
Dialogue with loved ones – February 2026
अपनों से अपनी बात…
मेरे प्रिय आत्मीय,
शुभाशीर्वाद,
प्रत्येक मनुष्य के शरीर में तीन विभाग होते है। पहला भाग है – उसका दिखने वाला शरीर दूसरा भाग है उसका मन, जो दिखता नहीं है लेकिन सदैव शरीर के साथ विद्यमान रहता है और तीसरा भाग है – उसकी आत्मा जो निरपेक्ष भाव से मनुष्य के मन और शरीर को कार्य करते हुए देखती रहती है।
शरीर की साधना सबको आती है और इस शरीर को निरन्तर युवामय, सौन्दर्यवान बनाने के लिये विविध-विविध प्रयत्न करते है।
साधना का सीधा अर्थ है, शरीर और मन को साधना और शरीर को साधने की क्रिया तो बहुत सरल है। उचित खान-पान, व्यायाम द्वारा शरीर आरोग्य युक्त रह सकता है लेकिन मन को साधना सबसे कठिन क्रिया है। जिसने मन को साध लिया वह मनुष्य योनि में ही मनस्वी बन जाता है श्रेष्ठ व्यक्तित्व बन जाता है। अपने जीवन को सार्थक कर सकता है, अपने लक्ष्यों का संधान कर सकता है।
आप सबके मन में भी यही प्रश्न बार-बार आता है कि गुरुदेव मैं अपने मन को कैसे साधूं? और यही प्रश्न भगवान श्रीराम ने अपनी शिक्षा-दीक्षा के उपरान्त अपने गुरु वशिष्ट से पूछा था और महान् योगी वशिष्ट ने कहा –
चेतन चेतः शममाशा नीत्वा शुद्धेन घोरास्रमिवास्रयुक्त्या।
चिराय साधो त्यज चञ्चलत्वं विमर्कटो वृक्ष इवाक्षतश्रीः॥
हे राम! यह मन एक वृक्ष के समान है। जिसकी जड़े पूरे शरीर में फैली हुई है। चिन्ताएं और दुःश्चिन्ताएं इसके पुष्प है और इच्छाएं और भोग भी इसके फूल है। रोग और बुढ़ापा इसके फल है। आशाएं और लालसाएं इसकी शाखाएं है। विकार और विकृतियां इसके पत्ते है। पर्वत के समान अटल दिखाई देने वाला इस वृक्ष को निरन्तर ‘अनुसंधान’ रूपी प्रचण्ड कुलहाड़े से तरासते रहो।
हे राम! ये मन एक हाथी के समान है जो शरीर रूपी वन में विचरण करता है लेकिन इसकी दृष्टि भ्रम के कारण क्षीण हो गई है। मन के उस कौने में यह प्रविष्ट हो चुका है जहां अज्ञान है। यह ज्ञानी लोगों को सुनने के कारण सत्य को देखना चाहता है पर अपनी धारणाओं और मानसिक बद्धता के कारण सुख-दुःख में लिप्त रहता है। इसलिये हे राम तुम बाद्य समान बनों और अपनी ‘तीव्र बुद्धि’ द्वारा इस हाथी पर प्रहार कर समाप्त करो।
हे राम! यह मन उस कौएं की भांति है जो शरीर रूपी घौसलें में रहता है। यह उस गन्दगी में ही रंगरेलियां मनाता है और शरीर रूपी मांस का भक्षण कर बहुत मजबूत हो गया है। यह मन दूसरों के हृदय को भी पीड़ा पहुंचाता है। मूर्खता के कारण यह कटु और काला है। सदा शोर मचाता है, धून का पक्का है। इसे अपने से बहुत दूर भगा दो, राग-रंग में मन को दूषित मत करो।
हे राम! यह मन एक भूत की तरह है और लालसा नामक भूतनी इसकी सेविका है। अज्ञान रूपी वन में यह निवास करता है और भ्रम के कारण अपने रूप बदलता रहता है। इसे ज्ञान और अनाशक्ति के माध्यम से पीछा छुड़ाया जा सकता है। केवल मंत्रोच्चार से यह नहीं होगा। गुरु कृपा, स्व प्रयास और मंत्रोच्चार द्वारा आत्मज्ञान प्राप्त किया जा सकता है लेकिन उसके पहले तुम्हें ज्ञान और अनासक्ति के माध्यम से इस भूत से पीछा छुड़ाना है। वास्तव में संसार सागर में सभी दुःखों की जड़ अति आसक्ति ही है। जीवन में प्रेम रखें, पर जब ये प्रेम आसक्ति में परिवर्तित हो जाता है तो जीवन अज्ञानमय हो जाता है और जीवन में प्रेम रखों, पर आसक्ति को दूर रखो।
हे राम! यह मन तो एक बन्दर के समान है। यह पूरे जीवन निरन्तर फल प्राप्ति, पुरस्कार, आनन्द की चाह में छलांगे लगाता रहता है और निरन्तर आनन्द, निरन्तर आनन्द, निरन्तर फल की इसकी चाह कभी पूरी होती ही नहीं है…।
तुम्हें पूर्णत्व प्राप्त करना है तो मरकट के समान, बंदर के समान इस मन को चारों तरफ से घेर कर इस बंद कर लो। मन की व्यर्थ की कूद-फांद को रोको…।
हे राम! यह मन बादल के समान है। बादल आते है, जाते है। निरन्तर प्रवाहवान रहते है। उसी प्रकार यह मन भी तरह-तरह की धारणाएं बनाता है, तरह-तरह के संकल्प करता है। जो आवश्यक नहीं है उसे भी प्राप्त करना चाहता है और जो प्राप्त है उसका सही से उपयोग और उपभोग भी नहीं करता है। इसलिये मन के ऊपर छाये हुए इस अज्ञान रूपी बादल को हटा दो। फिर तुम्हारे भीतर एक तेज पुंज प्रकट होगा। वह तेज पुंज है तुम्हारी आत्मा का प्रकाश। तब तुम अपने जीवन की सभी क्रियाएं निश्चिन्त भाव से, द्वंद्व रहित होकर सम्पन्न कर सकोंगे।
हे राम! जिस प्रकार किसी विशेष भयावह शस्त्र का, प्रहार का सामना उससे अधिक शक्तिशाली शस्त्र से करने से ही विजय पाई जा सकती है। उसी प्रकार साधक को इस भयावह मन को, मन की सहायता से ही शांत किया जा सकता है, मन को नियन्तित किया जा सकता है। उस पर विजय प्राप्त की जा सकती है।
हे राम! किसी भी प्रकार की मानसिक उतेजना से बचना है। तुम देखों एक वृक्ष पर पचासों बंदर उपद्रव करते है लेकिन वृक्ष सदैव शांत रहता है। इसलिये तुम अपने अन्दर ‘आत्मशांति’ बनाएं रखों।
मन को सुनों, उस पर विचार करो लेकिन उस विचार को आत्मा की कसौटी पर कसो तब तुम्हं मन के विचारों की सत्यता का और असत्यता का विचार होगा।
जो विचार आत्मा द्वारा शुद्ध हो जाये उस विचार को जीवन में अपना लो…।
हे राम! इस मन की धारणाएं, कल्पनाएं, बहुत सूक्ष्म और तीक्ष्ण होती है। यह हाथी, कौए, भूत, बन्दर, बादल के समान है। इसलिये मन में विचार आते ही, मन में धारणा आते ही उसको अपने जीवन में निश्चित मत करो। इस मन ने अपने आपको समय के जोड़ लिया है और समय के साथ-साथ धारणाएं और कल्पनाएं मन को और अधिक शक्तिशाली बना देती है। तब तुम्हारा मन तुम्हारे वश में नहीं रहता। यह मन तुम्हारी चेतना पर अधिकार स्थापित कर ले, उसके पहले ही बुद्धि, विवेक, ज्ञान और आत्म चिन्तन द्वारा निरन्तर मनन करो कि मेरे जीवन में क्या आवश्यक है और क्या अनावश्यक है। मैं इस संसार सागर में विशुद्ध कैसे रह सकता हूं? और अपनी ज्ञान चेतना को कैसे निरन्तर प्रज्जवलित रख सकता हूं। तब ही तुम्हें परमानन्द की प्राप्ति होगी।
प्रिय साधक सदैव याद रखों, मन ही शत्रु है, मन ही मित्र है। इस पर तुम्ही नियन्त्रण कर सकते हो अपनी चेतना के द्वारा चेतनावान, प्रज्ञावान साधक बनों…।
-नन्द किशोर श्रीमाली
Coming soon…
Nand Kishore Shrimali