
Dialogue with loved ones – June 2025
अपनों से अपनी बात…
मेरे प्रिय आत्मीय,
शुभाशीर्वाद,
शक्ति पर्व गुप्त नवरात्रि आषाढ़ शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से प्रारम्भ होकर नवमी तक है। ये नौ दिन विशेष साधनात्मक पर्व है। उसके पश्चात् 9-10 जुलाई को गुरु पूर्णिमा महोत्सव है। आप सभी गुरु पूर्णिमा महोत्सव में अपने-अपने स्थान पर और गुरु के सान्निध्य में ध्यान, पूजन, दैवीय आराधना अवश्य सम्पन्न करेंगे। आप शिष्य है और आपने सोच समझकर गुरु को अपना प्राण आधार बनाया है। उनके साथ अपनी आत्मा के तार जोड़े है।
गुरु पूर्णिमा से पहले मैं आपको एक विशेष प्रश्न कर रहा हूं और इस प्रश्न पर आपको स्वयं मंथन करना है। आपका जो उत्तर होगा उसी से आपके जीवन की दिशा निर्धारित हो सकती है।
इस संसार चक्र में कुछ भी स्थाई नहीं है, परिवर्तन ही जीवन का नियम है। हर क्षण सृष्टि में और सृष्टि के स्वरूप आपके मन, शरीर में भी परिवर्तन आता ही रहता है और जिसने परिवर्तन को जीवन की धारा मान लिया वह अपना जीवन सहज रूप से जीता है। वह जीवन्त कहलाता है, जो जीवन्त है वह परिवर्तनशाली है। जो परिवर्तनशाली नहीं है वह मृतप्रायः है जिसमें प्राणों की चेतना ही नहीं है।
प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि उसके जीवन में सुरक्षा हो, निश्चितता हो। आप एक गंभीर शिष्य है और मैं आपसे स्पष्ट पूछता हूं कि क्या आपको भी अपने जीवन में हर समय सुरक्षा और निश्चिन्तता चाहिये? यदि आपका उत्तर हां है, तो इसका यह अर्थ है कि आप जीवन जी नहीं रहे है घसीट रहे है। आप अपने जीवन को नहीं चला रहे है, जीवन आपको पकड़कर के चला रहा है। जिसमें आपका कोई प्रयास ही नहीं है।
जीवन का दूसरा भाव है, असुरक्षा और अनिश्चतता। और यही धुव्र सत्य है क्योंकि हमारा जीवन, हमारा अस्तित्व अनिश्चित है, असुरक्षित है और खतरों से भरा हुआ भी है क्योंकि जीवन एक विशेष प्रवाह है। इसमें हर समय चीजें बदलती है, लोग बदलते है, विचार बदलते है, कार्य बदलते है और शक्ति का रूपान्तरण होता रहता है। किसी भी व्यक्ति के शरीर में स्थिर शक्ति नहीं होती। उसके शरीर, मन और प्राण में चैतन्य शक्ति होती है।
असुरक्षा से इतना अधिक घबराते क्यों हो? जब जीवन का नियम ही अनिश्चतता है तो उस अनिश्चत जीवन को हम कैसे निश्चित कर सकते है? हम एक ही कार्य कर सकते है कि जीवन के प्रवाह के साथ निरन्तर आगे बढ़ते रहे।
क्या आपके चारों ओर पृथ्वी पर सारे पहाड़ एक जैसे है? क्या सारी नदियां एक जैसी है? क्या सब में प्रवाह एक जैसा है? क्या प्रवाह में जगह-जगह अवरोध नहीं है? जीवन है तो अवरोध होंगे ही होंगे। उन अवरोधों को पार कर आगे बढ़ने में ही नदी की भांति निरन्तर गतिशील होना है।
यदि जीवन में गति चाहते हो तो निश्चितता नहीं आ सकती। गतिशील जीवन हमें अनिश्चत मार्ग पर ले जाता है और उस अनिश्चित मार्ग पर हम अपनी शक्ति के द्वारा कार्य करते हैं और जब कार्य सफल होते है तो आनन्द आता है। आनन्द अनिश्चितता के गहरे अंधकार में, असुरक्षा के भयावह जंगल में प्रवेश करने के बाद ही आता है।
यदि जीवन का एक निश्चित नक्शा बना दिया जाये तो फिर आपके होने या नहीं होने की क्या उपयोगिता है? निश्चित मार्ग पर तो सृष्टि का कोई जीव जन्तु भी नहीं चलता है, पंछी भी आकाश में अनिश्चित मार्ग पर चलते है। असुरक्षित वातावरण में रहते है। फिर मनुष्य हर समय सुरक्षा और निश्चितता क्यों चाहता है?
वास्तव में मनुष्य एक निश्चित ढांचे में जीना चाहता है और धीरे-धीरे वह शक्तिहीन, आलस्य युक्त हो जाता है। जो चल रहा है वह ठीक है, बस ऐसे ही चलता रहे जिन्दगी कट जायेगी।
जिन्दगी कट जायेगी, यह सबसे बड़ा नकारात्मक भाव है। प्रिय शिष्य, जीवन काटने के लिये नहीं मिला है। जीवन मिला है अपने स्वरूप को, अपनी क्षमता को, अपने विचार को पहचान कर विस्तार करने के लिये। जीवन तो बहुत पवित्र मार्ग है, इस मार्ग पर एक निश्चित व्यवस्था का ढांचा मत दो। इस पर जबरदस्ती कुछ लादने की आवश्यकता नहीं है।
एक ईश्वर द्वारा बनाया गया संसार है और उस ईश्वरीय सत्ता के ही हम सब अंश है। तो हम उस ईश्वरीय व्यवस्था के अनुसार अपने जीवन को प्रवाहमान बनायें। कितनी भी सुरक्षा कर लो, जीवन किस घड़ी, कौनसा मोड़ ले लेगा यह कोई नहीं जानता। जब हम जानते ही नहीं है तो हमारे लिये एक ही उपाय है कि हम अपनी आन्तरिक शक्ति में वृद्धि करें। अपने विचारों को उन्नत बनायें, अपनी कार्य क्षमता का विस्तार करें। जो कार्य हमारे पुरखें नहीं कर पाये, उन कार्यों को हम सम्पन्न करें और अपने जीवन को प्रवाह के समान सहज बनायें।
सबसे बड़ी बाधा आपके मन के अन्तर्विरोध है। अन्तर्विरोध का अर्थ है मन का एक भाग कहता है, कुछ नया करो, एक भाग कहता है जो चल रहा है चलने दो। हर बार एक ढांचा बनाते हो और उसके अनुसार जीवन जीना चाहते हो। अन्तर्विरोध जीवन को बासी बना देते है, उसमें न कोई सुगन्ध, न कोई रस, न कोई आनन्द, न कोई नवीनता है। जब प्रवाहमान जीवन व्यवस्था होगी तो आपके मन के ऊपर कोई चीज आरोपित नहीं हो सकती। क्या तुम अपने आपको प्यार करते हो? अपनी आत्मा से प्यार करते हो? अपने जीवन से प्यार करते हो? तो फिर आपको अनिश्चितता से भरे संसार में अपने मजबूत कदम बढ़ाने होंगे। तब आप आपने स्वः को पहचान सकोंगे, तब पूर्ण रूप से आत्मीय बन सकोंगे, अपनी आत्मा से प्रेम कर सकोंगे और अपनी आत्मा के साथ जीओंगे।
कुछ वस्तुएं संग्रह करने के लिये यह जीवन उपहार में नहीं दिया है। ईश्वर ने जीवन दिया है शक्ति की जाग्रति के लिये, स्वतंत्र भाव से जीने के लिये।
क्या आपके घबराने से आपके काम सरल हो जायेंगे, बिल्कुल नहीं। आपकी शक्ति और अधिक मन्द पड़ जायेगी।
यह बात बार-बार अपने आपसे कहो कि मैं अपने जीवन का आदर्श हूं, मेरे स्वयं का एक तंत्र है, एक प्रवाह है और यह जीवन मेरा अपना है और किसी के सामने अपने आपको स्थापित करने की आवश्यकता ही नहीं है।
विचार करो, जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है? सबसे बड़ी उपलब्धि है अपने आप में प्रसन्न रहना। गुरु पूर्णिमा के पर्व तक अपने आपको स्वतंत्र करने के लिये दो चार कदम तो बढ़ाना, आगे गुरु आपका हाथ पकड़कर ले चेलेंगे जहां जीवन का सच्चिदानन्द है।
बहुत-बहुत आशार्वाद…
-नन्द किशोर श्रीमाली
Coming soon…
Nand Kishore Shrimali