Maheswari Tantra

महेश नवमीं 03 जून 2017
शिव का पौराणिक स्वरूप ‘महेश
विलय, संहार, परिवर्तन के देव
शत्रु बाधा, वाद-विवाद, षड्यंत्र,
धन-हानि निवार्णाथ
शिव उच्चरित तंत्र
माहेश्‍वरी तंत्र

शिव को आदि और अनादि माना गया है, हिन्दू धर्म में वे ही सर्वोच्च हैं। शिव का विशिष्ट स्वरूप ‘महेश’ – महा+ईश शब्दों को मिला कर बना है। महा का अर्थ है महानतम, सर्वोच्च या सबसे बड़ा और ईश का अर्थ है, ईश्‍वर। महा+ईश = महेश अर्थात् महादेव – शिव।

 

त्रिदेवों (ब्रह्मा-विष्णु-महेश) में से एक महेश ही भगवान शिव-शंकर हैं। वेदों में भगवान शिव को रुद्र स्वरूप में दर्शाया है। शास्त्रों में भगवान सदाशिव के रुद्र स्वरूप को महाकाल, तारा, भुवनेश, षोडश श्रीविद्येश, भैरव, छिन्नमस्तक, द्यूमवान, बगलामुख, मतंग, कमल आदि स्वरूपों में चित्रित किया है। कई स्थानों पर – कपाली, पिंगल, भीम, विरुपाक्ष, विलोहित, शास्ता, अजपाद, आपिर्बुध्य, शम्भू, चण्ड तथा भव का रूद्र स्वरूप में उल्लेख मिलता है।

 

शिव ने स्वयं से अपनी शक्ति को पृथक किया तथा उसी शक्ति के साथ मिलकर व्यवस्था हेतु एक कर्त्ता पुरुष का सृजन किया जो विष्णु कहलाए। भगवान विष्णु की नाभि से ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई। विष्णु ने ब्रह्मदेव को निर्माण का कार्य सौंपकर स्वयं पालन का कार्य वहन किया। फिर स्वयं शिव के अंशावतार शंकर ने सृष्टी के विलय के कार्य को वहन किया। भगवान शिव का यह शंकर स्वरूप ही महेश हैं।

 

भगवान शंकर स्वयंभू हैं क्योंकि उनकी उत्पत्ति निराकार रूप से हुई थी। स्कंद पुराण में त्रिमूर्ति को स्पष्ट करते हुए कहा गया है – ब्रह्मा, विष्णु, महेश (त्रिमूर्ति) की उत्पत्ति महेश्वर अंश से ही होती है।

 

शिव के विविध रूप

 

शास्त्रों में शिव-स्वरूप के साथ ही उनके रुद्ररूप का भी पर्याप्त वर्णन मिलता है। वे समय-समय पर अवतार लेकर देवताओं के संकटों को दूर करने के लिए राक्षसों का संहार भी करते हैं। भगवान् शिव का ताण्डव तो प्रसिद्ध है ही। यह ताण्डवलीला ही संहारलीला की प्रतीक बताई जाती है। रात्रि के आरम्भकाल – प्रदोष समय में यह ताण्डव नृत्य होता है तब सभी देव और गण इसमें सहयोगी बनते हैं।

 

शिव रुद्र स्वरूप होकर क्रोध करते हैं और उग्र बनकर गजासुर, अन्धकासुर, त्रिपुरासुर, कामदेव आदि का संहार करते हैं। त्रिशूल, खण्डपरशु, खट्वांग आदि भगवान शिव के अस्त्र हैं और अपनी इसी उग्रता के कारण वे मखान्तक ही नहीं, अपितु अंतकान्तक – यमराज का भी अन्त करने वाले बने हुए हैं।

 

शिव काल के भी काल ‘महाकाल’ है। शिव यमराज के पाश से छुड़ाने में पूर्ण समर्थ हैं। वे अपने भक्तों को काल के गाल में जाने से बचाते हैं। दुर्गति से बचाकर सुगति प्रदान करते हैं, अल्पायु को दीर्घायु बनाते हैं। इतना ही नहीं, चिरंजीवी – अमर बनाने में भी समर्थ हैं। फिर छोटी-मोटी बीमारियों से बचाने की तो बात ही क्या!

 

उनके ऐसे ही अपूर्व गुणों के कारण उन्हें ‘मृत्युञ्जय’ कहा गया है, वे ‘अमृतेश्‍वर’ हैं तथ उनकी अर्धाङ्गिनी जगदम्बा ‘अमृतेश्‍वरी’ हैं।

 

माहेश्‍वरी तंत्र

 

‘माहेश्‍वरी तंत्र’ भगवान शिव द्वारा रचित तंत्र सम्बन्धी प्रयोग काव्य है, जिसे अलग-अलग ॠषियों ने आधार बना कर ग्रंथों की रचना की है, माहेश्‍वरी तंत्र मूल रूप से उच्चाटन, विद्वेषण, आकर्षण, मारण एवं वशीकरण, मोहन, स्तम्भन विद्याओं से सम्बन्धित है और जो साधक इनमें दिये गये प्रयोगों को पूर्ण विधि विधान सहित मूल रूप से सम्पन्न करता है, उसे शत प्रतिशत सफलता मिलती ही है।

 

जहां तक शत्रु बाधा निवारण का प्रश्‍न है यह मूल रूप से मारण विद्या के अन्तर्गत आता है। मारण का तात्पर्य मृत कर देने से नहीं है इसका तात्पर्य है कि जिस पर प्रयोग किया जाय वह अपने जीवन में मूल जीवन तत्वों लक्ष्मी, बुद्धि, वृद्धि (सम्मान) से वंचित हो जाय क्योंकि जिस व्यक्ति के पास ये तीन वस्तुएं नहीं होती है वह जीवित होते हुए भी मृतप्राय ही है। मारण तंत्र के सम्बन्ध में भगवान शिव का कथन है कि यह प्रयोग निरर्थक कार्यों के लिए नहीं किया जाना चाहिए, अन्यथा साधक दोषी होता है और किसी मूर्ख द्वारा केवल आजमाने के उद्देश्य से अथवा हंसी-ठट्ठे में किये गये प्रयोगों से ये तंत्र उसी के ऊपर गिर पड़ता है। मूल रूप से यह रक्षाकारक तंत्र है।

 

जब तीव्र आर्थिक हानि की संभावना हो, शत्रु द्वारा जबर्दस्ती धन का हरण कर लिया गया हो, झूठे मुकदमे में शत्रुओं द्वारा फंसा दिया जाय अथवा शत्रुओं द्वारा इज्जत, सम्मान को हानि पहुंचाने का प्रयास किया जाय उस स्थिति में ‘माहेश्‍वरी तंत्र’ का प्रयोग करना चाहिए और एक बार में एक ही बाधा निवारण हेतु तंत्र विधान करना उचित रहता है और यही शास्त्र सम्मत भी है।

 

शत्रु बाधा निवारण प्रयोग

 

इस महातंत्र से सम्बन्धित सभी प्रयोग रात्रि में ही सम्पन्न किये जाते हैं और वह भी संध्याकाल के पश्‍चात् जब एक बार अनुष्ठान हाथ में लें चाहे वह तीन दिन का हो अथवा सात दिन का, उसे पूरा अवश्य करें तथा निश्‍चित संख्या में मंत्र जप करें। इस शत्रु बाधा निवारण प्रयोग में अपनी अभीष्ट सिद्धि के लिए महापर्वत, महाअग्नि, महावायु, महाभूमि और महाआकाश सभी देवताओं को साक्षी रखते हुए उन्हें तीव्रतम रूप में जाग्रत कर प्रयोग सम्पन्न किया जाता है। ये देवता शक्ति के भण्डार कहे गये हैं।

 

साधना सामग्री

 

इस तीव्र प्रयोग हेतु कुछ विशेष सामग्री की आवश्यकता अवश्य रहती है ये सामग्रियां हैं – 1. माहेश्‍वरी यंत्र, 2. छः षट् देवता चक्र, 3. नौ शक्ति पीठ बीज। इसके अतिरिक्त साधना हेतु पुष्प, कुंकुम, अक्षत की आवश्यकता होती है।

 

साधना विधान

 

सोमवार की रात्रि को यह विशेष साधना सम्पन्न की जा सकती है तथा पूर्ण प्रयोग सात दिन का है और 8 वें दिन साधक को हवन अवश्य करना चाहिए। इस विधान में सर्वप्रथम विनियोग तत्पश्‍चात् न्यास सम्पन्न कर शक्ति पूजा सम्पन्न करनी चाहिए। अपने सामने एक लकड़ी के बाजोट पर लाल वस्त्र बिछा दें। साधना से पूर्व नित्यक्रम के अनुसार गुरु पूजन अवश्य सम्पन्न कर लें।

 

साधना क्रम में जिस प्रकार सामग्री की आवश्यकता हो उसी प्रकार स्थापना करते रहें, अतः साधक धूप, दीप जला दें सभी सामग्री अपने पास रख लें और कार्य प्रारम्भ करें। पहले विनियोग, तत्पश्‍चात् न्यास, फिर षट् देवता पूजन, तत्पश्‍चात् पीठ शक्ति पूजन, फिर यंत्र स्थापना पूजन, तत्पश्‍चात् मूल मंत्र का जप निश्‍चित संख्या में करना है –

 

विनियोग

 

ॐ अस्य मन्त्रस्य ब्रह्मा ॠषिः अष्टिछन्दः महापर्वत महाब्धि महाग्नि महावायु महाधरा महाकाश षट् देवताः हुं बीजं ह्रीं शक्तिः ममभीष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोगः।

 

ॠष्यान्दियास

 

ॐ ब्रह्मॠषये नमः शिरसि
अभीष्ट छन्दसे नमः मुखे
महापर्वत महाब्धि महाग्नि महावायु महाधरा
महाकाशाष्ट देवताभ्यो नमः हृदि
हुं बीजाय नमः गुह्मे
ह्रीं शक्तये नमः पादयोः
विनियोगाय नमः सर्वांगे

 

करन्यास

 

ॐ ह्रीं अंगुष्ठाभ्यां नमः
ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः
ॐ ह्रीं मध्यमाभ्यां नमः
ॐ ह्रीं अनामिकाभ्यां नमः
ॐ ह्रीं कनिष्ठिकाभ्यां नमः
ॐ ह्रीं करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः

 

हृदयादिन्यास

 

ॐ ह्रीं हृदयाय नमः
ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा
ॐ ह्रीं शिखायै वषट्
ॐ ह्रीं कवचाय हुं
ॐ ह्रीं अस्त्राय फट्

 

अब सर्वप्रथम तिल की छः ढेरियां बनाकर उन पर छहों ‘षट् देवता चक्र’ स्थापित करें। प्रथम में पर्वत का ध्यान, द्वितीय में समुद्र का ध्यान, तृतीय में अग्नि का, चतुर्थ में वायु का, पंचम् में भूमि का तथा षष्टम् चक्र में आकाश देवता का ध्यान कर स्थापना करें तथा प्रत्येक का पूजन सम्पन्न कर दीप दर्शन कर लें। तत्पश्‍चात् ‘नौ पीठ शक्तियों’ का पूजन करें। इन देवताओं के आगे चावल की नौ ढेरियां बना कर प्रत्येक ढेरी पर एक-एक शक्तिपीठ बीज रखते हुए आठ दिशाओं में आठ शक्तियों तथा मध्य की ढेरी में मंगला शक्ति की स्थापना करें, इनका स्थापना क्रम इस प्रकार से होगा –

 

ॐ जयायै नमः ॐ विजयायै नमः
ॐ अजितायै नमः ॐ अपराजितायै नमः
ॐ नित्यायै नमः ॐ बिलासिन्यै नमः
ॐ दग्ध्यै नमः ॐ अघोरायै नमः
ॐ मंगलायै नमः॥

 

अब ताम्रपात्र में माहेश्‍वरी यंत्र की स्थापना करनी है, इस स्थापना क्रम में सर्वप्रथम यंत्र को घी से शुद्ध करें तत्पश्‍चात् दूध से और फिर जलधारा से अभ्यंग कर स्वच्छ वस्त्र से पौंछ कर ‘ॐ ह्रीं सर्वशक्ति पद्मासनाय नमः’ इस मंत्र से पुष्प का आसन देकर बाजोट के मध्य में स्थापित करें तथा देव आज्ञा से आवरण पूजा प्रारम्भ करें, पुष्पांजलि देते हुए, निम्न मंत्र से प्रार्थना करें –

 

संविन्मयपरो देव परामृतरसप्रिय।
अभिष्टं देहि मे देव परिवारार्चनाय ते॥

 

तत्पश्‍चात् यंत्र पर सिन्दूर की छः बिन्दियां लगावें और स्वयं के भी तिलक करें। फिर यंत्र में स्थापित इन्द्रादि दस दिग्पाल – इन्द्र, अग्नि, यम, नैर्ॠत्य, वरुण, वायु, कुबेर, ईशान, ब्रह्मा, अनन्त तथा देव, अस्त्र-वज्र, शक्ति, दण्ड, खड्ग, पाश, अंकुश, गदा, त्रिशूल, पद्म तथा चक्र आदि का पूजन कर मूल मंत्र का जप प्रारम्भ करना चाहिए।

 

शत्रु बाधा निवारण महामंत्र

 

॥ॐ अं कं चं टं तं पं हुं लों ह्रीं हुं सः हुं फट् स्वाहा॥

 

ध्यान रखें कि इस साधना को पूर्णता के साथ सम्पन्न करने के लिये 16 हजार मंत्रों का जप करना है और यह मंत्र जप ‘तांत्रोक्त काली हकीक माला’ से ही सम्पन्न करना चाहिए। जब मंत्र जप पूर्ण हो जाये तो निम्न छः द्रव्य – धान्य, चावल, घी, सरसों, जौ तथा तिल प्रत्येक की 267 आहुतियां बारी-बारी से देनी है, इससे कुल 1602 आहुतियां अर्थात् 16 हजार मूल मंत्र का दशांश हवन हो जाता है।

 

तत्पश्‍चात् ब्राह्मण भोजन इत्यादि सम्पन्न कराकर साधना को पूर्ण करना चाहिए, यंत्र को अपने पूजा स्थान में स्थापित रखें और संभव हो तो नित्य प्रति शत्रु बाधा निवारण मंत्र के कुछ मंत्र अवश्य ही जप करें, अन्य सामग्री एक लाल कपड़े में बांध देनी चाहिए, सवा माह पश्‍चात् लाल कपड़े में बंधी सामग्री और यंत्र को जल में विसर्जित कर दें। यह साधना प्रयोग अत्यन्त तीव्र प्रयोग है और साधक जिस बाधा निवारण के लिये साधना करता है उसमें उसे सफलता अवश्य ही मिलती है। भगवान शिव सृष्टि में संहार के देव हैं, उनकी कृपा से उसके सभी कार्य सफल होते हैं।

 

साधना सामग्री – 430/-

Mahesh Navmi

03 June 2017

The Mythological form of Shiva: “Mahesh”

The God of Merger, Destruction and Change

Riddance from Enmity, Dispute, Conspiracy and Poverty

Tantra from Lord Shiva

Maaheshwari Tantra


Lord Shiva has been considered as the eternal beginning and the eternal ending. He has been accorded the supremacy in the Hindu religion. “Mahesh”, the distinctive form of Lord Shiva is made from – Maha + ish words. Maha means the greatest, the best or the highest and the word ish means the God itself. Maha+Ish=Mahesh i.e. Mahadev – Shiva

Mahesh is the Lord Shiva-Shankar from the divine Trinity (Brahma-Vishnu-Mahesh). The Vedas depict Lord Shiva in the Rudra form. The holy scriptures-Shastras portray the Rudra form of Lord Sadashiva in the form of Mahakaal, Tara, Bhuvanesh, Shodash Srividesh, Bheirav, Chinnamastak, Dhumwaan, Baglamukh, Matang, Kamal etc. The Rudra form of Kapali, Pingal, Bhima, Virupaaksha, Vilohit, Shaasta, Ajpaad, Aapirbudhya, Shambhu, Chand and Bhav is cited at many places in the holy literature.

Shiva separated his power from Himself and collaborating with the same power, created an executive personality called Vishnu to administer the creation. Lord Brahma was born from the navel of Lord Vishnu. Lord Vishnu entrusted the creation work to Lord Brahma and took upon the tasks of preservation Himself. Then Lord Shankar, a divine manifestation of Lord Shiva Himself, took up the responsibilities of destruction. Mahesh is this Shankar form of Lord Shiva.

Lord Shankar is self-created because He originated from a formless form. The Skand Purana while explaining the Trinity clearly states that the forms of Lords Brahma, Vishnu and Mahesh originated from the Maheshwar excerpt.

 

Various forms of Shiva

The scriptures-Shastras describe the Rudra form of Lord Shiva in great detail. He destroys the demons through various incarnations to eradicate the problems of Gods. The Taandav dance form of Lord Shiva is famous everywhere. This Taandav-dance symbolizes destruction. This Taandav-dance is practised at the beginning (Pradosh) of the night-time, and all Gods and Ganas participate in this divine dance.

The angry form of Lord Shiva is the Rudra form, and He attains a furious form to vanquish Gajaasur, Andhakaasur, Tripuraasur, Kamdev etc. The favourite weapons of Lord shiva are Trishul (trident), Khandparshu, Khatwaang etc. and due to this furious form, He is considered not just as Makhaantak, but rather as Antakaantak , i.e. the one to vanquish Yamraaj, the God of death Himself.

Lord Shiva is the divine controller of the Time itself, therefore He is termed as “Mahakaal“. He has supreme capability to get riddance from the Yamraj’s Paash (lance). He saves His devotees from the vagaries of the time. He replaces misfortune with good-luck and converts quick-death to longevity. He is even capable to turn His devotees into immortal – Chiranjeevi. Why to worry about small, minor illnesses, when associated with such supreme Divinity.

He is termed “Mrityunjaya” due to these unique abilities, He is “Amriteshwar” and His divine consort Jagdamba is “Amriteshwari“.

 

Maaheshwari Tantra

The “Maheshwari Tantra” is a poetry composition of Tantra-prayogs composed by Lord Shiva Himself. Various sages used this divine work to compose multiple texts. Basically Maaheshwari Tantra is related to Uchchatan (Exorcism), Vidweshan (Detestation), Aakarshan (Attraction), Maaran (Termination), Vashikaran (Hypnotism), Mohan (Magnetism), Stambhan (Sublimation) and associated topics. Any Sadhak who practices these prayogs with proper process described in this text certainly accomplishes success.

The elimination of enmity falls under Maaran (Termination) skill. The word Maaran does not mean death, rather the target-recipient of Maaran prayog gets deprived of basic life elements like wealth, intellect, growth, honour etc. Any person lacking these basic elements leads a fate worse than death itself. Lord Shiva has stated about the Maaran prayog that this should never be performed without a specific purpose. The guilty Sadhak himself becomes the target recipient if this practice is performed as an experiment or as a joke. This is basically a defensive Tantra.

The “Maheshwari Tantra” should be practised when one faces a huge potential financial loss, when the enemy forcibly captures the wealth, when one gets trapped in false court-cases, or when the enemies try to harm the reputation and honour. The scriptures recommend to perform a specific Sadhana to terminate a specific obstacle.

 

Termination of Enemy Problems

All prayog-practices related to this Mahatantra are performed at night after the evening. The Anushthaan (whether of 3 days or 7 days) should definitely be completed, once started, with  definite regular Mantra-chants. The Sadhak intensely activates the various Gods – Mahaparvat (Great-Mountain), Mahaagni (Great-Fire), Mahaavayu (Great-Air), Mahaabhumi (Great-Earth) and Mahaakaash (Great-Sky) to obtain desired results in this enemy-termination prayog-practice. These Gods are said to be the treasures-reservoirs of power.

 

Sadhana material

Some special materials are required for this intense Sadhana –

  1. Maaheshwari Yantra
  2. Six Chath Devtaa Chakra
  3. Nine Shakti Peeth Beej

One also requires Flowers, Kumkum, Akshat-rice etc.

 

Sadhana Procedure

This special Sadhana can be done on Monday night. This is a seven day Sadhana practice and the Sadhak should definitely perform Hawan on the 8th day. In this procedure, we should first perform Viniyoga, followed by Nyaasa, leading to worship of Shakti.

Spread a red coloured cloth on a wooden board. You should definitely perform Guru poojan before starting the Sadhana.

Continue to setup the Sadhana materials during the Sadhana, as required. Therefore, the Sadhak should light the Incense and lamp; keep all Sadhana materials with him, and start the Sadhana.

One should first perform Viniyoga, followed by Nyaasa, then Shath Devata worship, followed by Peeth Shakti worship, then Yantra setup worship followed by Mantra chanting of main mantra in a specific number.

 

Viniyoga

Om Asya Mantrasya Brahmaa RishiH AshtiChandaH Mahaaparvat Mahaabdhi Mahaagni Mahaavayu Mahaadharaa Mahaakaash Shat DevataaH Hum Beejam Hreem ShaktiH Mamabhishta Siddhyarthe Jape ViniyogaH ||

 

Rishyaandiyaasa

Om Brahmaarishaye NamaH Shirasi

Abhishta Chandase NamaH Mukhe

Mahaaparvat Mahaabdhi Mahaagni Mahaavaayu Mahaadharaa Mahaakaashaashta Devataabhyo NamaH Hradi

Hoom Bijaaye NamaH Guhmo

Hreem Shaktye NamaH PaadayoH

Viniyogaaya NamaH Sarwaange

 

Karnyaasa

Om Hreem Angushthabhyaam NamaH

Om Hreem Tarjanibhyaam NamaH

Om Hreem Madhyamaabhyaam NamaH

Om Hreem Anaamikaabhyaam NamaH

Om Hreem Kanishthikaabhyaam NamaH

Om Hreem Karatalakarapristhaabhyaam NamaH

 

Hridyaadinyaasa

Om Hreem Hridayaaya NamaH

Om Hreem Shirase Swaaha

Om Hreem Shikhaayei Vashat

Om Hreem Kavachaaya Hoom

Om Hreem Astraaya Phat

 

Thereafter make six mounds of Til, and setup the six “Shat Devataa Chakra” on them.  Setup meditating on Parvat (mountain) on the first, Samudra (Sea) on the second, Agni (Fire) on the third, Vaayu (Air) on the fourth, Bhumi (Earth) on the fifth and Aakash (Sky) God on the sixth Chakra. Perform worship of each along with deep-darshan.  Then worship the “Nine Peeth Shakti”. Make nine mounds of rice in front of these Gods, and setup a Shakti beej on each mound. Setup eight Shaktis in the eight directions, and setup Mangla Shakti in the central mound. These will be setup in the following order –

Om Jayaayei NamaH

Om Vijyaayei NamaH

Om Ajitaayei NamaH

Om Aparajitaayei NamaH

Om Nityaayei NamaH

Om Bilaasinyei NamaH

Om Dagdhyei NamaH

Om Aghoraayei NamaH

Om Mangalaayei NamaH

 

Now you need to setup the Maaheshwari Yantra in the copper plate. First bathe the Yantra in Ghee, then with Milk, and then with  water. Wipe with a clean cloth. Setup on a seat of flowers chanting following Mantra –

“Om Hreem Sarvashakti Padmaasanaaya NamaH”

in the middle of the wooden board. Start the worship considering command from the Gods, pray with following Mantras offering flowers –

Sanvinmayaparo Deva Paraamrtarasapriya |

Ahbishtam Dehi Me Deva Parivaaraarchanaaya Te ||

 

Thereafter make six marks of sindoor on the Yantra, and make a mark on your forehead also. Then, after worshipping the ten Digpaal – Indra, Agni, Yama, Neirkratya, Varun, Vaayu, Kuber, Ishaan, Brahmaa, Anant and Deva-Astra- Vajra, Shakti, Danda, Khadag, Paash, Ankush, Gadaa, Trishul, Padma and Chakra , you should start the Mantra chanting of the main Mantra.

 

Shatru Badhaa Nivaaran Mahamantra

|| Om Am Kam Cham Tam Tam Pam Hum Lom Hreem Hoom SaH Hoom Phat Swaaha ||

 

You should note that 16 thousand Mantra chantings are required to successfully accomplish this Sadhana, and this Mantra chanting should be performed using “Taantrokt Black Hakeek Mala” only. After completion of Mantra chanting, you should offer 267 Ahutis each of following six materials one by one – Dhaanya (grain), Rice, Ghee, Sarson (Mustard), Jou (barley) and Til (Sesame). This results in total 1602 offerings i.e. one tenth of the main Mantra.

Thereafter the Sadhana should be completed by offering food to the Brahmins. Setup the Yantra in your worship-place. Chant some Mantras of the Shatru Badhaa Nivaaran Mantra daily, if possible. Tie the remaining sadhana materials into a red cloth. Drop the Sadhana material tied in the red cloth and the Yantra into a running stream of water after 1.25 months. This Sadhana practice is an extremely intense practice, and the Sadhak definitely obtains success in whatever endeavours he performs the Sadhana for. Lord Shiva is the God of destruction within the Universe, one obtains successes in all endeavours with his blessings.

 

Sadhana Material : 430 /-

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