Dialogue with loved ones – January 2026

अपनों से अपनी बात…

मेरे प्रिय आत्मीय,

शुभाशीर्वाद,

    विजयी भवः, यशस्वी भवः, आयुष्मान भवः, लक्ष्मीवान्‌‍ भवः…।

    आप सभी को नववर्ष पर आशीर्वाद देते हुए मुझे प्रसन्नता है कि निखिल शिष्य सद्मार्ग पर निष्ठा के साथ गतिशील है। नववर्ष मंगलमय हो, आनन्द के साथ आप अपनी जीवन यात्रा करते रहे।

    आपमें से प्रत्येक साधक जीवन में विजयी होना चाहता है क्योंकि पराजय एक अभिशाप है और विजय एक वरदान है और यह वरदान सबको अपनी जीवन धारा एक विशेष गति से चलाने पर ही प्राप्त होता है।

    पराजय शूल की तरह भीतर ही भीतर चुभती रहती है और बार-बार पराजय की स्थिति आने पर मनुष्य हताश, निराश हो जाता है। पर यह भी सत्य है कि हताश-निराश होने से जीवन का क्रम तो रुकेगा नहीं। हमें अपनी शक्ति से हताशा, निराशा की गहरी खाई को पार करना है, आशा और उत्साह के मार्ग पर चलना है, यही तो विजय यात्रा है।

    स्वभाविक रूप से सबके मन में यह प्रश्न आयेगा कि मैं जीवन में विजय कैसे प्राप्त करूं? याद रखों, विजय जीवन का लक्ष्य नहीं है, एक पड़ाव है एक के बाद दूसरी विजय यात्रा और दूसरी के पश्चात्‌‍ तीसरी विजय यात्रा यह एक अनवरत गतिशील क्रम है।

    तो विजय प्राप्त करने के लिये निश्चित रूप से कुछ नियमों का पालन करना पड़ेगा। कुछ बातों को अपने जीवन का आधार बनाना पड़ेगा। तभी तो ठोस कदमों से निरन्तर विजय प्राप्त करते हुए हम अपने लक्ष्य की ओर बढ़ सकते है। समय के साथ-साथ लक्ष्य भी बदलते है लेकिन जीवन यात्रा के विजय के आधारभूत सूत्र नहीं बदलते है।

    बहुत ही सरल सहज सूत्र है, इन सूत्रों के साथ अपनी जीवन यात्रा में गतिशील रहे।

    1. धर्मनिष्ठ कर्म – जो सही है, शुद्ध है, धर्म के अनुरूप है, जिसमें किसी प्रकार का अनैतिक आचरण नहीं है। उस नीति से कार्य करने पर ही स्थाई विजय प्राप्त होती है।

    2. निश्चय शक्ति – ‌‘यथा संकल्पः तदा वाचा, यथा वाचा तदा कर्माणि‌’, दृढ़ संकल्प से कर्म शक्ति जाग्रत होती है। संकल्प में कोई विकल्प नहीं रखना। अडिग रहना, कोई प्रमाद नहीं, कोई आलस्य नहीं।

    3. मनोनिग्रह – ‌‘अशांतस्य कुतः सुखम्‌‍‌’, अशांत व्यक्ति कैसे सुख प्राप्त कर सकता है? विजय सुख का ही दूसरा नाम है। तो मन को शांत करो, मन को नियन्त्रित करो। विचारों के भंवर जाल में उलझों नहीं। मन को जीत लिया तो परिस्थितियों को जीत ही लोगे।

    4. स्व अनुशासन – ‌‘इन्दियाणि हयानाहुः‌’, इन्द्रियां घोड़े है, यह शरीर रथ है और चलाने वाला है मन, और यदि घोड़े ही बेकाबू होंगे तो जीवन रथ बार-बार उल्टेगा, पल्टेगा ही। रखों संयम, नियम और अनुशासन।

    5. परिश्रम और पुरुषार्थ – ‌‘पुरुषार्थं विना दैवं न किंचित्‌‍‌’, पुरुषार्थ के बिना देवता भी कुछ प्रदान नहीं करते है। भाग्य भी कार्य नहीं करता और पुरुषार्थ के लिये तो कार्य करना ही पड़ेगा। इसलिये निरन्तर, नियमित परिश्रम ही पुरुषार्थ की अग्नि को प्रज्जवलित रखता हैं करते रहो… करते रहो…।

    6. गुरु आशीर्वाद और सत्संग – ‌‘आचार्यवान्‌‍ पुरुषो वेद‌’, गुरु और श्रेष्ठ मार्ग दर्शकों के वचन वेद वाक्य है, वे ही सत्मार्ग दिखा सकते है। गुरु वचनों को केवल श्रवण नहीं करना है। उन्हें जीवन में पालना भी करनी है।

सही ज्ञान = सही दिशा = सुनिश्चित विजय…

    7. अहंकार का त्याग – क्यों व्यर्थ का अहंकार रखा हुआ है। अहंकार, क्रोध और लोभ मनुष्य को अंधा बना देते है। व्यक्ति को अंहकार, क्रोध और लोभ में बड़ा रस आता है लेकिन इससे दीर्घकालीक विजय प्राप्त नहीं हो सकती हैं विजय उसी को प्राप्त होगी जो बिना गर्व, प्रमाद अपना कार्य निरन्तर करता रहता है। आपके कार्यों की सुगन्ध आपसे पहले हजार योजन तक पहुंच जाती है।

    8. समय का सम्मान (काल बोध) – ‌‘कालो हि दुरत्ययः‌’, देखों भाई कालचक्र तो निरन्तर घूम रहा है। इसको कोई रोक नहीं सकता है। इससे कोई जीत भी नहीं सकता है पर समय का सम्मान करने से समय भी हमारा सम्मान करेगा। आपको निर्णय लेना है, सही समय पर सही निर्णय ही विजय प्राप्ति का बड़ा रहस्य है। निर्णय को मत टालो, निर्णय लो और गतिशील हो जाओं। विजय को आना ही पड़ेगा।

    9. धैर्य और साहस (धृति शक्ति) – धैर्य का अर्थ चुपचाप बैठना नहीं है, धैर्य का अर्थ है – हमारी मानसिक स्थिरता और साहस का अर्थ है – कठिनाई में भी आगे बढ़ने की शक्ति प्रज्जवलित रखना। दोनों साथ-साथ चलने चाहिये। बार-बार अधैर्य हमारे साहस को क्षीण कर देता है। प्रयत्न कर रहे है, विजय फल अवश्य प्राप्त होगा। इसमें संदेह क्यों रखते हो?

    10. आत्म विजय – परम विजय – ‌‘यो वेद निहितम्‌‍ गुहायाम्‌‍‌’, अरे भाई! सबसे बड़ी विजय बाहर नहीं होती है, भीतर बहुत ज्यादा अवरोध है। इन अवरोधों को अपनी शक्ति से पार करना है। भीतर के अवरोध है – भय, भीतर का अवरोध है संदेह, भीतर का अवरोध है क्रोध, भीतर का अवरोध है आलस्य, भीतर का अवरोध है अज्ञान।

    यह किसी शत्रु ने आप पर आरोपिता नहीं किये है, यह तो आपके मन ने स्वयं पर आरोपित कर लिये है और इतना भय, संदेह, क्रोध, आलस्य, अज्ञान का भार उठाये चल रहे है और चाहत है विजय की, यह कैस संभव है?

    कालजयी वचन है, जिसने स्वयं को जीत लिया, उसकी हार तो हो ही नहीं सकती। अपने अन्तर्मन पर बार-बार दृष्टि डालते रहे और उसका मंथन करते रहे। मंथन करने से विजय का मक्खन ऊपर आयेगा, फिर दोष नीचे रह जायेंगे, समाप्त हो जायेंगे।

    गुरु रूप में नववर्ष के उपलक्ष में एक विशेष बात कहना चाहूंगा कि –

    मेरे प्रिय शिष्यों, गुण बाजार में नहीं मिलते है। गुण तो आपके भीतर ही है, अपने इन सद्गुणों को प्रेम के साथ प्रल्ल्वित होने दो।

    अवश्य होगा जीवन में –

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धि पुष्टिवर्धनम्‌‍।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्‌‍॥

-नन्द किशोर श्रीमाली 

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