Dialogue with loved ones – July 2026

अपनों से अपनी बात…

मेरे प्रिय आत्मीय,

शुभाशीर्वाद,

    जब ईश्वर ने सृष्टि का निर्माण किया तो इस सृष्टि में रहने वाले प्रत्येक प्राणी, जीव, जन्तु, पक्षियों को अलग-अलग प्रकार की आकृति प्रदान की। किसी की भी आकृति दूसरे प्राणी से शत प्रतिशत नहीं मिलती है। हम हजारों लोगों को देखते हैं, स्त्रियों, पुरुषों सबमें शरीर रचना एक समान है लेकिन सबमें कुछ न कुछ अलग है। किसी भी दो व्यक्तियों को, स्त्री-पुरुषों को एक जैसा नहीं बनाया। इसका अर्थ हुआ कि ईश्वर ने संसार में हमें सबसे अद्भुत और अनोखा बनाया और हमारे जैसा किसी और को नहीं बनाया।

    अब ईश्वर ने कहा कि यह तो शरीर की रचना हुई। यह संसार में चलेगा कैसे? कार्य कैसे करेगा? तो उसमें भाव गुण डाला। जिसे हम कहते है ‌‘स्वभाव‌’। तो संसार के प्रत्येक प्राणी का स्वभाव अलग-अलग होता है। किसी का भी स्वभाव, किसी दूसरे के स्वभाव से शत प्रतिशत नहीं मिलता है। यह भी हमारी विशेषता है, विभिन्न प्रकार के स्वभाव वाले स्त्री-पुरुष है। इसीलिये संसार में विविधता है, विचित्रता है, आकर्षण है। सार रूप में हमें जीती जागती, मशीन नहीं बनाया। हमें जीवन्त प्राणी बनाया और आदेश दिया कि जाओ इस संसार में विचरण करो, अपनी पूर्णायु का भोग करो और अपने-अपने स्वभाव से इस संसार में चिन्तन करते हुए जीओं। प्रगति करो, अवनति करो, जीवन का उत्थान करो, जीवन में सृजनकर्त्ता बनो, यह तुम्हारे स्वभाव पर है कि जीवन कैसे चलेगा? यह तुम्हारा स्वभाव रहेगा और अपने स्वभाव के स्वामी तुम स्वयं होंगे। मैं तुम्हारे स्वभाव के परिवर्तन के लिये हर क्षण दिशा निर्देश नहीं दूंगा।

    अब ईश्वर ने दे दिया सबको स्वभाव और मनुष्य जीवन में सबसे अधिक प्रभावी तत्व है उसका स्वभाव। स्वभाव का सीधा अर्थ है – स्व + भाव अर्थात्‌‍ स्वयं का भाव। आपकी प्रकृति, मनोवृति और आपकी प्रतिक्रिया की शैली। इसका अर्थ है जो हम बिना किसी दिखावे और प्रयास के करते है वह हमारा वास्तविक स्वभाव है।

    अब इस वास्तविक स्वभाव को व्यक्ति स्वयं ही देख सकता है। यदि हम दूसरों को पहचानना चाहते है तो यह देखें कि कठिन समय में उसका व्यवहार कैसा है? क्योंकि मनुष्य का वास्तविक स्वभाव प्रसन्नता में, क्रोध में, संकट में, सफलता में प्रकट होता है, पूरे संसार को दिखता है।

    सामान्य रूप में मनुष्य अपने वास्तविक स्वभाव पर एक आवरण डाले रखता है। इसे कहते है चेहरे के पीछे छिपा हुआ चेहरा। बाह्‌‍य रूप से किसी का वास्तविक स्वभाव अथवा उसके मन में क्या है यह देख नहीं सकते है क्योंकि मनुष्य में अभिनय का बहुत गुण है। वह किसी भी स्थिति में नाटक कर सकता है और नाटक करते-करते, धीरे-धीरे खुद की जिन्दगी को भी एक नाटक बना लेता है। वह अपने स्वयं के वास्तविक स्वभाव को ही भूल जाता है।

    आज में यह बात इसलिए कह रहा हूं कि मुझसे आप लोग आकर कहते हो कि गुरु जी में अपने आपको बदलना चाहता हूं। मैं परिवर्तन चाहता हूं, मैं उन्नति चाहता हूं, मैं बाधाओं का समापन करना चाहता हूं, मैं उच्च स्थान प्राप्त करना चाहता हूं, मैं वह करना चाहता हूं जो मेरे परिवार, मेरे मौहल्ले, मेरे समाज में किसी ने नहीं किया। मैं एक अलग प्रकार का व्यक्तित्व बनना चाहता हूं।

    यह सब बातें मुझे रोज सुननी पड़ती है और इन बातों के बीच में आप अपनी समस्याओं की बात भी कह ही देते हो।

    आज मेरी एक बात पर विचार करना, जो तुम करना चाहते हो, बनना चाहते हो। उस मुकाम तक पहुंचने के लिये सबसे अधिक क्या आवश्यक है?

    उसके लिये सबसे अधिक आवश्यक है – स्वभाव शुद्धि, अपने स्वभाव में परिवर्तन करना।

    यह भी बात सही है कि स्वभाव एक दिन में नहीं बनता, आपके बचपन के संस्कार, आपके चारों और का वातावरण, आपकी संगति, आपके अनुभव, आपके विचार, आपके स्वभाव का निर्माण करते है।

    हो सकता है, बचपन में अच्छे संस्कार, अच्छा वातावरण, अच्छी संगति नहीं मिली हो। जीवन में पचासों असफलताएं मिली हो। जिसके कारण विचारों में नकारात्मकता आ गई है।

    तो क्या आप ऐसे स्वभाव के आधार पर अपने जीवन को नवीन और श्रेष्ठ बनाना चाहते है जिसमें केवल दूषित विचार और नकारात्मकता भरी हो। तो फिर नये स्वभाव का, नये व्यक्तित्व का निर्माण कैसे होगा?

    देखों भाई संसार में सामान्यत आठ प्रकार के स्वभाव वाले लोग ही होते है –
1. शांत स्वभाव 2. क्रोधी स्वभाव 3. विनम्र स्वभाव 4. मिलनसार स्वभाव
5. अन्तर्मुखी स्वभाव 6. बहिर्मुखी स्वभाव 7. सकारात्मक स्वभाव 8. नकारात्मक स्वभाव।

    अब इन सब स्वभावों में कुछ गुण भी है, कुछ दोष भी है। किसी भी एक स्वभाव को पूर्ण नहीं कहा जा सकता है।

    यदि आप अपने जीवन को बदलना चाहते हो तो अपने स्वभाव में बदलाव की प्रक्रिया आज से ही शुरु कर दो। और स्वभाव में इन गुणों को बढ़ायें – माधुर्यता, सहनशीलता, करुणा, ईमानदारी, विनम्रता, क्षमाशीलता और सकारात्मकता।

    मनुष्य स्वभाव में निम्न दोष भी है – अहंकार, क्रोध, ईर्ष्या, जिद, असहिष्णुता और स्वार्थ।

    यह दोष एक दिन में नहीं मिटेंगे, इनका धीरे-धीरे नाश करना पड़ता है और इस नाश के लिये आवश्यक है हम अपने स्वभाव का निरन्तर परिष्कार करतेरहे। जिस प्रकार सोने को अग्नि में तपाकर शुद्ध किया जाता है उसी प्रकार साधना के द्वारा स्वभाव को निर्मल बनायें।

    रखों अच्छी संगत, करो स्वाध्याय और शांत रखो मन, करते रहो आत्म निरीक्षण, सदैव लो गुरु का मार्गदर्शन और अपने चिन्तन को रखों सकारात्मक।

    सबसे आवश्यक है अपने व्यवहार का रोज निरीक्षण करते रहो, कि मेरे व्यवहार में क्या अच्छा है, क्या खराब रहा है। जैसे-जैसे स्वभाव शुद्ध होगा, वैसे-वैसे सामान्य व्यक्ति से साधक और साधक से शिष्य की यात्रा गतिशील होगी।

    इस बार गुरु पूर्णिमा का शिविर, प्रभु श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या में सम्पन्न होने जा रहा है, आप सभी गुरु पूर्णिमा पर अयोध्या आने का प्रयास अवश्य करें।

-नन्द किशोर श्रीमाली 

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