Dialogue with loved ones – August 2025

अपनों से अपनी बात…

मेरे प्रिय आत्मीय,

शुभाशीर्वाद,

    जो भी भारत में है वह महाभारत में है। महाभारत केवल एक युद्ध कथा नहीं है, महाभारत जीवन यात्रा की कथा है जिसमें प्रेम है तो विरह भी है, मित्रता है तो घृणा भी है, मैत्री है तो द्वेष भी है, भक्ति है तो नास्तिकता भी है, वाद-विवाद भी है, गृहस्थ जीवन का मर्म भी है, संन्यास जीवन का मर्म भी है। सब प्रकार की विद्याओं का विवेचन है और केन्द्र बिन्दु है – भगवान श्रीकृष्ण।

    संसार में सब कोई शक्ति की बात करता है और हर व्यक्ति यह चाहता है कि मैं शक्ति सम्पन्न हो जाऊं, मैं दूसरों पर राज कर सकूं, मेरा वर्चस्व हो और इसके लिये वह निरन्तर संघर्ष करता रहता है, युद्ध करता रहता है।

    प्रत्येक व्यक्ति युद्ध में, जीवन युद्ध में, जीवन संघर्ष में जीतना चाहता है, क्या यह केवल शक्ति से संभव है? पर शक्ति तो सदैव आक्रमक होती है, शक्ति सदैव संहार भाव से युक्त होती है। शक्ति सदैव संग्राम की ओर प्रवृत रहती है और शक्ति को शौर्य, बल, पराक्रम की उपाधियों से सुसज्जित किया जाता है।

    महाभारत और शक्ति के सम्बन्ध में जब भी बात होती है तो एक नाम अवश्य ही उभरता है – बर्बरीक। बर्बरीक भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र थे। बर्बरीक एक महान्‌‍, पराक्रमी, बलशाली यौद्धा थे। बर्बरीक ने भगवान शिव की साधना-तपस्या से ‘तीन बाण’ प्राप्त किये थे, इस कारण इन्हें तीन बाणाधारी भी कहा जाता है। बर्बरीक ने अपनी माता को वचन दिया था कि वह सदैव कमजोर पक्ष की ओर से, जो युद्ध हार रहे हो, उनकी ओर से ही युद्ध में भाग लेंगे।

    आगे की कथा तो आपको ज्ञात ही है कि श्रीकृष्ण ने पाण्डवों की युद्ध में विजय हेतु ब्राह्मण वेश धारण कर बर्बरीक से उसका शीश मांगा, बर्बरीक ने उनकी आज्ञा मान ली और वचन लिया कि मैं यह महाभारत युद्ध देखना चाहता हूं और उनके शीश को जीवन्त स्वरूप में युद्ध क्षेत्र के नजदीक ही एक पहाड़ी पर स्थापित किया, जहां से बर्बरीक से सम्पूर्ण महाभारत युद्ध को अपनी आंखों से देखा।

    युद्ध की समाप्ति पर पांडवों में ही आपसी बहस होने लगी कि युद्ध में विजय का श्रेय किसको जाता है, इस पर श्रीकृष्ण ने उन्हें सुझाव दिया कि बर्बरीक सम्पूर्ण युद्ध का साक्षी है, अतः एवं उससे बेहतर निर्णायक भला कौन हो सकता है? सभी इस बात से सहमत हो गये।

    पाण्डवों ने बर्बरीक से पूछा कि युद्ध में पाण्डवों ने और उनकी सेना ने कितने पराक्रम से युद्ध लड़ा और इस जीत का श्रेय आप किसे देंगे?

    बर्बरीक ने कहा कि मैं तो केवल एक ही बात देख रहा था कि पाण्डव युद्ध नहीं कर रहे थे, एक विशेष महाकाली शक्ति पूरे शौर्य के साथ संहार कर रही थी और पाण्डवों के पक्ष में महाकाली शक्ति थी, पाण्डव तो गौण थे। महाकाली शक्ति ही श्रेष्ठतम्‌‍ थी और उसी के प्रभाव से युद्ध क्षेत्र में कहने को कह सकते है कि पाण्डव जीते, पर वास्तव में यह जीत महाकाली शक्ति की थी, जो कृष्ण से प्रकट हुई थी।

    अब प्रश्न उठता है कि क्या शक्ति इनती अधिक आवश्यक है कि उसके बिना संसार का कोई कार्य नहीं हो सकता है। निश्चित रूप से यह सत्य है लेकिन शक्ति का एक विशेष पक्ष है और यह पक्ष जब शक्ति के साथ संयुक्त हो जाता है तो विजयश्री अवश्य प्राप्त होती है।

    मेरे विचार से जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है शक्ति के साथ नीति। मैं नीति को शक्ति से ऊपर स्थान देता हूं। जो व्यक्ति नीति और विवेक के साथ शक्ति का उपयोग करते है उन्हें जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विजय प्राप्त होती है।

    निश्चित रूप से जीवन के प्रत्येक संघर्ष का उद्देश्य विजय प्राप्त करना ही है तो प्रिय शिष्य केवल शक्ति से नहीं होगा। अपनी शक्ति को नीति और विवेक से युक्त करो, विवेक नीति का सहोदर है, नीति और विवेक मिलकर अर्थात्‌‍ Planning और Discretion (बुद्धिमानी, विवेक) मिलकर ही शक्ति को सही दिशा की ओर निर्देशित करते है। नहीं, तो शक्ति अपने तीव्र स्वरूप में संहार ही संहार जानती है।

    जब शक्ति विवेक और नीति से युक्त होती है तो संहार के पश्चात्‌‍ सृजन होता है और हमें अपने जीवन में सृजन करना है, निर्माण करना है, नवनिर्माण करना है।

आप साधक है और इन दस बातों का सदैव ध्यान रखें –

1. आप याचक नहीं, दाता है और संसार को बहुत कुछ प्रदान कर सकते है।

2. आपमें क्षमता है और उस क्षमता का निरन्तर और निरन्तर विस्तार कर सकते है। क्षमता विस्तार की कोई सीमा नहीं होती, बस अपनी क्षमताओं को धीरे-धीरे बड़ा बनाते रहना।

3. जीवन में लड़ाईयां नहीं करनी है। लड़ाई तो सामान्य लोग करते है, करना है तो एक बार युद्ध और उस युद्ध में अपनी पूरी शक्ति लगा देनी है। नित्य प्रति युद्ध नहीं होता।

4. ज्ञान रूपी अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित करते रहे, ज्ञान रूपी अस्त्र-शस्त्र सदैव आपके साथ रहेंगे।

5. धन के पीछे भागे नहीं, अपनी कार्य क्षमता को नीति युक्त करें। धन तो अपने आप आ जायेगा।

6. कुछ भी बोलने से पहले मन में उस बात को दोहरा दें और तीन बार विचार कर लें कि क्या मुझे ये शब्द बोलने आवश्यक है और यदि आपको लगता है सही है तो फिर उन वचनों को अवश्य बोलें।

7. आप समर्थ साधक है, बलवान है और बलवान व्यक्ति नीति को सदैव साथ रखता है।

8. जीवन को सहज भाव से जीयें, पल में प्रसन्न, पल में आन्दोलित नहीं हो। अपने मन के विचार प्रवाह का निरीक्षण करें, तो मन का आड़ोलन, विड़ोलन रुक जायेगा। मन को स्थिर रखना सबसे बड़ी साधना है।

9. संसार क्या कहता है, इसकी परवाह नहीं करें। आप अपने आपको क्या कहते है यह परम आवश्यक है।

10. सदैव इस बात को दोहराते रहे कि जगत में सर्वशक्तिमान तो ईश्वर ही है और मुझे ईश्वरीय प्रेरणा और शक्ति निरन्तर प्राप्त होती रहे। ईश्वर के प्रति सदैव समर्पित रहे।

    जीवन में किसी भी बाधा को पार करने से पहले शांत भाव से, विवेक युक्त होकर नीति बनायें और फिर उसमें अपने पूरी शक्ति का संयोजन कर दें आपकी विजय अवश्य ही होगी।

    नवरात्रि शक्ति, नीति और विवेक का पर्व है, महालक्ष्मी, महाकाली और महासरस्वती का पर्व है। केवल संहार की इच्छा न रखें, निरन्तर और निरन्तर नीति और विवेक के साथ अपने भीतर सृजन का भाव स्थापित करें।

-नन्द किशोर श्रीमाली 

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