Dialogue with loved ones – May 2025

अपनों से अपनी बात…

मेरे प्रिय आत्मीय,

शुभाशीर्वाद,

    श्रीभगवद्गीता में एक विशेष प्रसंग आता है जिसमें अर्जुन के आग्रह पर भगवान श्रीकृष्ण उसे अपना विश्वरूप दिखाते है, जिसे विराट् स्वरूप कहा गया है। श्रीकृष्ण के स्वरूप को देखकर अर्जुन विस्मित हो गया और साथ ही साथ भयभीत हो गया। उस विश्वरूप को देखते ही भय से भी ग्रसित हो गया और एक प्रार्थना निकली –

द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि-व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः।
दृष्ट्‌‍वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्‌‍ ॥

    स्वर्ग, पाताल, अन्तरिक्ष, पृथ्वी तथा उसी प्रकार दसो दिशाएं और सभी दिशाचक्र, क्षितिज यह सब आपके ही रूप से व्याप्त हो गया है। मैं चकित होकर यह सब देख रहा हूं। आपके भव्य रूप की व्यापकता मर्यादित नहीं की जा सकती। आपके रूप का तेज सहन नहीं होता। भगवन्‌‍! आपका यह अद्भुत रूप देखकर भय क्यों लग रहा है, यह समझ में नहीं आता।

    उस रूप में वह देख रहा है कि सबकुछ श्रीकृष्ण के विराट् स्वरूप विलीन हो रहा है और ऐसा प्रतीत होता है कि संहार की लीला सम्पन्न हो रही है। सबकुछ श्रीकृष्ण के भीतर समाहित हो रहा है। काल का यह विशाल स्वरूप देखकर अर्जुन को ओर भी अधिक भय लगा। तब श्रीकृष्ण ने कहा कि अर्जुन तुम मेरे शिष्य हो, इसलिये मैं तुम्हें स्पष्ट कह रहा हूं, आज तक महायोगियों को भी मैंने अपना यह रूप नहीं दिखाया है। तुम्हें इस रूप को इसलिये दिखाया है कि तुम्हारे भीतर जो अहंकार व्याप्त हो गया है और अहंकार के साथ-साथ कायरता व्याप्त हो गई है, उस कायरता का नाश करने के लिये मैंने ये विराट् स्वरूप दिखाया है। तुम सोचते हो कि तुम कर रहे हो।

    आगे भगवान श्रीकृष्ण कहते है –

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्‌‍‍ भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्‌‍।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्‌‍ ॥

    यह सारी सेना कठपुतले के खेल की गुडियों की तरह निर्जीव है इसलिए इस सेना का यह आकार तोड़ने में अधिक समय नहीं लगेगा। इसलिए अर्जुन उठो और होश में आओ। इनका संहार करो और ऐसा यश प्राप्त करो कि अकेले अर्जुन ने शत्रुओं पर विजय प्राप्त की और यह समझ लो कि यश के साथ-साथ सारा राज्य भी हाथ में आ गया है। हे सव्यसाची! निमित्त बनकर शत्रु का संहार करो।

द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथाऽन्यानपि योधवीरान्‌‍।
मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्‌‍ ॥

    तुम द्रोण की चिन्ता मत करो, भीष्म का भय न करो और यह भी मत सोचो कि कर्ण पर शस्त्र कैसे चलाऊं? और जयद्रथ को मारने के लिए कैसी योजना बनानी है, उसका भी विचार न करो, और जो अन्य भी वीर हैं, उन्हें चित्र में बने हुए सिंह की तरह निर्जीव समझो। मैंने उन्हें पहले ही ग्रस लिया है। जिस समय तुम उन्हें मेरे मुंह में जाते देख रहे थे, तभी इनका जीवन समाप्त हो गया था। वे अब केवल भूसा भर है इसलिए शीघ्र ही उठो और जिन्हें मैं मार चुका हूं, उनका संहार करो। व्यर्थ का शोक न करो। इन्हें मारने के लिये तुम्हें निमित्त बनाया गया है।

    तब अर्जुन बार-बार प्रणाम करने लगा और कहा कि संसार में ऐसी कौन सी वस्तु है जिसमें आप नहीं हैं। आप ही वायु है, आप ही शासन कर्ता यम भी आप ही है। आप ही वरुण, इन्द्र और सृष्टि का निर्माण करने वाले ब्रह्म देव है। आपके सम्पूर्ण स्वरूप का वर्णन करना मेरे लिये संभव ही नहीं है। मेरे द्वारा आपको और आपके सम्पूर्ण शरीर को नमस्कार है। हे भगवंत यह बात मेरे मन में अच्छी तरह से बैठ गई है कि आप इस विश्व में सब पदार्थों से भिन्न नहीं है। सबकुछ आप ही है।

    अब अर्जुन को याद आता है कि वह किस प्रकार श्रीकृष्ण से व्यवहार करता था। प्रेमवश, मैत्रीकर, अपने आंगन में कल्पतरू का वृक्ष लगाने की तथा कामधेनु के बछड़े के साथ खेलने की मेरी जिद्द को भी आपने पूरा किया है। आपका यह रूप तो उपनिषद्ों में भी नहीं है जो आपने मुझे आज दर्शन करायें। मुझे आपके इस विश्व रूप से भय लगता है। आप इसे हटाकर अपने चतुर्भज स्वरूप में आ जाये। आपका यह चतुर्भज स्वरूप ही हमारे आराम का स्थल है।

    श्रीकृष्ण ने कुछ क्षणों के लिये ही यह रूप दिखाया था और इस रूप को देखने के पश्चात्‌‍ अर्जुन के मन की सारी पीड़ा, विषाद, अहंकार, उत्तेजना, कायरता, प्रमाद, सब समाप्त हो गया। फिर भी श्रीकृष्ण से अर्जुन ने एक प्रतिप्रश्न किया कि – हे श्रीकृष्ण मैं क्या करूं?

    श्रीकृष्ण अपने चतुर्भुज स्वरूप में आ गये और अर्जुन के सिर पर हाथ रखकर बोलें कि अर्जुन मेरी बात ध्यान से सुनों – सृष्टि का नियन्ता मैं हूं। मेरा कार्य सृष्टि में जन्म-पालन और संहार है। तुम एक छोटे से कालखण्ड में मेरे सखा, मेरे शिष्य, बनकर आये हो। तुम अपना कर्तव्य करो, कर्म करो और सबकुछ मेरे ऊपर छोड़कर इस जीवन संघर्ष में रत हो जाओं।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥

    प्रिय साधक सदैव याद रखों, ईश्वर विराट् है और हम सब उस विराट् चेतना के अणु स्वरूप है। इस अणुमय जीवन को शक्ति-भक्ति, समर्पण से युक्त कर जीवन में सद्भाव और संस्कार का निर्माण करना है। हमारे विचार ही हमारे चरित्र को बनाते है। जीवन में सदैव सकारात्मक विचारों से युक्त रहे और कोई नकारात्मक भाव आते ही उसे अपनी क्रिया द्वारा, अपनी तीव्र इच्छाशक्ति द्वारा उस नकारात्मक भाव का नाश कर दे।

    आप सभी साधक है और विशेष रूप से शक्ति के साधक है। आपकी इच्छा शक्ति सबसे अधिक प्रबल है। उस इच्छाशक्ति को क्रियाशक्ति के साथ जोड़ दे और अपनी इच्छाशक्ति और क्रिया शक्ति को ज्ञान शक्ति के अधीन कर दें। ज्ञान शक्ति ही सर्वोच्च शक्ति है, वही शक्ति सदैव आपको संयमित, धैर्यवान, योग्य और चारित्रिक बल प्रदान करती है।

    अपने सभी बलों को ऊर्ध्वरित करते रहे। ज्ञान शक्ति की अमृत जल धारा को उसमें निरन्तर प्रवाहित होने दे। आपका जीवन अवश्य ही सुगन्धमय, आरोग्यमय, कीर्तिमय होगा।

    गुरु पूर्णिमा गुरु की अन्तर-आत्मा और शिष्य की अन्तर-आत्मा के मिलन का पर्व है जहां दो दिव्य शरीर, मन और आत्माओं का मिलन होता है। गुरु पूर्णिमा केवल एक पर्व नहीं है यह अवसर है गुरु की विराट् शक्ति के साथ अपने आपको एकाकार करने का…

    बहुत-बहुत आशार्वाद…

-नन्द किशोर श्रीमाली 

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