Dialogue with loved ones – August 2026

अपनों से अपनी बात…

मेरे प्रिय आत्मीय,

शुभाशीर्वाद,

    सब चाहते है जीवन Perfect हो, सबकुछ शांति से चले लेकिन क्या ऐसा संभव हो पाता है? कोई भी ऐसा समय हमारे जीवन में नहीं आता है, जब सब कुछ Perfect हो। एक चीज को ठीक करते है तो दूसरी चीज की ओर आपका ध्यान बंटता है। अब उस पर ध्यान देना जरूरी होता है। स्वास्थ्य ठीक चल रहा है तो नौकरी, व्यापार की चिन्ता। नौकरी, व्यापार ठीक चल रहा है तो परिवार में कुछ कलह है, कुछ सम्बन्ध अच्छे नहीं है, सम्बन्धों को आपने ठीक कर दिया तो वित्त व्यवस्था गड़बड़ा जाती है।

    देखों भाई, जिन्दगी में कुछ न कुछ चलता रहता है और सबको यही लगता है कि यह समस्या ठीक हो जाये, फिर मैं खुश होऊंगा।

    लेकिन ध्रुव सत्य यह है कि एक चुनौती समाप्त होती है तो दूसरी चुनौती सामने आ जाती है। अपने जीवन में एक क्षण रुककर पीछे की ओर ध्यान दो कि क्या आपके जीवन में ऐसी कोई अवस्था आई है जब आपके पास कोई तनाव चिन्ता नहीं थी। यदि ऐसा हुआ है तो आप बहुत सौभाग्यशाली है, पर जीवन का मतलब ही चुनौतियां है।

    खुश रहने का रहस्य यह नहीं है कि चुनौतियां खत्म हो जायेगी, तब मैं खुश रहूंगा।

    प्रसन्न रहने का एक ही रहस्य है कि चुनौतियों के बीच भी मैं अपनी खुशी को खोज पाऊं, उन्हें अनुभव कर पाऊं। हर बार आप समस्याओं को ही अपनी जिन्दगी का केन्द्र बिन्दु बना लेते हो और सोचते हो कि यह पार हो जाये, उसके बाद मैं आनन्द प्राप्त करूंगा।

    होगा क्या? उम्र बीतते-बीतते 70-80 साल के हो जाओंगे और फिर अपने आप से कहोगे कि अरे मैंने अपनी जिन्दगी में क्या किया? आनन्द तो लिया ही नहीं केवल एक के बाद एक समस्याओं के समाधान में जीवन बिता दिया।

    हमारा जीवन केवल समस्याओं और चुनौतियों को निपटाने के लिये ही नहीं बना है। चुनौतियों के बीच प्रसन्न रहने के लिये ईश्वर ने जीवन का उपहार दिया है और इस उपहार को पाकर खुश रहना ईश्वर की इच्छा का सम्मान करना है।

    चुनौतियां आती है और आयेंगी, यही जीवन का नियम है।

    चुनौतियां आती है तो युद्ध करना ही पड़ेगा। युद्ध के बिना किसी भी समस्या का हल नहीं निकल सकता। पाण्डव 13 साल वनवास में रहे और फिर मांगा क्या था – हमें पांच गांव दे दिये जाये। ये पांच गांव थे – इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली), स्वर्णप्रस्थ (सोनीपत), पानप्रस्थ (पानीपत), व्याघ्रप्रस्थ (बागपत), तिलप्रस्थ (फरीदाबाद)। पूरा भारत तो नहीं मांगा था। हस्तिनापुर साम्राज्य का विस्तार तो पूरे आर्यावर्त में था और पाण्डवों ने तो पांच गांव ही मांगे थे।

    फिर क्या हुआ? आप जानते है, कुरुक्षेत्र का युद्ध हुआ। जिसे हम महाभारत कहते है और महाभारत कितने दिन चला केवल 18 दिन। इन 18 दिनों में पाण्डवों ने गुरु कृष्ण के निर्देशन में अपनी पूरी शक्ति से युद्ध लड़ा। जो समस्या 13 वर्षों की नहीं, उससे भी पहले की थी, पाण्डु और ध्रृतराष्ट्रके समय की थी वह पूरी समस्या 18 दिन में मिट गई और आर्यावर्त में धर्म का साम्राज्य स्थापित हो गया और गीता का यह श्लोक अमर बन गया –

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्‌‍‍॥

    तो फिर आप युद्ध से इतना क्यों घबराते हो? जीवन के सूत्र समझौता, शांति, Adjustment क्यों बना लिये? बार-बार आपको यही सिखाया जाता है कि Adjust करो। घर-परिवार में भी, नौकरी में भी, सम्बन्धियों में भी, लोक-व्यवहार में भी, चाहे आपके साथ कितना ही अहित हो रहा हो आप तिल-तिल कर मरते हो और कहते हो मैं जीवन जी रहा हूं। जी कहा रहे हो? अपने अन्तर्मन की पीड़ा का विस्तार करते रहते हो और वह पीड़ा, वह व्याधि आपके मन, शरीर, बुद्धि सबको कुण्ठित कर देती है। आप अपने स्वयं के पक्ष में खड़े ही नहीं होते हो, जो स्वयं के पक्ष में खड़ा नहीं हो सकता है वह धर्म के पक्ष में कैसे खड़ा होगा। जो सत्य के पक्ष में खड़ा नहीं होगा वह अपने जीवन धर्म को कैसे निभायेगा? वेद वाक्य है – धर्मो रक्षति रक्षितः… जो अपने धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।

    आपका धर्म क्या है? अपने स्वाभिमान की रक्षा करना। धर्म है अनुचित व्यवहार को सहन नहीं करना, धर्म है – अपने आपको परतंत्र नहीं बनाना। धर्म है जो कुछ ईश्वर ने उपहार में दिया है उसकी रक्षा करना और उसमें वृद्धि का प्रयास करना।

    धर्म के लिये, प्रिय मित्र जीवन में निरन्तर युद्ध तो करना ही पड़ेगा।

    जो युद्ध से बचना चाहते है वे जीवन संग्राम में कुचले जाते है। वे स्वयं अपनी ही नजरों से गिर जाते है और युद्ध जीवन का आवश्यक धर्म है। युद्ध के बिना शांति नहीं हो सकती है, कोई समझौता नहीं हो सकता है, सम्बन्ध ठीक नहीं हो सकते है और कार्य में उन्नति भी नहीं हो सकती है। जो हर कार्य को युद्ध की तरह लेता है, वह अपनी शक्ति में अभिवृद्धि करता है। ईश्वर ने प्रत्येक व्यक्ति को चुनौतियों से लड़ने की असीम शक्ति दी है वह अपनी शक्ति का विस्तार उच्चतम रूप में कर सकता है, जिसकी कोई सीमा ही नहीं है।

    भय कोई बाहर की वस्तु नहीं है, कोई शेर आप पर आक्रमण नहीं कर रहा है। भय आपका सबसे बड़ा आन्तरिक शत्रु है, जिसे आपने अपने मन पर ओढ़ रखा है और भय के मित्र है – आलस्य, प्रमाद, चिन्ता और अभिमान।

    न आलस्य करना है, न चिन्ता करनी है, न अभिमान करना है। जीवन की चुनौतियों को स्वीकार करना है, उनसे भिड़ना है। जिस दिन पहली बार भय को निकाल दोगे उस दिन पहली बार आपको अपनी शक्ति का अनुभव होगा और वह शक्ति रोम-रोम में व्याप्त होगी।

    एक और विशेष बात, सदैव याद रखना।

युद्ध नहीं जिनके जीवन में, वे भी बड़े अभागे होंगे।
या तो प्रण को तोड़ा होगा, या फिर रण से भागे होंगे…।

बहुत-बहुत आशीर्वाद

-नन्द किशोर श्रीमाली 

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