
Dialogue with loved ones – March 2026
अपनों से अपनी बात…
मेरे प्रिय आत्मीय,
शुभाशीर्वाद,
शक्ति पर्व चैत्र नवरात्रि नव-संवत्सर 2083 आ रहा है। आप सभी निरन्तर शक्ति से युक्त होना चाहते है और अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाने के लिये अपनी शक्ति का विस्तार भी चाहते है। यह शुभ भाव है और इस शुभ भाव में संकल्प के साथ निरन्तर वृद्धि अवश्य होनी चाहिये। यही तो साधक भाव है।
उपनिषद् की एक कथा मुझे याद आती है, ॠषि उद्दालक आरुणी के पुत्र थे श्वेतकेतु। 12 वर्ष की आयु होने पर पिता ने गुरुकुल भेजा, वेद-शास्त्र का अध्ययन करने। श्वेतकेतु ने 12 वर्ष निरन्तर आश्रम में रहकर सभी प्रकार के वेदों का अध्ययन किया। उपरान्त अपने घर आये, तो उन्हें अपने ज्ञान पर गर्व हो गया। पिता ने उनके व्यवहार में अहंकार देखा, वे सब बात समझ गये।
शांत स्वर में पिता ने पूछा – हे पुत्र! तुमने जो विद्या सीखी है, क्या उसको जान लेने से, जो नहीं जाना है वह भी जाना हुआ हो जाता है? जो अनसुना होता है वह भी सुना हुआ हो जाता है?
श्वेतकेतु यह प्रश्न सुनकर चकित हो गये और कहा कि मेरे गुरु ने तो ऐसी कोई विद्या नहीं सिखाई है। वैसे मैं सभी वेद, व्याकरण, गणित, तर्क सबमें पारंगत हो गया हूं।
ॠषि उद्दालक ने कहा कि यदि तुमने यह विद्या नहीं सीखी है तो तुम्हारा अध्ययन अधूरा है। तुम जिज्ञासु शिष्य तो बन गये हो लेकिन साधक नहीं बन पाये हो।
पुत्र ने पूछा वह कौनसी साधना है? जो वेद और विद्या से भी ऊपर है। पिता ने कहा कि सृष्टि में व्याप्त एक सूक्ष्म सत्ता है और वही हम सबका मूल है वही सत्य है, वही आत्मा है, जिसे ‘तत्वमसि अर्थात् वह तुम ही हो…’ कहा गया है।
जिस प्रकार परमात्मा दिखाई नहीं पड़ता, पर सबमें व्याप्त है। इसी प्रकार मूल हमारा शरीर नहीं आत्मा है जो ब्रह्म का अंश है। उसका ज्ञान ही सम्पूर्ण ज्ञान है और वह आत्म साधना से आता है।
इसलिये तुम पहले अपने आपको खाली कर दो और उस आत्म तत्व को जानों। यही बात सद्गुरु शिष्य को कहते है खाली हो जाओं… और शिष्य कहता है मुझे भर दो। अरे भाई! गुरु की बात बहुत गहरी है, जब कोई पात्र भरा हुआ है तो उसमें क्या भरा जा सकता है? उसमें ज्ञान, चेतना, भाव, नवीन विचार जो आत्मज्ञान की ओर ले जाता है उसके लिये तो कोई स्थान ही नहीं है।
सामान्य व्यक्ति नित्य प्रति अपनी मान्यताओं, परम्पराओं और अनुभव के विचारों से अपने आपको भरता ही रहता है और फिर संसार चक्र में अपना कार्य सिद्ध करना चाहता है। प्रसन्नता, शांति और भौतिक-आध्यात्मिक स्वतंत्रता प्राप्त करना चाहता है पर उसके कार्य सिद्ध नहीं हो पाते है। तब वह भगवान के सामने प्रार्थना करता है। जोर-जोर से मंत्र बोलता, स्तोत्र बोलता है और हर प्रार्थना के बाद फल श्रुति अर्थात् फल की कामना और जोर-जोर से बोलता है। पर फल प्राप्ति नहीं होती, फिर मन में विचार आता है किसी महात्मा, सिद्ध योगी, गुरु के पास जाया जाये, शायद वहां मेरा काम हो जाये।
ध्यान देना व्यक्ति पहले गुरु के पास आया पर शायद, किन्तु, परन्तु के भाव के साथ ही जाता है और वह अपनी साधना, पुरशचरण, मंत्र ज्ञान के बारे में बखान करता है और सद्गुरु उद्दालक की तरह कहते है – पहले खाली हो जाओं – भीतर प्रवेश करो।
उसकी सामान्य बुद्धि में यह बात समझ में नहीं आती है क्योंकि वह गुरु के पास अपने ज्ञान का भार उठाये, कामनाओं की पूर्ति और प्राप्ति के लिये आता हैं।
फिर कुछ काल तक विचार करता है, गुरु ने यह बात कहीं है तो उसके पीछे अवश्य ही गहरा भाव रहा होगा। तब वह मंथन करता है जिसका पहला पद है जिज्ञासा। जिज्ञासा उसकी विचार शक्ति को प्रबल बनाती है और फिर उसे एकाएक अनुभव होता है कि यहां मुझे मेरे सभी प्रश्नों का हल मिल जायेगा। तब वह बन जाता है, शिष्य। उसे इतना ही मालूम होता है कि गुरु के बिना मुझे पूर्णत्व प्राप्त नहीं हो सकता।
जिज्ञासु से आगे का पद – शिष्य। शिष्य में कोई अतिरेक जिज्ञासा नहीं होती। वह अपना हाथ फैलाये, खड़ा हो जाता है। इस स्थिति में गुरु शिष्य को पूर्ण परिवर्तन करने हेतु आत्म साधना के मार्ग में ले जाते है और साधक बना देते है। यह प्रक्रिया सबसे कठिन होती है। गुरु से साधक बनाकर उसमें 10 सूत्रों का प्रणिपात करते है –
अहिंसा क्षमा सत्यं ह्रीश्रद्धेन्द्रिय संयमाः। दानमिज्या तपो ध्यानं दशकं धर्म साधनम्॥
अहिंसा, क्षमा, सत्य, लज्जा, श्रद्धा, इंद्रिय निग्रह (संयम), दान, यज्ञ (पूजा), तप और ध्यान – ये दस धर्म (साधना) के साधन हैं।
जब यह स्थिति आती है तो साधना के द्वारा उसके भीतर बल, बुद्धि, विवेक जाग्रत होता है और वह तनाव, भय और अनिश्चितता से मुक्त हो जाता है। उसकी बुद्धि सात्विक होकर, विवेक युक्त होकर उसे व्यर्थ के लोभ, क्रोध, मोह से उच्चतर अवस्था में ले जाती है। तब उसके भीतर का हृदय कमल जाग्रत होता है। उस हृदय कमल में वह शक्ति जाग्रत होती है जिस शक्ति से वह बार-बार प्रार्थना करता है –
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
यहां उसकी सारी कामनाएं पूर्णता की ओर गतिशील हो जाती है। पर यहां एक बहुत बड़ा भेद है। शक्ति को एक विशेष आधार चाहिये। जिसके बिना शक्ति पूर्ण रूप से जाग्रत नहीं हो पाती और शक्ति के इस आधार का नाम है भक्ति।
जब साधक भक्ति में लीन हो जाता है तो वह निश्चित रूप से शक्ति से एकाकार हो जाता है। भक्ति बिना शक्ति अधूरी ही रहती है। इसलिये भक्ति को शक्ति की ज्येष्ठा कहा गया है। जहां भक्ति है, वहां शक्ति अपने आप आ जाती है। भक्त बनकर ही साधक अपनी शक्ति के प्रभाव से आलोकित हो जाता है वह अपने जीवन का उद्देश्य जान लेता है ओर स्वयं में अहं ब्रह्मास्मि.. को अनुभव करता है।
प्रत्येक व्यक्ति की जीवन यात्रा के पांच पद है – 1. जिज्ञासु, 2. शिष्य, 3. साधक, 4. भक्त, 5. सेवक।
सेवा से मन स्वच्छ निर्मल हो जाता है और कोई अहंकार नहीं रहता। वह अपने भीतर ईश्वर को अनुभव करता है। जिस प्रकार एक नदी समुद्र में जाकर छोटी नहीं हो जाती, वह अनन्त हो जाती है। वैसे ही जब साधक शिष्य बनकर सेवक बन जाता है तो वह केवल एक व्यक्ति नहीं रहता, स्वयं शक्ति बन जाता है।
सहज, सरल सेवा भाव से जीवन यात्रा करते रहे, शक्ति सदैव आपके साथ, आपके भीतर, आपके रोम-रोम में व्याप्त रहेगी। भक्ति पर्व – शक्ति पर्व चैत्र नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं आशीर्वाद…
-नन्द किशोर श्रीमाली
Coming soon…
Nand Kishore Shrimali