Dialogue with loved ones – June 2026

अपनों से अपनी बात…

मेरे प्रिय आत्मीय,

शुभाशीर्वाद,

    आज मैं आपसे एक महत्वपूर्ण प्रश्न पूछ रहा हूं और आप सबको इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार कर स्वयं ही उत्तर देना है। इससे आपके जीवन की दिशा आगे लिये निश्चित हो जायेगी कि आप किस प्रकार का जीवन चाहते है और उस जीवन के लिये क्या कर रहे है?

    सीधा सा प्रश्न है – क्या आप प्रसन्न है? क्या आप सुखी है?

    देखने में दोनों बातें एक जैसी लगती है पर दोनों में बड़ा अन्तर भी है। सुख भौतिक भाव है और प्रसन्नता आत्मिक भाव है। एक शरीर और मन से प्रकट होता है और एक आत्मा से प्रकट होता है।

    हमारे वेदों, उपनिषदों में सुख का कोई विवेचन नहीं आया है। उनमें आनन्द का ही वर्णन, विवेचन, विशेषता और उसको प्राप्त करने की प्रक्रिया समझाई गई है। संसार की सारी गतिविधियां वास्तव में आनन्द की प्रप्ति के लिये ही होनी चाहिये। जहां आनन्द होता है, वहां सुख अपने आप उसके पीछे चला आता है। ध्यान देना, आनन्द आगे है और सुख उसके पीछे-पीछे आता है। कभी यह मत समझ लेना कि सुख आयेगा तो उसके पीछे-पीछे आनन्द आयेगा। प्रथम तो आनन्द ही है और सदैव प्रथम ही रहेगा।

आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्‌‍। आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते।
आनन्देन जातानि जीवन्ति। आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति।

    आनन्द ही ब्रह्म है, आनन्द से ही हम उत्पन्न होते है, आनन्द से ही हम जीवित, जीवन्त रहते है और अंत में परमानन्द में विलीन हो जाते है।

    आनन्द के लिये सबके जीवन में एक ही परिभाषा है ‌‘प्रसन्नता‌’। यह प्रसन्नता किस प्रकार प्राप्त की जाये और प्रसन्न भाव से जीवन कैसे जीया जाये? इसकी परिभाषा सबके लिये अलग-अलग हो सकती है। कोई व्यक्ति धन अर्जन को जीवन की प्रसन्नता मानता है, कोई प्रतिष्ठा को, कोई प्रसन्नता के लिये परिवार बनाता है जिससे उसे प्रेम और अपनत्व प्राप्त हो, कोई व्यक्ति ईश्वर में चित्त लगाकर साधना करता है जिससे उसे आत्मिक शांति प्राप्त हो। स्पष्ट है सबका लक्ष्य एक ही है, हम जीवन में प्रसन्न हो।

    लक्ष्य एक ही है, पर यही पर सबसे बड़ा भ्रम भी उत्पन्न होता है क्योंकि ज्यादात्तर लोग सुख-सुविधा, मनोरंजन, धन को ही प्रसन्नता मान लेते है। पर क्या सारी भौतिक उपलब्धियां प्राप्त कर व्यक्ति प्रसन्न हो सकता है?

    सारी भौतिक उपलब्धियां प्राप्त हो जाये फिर भी ज्यादात्तर लोग अपने जीवन में अशांति, अप्रसन्नता ही अनुभव करते है क्योंकि प्रसन्नता मन और आत्मा से जुड़ी हुई अवस्था है।

    वास्तविक प्रसन्नता क्या है? आप सोचेंगे कि मुझे इच्छित वस्तुएं प्राप्त हो जाये, प्रशंसा मिल जाये, मेरे लक्ष्य पूरे हो जाये, मेरे लिये परिस्थितियां अनुकूल हो जाये तो मैं प्रसन्न हूं। ऐसी प्रसन्नता तो परिस्थितियों पर निर्भर करती है इसलिये वह अस्थाई होती है। आज सफलता मिली तो मन प्रसन्न और कल असफलता मिली तो वही मन अप्रसन्न। आज सम्मान मिला तो प्रसन्न, कल आलोचना मिली तो अप्रसन्न। अरे! यह प्रसन्नता तो बाहरी घटनाओं पर आधारित है, यह प्रसन्नता तो केवल मानसिक प्रतिक्रिया है।

    वास्तविक प्रसन्नता तो वह है जो परिस्थितियां बदलने पर भी समाप्त न हो। उपलब्धियों के बिना भी हमारे भीतर जीवित रहे। हमारे अकेलेपन में हमारा साथ दे। प्रसन्नता वह है जो संघर्ष के बीच हमें साहस प्रदान करें।

    वास्तविक प्रसन्नता यह है जब साधक अपने आपको स्वीकार कर लेता है, सन्तुष्ट हो जाता है, जब उसे अपने आप से ही युद्ध न करना पड़े। तब उसके भीतर ईर्ष्या, भय, असुरक्षा समाप्त हो जाती है और उसका स्थान विश्वास, संतोष और समर्पण ले लेते है और यही से वास्तविक प्रसन्नता प्रारम्भ होती है।

    जो व्यक्ति धन, सम्पत्ति, घर-परिवार, मान-सम्मान को प्रशंसा का आधार मानते है वे एक बात स्पष्ट रूप से समझ ले, प्रसन्नता के चार आयाम है जिन्हें में दीक्षा के समय प्रत्येक बार आपको बोलता हूं –

ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं, प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्‌‍।
आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं, बलमस्तु तेजः॥

    प्रसन्नता के ये चार आधार है – आयु, आरोग्य, बल और तेज। साथ ही जीवन में निरन्तर कर्म। ये तत्व आपमें है और इन तत्वों को आप अपने जीवन में, अपने मन में और अपने शरीर में स्थापित कर लेते है तो आपकी प्रसन्नता बाह्‌‍य घटनाओं पर आधारित नहीं होती है। आपकी प्रसन्नता मन और आत्मा की प्रसन्नता में होती है जिसमें आप ‌‘स्वान्त सुखायः‌’ अनुभव करते है।

 ‌   ‘स्वान्त सुखाय‌’, स्व का अर्थ है अपना, अन्त का अर्थ है भीतर और सुखाय का अर्थ है सुख के लिये। तो भाव यह है कि आत्मा की प्रसन्नता के लिये हम कर्म करें।

    मैं आपको किसी उलझन में नहीं डाल रहा हूं, मैं यह भी नहीं कह रहा हूं कि आप घोर स्वार्थी बन जाये, केवल अपने सुख के लिये ही कार्य करें। चाहे उसके लिये साम-दाम-दण्ड-भेद कुछ भी अपनाना पड़े। परन्तु इन प्रवृत्तियों के आधार पर सुख को प्राप्त कर आनन्द में परिवर्तित करना चाहते है तो यह असंभव है।

आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवित…

    सबकुछ आत्मा की तृप्ति के लिये ही होता है, यह उपनिषद्‌‍ भाव है। इसका अर्थ स्वार्थ नहीं है, इसका अर्थ है जब तक मनुष्य स्वयं भीतर से पूर्ण नहीं होगा तब तक वह अपने लिये और दूसरों के लिये भी उपयोगी नहीं हो सकता।

    पितरों का आशीर्वाद, गुरु का ज्ञान और संतों का सान्निध्य इन सब में शक्ति इसलिये है कि वे भीतर से सम्पन्न है। स्वयं की प्रसन्नता आवश्यक है, पर वह प्रसन्नता ऐसी होनी चाहिये कि वह दूसरों के लिये भी प्रसन्नता का स्रोत बनें। जब सेवा में भी यही भाव रहता है तो आत्मिक प्रसन्नता प्राप्त होती है।

मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।

    देखों भाई, मनुष्य के बंधन और मुक्ति दोनों का कारण मन ही है। यदि यह मन तुलना, लालसा, भय और क्रोध में फंसा है तो बाहरी उपलब्धियां कितनी ही प्राप्त क्यों न हो जाये वह दुःख ही देती है। यदि हम मन को शांत, सन्तुलित कर दे तो जीवन का आनन्द प्राप्त होगा।

॥ॐ नमः शिवाय॥

-नन्द किशोर श्रीमाली

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