Trinetra Neel Saraswati Sadhana

 

गुरु शिष्य संवाद

भाग्योदय अवश्य होता है

वाक् – वाणी – सद्विचार – ज्ञान

 

वाणी केवल शब्द नहीं है, वाणी आपके व्यक्तित्व की झांकी है। मोहक मुस्कान, खुला नजरिया, सरस वार्ता, आपका भाग्योदय नित्य प्रति करती है। भगवान तो आपकी ही आत्मशक्ति का स्वरूप है।

 


शिष्य : गुरुदेव! भाग्य को लेकर कई भ्रांतियां मेरे मन में उठती हैं। कभी मैं पाता हूं कि भाग्य का निवास श्रम है, तो कभी लगता है कि भाग्य पूर्व जन्म का संचित कर्म है। मैं समझ नहीं पाता हूं कि भाग्य क्या है और कैसे उसका मेरे जीवन में उदय होगा?

 

गुरुदेव : ये जो आप और मैं साथ बैठकर ज्ञान गंगा में भीग रहे हैं इसे ही भाग्योदय कहते हैं। मानना मुश्किल लग रहा है आपको तो चलिए, भाग्य शब्द को समझते हैं? किसे कहते हैं ‘भाग्य’?

 

भा+ग्य इन दो वर्णों का मेल भाग्य कहलाता है। भा का अर्थ चमकना होता है। स्वयं देखिए, आभा, विभा और प्रभा इन तीनों शब्दों का अर्थ प्रकाश या चमकना है और इन सबमें ‘भा’ आता है। प्रतिभा का अर्थ प्रत्येक व्यक्ति का नैसर्गिक प्रकाश है। ‘ग्य’ का अर्थ ज्ञान है। जिस क्षण ज्ञान का प्रकाश जीवन में उतरता है, उस क्षण को ही भाग्योदय कहते हैं। अमूमन, लोग भाग्य को किस्मत, धन, सफलता से जोड़ देते हैं, पर ये भाग्य (ज्ञान के प्रकाश) के प्रतिफल हैं, स्वयं भाग्य नहीं।

 

अगर, भाग्य ज्ञान का प्रकाश है तो ज्ञान का निवास कहां है? शास्त्रानुसार ज्ञान का एकमात्र अधिष्ठान वाक् अर्थात् वाणी है। ज्ञान प्राचीन काल में श्रुति के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को प्रदान किया जाता था। गुरु चरणों में बैठकर ज्ञान को कंठस्थ किया जाता था, आत्मसात किया जाता था। गुरु के कंठ (वाक्) से निःसृत ज्ञान को शिष्य सुनता और उसे अपने भीतर उतारता। गुरु मंत्र भी तो शिष्य, गुरु की वाणी से ही प्राप्त करता है।

 

इसलिए, छान्दोग्य उपनिषद (7-2-1) वाणी की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहता है कि – यदि वाणी का अस्तित्व नहीं होता तो अच्छाई-बुराई का ज्ञान नहीं हो पाता। सच-झूठ का पता नहीं चलता और सहृदय और निष्ठुर में भेद नहीं हो पाता। वाणी की उपासना अनिवार्य है।

 

यह तो समझ में आ रहा है कि वाणी के द्वारा ही सही और गलत का अर्थ ज्ञात होता है। नीर क्षीर विवेक, ऐसी बुद्धि जो दूध का दूध और पानी का पानी कर दे, वाक् का ही प्रकाश है। इस सन्दर्भ में राजा जनक और महर्षि याज्ञवल्क्य के मध्य वार्तालाप हुआ है। राजा जनक महर्षि से प्रश्‍न करते हैं जब सूर्य अस्त हो जाता है, चन्द्रमा की चान्दनी भी नहीं रहती है, उस समय मनुष्य को प्रकाश कौन दे सकता है? ॠषि ने उत्तर दिया वाणी और उसकी अधिष्ठात्री वागीश्‍वरी (देवी सरस्वती) की उपासना।

 

आप सोच रहे होंगे कि ये तो हजारों साल पुरानी बातें हैं। वर्तमान सन्दर्भ में ये मर्म प्रासंगिक नहीं रहे। आपकी भाषा में वे शब्द जो निराशा (घोर अन्धकार) में आपको आशा (प्रकाश/भा) की ओर प्रेरित करें, आपमें नया विश्‍वास जगाएं और आपको ज्ञान (ग्य) दें, उसे मोटिवेशनल स्पीच या प्रेरक शब्द कहते हैं।
जब आप मुझसे भेंट करते हैं, तब आपको ऐसा महसूस होता है कि आपमें नई ऊर्जा का संचार हुआ। वह ऊर्जा वाक् की शक्ति ही है जो आपको ऊर्जान्वित करती है, जिससे भाग्योदय होता है। आगे बताता हूं कैसे?

 

एक शब्द सुखरास है, एक शब्द दुखरास
एक शब्द बंधन करै, एक शब्द गलफांस

वाणी से जब हम शब्द उच्चारित करते हैं, तब कतिपय ध्वनि तरंगें वातावरण में भेजी जाती हैं। ये ध्वनि-तरंगें नाद ब्रह्म का ही रूप हैं। इतना तो आपको ज्ञात है कि ‘ॐ’ ओम का उच्चारण पूर्ण अविनाशी परमात्मा का स्मरण है।

 

ओम की कल्पना को रेखांकित करते हुए माण्डूक्योपनिषद में वर्णित है-
ओमित्येतदक्षरभिद सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं
भवद् भविष्यदिति सर्वमोंकार एव।
यच्चान्यत्त्रिकालतीतं तदप्योंकार एव॥

परमात्मा के समग्र रूप को समझने के लिए उनके चार पादों की कल्पना की गई है और ये चार पाद ‘’, ‘’ स्वरों एवं ‘’ व्यंजन के साथ मात्रा रहित और मात्रा सहित नाद के रूप में अभिव्यक्त हुए हैं अतः ॐ (ओम्) की कल्पना हुई।

 

ओम् का नाद ही अविनाशी परमात्मा हैं जिनमें स्थूल और सूक्ष्म जगत, भूत और भविष्य विलीन हो जाते हैं। दृश्य और अदृश्य जगत भी उन्हीं से उत्पन्न होते हैं और ओम् का नाद परम ब्रह्म, परमात्मा का समग्र रूप है।

 

वाणी को आप सिर्फ शब्द नहीं समझें। वाणी तो आपके व्यक्तित्व की झांकी है। मोहक मुस्कान, खुले नजरिए के साथ जब शब्द कहे जाते हैं तो वे दूर तक अपना प्रभाव छोड़ते हैं। वहीं कठोर वचन कह कर आप अपने भाग्योदय को स्वयं रोक देते हैं।

 

महाभारत काल का एक प्रसंग है। दुर्योधन पाण्डवों के इन्द्रप्रस्थ नगर को देखने आए थे। बड़ा ही वैभवशाली महल था और उसकी स्थापत्य कला अद्भुत थी। फर्श तो ऐसा चमकता था कि कहां पानी है और कहां नहीं पता ही नहीं चलता। दुर्योधन को भी धोखा हो गया। दो बार उन्होंने समझा कि फर्श पर पानी है और सावधान हुए, पर पानी था नहीं, तीसरी बार पानी सा लगा जमीन पर, पर चल दिए विश्‍वास के साथ, उसे भ्रम मानकर, परन्तु इस बार सही में पानी था, फिसलकर गिर गए। द्रौपदी झरोखे से देख रही थी। व्यंग्य भरी हंसी के साथ बोलीं ‘अन्धे का पुत्र अन्धा।’

 

वह बात दुर्योधन को फांस की तरह चुभ गई और लौटकर उसने द्यूत का प्रस्ताव भेज दिया। आगे क्या हुआ आप जानते हैं। ये है वाक् की महिमा जो समय के चक्र को परिवर्तित कर सकती है।

 

वाक्य संयम

 

वाणी का अत्यधिक प्रयोग विकार उत्पन्न करता है। इसलिए बोलते समय सतर्क रहना चाहिए। कहा भी गया है कि बात-बात में बात बढ़ जाती है। जब भी बोलें, सोचें, समझें और उसे तौलें, फिर ही मुख खोलें। ज्यादातर तो यही होता है-

 

पेट न फूलत बिनु कहे, कहत न लागत देर
सुमति विचारे बोलिए, समझि कुफेर सुफेर

वाणी का ऐसा प्रताप है कि मधुर वाणी से शत्रु भी मित्र बन जाते हैं और कटु वाणी अपनों को भी पराया कर देती है। जैसे धनुष से निकला बाण वापस नहीं लौटता, वैसे ही शब्द जब मुंह से निकल जाते हैं, तब लौटते नहीं हैं। सॉरी कहकर थोड़ी बहुत मरहम-पट्टी आप कर देते हैं, पर सारी तकलीफ तो जाती नहीं है। इसलिए वाणी पर नियंत्रण करके वागीश्‍वरी सरस्वती को प्रसन्न करें।

 

सरस्वत्यै नमो नित्यं भद्रकाल्यै नमो नमः
वेद, वेदान्त, वेदांग विद्यास्थानेभ्य एव च
सरस्वत्यै महाभागे विद्ये कमल लोचने
विश्‍वरूपे विशालाक्षि विद्यां देहि नमोस्तुते

सरस्वती देवी का आर्विभाव शक्ति से हुआ है। मार्कण्डेय पुराण में स्पष्टतः लिखा है-

 

गौरी देह समुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महां
पूर्वामत्र सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम्

ज्ञान की अधिष्ठात्री सरस्वती शुम्भ आदि दैत्यों का अन्त कर देती हैं। इन्हीं की शक्ति से काली का भी प्रादुर्भाव हुआ है और लक्ष्मी भी ज्ञान शक्ति का ही एक अन्य रूप हैं।

 

शुम्भ और निशुम्भ अहंकारी थे और देवी सरस्वती ने उनके अहंकार को छिन्न-भिन्न कर दिया। ज्ञान और अहंकार के मध्य अगर युद्ध होगा तो अहंकार की पराजय निश्‍चित है।

 

इस जगत का आधार ज्ञान है। व्यक्त रूप में ज्ञान ‘वाक्’   द्वारा अभिव्यक्त होता है और अव्यक्त रूप में मौन द्वारा। ऐसे में देवी सरस्वती अन्तरात्मा की आवाज बनकर सत्प्रेरणा देती हैं। इस बात को समझें कि आपकी सफलता का आकार आपकी कल्पना शक्ति की उड़ान पर निर्भर करता है। कोई भी योजना, आविष्कार साकार होने से पूर्व मात्र एक विचार होता है, एक कल्पना पर वह कल्पना फलीभूत होती है, सरस्वती की कृपा से, मनुष्य के लिए।

 

सर्वाधिक प्राचीन ग्रंथ ॠग्वेद में सरस्वती के दो रूपों का उल्लेख है- प्रथम वाग्देवी और द्वितीय सरस्वती। वाग्देवी के रूप में सरस्वती जिह्वा पर विराजमान हैं। देवी भागवत के अनुसार भगवान श्रीविष्णु ने देवी सरस्वती को अपनी जिह्वा पर धारण किया और जिह्वा या बोलने की कला आपकी उन्नति में एक निर्णायक भूमिका निभाती है।

 

दो लोगों के बीच बातचीत करना अलग बात है, पर किसी सभा को सम्बोधित करना एकदम ही अलग बात है। अपनी बात को प्रभावी तरीके से कहना एक कला है जिससे कि लोग बंधकर आपको सुनें। वाग्देवी के रूप में देवी सरस्वती आपकी वाणी को सरसता और सम्मोहन प्रदान करती हैं।

 

कथा है कि – ब्रह्माजी ने जब सृष्टि बनाने के बाद उसे देखा तो उन्हें अपने द्वारा बनाई गई दुनिया शांत और मृतप्रायः लगी। ब्रह्माजी भगवान श्रीविष्णु के पास गए और अपनी समस्या बतायी। श्रीविष्णु का उत्तर था कि इस सृष्टि में सुर और स्वर का सप्तक देवी सरस्वती की वीणा के तार से ही संभव है। जैसे ही सरस्वती ने वीणा के तारों को छुआ, उससे शब्द फूट पड़े। मूक सृष्टि में वाणी का संचार वाग्देवी की कृपा से हुआ।

 

सरस्वती शब्द में सरस शब्द छिपा हुआ है और वती का अर्थ युक्त होता है। जीवन में नीरवता कई अर्थों में नीरसता का पर्याय है और सरस्वती नीरस जिन्दगी में रस का संचार करती हैं, पर सरस्वती का रस सात्त्विक है जो उनके शुभ्र रंग से अभिव्यक्त होता है। उनका वाहन हंस नीर-क्षीर विवेक का प्रतीक है। एक ऐसी बुद्धि जिसमें ज्ञान का उदय हो गया है। जहां ज्ञान का प्रकाश फैलता है, वहां कौन होते हैं? गुरु! बिना गुरु ज्ञान नहीं मिलता है और जब गुरु जीवन में आते हैं उस समय अज्ञान, अहंकार स्वतः नष्ट हो जाते हैं।

 

मंगल बोलिए, मंगल होगा

 

शब्द एक विचार है और विचार आपके आचरण को निर्धारित करते हैं। यही कारण है कि अभिवादन करने के लिए कई लोग जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण कहते हैं। ईश्‍वर के नाम से अधिक पुण्यदायी तो कुछ और है ही नहीं। पत्थरों को खाकर कोई फल-फूल नहीं सकता है, उसी प्रकार कठोर शब्दों से किसी का कल्याण नहीं होता है। बल्कि हृदय टूट जाता है। हृदय जब टूट जाता है, तब मन को कितना भी ढांढ़स बंधाइये, सम्बन्ध पुनः पहले जैसे नहीं हो पाते हैं। उनमें एक गांठ पड़ जाती है। इसलिए, वाणी को नाप-तौल कर बोलें। अच्छा बोलें, न जाने किस घड़ी कहा गया कौन सा कथन सच हो जाए। कहा जाता है कि – 24 घंटे में एक बार सरस्वती प्रत्येक मनुष्य की वाणी को तथास्तु का वरदान देती हैं। इसलिए मंगल बोलें, जिससे जीवन में मंगल ही होगा।

 

आपके भाग्य का उदय होना कुछ हद तक आपकी जिह्वा पर निर्भर है जैसा आप बोलते हैं, उसके अनुरूप ही आप ढलने लगते हैं। सत्संग में जाना शुरू कीजिएगा तो नहीं चाहते हुए भी भगवद भजन में मन रमना शुरू हो जाएगा कहीं और जाकर व्यर्थ की गप्पबाजी करेंगे, तब अनर्गल प्रलाप करेंगे।

 

अनर्गल प्रलाप से बचने के लिए नई चीजें सीखिए। नए विचारों को मन में आने दीजिए। हमेशा ज्ञान को प्राप्त करने की ललक रखिए। जब ज्ञान आता है, तब आपके मन, विचार स्वतः ही महानता की ओर मुड़ जाते है। उसे ही तो भाग्योदय कहते हैं।

जाग जाग रे भाग्य

जाग जाग

 

भाग्योदय सिद्धि दिवस
त्रिनेत्र नील सरस्वती साधना

 

सृष्टि के निर्माण के समय जब सम्पूर्ण सृष्टि उदासीन, नीरस और मृतप्रायः थी। सृष्टि को सजीव, जाग्रत, चैतन्य करने के लिये सभी देवताओं ने सरस्वती की वंदना की। भगवती सरस्वती की वंदना से ही सृष्टि में स्वर का संचालन हुआ, चैतन्यता विद्यमान हुई और सृष्टि अपने सम्पूर्ण आवेश के साथ नृत्य-गायन करती हुई आगे बढ़ने लगी।

 

सरस्वती ने जब अपनी वीणा के तारों को छुआ, तो उससे स्वरों का प्रादुर्भाव हुआ और सृष्टि में रस का सिंचन हुआ। हवाओं, सागर, पशु-पक्षियों एवं अन्य जीवों को वाणी मिल गई। नदियों से कल-कल की ध्वनि फूटने लगी। उन्हीं स्वरों के समूहों को वाणी रूप में आज समस्त जगत में प्रयोग किया जाता है। आज मानव उन्हीं सरस्वती की कृपा से अपने भावों की अभिव्यक्ति एक-दूसरे के समक्ष करने में सफल हो पा रहा है।

 

सरस्वती को ‘वाणी की देवी’, ‘वागेश्वरी’, ‘शारदा’, ‘गिरा’, ‘वाचा’ आदि नामों से सम्बोधित किया जाता है। सरस्वती  के हाथों में वीणा होने के कारण उन्हें ‘वीणापाणि’ भी कहा जाता है। ग्रंथों के अनुसार वाग्देवी ब्रह्मस्वरूपा कामधेनु तथा समस्त देवों की प्रतिनिधि हैं। वे ही विद्या, बुद्धि और सरस्वती हैं।

 

वाणी सरस्वती द्वारा प्रदत्त अद्भुत शक्ति हैं.. जो आकाश तत्व से संबंध रखती हैं। वाणी के संयोग से ही हम अपने विचारों को दूसरों के समक्ष रख सकते हैं। वर्तमान परिपे्रक्ष्य मेंे समझें तो वाणी ही वह तत्व है जिससे भाग्योदय प्राप्त किया जा सकता है। जब मनुष्य की जिह्वा पर सरस्वती विराजमान हो जाती हैं, तो उसके मुख से उच्चारित शब्द समूह उसके लिये भाग्योदय कारक स्थितियों का निर्माण करते हैं।

 

निखिल मंत्र विज्ञान पत्रिका ने इसी बात को ध्यान में रखते हुए विशेष मंत्रों से चैतन्य सरस्वती यंत्रों का निर्माण किया है जो साधकों को वाक्सिद्धि प्रदान कर, उनके जीवन में भाग्योदय की स्थितियों का निर्माण करते हैं।

 

भाग्योदय के लिये कई क्षेत्रों में व्यक्तित्व का विकास आवश्यक है, उसमें से एक महत्वपूर्ण क्षेत्र वाणी है। जब साधक भगवती सरस्वती की साधना-आराधना कर अपनी वाणी को शुद्ध एवं संकल्पित कर लेता है तो उसकी वाणी को सुनने वाला उस पर  मंत्र मुग्ध हो जाता है और स्वतः ही ऐसी परिस्थितियों का निर्माण होता है, जिससे उसको भाग्योदय की अवस्था प्राप्त हो जाती है।

 

सरस्वती-साधना प्रत्येक व्यक्ति को अवश्य ही सम्पन्न करनी चाहिए। व्यक्ति अपनी बात कहे और वह बात दूसरों को प्रभावित करे, उसमें नेतृत्व क्षमता का विकास हो। ऐसा केवल और केवल भगवती सरस्वती की कृपा से ही संभव है, इसके अलावा कोई दूसरा मार्ग नहीं है और जब एक बार सरस्वती सिद्ध हो जाती हैं तो वे अपनी कृपा जीवन भर बनाये रखती हैं क्योंकि मां सरस्वती लक्ष्मी की तरह चंचला नहीं हैं, उनका तो स्थायी निवास रहता है।

 

साधना-विधान

 

यह साधना 9 अगस्त 2018 भाग्योदय दिवस अथवा किसी भी पुष्य नक्षत्र पर प्रातः प्रारंभ की जा सकती है। साधक श्‍वेत धोती पहन कर पूर्व दिशा की ओर मुंह कर बैठें। यदि अपने बालकों को भी साधना कराना चाहते हैं तो उन्हें भी श्‍वेत धोती पहना कर अपने साथ बैठाएं, चन्दन का तिलक करें, सामने एक बाजोट पर सफेद वस्त्र बिछाकर उस पर गुरु चित्र/गुरु विग्रह/गुुरु यंत्र/गुरु पादुका, सरस्वती चित्र लगाएं। शुद्ध घी का दीपक तथा अगरबत्ती जलाएं। अपने सामने किसी तांबे के पात्र में पीले पुष्प के आसन पर पीले अक्षत रखें और उस पर ‘वार्ताली सरस्वती यंत्र’ स्थापित करें।

 

भाग्योदय हेतु इस विशेष साधना में सरस्वती पूजन से पूर्व गुरु पूजन कर गुरुदेव से साधना में सफलता की कामना अवश्य करनी चाहिए। इसी क्रम में सर्वप्रथम गुरु पूजन सम्पन्न करें। गुरुदेव से साधना में सफलता की प्रार्थना हेतु ध्यान करें –

 

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्‍वरः।
गुरुः साक्षात् पर ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

निखिल ध्यान के पश्‍चात् गुरु चित्र/विग्रह/यंत्र/पादुका को जल से स्नान करावें –
ॐ निखिलम् स्नानम् समर्पयामि॥

 

इसके पश्‍चात् स्वच्छ वस्त्र से पौंछ लें निम्न मंत्रों का उच्चारण करते हुए कुंकुम, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, धूप-दीप से पंचोपचार पूजन करें –

 

ॐ निखिलम् कुंकुमं समर्पयामि।
ॐ निखिलम् अक्षतान् समर्पयामि।
ॐ निखिलम्  पुष्पम् समर्पयामि।
ॐ निखिलम् नैवेद्यम् निवेदयामि।
ॐ निखिलम् धूपम् आघ्रापयामि, दीपम् दर्शयामि।                              (धूप, दीप दिखाएं)

 

अब तीन आचमनी जल गुरु चित्र/विग्रह/यंत्र/पादुका पर घुमाकर छोड़ दें। इसके पश्‍चात् गुरु माला से गुरु मंत्र की एक माला मंत्र जप करें –

 

॥ॐ परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः॥

 

गुरु मंत्र का जप करने के पश्‍चात् दोनों हाथों में पीले पुष्प लेकर निम्न मंत्र से सरस्वती का ध्यान करें –

 

शवासनां सर्पभूषां कर्त्रीं चापि कपालकं चषकं त्रिशूलं च दधतीं च चतुष्करैः।
मुण्डमाला धरांत्र्यक्षां भजे वार्ताः सरस्वतीम्॥

शव आसन पर विराजमान सर्पों के आभूषण धारण की हुईं, शत्रुओं का नाश करने वाली, चारों हाथों में कपाल, त्रिशूल एवं मुण्ड माला धारण की हुईं, तीन नेत्रों वाली भगवती नील सरस्वती का मैं नित्य ध्यान करता हूं।

 

ध्यान के पश्‍चात् पुष्पों को सरस्वती यंत्र पर अर्पित कर दें। इसके पश्‍चात् साधक ‘मणिमाला’ से निम्न मंत्र की 1 माला मंत्र जप करें।

 

मंत्र

॥ॐ ह्रीं श्रीं ऐं वाग्वादिनि भगवति अर्हन्मुख निवासिनि सरस्वतिआस्येे प्रकाशं कुरु कुरु स्वाहा ऐं नमः॥

मंत्र जप के बाद माला को यंत्र के ऊपर रख दें और ध्यान अवस्था में बैठकर भगवती सरस्वती से शुद्ध वाणी एवं भाग्योदय हेतु प्रार्थना करें। इसके पश्‍चात् सरस्वती का मूल मंत्र ‘ॐ ऐं ॐ’ का कम से कम एक घड़ी अर्थात् 24 मिनट तक जप करते रहें।  इस प्रकार यह साधना सम्पन्न होती है। साधना की पूर्णता के पश्‍चात् अगले दिन यंत्र एवं माला को सफेद वस्त्र में बांधकर जल में विसर्जित कर दें।

 

प्राण प्रतिष्ठा न्यौ. – 330/

 

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