Vishwamitra Praneet Rinnharta Jyeshtha Lakshmi Sadhana

आंवला नवमीं – अक्षय नवमीं  29 अक्टूबर 2017
विश्‍वामित्र प्रणीत ॠणहर्ता ज्येष्ठा लक्ष्मी साधना

 

ब्रह्मॠषि विश्‍वामित्र एक ज्वलंत उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, मनुष्य की संकल्प शक्ति का और कैसे उस शक्ति द्वारा सृष्टि के नियम भी बदले जा सकते हैं। मनुष्यों को ‘ब्रह्म-गायत्री’ मंत्र का वरदान देने वाले ब्रह्मॠषि विश्‍वामित्र ही हैं। ॠग्वेद के दस मंडलों में तृतीय मंडल, जिसमें 62 सूक्त हैं के द्रष्टा ॠषि विश्‍वामित्र हैं, जो इस प्रकार है –

 

तत्सवितुर्वरेण्यम् भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् 

 

ब्रह्मॠषि विश्‍वामित्र की ही अनुकम्पा से मनुष्यों को गायत्री मंत्र प्राप्त हुआ और इस मंत्र की महिमा जग-विदित है।

 

ब्रह्मॠषि विश्‍वामित्र का जीवन पूर्णता की परिभाषा है। क्षत्रिय कुल में महाराज कौशिक के रूप में जन्म लेकर भी ब्रह्मॠषि विश्‍वामित्र ने ब्राह्मणत्त्व को ज्ञान और तप के बल पर धारण किया। ॠषि वशिष्ठ और ब्रह्मॠषि विश्‍वामित्र के बीच शास्त्रार्थ युद्ध हुआ, जिसमें विश्‍वामित्र का क्षत्रिय बल, ॠषि वशिष्ठ के ब्रह्म बल के समक्ष पराजित हो गया। विश्‍वामित्र ने ठान लिया कि ब्रह्मत्त्व प्राप्त करना है और 1000 वर्षों तक तपस्या की, उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने स्वयं उन्हें ‘राजर्षि’ की उपाधि दी। अर्धांगिनी के रूप में विश्‍वामित्र ने अप्सरा मेनका का वरण किया, जिसे इन्द्र ने उनकी तपस्या को भंग करने के उद्देश्य से भेजा था। राजा त्रिशंकु जो उनके शिष्य थे उनको सशरीर स्वर्ग भेजना चाहा और जब सृष्टि के नियम बीच में आए, तब विश्‍वामित्र ने नवीन स्वर्ग ही रच दिया।

 

अपने पुरुषार्थ, सच्ची लगन, उद्यम और तप की गरिमा से राजर्षि विश्‍वामित्र ने ब्रह्मत्त्व को प्राप्त किया और जब विष्णु ने रामावतार लिया तो उनके गुरु बनने का सौभाग्य भी विश्‍वामित्र को प्राप्त हुआ। न सिर्फ उन्होंने प्रभु श्रीराम का विवाह माता सीता के साथ कराया, अपितु जब रावण सीता का हरण  करके ले गया, तब लंका-युद्ध में ‘विजय क्रियमाण साधना’ द्वारा श्रीराम के लिए विजय का मार्ग सुनिश्‍चित किया।

 

ब्रह्मॠषि विश्‍वामित्र का सिद्धान्त था – ‘चुनौतियों से भिड़ जाना और उन पर विजय प्राप्त करना।

 

विश्‍वामित्र और लक्ष्मी

 

धन के अभाव में ब्रह्मॠषि विश्‍वामित्र का आश्रम बिखरने लगा था और उन्होंने दिव्य मंत्रों से लक्ष्मी को आबद्ध कर दिया, कोई गिड़गिड़ाए नहीं बल्कि मंत्रों की शक्ति के द्वारा मां लक्ष्मी को उनके पूर्ण सहस्र रूपों में अपने आश्रम में स्थापित किया। भगवती लक्ष्मी के पूर्ण स्वरूप को अपने आश्रम में स्थापित कर विश्‍वामित्र ने अद्वितीय गौरव को प्राप्त किया।

 

जन साधारण के लिए जो लक्ष्मी के अभाव में प्रायः कर्ज के कुचक्र में फंसे पड़े हैं, ब्रह्मॠषि विश्‍वामित्र ने ‘ज्येष्ठा लक्ष्मी’ साधना का आशीर्वाद प्रदान किया।

 

किसी समय यक्ष ने युद्धष्ठिर से प्रश्‍न किया था कि, ‘सुखी कौन है?’’ युद्धष्ठिर का उत्तर था, ‘जो ॠणमुक्त है, वही सुखी है।

 

पूर्णता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा ॠण है। ॠण ग्रस्त व्यक्ति के मन की सुख-शांति गिरवी पड़ जाती है। आमदनी बढ़ती तो है, पर ॠण के भेंट चढ़ जाती है और ॠण गरीबी में ही फलता-फूलता है। ऐसे समय में विश्‍वामित्र प्रणीत ‘ज्येष्ठा लक्ष्मी’ साधना लोगों के लिए अनिवार्य है।

 

देखा जाए तो मनुष्य का जीवन धन के अभाव में मृतप्रायः हो जाता है। कलियुग में निर्धनता एक अभिशाप है और गरीबी के करण व्यक्ति सौ तरह के पाप कर्म करता है। धर्म पथ से विमुख होने में निर्धनता का विशेष योगदान है। कहा भी गया है, ‘भूखे भजन न होय गोपाला, ले लो अपनी कंठी माला’ अर्थात् भोजन से भजन जुड़ा हुआ है। अब गरीबी कई बार अकर्मण्यता जनित होती है और कई बार कर्ज के कारण होती है। जब आमदनी से ज्यादा खर्च किया जाता है, तब कर्ज खुद ब-खुद व्यक्ति पर चढ़ जाता है, पर कर्ज के साथ उसका बंधु सूद भी आता है जो आय को खा जाता है। कर्ज जब रिश्तों में घुसता है, तब प्रेम विदा ले लेता है, तभी तो कहते हैं कि -‘उधार प्रेम की कैंची है।’ कितने भी अच्छे रिश्ते हों, उधार देकर देखिए, या तो रिश्ता टूट जाएगा, या फिर उधार लौटने की आस।

 

कुछ लोग चार्वाक सिद्धान्त में विश्‍वास रखते हैं और ‘उधार को शान से जीवन के स्टैन्डर्ड को बनाए रखने के लिए लेते हैं।

 

यावत् जीवेत् सुखम् जीवेत्, ॠणं कृत्वा घृतं पिबेत’ के सिद्धान्त के समर्थक न सिर्फ अपने लिए दरिद्रता खरीदते हैं, अपितु अपने वंशजों को भी गरीब बना देते हैं।

 

अक्षय लक्ष्मी

 

लक्ष्मी को अक्षय करने के मार्ग में ॠण सबसे बड़ी बाधा है, क्योंकि ॠण आपकी आमदनी में सेंध लगा देती है। कमाते तो आप अच्छा हैं, पर एचख चुकाते-चुकाते बचता कम है। अब घर, गाड़ी छोटी भी चल सकती है, छुट्टियों के लिए नैनीताल भी सही है, पर एचख के भरोसे किए गए बड़े-बड़े खर्च आपको निर्धन बना देंगे। ऐसे गृहस्थ जो ॠण के भंवर जाल में फंसे पड़े हैं उनके लिए विश्‍वामित्र प्रणीत ज्येष्ठा लक्ष्मी साधना वरदान तुल्य है।

 

श्रीसूक्त के आठवें श्‍लोक में लक्ष्मी की ज्येष्ठा या बड़ी बहन के विनाश के लिए प्रार्थना की गयी है –

 

क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठालक्ष्मीं नाशयाम्यहम्
अभूतिसमृद्धिं च सर्वा निर्णुद में गृहात्

 

लक्ष्मी की अग्रजा, अलक्ष्मी दरिद्रता है और दरिद्रता के आगमन में ॠण की एक प्रमुख भूमिका है। अब जितनी चादर है उससे लम्बा पैर फैलाएंगे तो कष्ट भी तो आपको ही होगा।

 

अक्षय नवमीं – ज्येष्ठा लक्ष्मी साधना

 

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की – आंवला नवमीं अर्थात् अक्षय नवमीं (29 अक्टूबर 2017) ॠण बाधा रूपी भंवर से स्वयं को बाहर निकाल जीवन में लक्ष्मी को अक्षय बनाने का श्रेष्ठतम् मुहूर्त है। इस विशेष मुहूर्त में विश्‍वामित्र प्रणीत ‘ज्येष्ठा लक्ष्मी साधना’ सम्पन्न कर आप अपने जीवन को ॠण रूपी भंवर से मुक्त कर सकते हैं।

 

इस साधना में मुख्य रूप से मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठा युक्त ‘ज्येष्ठा लक्ष्मी यंत्र’ ‘नौ लक्ष्मी सिद्धि श्रीफल’ तथा ‘ज्येष्ठा लक्ष्मी माला’ आवश्यक है, ये फल ज्येष्ठा लक्ष्मी की शक्तियों के स्वरूप हैं और इनका पूजन अवश्य करना चाहिये।

 

साधना विधान

 

सर्वप्रथम साधना में सफलता हेतु अपने सामने गुरु चित्र/विग्रह/यंत्र/पादुका स्थापित कर लें और गुरुदेव का पंचोपचार पूजन सम्पन्न कर गुरुदेव से साधना में सफलता का आशीर्वाद प्राप्त कर लें। साधक गुरु पूजन के पश्‍चात् एक माला गुरु मंत्र का अवश्य ही जप करें –

 

ॐ परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः

 

गुरु पूजन के पश्‍चात् निम्न प्रकार साधना करें –

 

विनियोग

 

ॐ अस्य श्री ज्येष्ठा लक्ष्मी मंत्रस्य ब्रह्माॠषिः अनुष्टुप्छंदः। ज्येष्ठालक्ष्मी देवता ह्रीं बीजम्। श्रीं शक्तिः ममाभीष्टसिद्धयर्थे जपे विनियोगः।

 

अब ज्येष्ठा लक्ष्मी का ध्यान कर उस यंत्र को ताम्र के पात्र में पुष्प का आसन देकर स्थापित करें –

 

ॐ रक्त ज्येष्ठायै विद्महे नील ज्येष्ठायै धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात्।

 

अब हाथ में सुगन्धित पुष्प लेकर यंत्र में ज्येष्ठा लक्ष्मी की भावना रखते हुए निम्न मंत्र पढ़ें –

 

ॐ संविनमये परे देवि परामृत रस प्रिये। 
अनज्ञां देहि ज्येष्ठायै परिवारार्चनाय मे।

 

अब नौ श्रीफल को जो ज्येष्ठा की नौ शक्तियों के प्रतीक हैं उनको पूर्व दिशा से प्रारम्भ करते हुए क्रमशः निम्न मंत्रों का उच्चारण करते हुए स्थापित करना चाहिये –

 

1. ॐ लोहिताक्ष्यै नमः, 2. ॐ विरूपायै नमः, 3. ॐ कराल्यै नमः, 4. ॐ नील लोहितायै नमः, 5. ॐ समदायै नमः, 6. ॐ वारूण्यै नमः, 7. ॐ पुष्टयै नमः, 8. ॐ अमोघायै नमः, 9. ॐ विश्‍वमोहिन्यै नमः

 

अब साधक अष्टगंध से सामग्री के चारों ओर एक घेरा बना दें तथा चारों दिशाओं में चार दीपक जलाकर रखें, तथा ज्येष्ठा लक्ष्मी माला से 5 माला मंत्र जप अवश्य करें।

 

ज्येष्ठा लक्ष्मी मंत्र 

 

॥ ऐं ह्रीं श्रीं ज्येष्ठालक्ष्मि स्वयंभुवे ह्रीं ज्येष्ठायै नमः॥

 

इसके पश्‍चात् साधक सारी सामग्री को एक थाली द्वारा ढंक दें और दूसरे दिन पुनः इस प्रयोग को सम्पन्न करें, इस प्रकार सात दिन तक प्रयोग करने के पश्‍चात् साधक बाद में केवल ज्येष्ठा लक्ष्मी का मंत्र ही जपें।

 

जो साधक एक लाख मंत्र जप कर लेता है तो उसे जीवन में ॠण सम्बन्धी किसी प्रकार की बाधा का सामना नहीं करना पड़ता है। मंत्र जप पूरा होने पर सारी सामग्री नदी या तालाब में विसर्जित कर दें।

 

साधना सामग्री – 470/-
Amvla Navami – Akshaya Navami

 29 October 2017

 

Vishwamitra

Praneet

Rinnharta

Jyeshtha  Lakshmi Sadhana

 

Brahmarishi Vishwamitra presents a vivid example of  the power of human determination and illustrates how even the rules of creation can be transformed using this power.  Brahmarishi Vishwamitra even granted the boon of ‘Brahma-Gayatri‘ Mantra to humans. Rishi Vishwamitra is the Lord of the Third chapter (containing 62 rules) out of the ten chapters of the holy Rigveda, which is as follows –

Tatsaviturvarenyam Bhargo Devasya Dheemahi Dhiyo Yo NaH Prachodayaat

 

The humans received the Gayatri Mantra through the grace of Brahmarishi Vishwamitra, and the glory of this mantra is world-famous.

The life of Brahmarishi Vishwamitra illustrates the definition of perfection.  Brahmarishi Vishwamitra attained Brahmatatva on the basis of knowledge-wisdom and asceticism, even after being born as a Kshatriya as King Kaushik. The Kshatriya strength of Brahmarishi Viswamitra got defeated against the Brahma strength of Rishi Vashishtha in a scriptural debate. Vishwamitra decided to attain Brahmatatva and performed penance for 1000 years. Lord Brahma Himself granted him the title of “Rajarshi” , being pleased with his austerities. Vishwamitra made Apsara-Nymph Menaka as his spouse, whom Indra had sent to ruin his austerity. He tried to send his disciple King Trishanku to Heaven in his physical form, and created a new heaven when the rules of creation posed a problem.

Rajarshi Vishwamitra attained Brahmatatva through his diligence, passion, enterprise, asceticism and tenacity. He also got the  good fortune of becoming Guru of Lord Vishnu in His Rama Avataar. He not only arranged Lord Shree Ram’s  marriage to Mother Sita, he also ensured the path of victory for Shree Ram through “Vijay Kriyamaan Sadhana” during Lanka-war when Ravan kidnapped Sita.

The core principle of Brahmarishi Vishwamitra  was – “Confront the Challenges head-on and Conquer them“.

 

Vishwamitra and Lakshmi

The ashram of Brahmarishi Vishwamitra started disintegrating in absence of wealth,  and he bound Goddess Lakshmi with Divine Mantras. He did not plead to anyone, rather he established Mother Lakshmi in his ashram in Her Thousand forms through the power of Mantras. Vishwamitra attained unique glory by establishing the complete form of Goddess Lakshmi in his ashram.

Brahmarishi Vishwamitra has granted the blessing of “Jyeshtha Lakshmi Sadhana” to the general public trapped in the vicious circle of debt.

 

Once Yaksha had questioned Yudhishthir – “Who is Happy?

Yudhishthir had answered – “One who is debt-free, is Happy.

 

Debt is the biggest obstacle in the path of perfection.  The happiness and peace of the mind of the debt-trapped victim gets pawned. Any increase in income gets offered to the debt repayment. The debt flourishes in poverty. The Vishwamitra composed “Jyeshtha Lakshmi Sadhana” is mandatory for people trapped  in such situations.

 

In reality, the absence of wealth transforms a person into a corpse. Poverty is a curse in Kali-Yuga and a person stricken with poverty commits hundreds of sins. Poverty has a special contribution in straying a person from the righteous path of religion. It is also said that – “Bhukhe Bhajan Na Hoya Gopala, Le Lo Apni Kanthi Mala“, i.e. devotion is strongly linked to food.

This poverty is generated either from inactions-laziness or from debt. When one spends far more in excess than income, then debt automatically arrives, but this debt is always accompanied with his brother interest, who consumes the income. Entry of debt into relationships throws out mutual love. Therefore, it is said that  – “Debt is the scissor-cutter to love“. You might be in a very deep relationship, just try to give loan, either the relationship will break, or the hope of return of loan.

Some people believe in the Charvak theory and take loan to maintain a life of high standard and luxury.

 

The proponents of this “Yavat Jeevet Sukham Jeevet, Rinnam Kritvaa Ghritam Pibet” theory not only throw themselves into poverty, but also push their progeny into penury.

 

Akshaya Lakshmi –

Debt is the biggest obstacle in the path of attaining permanent Akshaya Lakshmi because the debt bogs down  your earnings. You earn good enough, but the EMIs eat into your savings.  You can very well survive on a small house or a small car. Nainital is a good place for holidays but repeated spending done through EMIs will make  you poor. Vishvamitra Praneet Jyeshtha Lakshmi Sadhana  is like a boon for those engulfed in the debt-trap.

The eighth verse of Shree-Sukta has a  prayer for the destruction of elder sister of Lakshmi –

Kshutpipaasaamalaam Jyeshthaalakshmin Naashyaabhyaham

Abhutisamriddhim Cha Sarvaa Nirnuda Mem Grihaat

 

Alakshmi or Poverty is the elder sister of Lakshmi and debt has a major role in the advent of poverty. If you spend much more than your income, then you yourself will have to bear the sufferings.

 

Akshaya Navami – Jyeshtha Lakshmi Sadhana

The Aamvalaa Navami or Akshaya Navami (29 October 2017) of Shukla Paksha of Kartik month is the most auspicious muhurath to attain permanent Akshaya Lakshmi and get out of the debt trap. You can obtain riddance from this debt trap in your life by performing the “Jyeshtha  Lakshmi Sadhana” composed by Vishwamitra.

The mandatory required items for this Sadhana are Mantra consecrated-enlivened-sanctified “Jyeshtha Lakshmi Yantra“, “Nine Lakshmi Siddhi Shreephal” and “Jyeshtha Lakshmi Mala“. These phals are symbolic forms of the Shakti powers of Jyeshtha Lakshmi, and they should certainly be worshipped.

 

Sadhana Procedure

First, you should setup Guru Picture/ Statue/ Yantra/ Paduka in front of you and after performing panchopchaar worship of Guru, obtain blessings for success in Sadhana from Gurudev. The Sadhak should definitely chant 1 mala rosary-round of Guru Mantra after performing Guru worship.

 

|| Om Param Tatvaaya Naaraayanaaya Gurubhayo Namah ||

 

After completion of Guru worship, perform Sadhana as follows –

 

Viniyoga

 

Om Asya Shree Jyeshthaa Lakshmee Mantrasya BrahmaarishiH AnushtupchandaH | Jyeshthaalakshmee Devataa Hreem Beejam | Shreem ShaktiH Mamaabhishtasiddhyarthe Jape ViniyogaH |

 

Now meditating on the Jyeshtha Lakshmi, setup the Yantra in a copper plate on a seat of flowers –

 

Om Rakta Jyeshthaayei Vidmahe Neela Jyeshthaayei Dheemahi Tanno Lakshmee Prachodayaat ||

 

Now taking fragrant flowers in hand, sensing the presence of  Jyeshtha Lakshmi in the Yantra, chant following Mantra –

 

Om Samvinamaye Pare Devi Paraamrita Rasa Priye |

Anagyaam Dehi Jyeshthaayei Parivaaraarchanaaya Me |

 

The Nine Shreephals symbolize the Shakti powers of nine forms of Jyeshtha. Now set them up starting from East direction, chanting following Mantras –

  1. Om Lohitaakshyei NamaH ||
  2. Om Virupaayei NamaH ||
  3. Om Karaalyei NamaH ||
  4. Om Neel Lohitaayei NamaH ||
  5. Om Samadaayei NamaH ||
  6. Om Vaarunyei NamaH ||
  7. Om Pushtayei NamaH ||
  8. Om Amoghaayei NamaH ||
  9. Om Vishwamohinyei NamaH ||

 

Now the Sadhak should draw a circle around the Sadhana materials using Ashtgandha and light lamp in four directions. You should definitely chant 5 mala rosary-round of the  Mantra using Jyeshtha Lakshmi Mala –

 

Jyeshtha Lakshmi Mantra

|| Ayeim Hreem Shreem Jyeshthaalakshmi Swayambhuve Hreem Jyeshthaayei NamaH ||

 

Thereafter, the Sadhak  should cover all the material with a plate and repeat the same procedure next day. After repeating this for seven days, the Sadhak should later chant only Jyeshtha Lakshmi Mantra.

A Sadhak who manages to chant one lakh mantras,  does not have to face any kind of debt related obstruction in his life. Immerse the entire material in a river or pond after completion of Mantra chanting.

 

Sadhana Materials – 470 / –

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