबका काम करने लग जाओंगे तो उसके बोझ के कारण आपके भीतर थकान और असंतोष हावी हो जायेंगे।
अपेक्षा की सीमा बांधिये और स्पष्ट संवाद कीजिये कि इस सप्ताह मैं यह काम पूरा नहीं कर सकूंगा लेकिन अगले सप्ताह अवश्य पूरा कर दूंगा।
जीवन का आधार गृहस्थ जीवन है। बहुत संवेदनशील होता है, इसमें आपसे की अपेक्षाएं भावनात्मक भी होती है, व्यवहारिक भी होती है। अब सबको पूरा करना स्वभाविक भी नहीं है। सुखी गृहस्थ जीवन उस व्यक्तिका है जहां दोनों एक दूसरे की सीमाओं का सम्मान करते है। कभी पति का त्याग चलेगा, कभी पत्नी का त्याग चलेगा। इससे बोझ सांझा हो जायेगा। यही संन्तुलन गृहस्थ जीवन को मजबूत बनाता है।
आपने अपने आप से भी कुछ वादे किये है, संकल्प लिये है तो सबसे पहले उन्हें पूरा करना है। इसका अर्थ यह नहीं है कि हम स्वार्थी बन जाये। पर इस बात का भी ध्यान रखें कि दूसरों का कार्य परमार्थ करते-करते, इतना भी न डूब जाये कि हमें अपना स्वयं का स्मरण ही नहीं रहे कि यदि हम स्ययं प्रसन्न नहीं रहेंगे तो दूसरों की प्रसन्नता का हम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। जब हम स्वयं के प्रति सच्चे रहते है तो दूसरों के प्रति भी ईमानदारी और सन्तुलन ला पाते है।
हमारी अपने प्रति क्या अपेक्षा होनी चाहिये, तीन अपेक्षाएं मुख्य है – 1. अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग रहना, 2. अपने विकास पर ध्यान देना और 3. अपने आत्म सम्मान की रक्षा करना। यदि इन तीन प्रमुख बातों को छोड़ देंगे तो फिर चाहे दूसरों के लिये कितना भी कर दें, भीतर खालीपन ही बना रहेगा।
इसके लिये एक श्रेष्ठ जीवन प्रबन्धन होना चाहिये। यह ठीक है, कहीं-कहीं रिश्तों की गरिमा और प्रेम बनाएं रखने के लिये हमें अपनी सीमा से भी आगे बढ़ना पड़ता है लेकिन यह विवेक पूर्ण होना चहिये। जो बात हमारे मूल्यों और हमारी क्षमता से मेल खाती है उन्हें स्वीकार करना चाहिये और जो असंभव है, आपसे नहीं हो सकता है उसके लिये बड़ी ही नम्रता के साथ अस्वीकार कर देना चाहिये।
आप सबको हर समय प्रसन्न नहीं रख सकते है और यह आवश्यक भी नहीं है। जब हम अपनी सीमाओं को पहचान कर स्पष्ट संवाद करते है तो धीरे-धीरे लोग भी आपकी मर्यादा को स्वीकार करने लग जाते है। उन्हें यह पता चल जाता है कि यह स्पष्ट वक्ता है और जो कहता है वह अवश्य करता है। इससे आपके सम्मान में वृद्धि होगी। कोई भी बात को भविष्यकाल के लिये मत टालिये, टालमटौल करना सबसे बड़ा अवगुण है।
जो व्यक्ति अपने समय का और अपना स्वयं का मूल्य समझ जाता है वही प्रसन्ता से भरा रहता है।
आपको स्पष्ट, सन्तुलित और आत्म सम्मान से भरा हुआ बनना है। तब आप अपना कार्य भली भांति कर सकेंगे और आपके जीवन में आनन्द, शांति और संतोष साथ-साथ चलते रहेंगे।
ज्ञान को अपने भीतर स्थापित कीजिये और ज्ञान ही आपको जीवन भर गाईड करता रहता है। इसीलिये गुरु को ज्ञान प्रदाता कहा गया है। गुरु यदि आपकुे हृदय में स्थित है तो आप अपने आपको सही, उचित और सिद्ध दिशा में ले जा सकेंगे। तब जीवन क समस्त सिद्धियां आपको प्राप्त होगी।
बहुत-बहुत आशीर्वाद…
-नन्द किशोर श्रीमाली
Coming soon…
Nand Kishore Shrimali