Dialogue with loved ones – April 2021

अपनों से अपनी बात…
प्रिय आत्मन्,
शुभाशीर्वाद,

आज गुरु रूप में मैं तुम्हें कुछ विशेष बात कहना चाहता हूं। गुरु और शिष्य के सम्बन्ध में बात कहना चाहता हूं। तुम मेरे पास आते हो, अपनी बात कहते हो और फिर चले जाते हो। इस बात का क्या अर्थ है? क्या तुम गुरु से अलग हो? या गुरु के साथ एक मन हो गये है।

इसी बात को कृष्ण ने गीता में कहा, अर्जुन को उपदेश देते हुए – ‘सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं वज्र…।

तुम वाद-विवाद छोड़ दो, संशय छोड़ दो, सारे प्रश्‍न छोड़ दो, बस तुम मेरी शरण में आ जाओं। मेरी शरण में आते ही तुम्हें ज्ञान मिलेगा।

ज्ञान की एक विशेषता है कि ज्योहीं ज्ञान आता है त्योहीं शिष्य शरणागति हो जाता है। इसीलिये कहा गया है कि –

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥

यह जीवन चलता है केवल ज्ञान से केवल विश्‍वास करने से सत्य नहीं बन जाता इसीलिये जो गहरे उतरता है, संशय छोड़कर समर्पित हो जाता है, उसके जीवन में ज्ञान की किरण उतरती है।

जिन खोजा तिन पाईया, गहरे पानी पैठ।
मैं बौरी खोजन गई, रही किनारे बैठ॥

वहीं ज्ञान पा सकता है जो गहरे पानी में डूबने के लिये तैयार है। जो डूबने से डरेगा वह गुरु से, परमात्मा से, शक्ति से एकाकार कैसे होगा? जो डूबता है, वही उबरता है। जो डूबता है, वही पहुंचता है। जो डूबता है वही पाता है।

ज्ञान कैसा हो? उधार का ज्ञान नहीं हो क्योंकि उधार का ज्ञान अहंकार से भर देता है। इगो से भर देता है और जानते हो, सबसे मजेदार बात क्या है? जो ज्ञान भीतर से उत्पन्न होता है, उपजता है उसके उपजते ही अहंकार ऐसे विदा हो जाता है जैसे सुबह सूरज के उगने पर, अंधेरा विदा हो जाता है।

मैं तुम्हारा गुरु हूं और गुरु रूप में ज्ञान को बांटता नहीं हूं। मैं तो तुम्हारे भीतर ज्ञान की प्यास जगाता हूं जिससे तुम अपने भीतर ही उस ज्ञान के अमृत कुण्ड को खोज सको, उसे पा सको और उस अमृत को पीकर तृप्त हो सको।

कितनी गहरी बात है, यदि एक बीज यह सोच ले कि मैं मिट जाऊंगा अपने आपको बचा लूं। तो बीज अपने आपको तो बचा सकता है लेकिन वह वृक्ष नहीं बन पायेगा और वृक्ष नहीं बन पाया तो फिर बीज के जीवन की सार्थकता क्या है?

ज्ञानी वह है जिन्होंने अपने आपको खो दिया, अपने आपको मिटा दिया और वे वृक्ष बन गये। शंकराचार्य बन गये, निखिल बन गये और आज उन वृक्षों के नीचे हजारों लोग छाया ले सकते है।

क्या तुम्हारा जीवन केवल इसलिये बना है कि जिओं और समाप्त हो जाओं। देखों दो ही मार्ग है या तो हम अपने जीवन में वृक्ष बन जायें अथवा धीरे-धीरे गल जाये, विनिष्ट हो जाये।

मैं हर बार तुम्हें एक बात कहता हूं, खुश रहो, खुश रहो, आनन्द से रहो, प्रेम से रहो, अपने आपसे प्रेम करो, अपनी आत्मा से प्रेम करो। बस अपने आप इस जगत से, ईश्‍वर से सबसे प्रेम प्रारम्भ हो जायेगा क्योंकि वह प्रेम तुम्हारे स्वयं के भीतर उपजा है। उधार का प्रेम नहीं है, किसी लालच का प्रेम नहीं है। किसी तृष्णा का प्रेम नहीं है।

ज्ञान का क्या अर्थ है कि तुम्हारे मन में एक ख्याल आये, एक विचार आये कि कहीं मैं यंत्र की भांति तो जीवन नहीं जी रहा? कहीं मैं कोल्हू के बैल की तरह तो नहीं घूम रहा हूं?

जब ये विचार आये तब समझ जाना कि ज्ञान की पहली किरण फूटी है। ज्ञान की पहली किरण यह कह रही है कि आज तक जो जीवन हमने जिया है, वह जीने योग्य है और यदि परमात्मा कभी दुबारा मौका दे तो क्या फिर से इसी जिन्दगी को जीना चाहोंगे? शायद नहीं।

इसका एक अर्थ है कि सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। अपने आपको बदलने की केवल तैयारी ही नहीं करनी है, शुरुआत ही कर देनी है। जिससे मन में पश्‍चाताप नहीं रहे और जीवन को हम शानदार रूप से जीये। जो भी आने वाले वर्ष बाकी है हम अमृत भाव से, अपने ज्ञान से जीये।

जब ज्ञान की शरण में आते हो, ज्ञान के प्रकाश में आते हो, गुरु के शरण में आते हो तो फिर उसके बाद कहीं ओर जाने की आवश्यकता ही नहीं है। दीक्षा ग्रहण करने का अर्थ ही बहुत सरल है, ज्ञान का आश्रय ग्रहण करना और यह आश्रय गुरु ही दे सकते है।

जब तुम द्वार-द्वार भटकते हो, तो फिर अपने ही मन में सन्देह, द्वंद्व में फंस जाते हो। जो ज्ञान की एक किरण फूटी थी, उस पर भी अविश्‍वास का गहरा बादल छा जाता है और अधिक द्वंद्व उत्पन्न होने लगते है।

तुम अपनी आगे की जिन्दगी शानदार – आनन्द अमृत रूप से जीना चाहते हो, तो अपने संदेहों का अन्त करने के लिये गुरु के शरणागत होना ही पड़ेगा। ज्ञान के आश्रय में आना ही पड़ेगा।

एकात्मकता में ही अनन्तता, एक में ही अनन्त है। यही है मूल तत्व, यही है आधारभूत सत्य।

और शरणागत होने का अर्थ है, उस एक के पास चले जाना, उस एक के पास जीत, हार सब छोड़ देना। तब तुम हल्के हो सकोगे। अपने मन पर पड़े बोझों को उतार कर अपने ही इस जीवन को शानदार ढंग से आगे जीओगे।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥

जब ज्ञान उपजता है, तो एक अखण्ड विश्‍वास उपजता है कि गुरु मुझे पार लगा देंगे। मैं अब किनारे नहीं बैठा रहूंगा। मैं कूद गया हूं, जलधार में पार होने के लिये।

सदैव जीयो ज्ञान से, प्रसन्न भाव से, मेरे आत्मीय…

-नन्द किशोर श्रीमाली

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