
Dialogue with loved ones – December 2025
अपनों से अपनी बात…
मेरे प्रिय आत्मीय,
शुभाशीर्वाद,
आप सभी लोगों का मुझसे एक प्रश्न अवश्य रहता है कि गुरुदेव हम जगत में किस प्रकार का व्यवहार करें जिससे हमें सुख-शांति प्राप्त हो। हमारा उद्वेलित मन शांत रहे क्योंकि हमारे मन में जगत के लोगों के प्रति कभी प्रेम, कभी द्वेष, कभी घृणा का भाव आता है और हमारा मन अशांत हो जाता है?
एक बात सदैव याद रखों कि ईश्वर ने संसार की रचना में सभी प्राणियों में विभिन्न प्रकार के गुण-धर्म प्रदान किये। हर व्यक्ति ने अपने मन के विचारों के अनुसार अपने अनुभवों के अनुसार अपने व्यक्तित्व का निर्माण किया और यह व्यक्तित्व उसकी प्रवृति, प्रकृति और व्यवहार से निरन्रत छलक जाता है।
इस संसार में सब प्राणियों को चार भागों में बांटा जा सकता है।
प्रथम श्रेणी – सुखी प्रवृति वाले लोग
द्वितीय श्रेणी – दुःखी प्रवृति वाले लोग
तृतीय श्रेणी – भली प्रवृति वाले लोग
चौथी श्रेणी – दुष्ट प्रवृति वाले लोग
प्रवृति शब्द का प्रयोग मैंने इसलिये किया है कि संसार में कोई भी व्यक्ति पूर्ण सुखी, पूर्ण दुःखी, पूर्ण भला, पूर्ण दुष्ट नहीं होता है। अपनी प्रवृतियों को, अपने विचारों को जिस दिशा में मोड़ता है वह वैसा ही बन जाता है।
जब इन चार प्रकार के लोगों से ही हमारा रोज सामना होता है तो हमें इनके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिये, जिससे हमारा आन्तरिक सन्तुलन ओर मानसिक सन्तुलन विचलित न हो। हम अप्रभावित रहे और हम स्वयं अपने व्यक्तित्व के प्रति स्वयं की भावनाओं और अपनी निर्मलता के प्रति सचेत रहे।
देखों भाई! सुखी प्रवृति वाले व्यक्ति के साथ हमेशा मित्रता की भावना का व्यवहार करना चाहिये। इससे हमारे चित्त में भी प्रसन्नता का भाव आता है और हम अपने आप खुश हो जाते है। सुखी व्यक्ति हमारे लिये प्रेरणा बन जाता है और हमें अपनी ओर आकर्षित करता है तो निश्चित रूप से हम स्वयं भी अपनी ओर सुख को आकर्षित कर लेते है। यह तो स्पष्ट है कि जिससे हमारी मित्रता होती है, उसकी सहज संवेदनाएं हमारे भीतर भी स्पन्दित होने लगती है और हम उसे तीव्रता से ग्रहण कर पाने में सक्षम हो जाते हे।
पर यह आवश्यक नहीं है कि संसार में हमें सब सुखी व्यक्ति ही मिले क्योंकि सुखी व्यक्ति तो कम है, दुःखी व्यक्ति ज्यादा है। अब दुःखी व्यक्ति से दया का भाव रखों। उसके प्रति दुःख का भाव नहीं रखेंगे, चीड़ का भाव रखेंगे तो हम भी दुःखी हो जायेंगे। दया का भाव रखने से हमारे भीतर करुणा उत्पन्न होगी और हम अपने सामर्थ्य के अनुसार उसको सहयोग भी कर पायेंगे। दया का भाव रखने से, सहयोग का भाव रखने से हमारा चित्त विचलित नहीं होगा। हम शांत रह सकते है।
ज्यादात्तर व्यक्ति सामान्यतः अशांत क्यों है? क्योंकि चारों ओर दुःख अवश्य है यदि हम अपने भीतर झांक कर देखें तो हमारे भीतर दया का भाव बहुत कम हो गया है और दया भाव को प्रकट नहीं करने और अपने सामर्थ्य का प्रयोग नहीं करने से हमारा मन भी दुःख से तृप्त हो जाता है। एक बार सोचना जरूर आज तक आपने किसी के दुःख को देखकर दया तो की है लेकिन अपने सामर्थ्य से सहयोग कितना किया है? आपको अपने प्रश्न का जवाब मिल जायेगा। दया दिखाने के लिये नहीं होती है, दया सामर्थ्य से सहयोग करने से पूर्ण होती है।
ढूंढने जाते है हम भले लोग और मिल जाते है बुरे से बुरे लोग। इस पर भी विचार करेंगे पहले भले लोगों के प्रति हमारा कैसा व्यवहार होना चाहिये? भले लोगों के प्रति हमारा व्यवहार हर्ष का होना चाहिये। यदि कोई व्यक्ति अच्छा कार्य कर रहा है तो हमारा कर्तव्य है कि हम उसके कार्य को सहराये और अच्छे कर्म करने में सहायक बनें। यह हमारी सहज प्रवृति होनी चाहिये। यदि हमने इस सहज प्रवृति को छोड़ दिया और अच्छे कर्म में सहायक नहीं बनकर बाधक बनें तो धीरे-धीरे हम अपने अन्तर्मन में शुष्क व्यक्तित्व बनते जायेंगे और हमारी सहज प्रवृतियां जो कि प्रेम, दया, ममता, सौहार्द है वे भी शुष्क हो जायेंगी। यह भी बहुत बड़ा पुरुषार्थ है। इस पुरुषार्थ का विकास करने से आप ईर्ष्या रहित हो जाते है। आपको स्वयं प्रेरणा प्राप्त होती है कि मुझे भी भला कार्य करना चाहिये।
अब दुष्ट व्यक्ति मिले तो क्या करें? मन को अशांत कर दे, यह तो स्वयं पर अत्याचार हुआ। चित्त को तो शांत रखना है। एक ही उपाय है, दुष्ट व्यक्तियों के प्रति बिल्कुल उपेक्षा रखें। यह सबसे कठिन साधना है। उपेक्षा का भाव रखने से पहले आपको अशुभ की उपेक्षा करनी पड़ेगी। तब एक क्षण के लिये भी अशुभ आपके पास नहीं भटक सकता है। इसके लिये निर्णय करना पड़ेगा कि दुष्टता क्या है? सज्जनता क्या है? जब तक अशुभ के प्रति उपेक्षा नहीं होगी, तब तक हम अशुभ व्यक्तियों के प्रति उपेक्षा नहीं कर पायेंगे।
सोचों, यदि आपके मन में अपशब्द के प्रति उपेक्षा का भाव नहीं होगा तो कोई व्यक्ति आपकी उपस्थिति में अपशब्द बोलता है उसके प्रति उपेक्षा संभव नहीं हो पायेगी। सबसे पहले अपने मन में अशुभ की उपेक्षा करनी है और मन में यह दृढ़ भाव बना लेना है कि न मेरे मन में दृष्टता का भाव आये और न मैं दुष्ट व्यक्तियों के साथ व्यवहार करूं। मेरे पास कुछ अशुभ नहीं आ सकता है क्योंकि मैं अशुभ की उपेक्षा करता हूं, उसके बारे में विचार ही नहीं करता हूं। तब ही आपके जीवन में शुभ का प्रवेश होगा।
इस संसार में चिन्ता का सबसे बड़ा कारण मन का आन्दोलन है। यदि जीवन में सबकुछ ठीक चल रहा है तो आपके मन में यह विचार अवश्य आयेगा कि अभी तो ठीक चल रहा है, अच्छा चल रहा है लेकिन अब कुछ न कुछ अशुभ अवश्य होगा। कोई न कोई बाधा अवश्य आयेगी। सब दिन एक समान थोड़े ही होते है।
निखिल का शिष्य सोचता है कि मैं शुभ भाव से कार्य कर रहा हूं, ईश्वर कृपा से मेरे जीवन में शुभ-शुभ घटित हो रहा है, मुझे श्रेष्ठ कर्म फल की प्राप्ति हो रही है, आगे भी शुभ-शुभ ही होगा, यह विचार सकारात्मक भाव है। इस सकारात्मक भाव में निरन्तर वृद्धि करनी है…
सदैव शुभ-शुभ का विचार करें। सदैव सुख और आनन्द का विचार करें। अशुभ और दुष्टता के भाव आपसे बिल्कुल दूर हो जायेंगे। अशुभ प्रवृतियां, अशुभ शक्तियां आप पर कोई प्रभाव नहीं डाल सकेगी।
शुभ सोंचे, शुभ करें, सुख का सोंचे प्रसन्न मन से अपना कार्य करें यह सबसे बड़ा पुरुषार्थ है।
-नन्द किशोर श्रीमाली
Coming soon…
Nand Kishore Shrimali