Vartali Sadhana

वार्ताली

तीव्र तंत्र स्तम्भन साधना

शत्रु आपके समक्ष निस्तेज

वार्ताली साधना, शिव साधना का एक प्रमुख भाग है, आदि देव शिव की यह विशेष शक्ति वार्ताली शत्रुहन्ता, मारण, विद्वेषण, स्तम्भन की शक्ति है।

बाधाएं जीवन का विष हैं। कई बार अज्ञानवश, कभी प्रमादवश और कभी बड़बोलेपन में हम अक्सर बाधाओं को न्यौता दे देते हैं और फिर शनैः शनैः जीवन का अमृत तत्व (रस) सूख जाता है। शक्ति साधना को एक शब्द में अगर परिभाषित करना हो तो कहा जाएगा ‘बाधा-विजय’।

 

स्तम्भन एक गूढ़ शब्द है। जिसका अर्थ है शत्रु को जड़ कर देना, पत्थर सदृश कर देना। उसकी बुद्धि, शक्ति एवं मति को स्तम्भित कर देना। आजकल की भाषा में कहें तो शत्रु की मति को संज्ञाशून्य (उेार) अवस्था में डाल देना। स्तम्भन किसी ब्रह्मास्त्र से कम नहीं है और शत्रु विजय हेतु अत्यन्त सटीक एवं शीघ्र प्रभावी उपाय है।

 

कैसे वार्ताली साधना बाधा विजय में कारगर है?

 

वार्ताली शब्द पर ध्यान देंगे तो इसमें वार्ता निहित है। वार्ता दो व्यक्तियों, भक्त और भगवान, प्रकृति-मनुष्य किसी के भी मध्य हो सकती है।

 

जरूरी नहीं, वार्ता में हमेशा बोला जाय, कई बार नयनों से एक मौन संवाद होता है तो कई बार शरीर बोल जाता है। कुछ लोगों की चेतना शक्ति अति विकसित होती है, उनका अथर्वा सूत्र (खर्पींीींळेप) जाग्रत होता है, ऐसे लोगों को आगामी खतरे का आभास हो जाता है और वे उनसे बच जाते हैं। ऐसे लोगों के साथ प्रकृति मौन वार्ता करती है।

 

देवी वार्ताली महिष (बैल) पर सवार हैं, शिव की भांति (शिव का वाहन नन्दी बैल है।) एवं महाकाल सदृश दक्षिण दिशा से आने वाली बाधाओं को स्तम्भित कर देती हैं।

 

वार्ताली साधना साधक की चेतना शक्ति को तीव्र कर देती है। तीव्र चेतना से युक्त साधक में अपने ज्ञात, अज्ञात शत्रुओं हो पहचानने में सक्षम होता है। वार्ताली साधना के प्रभाव से साधक गुप्त शत्रुओं को पहचान कर भविष्य में आने वाली बाधाओं के प्रति सचेत हो जाता है और साधक अपने ज्ञात, अज्ञात शत्रुओं को निस्तेज करके स्तम्भित कर देता है।

 

अद्भुत तांत्रिक वार्ताली साधना

 

वार्ताली साधना, शिव साधना का एक प्रमुख भाग है, आदि देव शिव की यह विशेष शक्ति वार्ताली शत्रुहन्ता, मारण, विद्वेषण, स्तम्भन की शक्ति हैं। जब शत्रु अत्यन्त प्रबल हो जाय और सामान्य प्रभाव से वश में न आए तो तंत्र शास्त्र में प्रमुख इस साधना का प्रयोग करना चाहिए।

 

तांत्रिक वार्ताली साधना निम्न कार्यों के लिए सम्पन्न की जाती है –

 

* जब व्यापार में निरन्तर हानि हो रही हो और कार्य बहुत प्रयास करने पर भी पूरे नहीं हो रहे हों।
* जब राज्य बाधाएं बढ़ने लगें और किसी भी प्रकार का कार्य हर दृष्टि से रुक जाय, वह बाधा किसी भी प्रकार की हो सकती है।
* जब आपके अधिकारी आपके अनुकूल न हों और आपको तंग करने का प्रयास करते ही रहें।
* किसी कार्य द्वारा मानहानि, अपयश की आशंका हो।
* किसी मुकदमे में हार की संभावना हो, और मुकदमा निपट ही नहीं रहा हो।
* जब मानसिक अशांति बढ़ जाय और आगे बढ़ने का कोई मार्ग न मिले।
* जब शत्रु प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष रूप से हानि पहुंचाने लगें।
* घर पर किसी प्रकार का तांत्रिक प्रयोग आपके विरुद्ध किये जाने लगें और घर में हर समय कलह, रोग का वातावरण रहने लगे।
* घर पर भूत-प्रेत-पिशाच का डर हो, अदृश्य आत्माएं अपना प्रकोप दिखाने लगें।

 

इन सब विपरीत स्थितियों के निराकरण हेतु वार्ताली साधना ऐसी तीव्र, अचूक, शक्ति प्रदायक, तुरन्त फल प्रदायक साधना है, जो प्रबल से प्रबल शत्रु को भी आपके वश में कर देती है।

 

साधना कब करें?

 

यह साधना मूल रूप से कृष्ण पक्ष में ही सम्पन्न की जाती है, तथा यह रात्रिकालीन साधना है। मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की एकादशी अर्थात् माया मोहिनी एकादशी (3 दिसम्बर 2018) इस साधना को सम्पन्न करने का अद्वितीय मुहूर्त है। इस साधना को कृष्ण पक्ष की अष्टमी और अमावस्या की रात्रि को भी सम्पन्न किया जा सकता है। है। साधना के समय किसी प्रकार का विघ्न न हो, आप अपने पूर्ण मनोयोग से फल प्राप्ति की, शक्ति प्राप्ति की इच्छा के साथ ही साधना सम्पन्न करें। साधना में भावना का भी स्थान प्रबल है। दृढ़ भावना, दृढ़ इच्छा शक्ति होनी ही चाहिए।

 

वार्ताली स्तम्भन साधना

 

इस साधना हेतु कुछ विशेष उपकरणों की आवश्यकता है, उसी अनुरूप कार्य होना चाहिए। साधना काल में जो-जो वस्तुएं आवश्यक हैं, उन वस्तुओं की व्यवस्था पहले से ही कर लेनी चाहिए, साधना काल में बीच में उठना एक प्रकार से साधना में विघ्न है।

 

एक समय में एक विशेष कामना, इच्छा पूर्ति अथवा एक विशेष कार्य हेतु ही साधना सम्पन्न करनी चाहिए, साधना प्रारम्भ करने से पहले जो कार्य पूर्ण करना चाहते हैं, उस कार्य का संकल्प अवश्य लेना चाहिए, भिन्न-भिन्न लक्ष्यों की पूर्ति का एक साथ प्रयास करने से एक भी लक्ष्य पूरा नहीं होता, यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए।

 

साधना सामग्री

 

इस साधना हेतु आवश्यक सामग्री में – एक बड़ी थाली, एक छोटा ताम्र पात्र, स्वच्छ वस्त्र, हल्दी, अक्षत, 9 सुपारी, घी, दूध, ताम्र पात्र में जल, रक्त चन्दन, अगरबत्ती, केसर, चन्दन, सुगन्धित पुष्प, के अतिरिक्त ताम्र पत्र पर अंकित ‘प्राण प्रतिष्ठायुक्त वार्ताली स्तंभन यंत्र’ आवश्यक हैं।

 

इन सभी सामग्रियों का उपयोग कैसे किया जाय, यह आगे स्पष्ट किया जा रहा है।

 

साधना विधान

 

साधना दिवस की रात्रि को प्रथम प्रहर के पश्‍चात् अर्थात् 10 बजे के बाद स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें, एक थाली में सभी सामग्री अपने पास रख दें।

 

सर्वप्रथम अपने सामने लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर घी का दीपक जलाकर गुरु पूजन करें तथा गुरुदेव से साधना की मानसिक आज्ञा प्राप्त कर, अपने इष्ट देव और शिव का पूजन करें, जब यह कार्य पूर्ण हो जाय तो अपने मन को स्थिर कर साधना की ओर अग्रसर हों।

 

विनियोग

 

अस्य श्रीवार्ताली मन्त्रस्य शिव ॠषिः जगतीच्छन्दः वार्ताली देवता ग्लौं बीजं स्वाहा शक्तिः  ममाखिला वाप्तये जपे विनियोगः।
ध्यान

 

ॐ रक्ताम्भो रुहकर्णिको परिगते शवासने संस्थितां मुण्डस्रक्परिराज मानहृदयां नीलाश्मस द्रोचिषम्। हस्ताब्जैर्मुशलं हलाभ्यवरान् संबिभ्रतीं सत्कुचां वार्ताली मरुणाम्बरां त्रिनयनां वन्दे वराहाननाम्॥

 

अब अपने सामने चावल की नौ ढेरियां बनाकर उन पर एक-एक सुपारी रखें और निम्न मंत्र बोलकर वार्ताली की नौ पीठ शक्तियों का पूजन करें।

 

ॐ जयायै नमः।
ॐ विजयायै नमः।
ॐ जितायै नमः।
ॐ अपराजितायै नमः।
ॐ नित्यायै नमः।
ॐ विलासिन्यै नमः।
ॐ द्रोगध्यै नमः।
ॐ अघोरायै नमः।
ॐ मङ्गलायै नमः।

 

अब अपनी दांयी ओर तेल का दीपक जला दें। सामने एक बड़ी थाली रखें उसमें प्राण प्रतिष्ठा युक्त वार्ताली स्तम्भन यंत्र स्थापित करें। इस यंत्र पर सबसे पहले घी चढ़ाएं उसके पश्‍चात् दूध और अंत में जल चढ़ाएं। यंत्र को स्वच्छ कपड़े से पौंछकर, एक दूसरी थाली में कुंकुम से त्रिभुज बनाकर, त्रिभुज के मध्य अक्षत और पुष्प का आसन देकर उस पर यंत्र को स्थापित कर दे। यंत्र स्थापन के समय निम्न मंत्र का उच्चारण करें –

 

ॐ ग्लौं वार्ताल्यै कैलाशांचल मध्य स्थितितायै नमः॥

 

हे देवी! वार्ताली आप मेरी पूजा के इस मानस कैलाश पर्वत पर अपनी सभी शक्तियों के साथ स्थित हों।

 

इसके पश्‍चात् यंत्र पर रक्त चन्दन, हल्दी, केसर इत्यादि अर्पित करें। अब अपने हाथ में वार्ताली स्तम्भन माला लें और उस माला को अपने मस्तक पर तथा नेत्रों को स्पर्श कराकर यंत्र पर पहना दें। निम्न मंत्र से शक्तियों का आह्वान करें –

 

ॐ डाकिन्यै नमः। ॐ राकिन्यै नमः। ॐ लाकिन्यै नमः। ॐ काकिन्यै नमः। ॐ शाकिन्यै नमः। ॐ हाकिन्यै नमः। ॐ वाराह्येनमः। ॐ वराहमुख्यै नमः। ॐ अन्धिन्यै नमः। ॐ रुधिन्यै नमः। ॐ जम्भिन्यै नमः। ॐ मोहिन्यै। ॐ स्तम्भिन्यै नमः।

 

ये देवी वार्ताली की चल शक्तियां हैं जो साधक के कार्यों को सम्पन्न करती हैं।

 

जिस विशेष कार्य को सम्पन्न करना है, जिस शत्रु को स्तम्भित करना है अथवा जिस बाधा को समाप्त करना है, उस कार्य को मन ही मन 11 बार दोहरायें। यह संकल्प लें कि मैं वार्ताली शक्ति साधना सम्पन्न कर, वार्ताली की पीठ शक्तियां और चल शक्तियों के सहयोग से अपनी बाधा को अवश्य समाप्त कर दूंगा।

 

वार्ताली स्तम्भन महामंत्र

 

ॐ ऐं ग्लौं ऐं नमो भगवति वार्तालि वाराहि वराहमुखि ऐं ग्लौं ऐं अन्धे अन्धिनि नमो रुन्धे रुन्धिनी नमो जम्भे जम्भिनी नमो मोहे मोहिनि नमः स्तम्भे स्तम्भिनि नम ऐं ग्लौं ऐं सर्व दुष्ट प्रदुष्टानां सर्वेषां सर्ववाक्य पद चित्त चक्षुर्मुख गति जिह्वा स्तम्भं कुरुकुरु शीघ्रं वशं कुरुकुरु ऐं ग्लौं ऐं ठः ठः ठः ठः हुं फट् स्वाहाः॥

 

रुद्र आगम तंत्र में यह विवेचन आया है कि उपरोक्त मंत्र का वीर मुद्रा में बैठकर जप किया जाये तो 7 दिन के भीतर-भीतर सफलता मिलती है। यदि यह संभव न हो तो सहज मुद्रा में बैठकर 108 बार मंत्र जप अपने सामने यंत्र पर स्थापित माला पहन कर करना है।

 

इस कार्य में एक घण्टा लगे या दो घण्टे इस बात का विचार न करें। 108 बार मंत्र जप अवश्य करना है। इस साधना के दौरान कुछ विचित्र आवाजें, दृश्य उपस्थित हो सकते है। उन सबसे विचलित नहीं होना है। शत्रु स्तम्भन की साधना निरन्तर जारी रखनी है।

 

पूजन के पश्‍चात् वार्ताली यंत्र को अपने पूजा स्थान में एक ओर स्थापित कर दें तथा जब भी किसी प्रकार की शत्रु बाधा, अथवा कोई अन्य बाधा आये तो अष्टमी अथवा अमावस्या को पूजन अवश्य करना चाहिए।

 

* साधना के एक महीने के भीतर-भीतर बाधाएं समाप्त होने लगती हैं।
* तीव्र से तीव्र शत्रु की बुद्धि का स्तम्भन हो जाता है और वह आपसे सुलह करने की प्रार्थना करने लगता है।
* अज्ञात शत्रु भी आपके सामने आकर नतमस्तक हो जाता है।
* वार्ताली स्तम्भन तो तीव्र शाक्त साधना है जो शीघ्र फल देती है।

 

प्राण प्रतिष्ठा न्यौ. – 600/-

Vaartaali

Teevra Tantra Stambhan Sadhana

Intense Tantra Astriction Sadhana

Immobilizes Foes

Vaartaali Sadhana is a significant component of Shiv Sadhana, This special power of Almighty God Shiva is the power of destroying, annihilating, restricting and terminating foes.


Obstacles are the venom of life. We often invite obstacles due to our ignorance, laziness or exaggeration, thereby drying up the nectar of life. The Shakti Sadhana can be defined in one single word – “Overcoming Obstacles”.

Astriction is  a cryptic term, which means destruction of the very foundation of the enemy, and to make him as powerless as a simple stone. It completely restrains enemy’s intelligence, strength and mind.  Simply stated,  it blocks and immobilizes the mind. The power of astriction  is comparable to that of Brahmaastra.  It is a highly  accurate and effective process to achieve victory over the enemies.

 

Why is Vaartaali Sadhana effective in overcoming obstacles?

Literally, the word “Vaartaali” itself contains a subsegment word “Vaartaa”. The Hindi word “Vaartaa” translates to word “conversation” in English. This conversation may occur between any two persons, between the devotee and his God, or between the mother-nature and a human-being.

It is not necessary to always speak in a conversation. Sometimes we do a silent dialog through our eyes or body language. Some people have an elevated level of consciousness,  as their Atarva Sootra (intuition) is highly active. Such people can sense forthcoming risks, and escape such dangers. They conduct a silent dialog with mother nature.

Goddess Vaartaali  is mounted on a Mahisha (bull), like Lord Shiva (mounted on Nandi bull). Like Lord Mahakaal, She subdues all obstacles emerging from the South direction.

Vaartaali Sadhana intensifies the consciousness of the Sadhak. This acute consciousness enables the Sadhak to recognize his known and unknown foes. The Vaartaali Sadhana empowers the Sadhak to recognize his hidden enemies, and alerts the Sadhak to their nefarious designs in future. It enables him to subdue and curtail any harm from known and unknown foes.

 

Wonderful Taantrik Vaartaali Sadhana

Vaartaali Sadhana is an important component of Lord Shiva Sadhana. This special power of Aadi Deva Lord Shiva is the distinctive power of termination, destruction, malevolence  and astriction of enemies. This significant Sadhana should be performed, during the circumstances, when it becomes impossible to tackle or control a powerful enemy through normal methods.

The Tantrik Vaartaali Sadhana is accomplished for following purposes-

* When there are frequent losses in business and it becomes increasingly  impossible to complete the intended tasks even after putting in  a lot of effort.

* When Government obstacles begin to increase, and all types of tasks come to a standstill,  hindered due to multiple kinds of obstacles.

* When your superior officials are not friendly towards you and they keep trying to cause you distress.

* There is a possibility of defamation or failure due to any reason.

* There is a possibility of losing a court-trial, or the court-case just keeps extending, with no end in sight.

* When mental disturbances become severe and the future looks completely bleak with no clarity.

* When the enemies start to cause harm, directly or indirectly.

* When someone performs black-magic against you or your home, causing ever-present conflicts in the family.

* Fear of ghosts-vampires increases at home, and invisible ghosts start causing harm.

 

Vaartaali Sadhana is the only intense, accurate, powerful, quick-acting Sadhana to counter these adverse situations. It subdues-captivates even the most powerful foe.

 

When to perform Sadhana?

This sadhana is generally performed only in Krishna Paksha (dark fortnight), and it is a  nocturnal Sadhana. The Ekadashi of Maargshreesha Krishna Paksha , also known as  Maya Mohini Ekadashi (3 December, 2018) is the most auspicious muhurath to accomplish this sadhana. This sadhana can also be accomplished on the night of Krishna Paksha Ashtami (8th day of dark fortnight) or on Amaavasya (New Moon).  There should not be any kind of disturbance at the Sadhana time. You should perform this sadhana with full focus and concentration,  with a strong desire to attain power and associated benefits. The emotions have a strong role in the sadhana. One should certainly possess strong spirit and intense will-power.

 

Vaartaali Stambhan Sadhana

Some specialized items are required in this sadhana, and we should plan ahead to obtain them. We should do prior preparation and arrange for these items in advance. Getting up in the middle of the sadhana period is considered as a major interruption.

The sadhana should be accomplished every time to fulfill just one major desire or wish. One should definitely take Sankalp (Pledge) for the desire which one wants to fulfill with the sadhana. One should always remember that the effort of fulfilling different types of wishes simultaneously is never successful.

 

Sadhana Materials

Apart from “Sanctified-Consecrated Vaartaali Stambhan Yantra” inscribed on  copper, the mandatory materials required for this Sadhana are – One large plate, one small Taamra Patra (copper glass), Pure-Clean Clothes, Turmeric, Akshat (Unbroken Rice), 9 Supari (Betel-nuts), Ghee, Milk, Water in Copper Tumbler, Rakta Chandan (Red sandalwood powder), Incense, Saffron, Sandalwood Powder and Fragrant Flowers.

The method to use these materials is elucidated in the next few lines.

 

Sadhana Procedure

After First-Prahar of the sadhana night, i.e. after 10 pm, adorn clean clothes after taking a bath. Put all the materials on a large plate and place it near you.

Spread Red cloth on a wooden board in front of you and perform Guru Poojan with Ghee-lighted lamp. Mentally obtain Gurudev’s permission to perform this Sadhana, and worship your Ishta Dev and Lord Shiva. Focus your mind on the Sadhana after completing these worships.

 

Viniyoga

Asya Shreevaartaalee Mantrasya Shiva RishiH JagateechchandaH Vaartaalee Devataa Gloum Beejam Swaahaa ShaktiH Mamaakhilaa Vaaptye Jape ViniyogaH |

 

Meditation

Om Raktaambho Ruhakarniko Parigate Shavaasane Sansthitaam Mundastrakpariraaja Maanahrdayaam Neelaashmasa Drochishama |

Hastaabjeirmushalam Halaabhyavaraan Sambibhrateem Satkuchaam Vaartaali Marunaambaraam Trinayanaam Vande Varaahaananaam ||

 

Now make nine stacks of rice in front of you. Place 1 Betel-nut on each one of them. Worship Nine Peetha Shaktis of Vaartaali by chanting the following Mantras.

 

Om Jayaayei NamaH |

Om Vijayaayei NamaH |

Om Jitaayei NamaH |

Om Aparaajitaayei NamaH |

Om Nityaayei NamaH |

Om Vilaasinyei NamaH |

Om Drogadhyei NamaH |

Om Aghoraayei NamaH |

Om Mangalaayei NamaH |

 

Now light an  oil lamp on your right side. Place a large plate in front, and set-up consecrated-sanctified Vaartaali Stambhan Yantra on it. First offer ghee on this yantra, followed by milk and water in the end. Wipe the yantra with a clean cloth. Draw a triangle with Kumkum in a second plate. Make a seat of Rice and Flowers in center of the triangle, and set-up Yantra on this seat. Chant following Mantra while setting-up the Yantra.

 

Om Gloum Vaartaalyei Keilaashaanchala Madhya Sthititaayei NamaH ||

 

O Goddess! Vaartaali, please appear on this mental Kailash mount with all your Shaktis powers during this worship.

 

Thereafter offer Rakta-Chandan, Turmeric, Saffron etc. on the Yantra. Now take Vaartaali Stambhan Mala in your hand and after touching your forehead and eyes with this rosary, wrap it around the Yantra. Invoke Shaktis chanting following Mantras –

 

Om Daakinyei NamaH |

Om Raakinyei NamaH |

Om Laakinyei NamaH |

Om Kaakinyei NamaH |

Om Shaakinyei NamaH |

Om Haakinyei NamaH |

Om Vaaraahno NamaH |

Om Varaahamukhayei NamaH |

Om Andhinyei NamaH |

Om Rudhinyei NamaH |

Om Jambhinyei NamaH |

Om Mohinyei NamaH |

Om Stambhinyei NamaH |

These are active intense Chal Shaktis of Goddess Vaartaali, and they accomplish the tasks of the sadhaks.

Mentally repeat 11 times whatever task you wish to accomplish, or whatever enemy you wish to vanquish or whatever obstacle you want to terminate. Take a pledge that I shall certainly terminate my obstacle with the help of Peeth Shaktis and Chal Shaktis, after accomplishing Vaartaali Shakti Sadhana.

 

Vaartaali Stambhan Mahaamantra

Om Ayeim Gloum Ayeim Namo Bhagwati Vaartaali Vaaraahi Varaahamukhi Ayeim Gloum Ayeim Andhye Andhini Namo Rundhe Rundhini Namo Jambhe Jambhini Namo Mohe Mohini NamaH Stambhe Stambhini NamaH Ayeim Gloum Ayeim Sarva Dushta Pradushtaanaam Sarveshaam Sarvavaakya Pada Chitta Chakshurmukha Gati Jihvaa Stambham Kurukuru Sheegram Vasham Kurukuru Ayeim Gloum Ayeim ThaH ThaH ThaH ThaH Hoom Phat SwaahaaH ||

 

Rudra Aagam Tantra states that one obtains success within 7 days if one chants the above mentioned Mantra sitting in Veer Mudra. If it is not possible, then the Sadhak should chant the Mantra 108 times sitting in a comfortable position, in front of the Yantra whilest wearing the rosary.

Do not worry even if this takes an hour or two. You should definitely chant 108 times. You may experience some strange sounds or scenes during this Mantra chanting. Do not get distracted by them. You should continue the Shatru Stambhan Sadhana.

Setup the Vaartaali Yantra in your worship altar after completion of the above worship. You should perform the worship on Ashtami or Amavasya, whenever you face any enemy or other kind of obstacle.

* The obstacles start terminating within a month of the Sadhana.

* The Intellect of even the strongest foe gets muted, and he starts to request you for reconciliation-settlement.

* Even the unknown foes bow to you.

* Vaartaali Stambhan is a highly intense Shaakt Sadhana, and it yields results very rapidly.

Consecrated-Sanctified Sadhana Materials – 600/-

 

 

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