
Dialogue with loved ones – April 2026
अपनों से अपनी बात…
मेरे प्रिय आत्मीय,
शुभाशीर्वाद,
आप सभी शक्ति के उपासक है, शिव के भी उपासक है। शक्ति साधना, अपने जीवन के कार्यों को भली भांति सम्पादित करने और भीतर की शक्ति को जाग्रत करने के लिये करते है तथा शिव साधना अपने जीवन में शांति, पुष्टता और आरोग्य के लिये सम्पन्न करते है।
इस प्रकार तो शक्ति और शांति दो विपरित ध्रुव हो गये। शक्ति संघर्ष, युद्ध और लड़ाई का प्रतीक है और शिव पूर्ण शांति, अपने आप में तल्लीनता के स्वरूप है।
आप अपने जीवन में क्या चाहते है, शक्ति या शांति? यह प्रश्न बड़ा ही गम्भीर है और विचित्र विरोधाभास से भरा हुआ है।
वैदिक मंत्रों में हम प्रार्थना करते है –
ॐ घौः शान्तिरन्तरिक्ष गुंग शांतिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्व गुंग शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सामा शान्तिरेधि॥
हे परमेश्वर, मेरे लिए द्युलोक, अन्तरिक्ष लोक, पृथिवी, जल, औषधियां, वनस्पतियां, विश्वेदेव, ब्रह्म सभी शान्तिकारक हो। मुझे प्रकृति की शान्ति प्राप्त हो। शान्ति की शान्ति प्राप्त हो। वास्तविक शान्ति प्राप्ति हो।
पर एक विचित्र बात है शांति की स्थापना युद्ध लड़े बिना प्राप्त नहीं हो सकती है।
इसलिये शांति की बात करना तो बहुत आसान है, प्रशंसा करना भी आसान है लेकिन शांति से जीना बड़ा कठिन है। इसलिये हम लोग शांति को मृत्यु के बाद के लिये टाल देते है। उस समय लिखते है – ॐ शांति ॐ।
प्रत्येक मनुष्य जो जीवन में शांति की खोज के लिये भटकता है, वह वास्तव में शांति से दूर होता जाता है। पूरे जीवन अशांति और कलह का बोलबाला रहता है।
जब शांति ही चाहिये तो फिर हर मनुष्य लड़ाई के प्रति क्यों आकर्षित होता है?
लड़ाई में एक तत्व है तीव्र ऊर्जा और हमारा मानव मन स्वभाव से नीरसता से डरता है। उसे चाहिये हर समय उतेजना।
लड़ाई में आवाज ऊंची हो जाती है, हाव-भाव तेज हो जाते है, अहम् टकराता है, भावनाएं उफान पर होती है। यह सब मिलकर मनुष्य के मस्तिष्क में दो हार्मोन्स एड्रेनालिन और डोपामिन को सक्रिय करते है। इसके कारण जोश आता है, शौर्य आता है, संघर्ष की भावना आती है, कार्य तीव्रता से होता है।
कई बार तो ऐसा होता है कि हम सड़क पर दो लोगों की लड़ाई देखकर स्वयं भीतर से उतेजित हो जाते है। जबकि उस लड़ाई से हमारा कोई वास्ता ही नहीं होता है।
दूसरो की लड़ाई देखकर क्यों आनन्द आता है? क्योंकि वहां कोई जोखिम नहीं है केवल रोमांच ही रोमांच है। दूसरों की लड़ाई देखने वाला खुद को सुरक्षित अनुभव करता है लेकिन अपने भीतर वह उसी उत्तेजना को प्राप्त करता है, जो ऊर्जा उसे बिना मूल्य चुकाएं मिल जाती है। ये एक प्रकार से हमारी ऊर्जा का भावनात्मक उपभोग है।
चाहिये मनुष्य को निरन्तर और निरन्तर ऊर्जा और बात करता है शांति की।
कई लोग ऐसे होते है जिनके लिये लड़ाई स्वादिष्ट भोजन के समान होती है। बड़ा ही मजा आता है। ऐसे व्यक्ति वास्तव में भीतर गहरे असंतोष से भरे होते है। स्वयं में असन्तुलित होते है और वे अपने अस्तित्व को संघर्ष के माध्यम से, लड़ाई के माध्यम से महसूस करते है। अब वाक् युद्ध भी हो सकता है, शारीरिक हिंसा भी हो सकती है। ऐसे व्यक्तियों के लिये शांति बहुत खालीपन ले आती है।
अरे भाई! शांति में स्वयं से सामना करना पड़ता है। लड़ाई में हम दूसरों पर दोष डाल देते है और शांति में स्वयं से सामना यह सबसे कठिन है।
ज्यादातर लोगों को लड़ाई यह भ्रम देती है कि मैं जीवित हूं, मैं दूसरों पर प्रभाव डाल रहा हूं, मैं कोई विशेष हूं। जब तक वे किसी से टकराते नहीं, उन्हें अपना होना ही संदिग्ध लगता है।
क्या करें? शांति की और जाये या हर समय लड़ाई की ओर।
ऐसा है शांति धीमी होती है। शांति मौन है जो आपको भीतर उतरने का कहती है और आपके अहम् को भूखा छोड़ देती है। इसलिये शांति में न तो कोई बाहरी दर्शक होता है, न तालियां मिलती है क्योंकि शांति में केवल चेतना होती है। शायद इसी कारण शांति का मूल्य जीवन में नहीं, मृत्यु के बाद समझाया जाता है।
उपनिषद् में जो इतना विशेष शांति मंत्र दिया गया है वह केवल प्रार्थना नहीं है, वह एक बहुत बड़ी चेतावनी है।
यह प्रार्थना समझाती है कि हे मानव! जब तक भीतर का संघर्ष शांत नहीं होता है, बाहर की शांति केवल शब्द है, दिखावा है।
मनुष्य बड़ा विचित्र है, पहले लड़ाई का रस चखता है, फिर थकता है, फिर हारता है और अंत में शांति की ओर मुड़ता है। इसीलिये मनुष्य शांति को गंभीरता से अंत में लेता है।
यह निश्चित बात है कि लड़ाई हमें आकर्षित करती है। संघर्ष हमें आकर्षित करता है और प्राप्ति की भूख आकर्षित करती है। क्योंकि लड़ाई आपको एक ऊर्जा दे देती है। वह ऊर्जा बिना चेतना के मांगे आपको दौड़ाती है।
शांति चेतना मांगती है, वह कहती है – ॐ हृीं मम प्राण देह रोम प्रतिरोम चैतन्य जाग्रय हृीं ॐ नमः।
इसीलिये चेतना सबसे बड़ी साधना है।
देखों भाई लड़ाई तो सहज है पर शांति को अर्जन करना पड़ता है, अपनी चेतना के द्वारा और जो अर्जन करना पड़े उसे हम लोग टाल देते है। हम जब तक जीवन चलता है, युद्ध ही तो करते है। जबकि हमारा परम लक्ष्य है शांति… शांति….,
अपनी चेतना को प्रबुद्ध करो, चेतना का भाव जाग्रत करो.., आत्म शांति प्राप्त करो…।
-नन्द किशोर श्रीमाली
Coming soon…
Nand Kishore Shrimali