Yogini Sammohan Sadhana

योगिनी एकादशी – 9 जुलाई 2018

 

योगिनी शक्ति
प्रेम और सौन्दर्य का साकार रूप

 

योगिनियों का सम्बन्ध आद्या शक्ति काली कुल से है। काली ही घोर नामक दैत्य को पराजित करने हेतु योगिनियों के रूप में अवतरित हुईं। प्रत्येक योगिनी विशेष आलौकिक शक्तियों से सम्पन्न होती है। इसीलिये योगिनी के लिये वशीकरण, स्तम्भन, सम्मोहन, सौन्दर्य, अर्थ, काम- रति सुख सहज संभव होता है। वे सदैव चिर यौवना रहती हैं। जो साधक सहचरी के रूप में इनकी साधना करता है, उसे अपने पूरे जीवन में योगिनी का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग मिलता है।
जो साधक को प्रेम, भावना, सौन्दर्य, आकर्षण से युक्त कर उसका कायाकल्प कर देती हैं, हर समय सहचरी बन उसके आपाधापी भरे, जीवन में अमृत का संचार कर देती हैं…

 


प्रेम को महज एक भावना समझने की भूल नहीं करें। प्रेम जिन्दगी को एक राह और दिशा देता है जिससे जीवन सार्थक हो जाता है। जीवन में सफल होने के लिए प्रेम भावना अति आवश्यक है। प्रेम बांधता है, पर बंधन नहीं है। यह तो एक भाव है जो आपको असीम की सीमाओं तक ले जाता है और जीवन को पूर्णता प्रदान करता है क्योंकि जीवन सिर्फ मशीन की तरह काम करने का नाम नहीं है, बल्कि जीवन में रस होना चाहिए। प्रेम-भावना जीवन का अमृत है और जब यह अमृत जीवन में उतरता है, उस समय निराशा, विषाद स्वतः जीवन से लुप्त हो जाते हैं। प्रेम जीवन को अविस्मरणीय बना सकता है, क्योंकि जब प्रेम प्रखर होता है, तब वह चट्टानों को भी काट कर अपना रास्ता निकाल लेता है।

 

हर सफल पुरुष केे पीछे

 

युगों से मान्यता रही है कि हर सफल पुरुष के पीछे स्त्री का हाथ होता है। स्त्री से यहां तात्पर्य उन कोमल भावनाओं से है जो शक्ति रूप में प्रतिपल व्यक्ति के मन में सफलता को प्राप्त करने का भाव दृढ़ करती है। जीवन में जो भी वांछनीय है, जिसकी प्राप्ति जीवन को अर्थपूर्ण बनाती है, उसके मूल में प्रेम ही है। जब प्रेम सफल होता है तो जीवन को सफल कर देता है। अन्यथा जीवन असार हो जाता है- रसविहीन, बिलकुल मशीनी स्वयं विचार कीजिए शिव के केन्द्र में शक्ति स्थापित हैं, विष्णु बिना लक्ष्मी के सहयोग के सृष्टि का पालन-पोषण कैसे करेंगे? बिना सीता के राम और राधा बिना कृष्ण कहां सजते हैं?

 

जीवन में अपनत्व प्रेम के बाद ही आता है। इस अपनत्व का मूर्त रूप पत्नी होती है क्योंकि वह पति की वामांग है। पृथक व्यक्तित्व होते हुए भी, एक दूसरे के पूरक होते हैं पति और पत्नी।

 

थोड़ी विचित्र बात है, पर सफल होने के लिए दुनिया बदलने के लिए जो हौसला चाहिए, उसके मूल में प्रेम का भाव ही होता है जिसमें कहीं न कहीं दीवानगी का पुट होता है।

 

प्रेम और युद्ध में कहा जाता है कि सब जायज है। युद्ध भी तो प्रेम के लिए लड़ा जाता है और जीवन भी एक रण है। प्रेम जीवन को आश्‍वस्त बनाता है। उसे एक सुरक्षा बोध देता है कि जीवन परिपूर्ण है, कोई कमी नहीं उसमें। इस अहसास से बढ़कर जीवन में कुछ भी नहीं है। उसे (सच्चे प्रेम को) प्राप्त करने के लिए व्यक्ति कहां-कहां नहीं भटकता।

 

अब, यह प्रेम भाव पत्नी, पुत्री, माता और बहन के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति से प्राप्त करने के पीछे मंशा क्या है? संसार तो हर व्यक्ति के लिए उसका परिवार है, फिर यह भावनात्मक लगाव किसी अन्य व्यक्ति में क्यों तलाशा जाए? बिलकुल आवश्यकता नहीं है, पर कई बार मन में गुबार होता है, कई बोझ होते हैं जिसे स्वजनों से भी कहा नहीं जा सकता है, क्योंकि भय होता है कि कहीं वे स्वयं न्यायधीश बनकर आपको कटघरे में खड़ा तो नहीं कर देंगे। इस भय के कारण जीवन में विष बढ़ता जाता है। जीवन में खुशियां बांटने से बढ़ती हैं और दुःख बांटने से घटते हैं। ‘जैसे-जैसे विष का बोझ बढ़ता है, जीवन यंत्रवत हो जाता है। समय पर उठो, काम-काज पर जाओ, नियत समय पर खाना खाओ और सो जाओ।

 

ऐसी मशीनी जिन्दगी में रस घोलने के लिए जिस प्रवाह की आवश्यकता होती है, वह सिर्फ और सिर्फ साधनाओं के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है क्योंकि साधनाओं के द्वारा जीवन में शक्ति का एक अजस्र प्रवाह होता है।

 

तंत्र, नारी और प्रेम

 

तंत्र के समग्र संसार में स्त्री मुख्य भूमिका में है और प्रेम के इर्द-गिर्द ही इस संसार का ताना-बाना बुना हुआ है। जीवन में भी नारी केन्द्रीय भूमिका में है और प्रत्येक भूमिका में ममत्व होता है। ममता हर स्त्री का मूल भाव है, और इन स्वरूपों से थोड़ा अलग, जो स्वरूप विशिष्ट नहीं विशिष्टतम है उसी एक स्वरूप का नाम योगिनी है।

 

योगिनी एक नारी देह में आबद्ध होते हुए, नारी मन की समस्त कोमल भावनाओं को एकत्र कर, उपस्थित होते हुए भी अन्ततोगत्वा शक्ति का एक पुंज ही होती हैं, जो नारी देह का आश्रय लेकर सम्मुख आती हैं, क्योंकि शक्ति का आश्रय स्थल सदैव से ही नारी को स्वीकार किया गया है।

 

केवल साधक ही नहीं, प्रत्येक समान्य मनुष्य के जीवन में भावनाएं होती हैं, जो उसे सहज प्रवाह दे सकती हैं। जीवन से यदि भावनाओं को ही निकाल दिया जाए, तो मनुष्य व मशीन में अंतर ही क्या रह जाएगा? किन्तु मनुष्य मशीन नहीं बन सकता।

 

पहले ही इस युग की सभ्यता ने मनुष्य को एक मशीन बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है, जिसके परिणाम की अधिक व्याख्या या वर्णन की आवश्यकता नहीं है।

 

जो सम्मुख है, वह है – ‘एक यंत्रवत् जीवन’, जिसमें न किसी के प्रति कोई ममत्व है, न अपनत्व, न उछाह, न वेग, न प्रेम और न ही जीवन के प्रति कोई लक्ष्य ही।

 

किसी भी व्यक्ति से पूछ कर देखिए, कि उसके जीवन में जो आपाधापी चल रही है या जिस आपाधापी का न केवल उसने सृजन कर लिया है वरन् जिसका वह निरन्तर पोषण भी करता जा रहा है, उसका अर्थ क्या है? क्यों वह सदैव इतना उद्विग्न बना रहता है? इसके बदले उसे क्या प्राप्त हो जाएगा? किसी के पास भी इसका निश्‍चित उत्तर नहीं होगा, क्योंकि इन बातों का कोई निश्‍चित उत्तर हो भी नहीं सकता। ‘भावनाएं’ जो जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि हो सकती हैं, जब उन्हीं का अभाव हो गया, उन्हीं का हनन करके कुछ निर्मित करने की चेष्टा की, तो भूल तो वहीं से प्रारम्भ हो गयी थी।

 

…और इसी बिन्दु पर आकर योगिनी साधना का महत्व स्वयंमेव स्पष्ट हो जाता है, क्योंकि योगिनी साधना का अर्थ ही है – भावनाओं की साधना, अपनत्व व ममत्व की साधना, जीवन में जो कुछ रिक्त रह गया हो, उन सभी को अर्जित कर लेने या पुनः प्राप्त कर लेने की साधना।

 

योगिनी – एक तथ्यात्मक विवचेन

 

तंत्र के आदि रचयिता भगवान शिव हैं और समस्त तांत्रिक विद्याओं की रचना उन्हीं के द्वारा हुई है। बाद के विद्वानों ने शिव रचित विद्याओं में शोध कर उनमें निहित अनेक नवीन रहस्यों को खोज निकाला और अपने शिष्यों में उस ज्ञान का सञ्चरण कर आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अमूल्य थाती के रूप में उन्हें सौंप दिया।

 

भगवान शिव ने पार्वती को योगिनी साधना के विषय में उपदेश दिया है। जब भगवान शिव से पार्वती ने पूछा, कि देवताओं के लिए तो स्वर्ग में सभी प्रकार के सुख उपलब्ध हैं, अप्सराएं नित्य उनकी सेवा करती रहती हैं, उन्हें अक्षुण्ण यौवन प्राप्त है और उनकी समस्त प्रकार की इच्छाएं पूर्ण होती हैं, जबकि पृथ्वी लोक में रहने वाले मनुष्यों की सभी इच्छाएं पूर्ण नहीं हो पातीं और वे अपनी अपूर्ण इच्छाओं के जाल में उलझे जन्म-मरण के चक्र में फंसे रहते हैं। अतः आप ऐसा उपाय बताएं, जिससे मनुष्य भी देवताओं के समान तेजस्वी और पराक्रमी बन सकें और अपनी समस्त प्रकार की इच्छाओं को पूर्णता प्रदान करते हुए दिव्यता के पथ पर अग्रसर हो सकें।

 

भगवान शिव ने उत्तर दिया – योगिनी साधना ही एकमात्र ऐसा उपाय है, जिसके माध्यम से मनुष्य अपनी समस्त प्रकार की इच्छाओं को पूर्णता देते हुए, भौतिक और आध्यात्मिक उपलब्धियों को प्राप्त कर सकते हैं। योगिनी साधना सम्पन्न करने से भोग व मोक्ष की प्राप्ति होती है। ये योगिनियां तत्काल फल देने वाली समस्त प्रकार की अतृप्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाली होती हैं क्योंकि ये मेरी ही शक्ति का स्वरूप हैं।

 

शिव- पार्वती के इस संवाद से स्पष्ट हो जाता है, कि मानव जीवन में योगिनी साधना का क्या महत्त्व है, वास्तव में योगिनियां अर्द्ध देवियां हैं, देव वर्ग के इतर यक्ष, किन्नर, गंधर्व आदि योनियों के समान ही योगिनियों का महत्त्व है।

 

योगिनियां तो तंत्र साधनाओं की आधारभूत देवियां हैं, अपूर्व सौन्दर्य की स्वामिनी होने के साथ ही साथ इन्हें तंत्र के गोपनीय और दुरूह रहस्यों का भी ज्ञान होता है। ये मात्र नारी आकृति ही नहीं होतीं, अपितु पूर्ण चैतन्यता से आपूरित एक विशिष्ट सौन्दर्य की स्वामिनी होती हैं, जिनके रोम-रोम में साधनात्मक बल समाया होता है और नेत्रों में समाई होती है तंत्र की प्रखरता, जो कि आधार है तांत्रिक साधनाओं का।

 

अत्यन्त गौर वर्ण, विद्युत आभा सा देदीप्यमान मुखमण्डल, चराचर विश्‍व को सम्मोहित सी करती झील सी गहरी काली आंखें और उनमें लहराती मादकता और प्रेम का एक अनोखा संगम, मांसल, सुडौल, पुष्ट दूधिया बदन पर दिव्य लेपन और पारद कल्प से प्राप्त चिरयौवन की अठखेलियों के फलस्वरूप सदैव षोडश वर्षीया नवयौवना का साहचर्य जिसे प्राप्त हो जाता है, उसके जीवन में फिर असम्भव जैसा कोई शब्द रह ही नहीं जाता, क्योंकि दिव्य आभा से आपूरित इन अत्यन्त तेजस्विनी सौन्दर्य की मल्लिकाओं के अन्दर समायी होती है तंत्र की विलक्षण तीव्रता।

 

वस्तुतः योगिनी का वर्णन ‘प्रेमिका’ के रूप में होने के पीछे जो कारण है, वह मात्र इतना ही है, कि भारतीय समाज की मान्यताओं में महिला मित्र की कभी कोई अवधारणा ही नहीं रही, लेकिन जो भावगत तात्पर्य है वह सदैव से यही रहा है।

 

साथ ही प्रेमिका का तात्पर्य होता है, एक ऐसी स्त्री, जो अपने प्रिय पर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देने को ही अपना सुख मानती हो और न केवल विलक्षण सौन्दर्य के रूप में वरन् ***इस*** प्रेमिका के रूप में भी योगिनी की समकक्षता कोई भी स्त्री करने में असमर्थ ही होगी।

 

जीवन में भावनाओं के आधार पुनः निर्मित करने व योगिनी के रूप में एक वास्तविक प्रेमिका प्राप्त करने के इच्छुक साधकों हेतु, इस वर्ष दिनांक 9 जुलाई 2018 को घटित होने वाली ‘योगिनी एकादशी’ के अवसर पर एक विशिष्ट साधना पद्धति प्रस्तुत की जा रही है, जिसे सम्पन्न कर वे अपने भावनाशून्य हो रहे जीवन में हास्य, विनोद व मधुरता जैसे कुछ नये पृष्ठ जोड़ पाने में समर्थ हो सकते हैं।

 

साधना विधान

 

इस साधना में प्रवृत्त होने वाले साधकों के लिए आवश्यक है, कि वे ताम्रपत्र पर अंकित ‘योगिनी यंत्र’ व ‘सफेद हकीक माला’ को साधनात्मक उपकरण के रूप में प्राप्त कर लें।

 

यह साधना उपरोक्त दिवस (योगिनी एकादशी) के अतिरिक्त किसी भी शुक्रवार को सम्पन्न की जा सकती है।

 

साधना में वस्त्र आदि का रंग श्‍वेत होना चाहिए तथा दिशा उत्तर मुखी होनी चाहिए। इस साधना में किसी विशेष विधि-विधान को सम्पन्न करने की आवश्यकता नहीं है। यंत्र व माला का सामान्य पूजन करने के पश्‍चात् दत्तचित्त भाव से निम्न मंत्र की ग्यारह माला मंत्र जप सम्पन्न करें –

 

मंत्र

 

॥ ॐ ह्रीं योगिनि आगच्छ आगच्छ स्वाहा॥

 

यह एक दिवसीय साधना है तथा साधना सम्पन्न करने के दूसरे दिन यंत्र व माला को किसी स्वच्छ जलाशय में या निर्जन स्थान पर विसर्जित कर देना चाहिए।

 

जैसा कि प्रारम्भ में कहा, योगिनी शक्ति तत्व का ही एक विशिष्ट प्रस्तुतीकरण होती हैं, अतः यह स्वाभाविक ही है, कि इसे मनोयोग पूर्वक सम्पन्न करने वाले साधक को, जीवन के प्रत्येक पक्ष में अनुकूलता मिलने की क्रिया स्वयंमेव प्रारम्भ हो जाए, चाहे वह धन सम्बन्धी पक्ष हो, स्वास्थ्य की समस्या हो, सौन्दर्य प्राप्ति की कामना हो या गृहस्थ जीवन के किसी भी पक्ष को स्पर्श करता कोई भी विषय।

 

प्रस्तुत साधना की एक अन्य गुह्य विशेषता यह भी है, कि यह प्रबल पौरुष प्राप्ति की साधना भी है। साधना सम्पन्न करने के उपरान्त अपने अनुभवों को गोपनीय ही रखें।

 

प्राण प्रतिष्ठा न्यौ. 430/-
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