Yogini Sammohan Sadhana

योगिनी एकादशी – 9 जुलाई 2018

 

योगिनी शक्ति
प्रेम और सौन्दर्य का साकार रूप

 

योगिनियों का सम्बन्ध आद्या शक्ति काली कुल से है। काली ही घोर नामक दैत्य को पराजित करने हेतु योगिनियों के रूप में अवतरित हुईं। प्रत्येक योगिनी विशेष आलौकिक शक्तियों से सम्पन्न होती है। इसीलिये योगिनी के लिये वशीकरण, स्तम्भन, सम्मोहन, सौन्दर्य, अर्थ, काम- रति सुख सहज संभव होता है। वे सदैव चिर यौवना रहती हैं। जो साधक सहचरी के रूप में इनकी साधना करता है, उसे अपने पूरे जीवन में योगिनी का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग मिलता है।
जो साधक को प्रेम, भावना, सौन्दर्य, आकर्षण से युक्त कर उसका कायाकल्प कर देती हैं, हर समय सहचरी बन उसके आपाधापी भरे, जीवन में अमृत का संचार कर देती हैं…

 


प्रेम को महज एक भावना समझने की भूल नहीं करें। प्रेम जिन्दगी को एक राह और दिशा देता है जिससे जीवन सार्थक हो जाता है। जीवन में सफल होने के लिए प्रेम भावना अति आवश्यक है। प्रेम बांधता है, पर बंधन नहीं है। यह तो एक भाव है जो आपको असीम की सीमाओं तक ले जाता है और जीवन को पूर्णता प्रदान करता है क्योंकि जीवन सिर्फ मशीन की तरह काम करने का नाम नहीं है, बल्कि जीवन में रस होना चाहिए। प्रेम-भावना जीवन का अमृत है और जब यह अमृत जीवन में उतरता है, उस समय निराशा, विषाद स्वतः जीवन से लुप्त हो जाते हैं। प्रेम जीवन को अविस्मरणीय बना सकता है, क्योंकि जब प्रेम प्रखर होता है, तब वह चट्टानों को भी काट कर अपना रास्ता निकाल लेता है।

 

हर सफल पुरुष केे पीछे

 

युगों से मान्यता रही है कि हर सफल पुरुष के पीछे स्त्री का हाथ होता है। स्त्री से यहां तात्पर्य उन कोमल भावनाओं से है जो शक्ति रूप में प्रतिपल व्यक्ति के मन में सफलता को प्राप्त करने का भाव दृढ़ करती है। जीवन में जो भी वांछनीय है, जिसकी प्राप्ति जीवन को अर्थपूर्ण बनाती है, उसके मूल में प्रेम ही है। जब प्रेम सफल होता है तो जीवन को सफल कर देता है। अन्यथा जीवन असार हो जाता है- रसविहीन, बिलकुल मशीनी स्वयं विचार कीजिए शिव के केन्द्र में शक्ति स्थापित हैं, विष्णु बिना लक्ष्मी के सहयोग के सृष्टि का पालन-पोषण कैसे करेंगे? बिना सीता के राम और राधा बिना कृष्ण कहां सजते हैं?

 

जीवन में अपनत्व प्रेम के बाद ही आता है। इस अपनत्व का मूर्त रूप पत्नी होती है क्योंकि वह पति की वामांग है। पृथक व्यक्तित्व होते हुए भी, एक दूसरे के पूरक होते हैं पति और पत्नी।

 

थोड़ी विचित्र बात है, पर सफल होने के लिए दुनिया बदलने के लिए जो हौसला चाहिए, उसके मूल में प्रेम का भाव ही होता है जिसमें कहीं न कहीं दीवानगी का पुट होता है।

 

प्रेम और युद्ध में कहा जाता है कि सब जायज है। युद्ध भी तो प्रेम के लिए लड़ा जाता है और जीवन भी एक रण है। प्रेम जीवन को आश्‍वस्त बनाता है। उसे एक सुरक्षा बोध देता है कि जीवन परिपूर्ण है, कोई कमी नहीं उसमें। इस अहसास से बढ़कर जीवन में कुछ भी नहीं है। उसे (सच्चे प्रेम को) प्राप्त करने के लिए व्यक्ति कहां-कहां नहीं भटकता।

 

अब, यह प्रेम भाव पत्नी, पुत्री, माता और बहन के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति से प्राप्त करने के पीछे मंशा क्या है? संसार तो हर व्यक्ति के लिए उसका परिवार है, फिर यह भावनात्मक लगाव किसी अन्य व्यक्ति में क्यों तलाशा जाए? बिलकुल आवश्यकता नहीं है, पर कई बार मन में गुबार होता है, कई बोझ होते हैं जिसे स्वजनों से भी कहा नहीं जा सकता है, क्योंकि भय होता है कि कहीं वे स्वयं न्यायधीश बनकर आपको कटघरे में खड़ा तो नहीं कर देंगे। इस भय के कारण जीवन में विष बढ़ता जाता है। जीवन में खुशियां बांटने से बढ़ती हैं और दुःख बांटने से घटते हैं। ‘जैसे-जैसे विष का बोझ बढ़ता है, जीवन यंत्रवत हो जाता है। समय पर उठो, काम-काज पर जाओ, नियत समय पर खाना खाओ और सो जाओ।

 

ऐसी मशीनी जिन्दगी में रस घोलने के लिए जिस प्रवाह की आवश्यकता होती है, वह सिर्फ और सिर्फ साधनाओं के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है क्योंकि साधनाओं के द्वारा जीवन में शक्ति का एक अजस्र प्रवाह होता है।

 

तंत्र, नारी और प्रेम

 

तंत्र के समग्र संसार में स्त्री मुख्य भूमिका में है और प्रेम के इर्द-गिर्द ही इस संसार का ताना-बाना बुना हुआ है। जीवन में भी नारी केन्द्रीय भूमिका में है और प्रत्येक भूमिका में ममत्व होता है। ममता हर स्त्री का मूल भाव है, और इन स्वरूपों से थोड़ा अलग, जो स्वरूप विशिष्ट नहीं विशिष्टतम है उसी एक स्वरूप का नाम योगिनी है।

 

योगिनी एक नारी देह में आबद्ध होते हुए, नारी मन की समस्त कोमल भावनाओं को एकत्र कर, उपस्थित होते हुए भी अन्ततोगत्वा शक्ति का एक पुंज ही होती हैं, जो नारी देह का आश्रय लेकर सम्मुख आती हैं, क्योंकि शक्ति का आश्रय स्थल सदैव से ही नारी को स्वीकार किया गया है।

 

केवल साधक ही नहीं, प्रत्येक समान्य मनुष्य के जीवन में भावनाएं होती हैं, जो उसे सहज प्रवाह दे सकती हैं। जीवन से यदि भावनाओं को ही निकाल दिया जाए, तो मनुष्य व मशीन में अंतर ही क्या रह जाएगा? किन्तु मनुष्य मशीन नहीं बन सकता।

 

पहले ही इस युग की सभ्यता ने मनुष्य को एक मशीन बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है, जिसके परिणाम की अधिक व्याख्या या वर्णन की आवश्यकता नहीं है।

 

जो सम्मुख है, वह है – ‘एक यंत्रवत् जीवन’, जिसमें न किसी के प्रति कोई ममत्व है, न अपनत्व, न उछाह, न वेग, न प्रेम और न ही जीवन के प्रति कोई लक्ष्य ही।

 

किसी भी व्यक्ति से पूछ कर देखिए, कि उसके जीवन में जो आपाधापी चल रही है या जिस आपाधापी का न केवल उसने सृजन कर लिया है वरन् जिसका वह निरन्तर पोषण भी करता जा रहा है, उसका अर्थ क्या है? क्यों वह सदैव इतना उद्विग्न बना रहता है? इसके बदले उसे क्या प्राप्त हो जाएगा? किसी के पास भी इसका निश्‍चित उत्तर नहीं होगा, क्योंकि इन बातों का कोई निश्‍चित उत्तर हो भी नहीं सकता। ‘भावनाएं’ जो जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि हो सकती हैं, जब उन्हीं का अभाव हो गया, उन्हीं का हनन करके कुछ निर्मित करने की चेष्टा की, तो भूल तो वहीं से प्रारम्भ हो गयी थी।

 

…और इसी बिन्दु पर आकर योगिनी साधना का महत्व स्वयंमेव स्पष्ट हो जाता है, क्योंकि योगिनी साधना का अर्थ ही है – भावनाओं की साधना, अपनत्व व ममत्व की साधना, जीवन में जो कुछ रिक्त रह गया हो, उन सभी को अर्जित कर लेने या पुनः प्राप्त कर लेने की साधना।

 

योगिनी – एक तथ्यात्मक विवचेन

 

तंत्र के आदि रचयिता भगवान शिव हैं और समस्त तांत्रिक विद्याओं की रचना उन्हीं के द्वारा हुई है। बाद के विद्वानों ने शिव रचित विद्याओं में शोध कर उनमें निहित अनेक नवीन रहस्यों को खोज निकाला और अपने शिष्यों में उस ज्ञान का सञ्चरण कर आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अमूल्य थाती के रूप में उन्हें सौंप दिया।

 

भगवान शिव ने पार्वती को योगिनी साधना के विषय में उपदेश दिया है। जब भगवान शिव से पार्वती ने पूछा, कि देवताओं के लिए तो स्वर्ग में सभी प्रकार के सुख उपलब्ध हैं, अप्सराएं नित्य उनकी सेवा करती रहती हैं, उन्हें अक्षुण्ण यौवन प्राप्त है और उनकी समस्त प्रकार की इच्छाएं पूर्ण होती हैं, जबकि पृथ्वी लोक में रहने वाले मनुष्यों की सभी इच्छाएं पूर्ण नहीं हो पातीं और वे अपनी अपूर्ण इच्छाओं के जाल में उलझे जन्म-मरण के चक्र में फंसे रहते हैं। अतः आप ऐसा उपाय बताएं, जिससे मनुष्य भी देवताओं के समान तेजस्वी और पराक्रमी बन सकें और अपनी समस्त प्रकार की इच्छाओं को पूर्णता प्रदान करते हुए दिव्यता के पथ पर अग्रसर हो सकें।

 

भगवान शिव ने उत्तर दिया – योगिनी साधना ही एकमात्र ऐसा उपाय है, जिसके माध्यम से मनुष्य अपनी समस्त प्रकार की इच्छाओं को पूर्णता देते हुए, भौतिक और आध्यात्मिक उपलब्धियों को प्राप्त कर सकते हैं। योगिनी साधना सम्पन्न करने से भोग व मोक्ष की प्राप्ति होती है। ये योगिनियां तत्काल फल देने वाली समस्त प्रकार की अतृप्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाली होती हैं क्योंकि ये मेरी ही शक्ति का स्वरूप हैं।

 

शिव- पार्वती के इस संवाद से स्पष्ट हो जाता है, कि मानव जीवन में योगिनी साधना का क्या महत्त्व है, वास्तव में योगिनियां अर्द्ध देवियां हैं, देव वर्ग के इतर यक्ष, किन्नर, गंधर्व आदि योनियों के समान ही योगिनियों का महत्त्व है।

 

योगिनियां तो तंत्र साधनाओं की आधारभूत देवियां हैं, अपूर्व सौन्दर्य की स्वामिनी होने के साथ ही साथ इन्हें तंत्र के गोपनीय और दुरूह रहस्यों का भी ज्ञान होता है। ये मात्र नारी आकृति ही नहीं होतीं, अपितु पूर्ण चैतन्यता से आपूरित एक विशिष्ट सौन्दर्य की स्वामिनी होती हैं, जिनके रोम-रोम में साधनात्मक बल समाया होता है और नेत्रों में समाई होती है तंत्र की प्रखरता, जो कि आधार है तांत्रिक साधनाओं का।

 

अत्यन्त गौर वर्ण, विद्युत आभा सा देदीप्यमान मुखमण्डल, चराचर विश्‍व को सम्मोहित सी करती झील सी गहरी काली आंखें और उनमें लहराती मादकता और प्रेम का एक अनोखा संगम, मांसल, सुडौल, पुष्ट दूधिया बदन पर दिव्य लेपन और पारद कल्प से प्राप्त चिरयौवन की अठखेलियों के फलस्वरूप सदैव षोडश वर्षीया नवयौवना का साहचर्य जिसे प्राप्त हो जाता है, उसके जीवन में फिर असम्भव जैसा कोई शब्द रह ही नहीं जाता, क्योंकि दिव्य आभा से आपूरित इन अत्यन्त तेजस्विनी सौन्दर्य की मल्लिकाओं के अन्दर समायी होती है तंत्र की विलक्षण तीव्रता।

 

वस्तुतः योगिनी का वर्णन ‘प्रेमिका’ के रूप में होने के पीछे जो कारण है, वह मात्र इतना ही है, कि भारतीय समाज की मान्यताओं में महिला मित्र की कभी कोई अवधारणा ही नहीं रही, लेकिन जो भावगत तात्पर्य है वह सदैव से यही रहा है।

 

साथ ही प्रेमिका का तात्पर्य होता है, एक ऐसी स्त्री, जो अपने प्रिय पर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देने को ही अपना सुख मानती हो और न केवल विलक्षण सौन्दर्य के रूप में वरन् ***इस*** प्रेमिका के रूप में भी योगिनी की समकक्षता कोई भी स्त्री करने में असमर्थ ही होगी।

 

जीवन में भावनाओं के आधार पुनः निर्मित करने व योगिनी के रूप में एक वास्तविक प्रेमिका प्राप्त करने के इच्छुक साधकों हेतु, इस वर्ष दिनांक 9 जुलाई 2018 को घटित होने वाली ‘योगिनी एकादशी’ के अवसर पर एक विशिष्ट साधना पद्धति प्रस्तुत की जा रही है, जिसे सम्पन्न कर वे अपने भावनाशून्य हो रहे जीवन में हास्य, विनोद व मधुरता जैसे कुछ नये पृष्ठ जोड़ पाने में समर्थ हो सकते हैं।

 

साधना विधान

 

इस साधना में प्रवृत्त होने वाले साधकों के लिए आवश्यक है, कि वे ताम्रपत्र पर अंकित ‘योगिनी यंत्र’ व ‘सफेद हकीक माला’ को साधनात्मक उपकरण के रूप में प्राप्त कर लें।

 

यह साधना उपरोक्त दिवस (योगिनी एकादशी) के अतिरिक्त किसी भी शुक्रवार को सम्पन्न की जा सकती है।

 

साधना में वस्त्र आदि का रंग श्‍वेत होना चाहिए तथा दिशा उत्तर मुखी होनी चाहिए। इस साधना में किसी विशेष विधि-विधान को सम्पन्न करने की आवश्यकता नहीं है। यंत्र व माला का सामान्य पूजन करने के पश्‍चात् दत्तचित्त भाव से निम्न मंत्र की ग्यारह माला मंत्र जप सम्पन्न करें –

 

मंत्र

 

॥ ॐ ह्रीं योगिनि आगच्छ आगच्छ स्वाहा॥

 

यह एक दिवसीय साधना है तथा साधना सम्पन्न करने के दूसरे दिन यंत्र व माला को किसी स्वच्छ जलाशय में या निर्जन स्थान पर विसर्जित कर देना चाहिए।

 

जैसा कि प्रारम्भ में कहा, योगिनी शक्ति तत्व का ही एक विशिष्ट प्रस्तुतीकरण होती हैं, अतः यह स्वाभाविक ही है, कि इसे मनोयोग पूर्वक सम्पन्न करने वाले साधक को, जीवन के प्रत्येक पक्ष में अनुकूलता मिलने की क्रिया स्वयंमेव प्रारम्भ हो जाए, चाहे वह धन सम्बन्धी पक्ष हो, स्वास्थ्य की समस्या हो, सौन्दर्य प्राप्ति की कामना हो या गृहस्थ जीवन के किसी भी पक्ष को स्पर्श करता कोई भी विषय।

 

प्रस्तुत साधना की एक अन्य गुह्य विशेषता यह भी है, कि यह प्रबल पौरुष प्राप्ति की साधना भी है। साधना सम्पन्न करने के उपरान्त अपने अनुभवों को गोपनीय ही रखें।

 

प्राण प्रतिष्ठा न्यौ. 430/-
Yogini Ekadashi – 9 July 2018

 

Yogini Power

The Divine combination of Love and Beauty

 

The Yoginis have a deep connection with Mother Aadhyaa Shakti Kaali. Mother Kali incarnated as Yogini to destroy the Demon Ghore. Each Yogini is endowed with special celestial supernatural powers.  Thus powers like Entrancing, Astriction, Hypnotism, Beauty, Wealth and Lust-Pleasure are mere child’s play for them. They are ever youthful. Any Sadhak who performs Sadhanas to seek their companionship, obtains their assistance through both visible and invisible mediums.

They rejuvenate the Sadhak through love, beauty and charm. They introduce divine joyful nectar in Sadhak’s turbulent  life with Their divine companionship …


Do not make the mistake of treating love as a mere petty emotion. Love provides a path and direction to  life, making it worthwhile. Love is very important to become successful in life. Love binds, but without any bondage. It is a superior  sense leading you to boundless boundaries and it grants perfection to  life. The purpose of life is not to work mechanically like a machine for-ever.  Rather life should be full of joyful flavors. The sense of love is the nectar of your life. The arrival of this divine nectar in your life will  automatically eradicate any feelings of despair and depression. Love can etch unforgettable memories into your life. Strong intense love can easily carve out its  path,  slicing easily through stubborn rocks.

 

Behind every successful man

It is an old adage that “Behind every successful man, there is  always a woman”. The word “woman” here refers to those gentle feelings which fill the person’s mind with strong unabated passion to achieve success. Love is the basic essence of everything, the attainment of which makes life worthwhile. A successful love leads to a successful life. The absence of love stagnates the life, and turns it into a mechanical machine, bereft of any emotion. Mother Shakti is embedded within the center of Lord Shiva. Can you even think of Lord Vishnu nurturing the universe in absence of Goddess Lakshmi. Lord Rama and Lord Krishna too lose their sheen in absence of Mother Sita and Mother Radha.

Love introduces the feelings of affection in life. The wife is the embodiment of this affection, in her left-side position to her spouse. Both husband and wife complement each other, even though both are  different persona.

It sounds a bit strange, but the courage needed to transform the world originates from the divine emotion of intense love, filled with  passionate craziness.

It is said that everything is permitted in love and war. The battles are also fought for love, and this life is a daily battlefield. Love provides confidence in life. It grants a sense of security and fullness to life. There is nothing in life beyond this realization. A person wonders through all extremes to attain this true love.

Now, what is the reason to seek this love from a third person, apart from wife, daughter, mother or sister? The entire world is the family. Why should this  emotional attachment be sought in someone else? It is not essential. However, sometimes, one feeks a number of emotions, which cannot be shared with own kin. There is always a risk that they may turn judgmental.  This fear enhances the poison in life. Sharing enhances the joys and reduces the sorrows. The steady increase of this poison makes life more mechanical and routine.  Get up on time, go to work, eat food at regular times and go to sleep.

The flow of joy in such mechanical lives can only be achieved only through Sadhanas. The Sadhanas inject an intense continuous flow of energy into the life.

 

Tantra, Women and Love

The woman is the central character in the entire system of Tantra, and this entire Tantrik world is woven around love. Woman also play central role in life , and each emotion has a maternal angle. Maternal is the core emotion of each woman. An extraordinary matchless special form of this emotion is the Yogini.

Yogini is bound within a woman’s physical form, combining all her gentle emotions in one supernatural mass of energy (Shakti). Shakti has been residing solely in a female form from times immemorial.

There are passionate emotions in life of each Sadhak, nay each person. These emotions drive the course of life. The elimination of these emotions from life will turn the person into a mechanical machine. However, a human should not become a machine.

This current civilization of ours is anyway, endeavoring in multiple different ways, to turn the human into the machine. There is no need to detail the results and effects.

The resultant “Mechanical Life” does not contain any iota of attachment, affection or  passion for anyone. There is no excitement or  love. Life becomes totally aimless.

Let us try to question any person to understand the meaning of the turbulence in his or her life. The turbulence which was not only created by him, but is also being nurtured by him. Why is he always so distraught? What will he achieve in result? Nobody will have a  definitive answer,because any definitive answer is just not possible. The initial starting point of the mistake itself was to try to create something by destroying or ignoring the vital emotions. These emotions could have been the supreme  achievement of life.

… and the significance of Yogini Sadhana becomes very clear at this point, as the actual meaning of Yogini Sadhana is – the development of emotions, the Sadhana of attachment and maternal, to fulfill whatever is empty in life, or to re-fill these emptiness of life.

 

Yogini – A Factual Description

Lord Shiva is the creator of the Tantra and He has architected all Tantrik theories and knowledge. The scholars later researched into the treatises written by Lord Shiva, and discovered many new secrets contained within them. They taught this divine knowledge to their disciples to handover this invaluable resource to future generations.

Lord Shiva has described the subject of Yogini Sadhana to Goddess Parvati. Goddess Parvati questioned Lord Shiva that the Gods have access to kinds of pleasures in the Heaven. The Apsaras nymphs serve them constantly, they enjoy ever-youthfulness and all of their wishes get fulfilled. However, the wishes and desires of the humans living on Earth remain unfulfilled. They remain entangled in the cycle of birth and death due to the trap of their incomplete desires. Therefore, please explain the method, so that the humans can also become as intense and mighty as the gods, and can move towards the path of divinity while attaining complete fulfillment of all their desires.

Lord Shiva replied – Yogini sadhana is the only method, through which human beings can achieve physical and spiritual success, whilest completely fulfilling all their wishes and desires. Yogini Sadhana grants both Bhog (Material) and Moksha (Salvation) benefits. These Yoginis are fully proficient in granting completeness to all kinds of desires , as They are a manifestation of My own Energy Shakti.

This divine conversation between Shiva-Parvati clarifies the significance of Yogini Sadhana in human life. The Yoginis are actually Demi-Goddesses, and Their importance is similar to that of Yaksha, Kinnar, Gandharva etc. of the Dev Itar Yonis.

Yoginis are the basic foundation Goddesses of Tantra Sadhanas. Apart from being extremely beautiful, They also possess divine knowledge of  confidential and rare secrets of the Tantrik science. They are not mere female forms, rather, They are masters of special beauty entwined with full intense consciousness. Each pore of Their body is embedded with strong spiritual energy. Their eyes are intense with Tantrik brightness, which is the very essence of the Tantra Sadhanas.

Extremely Fair complexion, an electric aura radiating on the face, dark deep black serene eyes hypnotizing the entire universe, full of a  unique confluence of wavy drunkenness and love, fleshy, athletic proportionate form, divine coating on the milky skin, and Paarad-Kalp bestowed ever-youthful sixteen year old beauty.  Nothing is impossible for anyone who attains companionship of such a divine form. The intense Tantrik energy is fully embedded within this divine queen of beauty.

The reason behind the fact that Yogini is described in the form of “female lover” is that even though, the traditional Indian society has no concept of “female lover” in its beliefs, the necessity of such emotional meaning has always been there.

Moreover a lover signifies a woman, who considers sacrificing of  her entire being for her lover, as her supreme pleasure. No other woman will be able to compare herself with the love in this form, as expressed by *** this *** lover form of Yogini

The Sadhaks wishing to recreate the foundation of emotions and seeking a true lover in Yogini form, can perform this special Yogini Sadhana on “Yogini Ekadashi” falling on  9th July 2018. This will enable them to add new pages of humor, wit and sweetness in their current emotionless  life.

 

Sadhana Procedure

The Sadhaks desirous of performing this Sadhana should obtain the copper-inscribed “Yogini Yantra” and “White Hakeek Mala” as Sadhana materials.

This Sadhana can also be performed on any Friday, apart from the above mentioned Yogini Ekadashi day.

The Sadhak should wear white clothes, and the Sadhana should be performed while seated facing North direction. There is no need to complete any specific procedure in this Sadhana. After completing normal worship of the Yantra and Mala, the Sadhak should perform 11 mala Mantra-chanting of following Mantra with full concentration :

 

Mantra

|| Om Hreem Yogini Aagachch Aagachch Swaahaa ||

 

This is a one-day Sadhana, the Yantra and Mala should be immersed in a clean water reservoir or in a lonely place on the second day.

As mentioned above, the Yogini is a special embodiment of the Shakti Tatva. Therefore it is natural that the Sadhak performing this Sadhana with full concentration, will start getting favorable results automatically in every aspect of life – wealth-related, health-problems, desire for beauty or any other aspect of domestic life.

Another abstruse feature of this Sadhana is that this Sadhana also bestows strong vitality and virility. Maintain confidentiality of your experiences  after accomplishing the Sadhana.

Consecrated and Sanctified Sadhana Articles – Rs. 430 /-

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