Shiv Chakra Sahastraar Mahadiksha

आरोग्य धाम दिल्ली

29-30 दिसम्बर 2018

शिव चक्र सहस्रार महादीक्षा

आनन्द पथ की निर्बाध यात्रा

चलो दिल्ली आरोग्यधाम

बैठे गुरु संग पायेगें अमृत प्रेम

– रामचैतन्य शास्त्री


गुरु और शिष्य के बीच निरन्तर सम्पर्क आवश्यक है और शिष्यता का पहला भाव जिज्ञासा ही होता है। इस जिज्ञासा भाव में स्वयं की आन्तरिक शक्ति और बाह्य शक्ति को तीव्र और तीव्र से तीव्रतम करने की कामना भी अवश्य रहती है लेकिन जिज्ञासा केवल और केवल कामना के मार्ग पर न चली जाए, जिज्ञासा जब साधक को बाहर से भीतर उतारती है तो वह अपने भीतर एक परम सत्ता को अनुभव करता है और उस अनुभव के कारण उसकी स्वयं की सुप्त शक्तियां जाग्रत होती हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि – उसे एक विराट सत्ता, चैतन्यता का अनुभव होता है।

 

गुरुदेव गंभीर विषयों को सहज रूप से समझा देते हैं। वे अपनी सहज-सरल वाणी में वेद मंत्रों, उपनिषदों, तंत्र शास्त्र की व्याख्या कर देते हैं जिसे तथाकथित ज्ञानियों, विद्वानों, मीमांसा कारो ने उलझा रखा होता है।

 

शब्द वे ही प्रभावी हैं जो सहज रूप से समझ में आ सकें। कितना भी बड़ा क्लिष्ट शब्द हो उसका संधि विच्छेद कर उस शब्द को सरल बनाया जा सकता है जैसे तत्वमसि – तत्वम् + असि= मेरा अस्तित्व प्राण तत्व के कारण है।  ठीक उसी प्रकार गुरु भी गूढ़ रहस्यात्मक ज्ञान को संधि विच्छेद कर सरल रूप में शिष्य को प्रदान करते हैं और उनका यह ज्ञान प्रदान करना ठीक वैसा ही होता है जैसे एक मां अपने बच्चे को उसके लिये आवश्यक भोजन अपने हाथों से खिलाती है। जिस प्रकार एक पिता अपने अनुशासन में अपनी संतान को आवश्यक भोजन ग्रहण करने का आदेश देता है, उसी प्रकार गुरु के ज्ञान में सदैव और सदैव मातृ-पितृ का संयुक्त भाव रहता है।

 

शक्ति, शिव, नाद, बिन्दु, तंत्र, कला, चक्र, उर्ध्वपात बड़े ही विशेष गूढ़ विषय हैं। इन विषयों पर गुरुदेव अपनी सहज वाणी में सरल रूप में शिष्यों-साधकों को समझा देते है।

 

स्वं कर्त्तव्यं किमपि कलयंल्लोक एष प्रयत्नात्,
नो पारक्यं प्रति घटयते काञ्चन स्वात्मवृत्तिम्।
यस्तु ध्वस्ताखिलभवमलो भैरवीभावपूर्णः,
कृत्य तस्या स्फुटिमदमियल्लोककर्त्तव्यमात्रम्॥

जिस व्यक्तित्व में स्वतः सत्, तर्क, कर्त्तव्य का उदय होता है, जहां समस्त बंधन शिथिल हो जाते हैं और जहां पूर्ण शिव भाव का उदय हो जाता है वे ही शांत, सिद्ध गुरु हैं। उनको अपने लिये कुछ भी करना शेष नहीं रहता क्योंकि उनकी आत्मा कृत कृत्य है दूसरों पर अनुग्रह करना ही उनका एकमात्र लक्ष्य रहता है।

 

जब तक शिष्य पूर्ण निर्मल नहीं हो जाता तब तक गुरु बाह्य उपकरणों का उपयोग करते हैं, ‘मैं अपने शिष्य को इस साधना पथ पर अग्रसर करूंगा।’, ‘इस प्रकार से अनुग्रह करूंगा।’ इसमें शास्त्रीय मर्यादा भी है। गुरु स्वयं शिव भाव, शिवत्व स्वरूप होते हुए भी शिष्य की प्रकृति, उसकी चित्त शक्ति और उसकी मानसिक प्रकृति के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार के साधनात्मक ज्ञान प्रदान करते हैं।

 

यथैकं भेषजं ज्ञात्वा न सर्वत्र भिषज्यति।
तथैकं हेतु मालंम्ब्य न सर्वत्र गुरुर्भवेत्॥

जिस प्रकार कोई मात्र एक औषधि के ज्ञान से समस्त रोगों का चिकित्सक नहीं बन जाता, उसी प्रकार किसी एक ही हेतु का अवलम्बन लेकर, एक ही मार्ग पर चलकर कोई भी गुरु पद पर अधिष्ठित नहीं हो सकता है। गुरु तो सर्वगत, सम्यक्, सहज होते हैं जो साधक की प्रकृति के अनुसार उस पर कृपा करते हैं, शक्तिपात करते हैं, उसे ज्ञान प्रदान करते हैं।

 

शास्त्रों में कुण्डलिनी शक्ति के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है। हजारों ग्रंथ हैं, हजारों तर्क-शास्त्र, मीमांसाएं दी हुईं हैं और साधना के क्षेत्र में प्रविष्ट करने वाला प्रत्येक व्यक्ति यह जानता है कि – मनुष्य के शरीर में कुण्डलिनी के निम्न चक्र होते हैं –

 

चक्र व्याहतियां
मूलाधार चक्र भूः भौतिक
स्वाधिष्ठान चक्र भुवः भौतिक
मणिपुर चक्र स्वः भौतिक
अनाहत चक्र महः भौतिक-आध्यात्मिक
विशुद्ध चक्र जनः विशुद्ध चेतनात्मक
आज्ञा चक्र तपः विशुद्ध चेतनात्मक
सहस्रार चक्र सत्ः सत्य

 

मूलाधार चक्र – 99.99 प्रतिशत लोगों की चेतना इस चक्र में ही अटकी रहती है। ऐसे लोगों के जीवन में काम, भोग, संभोग और निद्रा की प्रधानता होती है।
पर जैसे – जैसे ऊर्जा अग्रिम चक्रों में गमन करती है रूपान्तर की क्रिया प्रारम्भ हो जाती है।

 

स्वाधिष्ठान चक्र – जब ऊर्जा इस चक्र में एकत्रित होती है तब जीवन में मौज-मस्ती, घूमना-फिरना और मनोरंजन की प्रधानता होती है। जीवन आमोद-प्रमोद में खप जाएगा और अन्त समय हासिल कुछ भी नहीं होगा।

 

मणिपुर चक्र – जब ऊर्जा इस चक्र में एकत्रित होती है तो उन्हें काम करने की धुन होती है। ये कर्मयोगी होते हैं। इस चक्र के सक्रिय होने पर तृष्णा, लज्जा, भय, घृणा, मोह आदि दूर होते हैं और आत्मशक्ति दृढ़ होती है।

 

अनाहत चक्र – जब इस चक्र में ऊर्जा दृढ़ होती है तो सृजनात्मक शक्तियां सक्रिय हो जाती हैं। हर क्षण कुछ न कुछ नया सोचते हैं। इस चक्र के जाग्रत होने पर व्यक्ति में प्रेम और संवेदनाएं जाग्रत हो जाती हैं और उसमें समय ज्ञान स्वतः प्रकट हो जाता है।

 

विशुद्ध चक्र – कंठ में सरस्वती का स्थान है, इसके जाग्रत होने पर षोडश कलाओं और विभूतियों का ज्ञान होता है। इसके जाग्रत होने पर भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी की आकुलता का प्रभाव नहीं होता, साधक उच्च स्तर प्राप्ति हेतु रत हो जाता है।

 

आज्ञा चक्र – इस चक्र के जाग्रत होने पर व्यक्ति की ऊर्जा चैतन्य हो जाती है, वह बौद्धिक रूप से सम्पन्न हो जाता है। वह संवेदनशील हो जाता है, पर साथ ही साथ शांत भी हो जाता है।

 

सहस्रार चक्र – कुण्डलिनी जागरण की चरम स्थिति सहस्रार में ऊर्जा का प्रवाह है। व्यक्ति में कुण्डलिनी जागरण की यह स्थिति अभिव्यक्त होती है तब वह परमहंस बन जाता है, अर्थात् शिव चक्र की दशा। आनन्द से परिपूर्ण

 

अब यह तो पठनीय सामग्री हो गई, यहां तक की शारीरिक आसन कराने वाले शिक्षक भी अपने आपको योग गुरु कहते हुए आपके शरीर के कुण्डलिनी चक्रों को जाग्रत करने का उपदेश देते हैं। वे तो यहां तक दावा करते हैं कि – बीस दिन में आपका मूलाधाार जाग्रत हो जाएगा, चालीस दिन में स्वाधिष्ठान, पचास दिन में मणिपुर, फिर अनाहत इतने दिनों में और आगे इसी प्रकार विशुद्ध, आज्ञा और सहस्रार चक्र जाग्रत हो जाएंगे। यहां पर उन सबकी चर्चा करना आवश्यक नहीं है।

 

सद्गुरु कहते हैं कि – शरीर के ये चक्र दृश्यमान नहीं हैं। ये नाड़ी समूहों के एक विशेष स्थान हैं जो शरीर के अलग-अलग भागों में जाग्रत होते हैं। बहुत सरल भाषा में समझाते हुए गुरु ने मुझे कहा कि – एक रस्सी को देखो उसमें सूत्र के हजारों धागे होते हैं। उन हजारों धागों में भी लाखों कपास के कण होते हैं। उन कपास के कणों, धागों से मुख्यतया तीन मोटे धागे बनाये जाते हैं। उन मोटे धागों का आपस में गुंथन कर एक और धागा या रस्सी बनाई जाती है जिसे हजार प्रकार से उपयोग में लाया जा सकता है। तो मूल तत्व कपास का वह धागा है और उस धागे की पूर्ण यात्रा रस्सी है, तो धागे से रस्सी तक का गुंथन यदि पूर्ण नहीं होता तो उस कपास के कण, धागे में, रस्सी में कोई शक्ति नहीं रह पाती है।

 

अब न कपास के धागे अपने आप आपस में जुड़ सकते हैं और न ही उनका गुंथन हो सकता है। यह गुंथन जिस प्रकार से जुलाहा करता है, उसी प्रकार गुरु का कार्य होता है। प्रत्येक साधक के शरीर में ये चक्र हैं, पर उस चक्र का क्या स्थान है, उस चक्र की क्या स्थिति है? कौनसा चक्र कितना कमजोर है और कौनसा चक्र कितना मजबूत है। यह केवल गुरु ही जान सकते हैं। यदि एक जगह भी कमजोरी रह गई तो रस्सी टूट सकती है।

 

ठीक इसी प्रकार प्रत्येक साधक और शिष्य के जीवन की स्थिति है। किसी के शरीर में कोई रोग है, तो किसी के शरीर में स्मरण शक्ति कम है, किसी के शरीर में कोई एक विशेष प्रतिभा है, तो किसी के शरीर में कोई पूर्व जन्म का दोष है। कहीं न कहीं कोई न कोई अभाव है। ध्यान देने योग्य बात है कि – प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में चक्र हैं उनमें स्पन्दन भी निरन्तर होते हैं लेकिन यदि उन स्पन्दनों में एक समान गति न हो, ऐसी गति न हो जो उर्ध्वमुखी नहीं हो तो वह शक्ति छिन्न-भिन्न हो जाएगी। वह शक्ति सार्थक नहीं हो पाएगी।

 

शक्ति वही है जो सार्थक हो। जीवन को दुःख से, पीड़ा मुक्ति की ओर ले जाएं, पीड़ा मुक्ति से आनन्द की ओर ले जाए। आनन्द से परमानन्द की ओर ले जाएं और परमानन्द से शिव आनन्द की ओर ले जाएं।

 

शिव चक्र की व्याख्या करते हुए सद्गुरुदेव ने उज्जैन के एक शिविर में कहा था कि –
आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं
पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः
सञ्चारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो
यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम्॥

हे शम्भो! आप मेरी आत्मा हैं, मां भवानी मेरी बुद्धि हैं, मेरी इन्द्रियां आपके गण हैं एवं मेरा शरीर आपका गृह है। सम्पूर्ण विषय-भोग की रचना आपकी ही पूजा है। मेरी निद्रा की स्थिति, आपकी ही समाधि स्थिति है। मेरा चलना, आपकी ही परिक्रमा है। मेरे शब्द आपके ही स्तोत्र हैं। वास्तव में, मैं जो भी करता हूं, वह सब आपकी ही आराधना है।

 

शिव अर्थात् शांत, शिव अर्थात् भ्रम से ऊपर, शिव अर्थात् जहां कोई दुःख – संताप न हो, शिव अर्थात् अपने आप में लीन।

 

गुरुदेव ने मुझे समझाया कि कुण्डलिनी चक्रों का जागरण एक क्रमबद्ध क्रिया है। जिसे किसी भी पुस्तकीय ज्ञान द्वारा जाना नहीं जा सकता है। उसे अपने आप समझा भी नहीं जा सकता है। उसके लिये कठोर तपस्या भी आवश्यक नहीं है। आप एक लाख, दस लाख, पचास लाख, दस करोड़ मंत्र जप कर लें, कोई कठोर वाममार्गी हठ योग की साधना कर लें तो यह निश्‍चित नहीं आपके शरीर के चक्रों का ऊर्जा प्रवाह उर्ध्व दिशा की ओर सरल सुगम, एक सूत्र में हो जाए, यह केवल साधना से, तपस्या से, जप से एवं पुस्तकीय ज्ञान से संभव नहीं है।

 

इसके लिये तो एक व्यक्ति की आवश्यकता है जो स्वयं शिवत्व भाव से युक्त हो उसका स्पर्श ही साधक के शरीर के चक्रों को क्रमबद्ध रूप से एक गति प्रदान कर सकता है। वह व्यक्ति परम तत्व सद्गुरुदेव हैं।

 

मैंने गुरुदेव से पूछा कि – हे! गुरुदेव इस संसार में ‘नानक दुखिया सब संसार, सो सुखीया जिन्ह नाम आधार’ क्यों है? हर व्यक्ति को कई-कई प्रकार के कष्ट क्यों हैं? क्या यह मनुष्य जीवन कष्टों को भोगना ही है? फिर इस मुनष्य जीवन की क्या उपयोगिता है? क्या ईश्‍वर ने हमें इस संसार में, जीवन को कष्टों से जीने के लिये ही भेजा है? क्या मनुष्य अपने पूर्व जन्मों के कर्मों का बोझा ढोते हुए इस जीवन की यात्रा करता है? क्या यह यात्रा इसी प्रकार चलती रहती है? क्या इस यात्रा का कोई लक्ष्य है? क्या यह यात्रा आनन्द की ओर बढ़ सकती है?

 

गुरुदेव ने कहा कि – शास्त्री जी तुम्हारे सारे प्रश्‍नों का मूल एक ही है। मनुष्य के भीतर दुःख की अनुभूति तीव्र होती है और यह अनुभूति जब दुःख की दिशा में गतिशील होती है तो उसके साथ-साथ विषाद, पीड़ा, चिन्ता की धाराएं संलग्न हो जाती हैं।

 

तुम्हारा प्रश्‍न यह है कि – दुःख की अनुभूति से सुख की अनुभूति की ओर किस प्रकार परिवर्तित हुआ जाय। जीवन की धारा को किस प्रकार मोड़ें, यही प्रश्‍न सबसे महत्वपूर्ण है। तुम्हारा यह प्रश्‍न है कि – यदि प्रत्येक मनुष्य में शक्ति की ज्वाला है तो उस शक्ति ज्वाला को, उस ज्वाला के प्रहार को कैसे सहज बनाया जा सके?

 

ध्यान से सुनो, प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन में प्रथम स्तर पर भौतिक उन्नति प्राप्त करना चाहता है और द्वितीय स्तर पर आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करना चाहता है। भौतिक उन्नति का सम्बन्ध केवल देह से है और आध्यात्मिक उन्नति का सम्बन्ध ज्ञान से है। दोनों धाराएं कालचक्र में अलग-अलग स्तर पर प्राप्त नहीं की जा सकती हैं। दोनों का हर समय समागम रखना आवश्यक है। जिस प्रकार आगम-निगम तंत्र है, उसी प्रकार जीवन में भौतिक और आध्यात्मिक भाव हैं। दोनों का संगुफन हर स्तर पर होना आवश्यक है तभी मनुष्य शरीर से बलशाली, शक्तिशाली और मस्तिष्क से बुद्धिशाली, मन से विचारशील और भावनात्मक रूप से तीव्र हो सकता है।

 

तुम्हारा प्रश्‍न है कि क्या प्रत्येक मनुष्य की शक्ति और ज्ञान का स्तर तीव्र हो सकता है, उच्च हो सकता है।

 

अवश्य हो सकता है, एक विचार, एक ज्ञान ही हमारे शरीर के स्तर और विचार के स्तर का मिलन करा सकता है और वह ज्ञान तत्व गुरु हैं  वे ही हमारे भीतर तीव्र स्पन्दन शक्ति प्रदान कर सकते हैं, जिन्हें सद्गुरु कहा जाता है और जब सद्गुरु आते हैं तभी जीवन में परिवर्तन आता है। केवल अपने-आप न भौतिक जीवन में परिवर्तन आ सकता है और न ही आध्यात्मिक जीवन में परिवर्तन आ सकता है।

 

गुरुदेव! सामान्य व्यक्ति क्या करे?

 

गुरुदेव ने कहा कि – साधक और शिष्य के लिये परम आवश्यक है कि वह तीव्र इच्छा शक्ति अपने भीतर उत्पन्न करे। केवल एक इच्छा शक्ति के जागरण से जो मूलाधार में स्थित है, उस चक्र के तीव्र स्पन्दन से वह अपने सन्मार्ग पर बढ़ सकता है और तब गुरु की परम आवश्यकता होती है जो उसकी इच्छा शक्ति का, ज्ञान से मिलन करा देते हैं। शरीर और प्राणों का मिलन करा देते हैं। विचारों को एक सहज प्रवाह दे देते हैं। भावनाओं को मार्ग दे देते हैं और उन सबका मार्ग शिव स्थान है, सहस्रार है। उस क्रिया को करने हेतु सद्गुरु जो अनुग्रह करते हैं उसे शक्तिपात की क्रिया कहा जाता है।

 

इसीलिये गुरु के व्यक्तित्व और महानता की कोई सीमा नहीं है क्योंकि केवल और केवल सद्गुरु ही साधक को शिष्यत्व भाव प्रदान कर उसके शरीर के अणु-परमाणुओं को एक गति प्रदान कर देते हैं और वह गति उर्ध्वपात की गति होती है।

 

गुरु द्वारा शक्तिपात की इस क्रिया में शरीर में, मन में, एक दो नहीं हजारों विस्फोट होते हैं। उन विस्फोटों की अनुभूति केवल और केवल शिष्य को होती है। हर मनुष्य के जीवन में निरन्तर विस्फोट होते हैं लेकिन ये विस्फोट ध्वसांत्मक भी हो सकते हैं और सृजनात्मक भी, जब मनुष्य अपने स्वयं के प्रयास से क्रिया करता है तो उसके शरीर के चक्रों का विस्फोट किस दिशा में जाएगा उसे स्वयं भी ज्ञात नहीं होता है लेकिन जब गुरु द्वारा शक्तिपात कर शरीर के चक्रों में विस्फोट किया जाता है तो वह प्रत्येक विस्फोट सृजन की ओर एक-एक चरण उर्ध्वगामी होता है।

 

गुरु द्वारा कभी एक साथ तीव्र शक्तिपात नहीं किया जाता।

 

प्रथम स्थिति में गुरु द्वारा मंद शक्तिपात, फिर धीरे-धीरे साधक की और इच्छाशक्ति उदय होने पर मध्यम शक्तिपात और फिर एक स्थिति आने पर तीव्र शक्तिपात किया जाता है। यह परम तीव्र शक्तिपात की क्रिया ही ‘शिव चक्र’ विस्फोट की क्रिया है। जहां साधक के शरीर के सारे चक्र एक ही दिशा में प्रवाहित होने लगते हैं और वह चक्र यात्रा है – मूलाधार से सहस्रार की ओर।

 

यहां यह ध्यान रखने की बात है कि – यह चक्र यात्रा सहस्रार में जाकर समाप्त नहीं हो जाती है। एक वर्तुल बनता है और सहस्रार से पुनः मूलाधार की ओर तथा मूलाधार से पुनः सहस्रार की ओर, इस प्रकार यह अविच्छन्न चक्र चलता रहता है।

 

पर गुरुदेव क्या सामान्य व्यक्ति इन चक्रों के भाव को समझ सकता है?

 

गुरुदेव ने कहा कि – संसार में कोई भी व्यक्ति सामान्य नहीं है। ईश्‍वर ने मनुष्य को प्राण देकर कोई पुतले या रोबोट नहीं बनाये हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपने आप में अद्वितीय है, ईश्‍वर की प्रत्येक रचना अद्वितीय है। संसार का कोई भी एक मनुष्य दूसरे के समान नहीं हो सकता है। हर मनुष्य का शरीर, मन, बुद्धि अलग-अलग होती है। इसीलिये मनुष्य को सामान्य मत कहो, मनुष्य तो असीम शक्ति से भरा हुआ ईश्‍वर रूपी ब्रह्म का एक अंश है। जिसके लिये अहम् ब्रह्मास्मि शब्द आया है, जिसके लिये तत्वमसि का उद्घोष आया है।

 

हर मनुष्य अपने जीवन में किसी न किसी साधना के मार्ग पर, कामना पूर्ति के मार्ग पर रत है। वह तपस्या कर रहा है, परिश्रम कर रहा है, क्रिया कर रहा है और गुरु उसे अपने साथ जोड़कर उसके तप, उसकी तपस्या को फल की दिशा में ले जाते हैं। जिससे वह आनन्दित हो सके, अपने सहस्रार में स्थित शिव भाव रूपी अमृत का आस्वादन कर सके।

 

सद्गुरु पीड़ा से भरे हृदय और वेदना से भरे मन में मरहम-पट्टी कर उसके शरीर के चक्रों पर स्थित घावों को समाप्त कर, उसके शरीर के अणुओं को पीड़ा मुक्त कर आनन्द पथ की ओर ले जाने की क्रिया सम्पन्न करते हैं।

 

यही शिव चक्र सहस्रार है, गुरु ही शिष्य में शक्तिपात द्वारा शिवत्व स्थापन करते है।

शिवचक्र सहस्रार महादीक्षा

 

निखिल मंत्र विज्ञान के साधक सृजनात्मक पथ पर गतिशील हों। आशा और विश्‍वास से पूरित होकर कर्मसाधना करें क्योंकि कर्मयोगी सद्गुरुदेव के शिष्य भी कर्म पथ पर ही प्रवृत्त होंगे पर शिव भाव से, बिना कर्म में लिप्त हुए। इसी में अमरत्व रूपी गंगा का प्रवाह है।

 

भौतिक और आध्यात्मिकता के संयोग की क्रिया प्रखर तभी होती है जब गुरु और शिष्य का मिलन होता है। उस क्षण नेत्रों के मौन संवाद में, अंगुष्ठ के क्षणिक स्पर्श में कुण्डलिनी में चक्रों का भेदन आरम्भ होता है।

 

वर्षों के मेरे अनुनय विनय के बाद और अंसख्य साधकों की अनन्त प्रार्थनाओं पर हामी भरते हुए पूज्य सद्गुरुदेव पुनः ‘शिव चक्र सहस्रार महादीक्षा’ नववर्ष के परिप्रेक्ष्य में निखिल साधकों को प्रदान करने हेतु राजी हो गए हैं। पूर्वजन्म के पुण्य कर्म होते हैं, या फिर गुरु की असीम अनुकम्पा कि शिवचक्र शक्तिपात दीक्षा साधक ग्रहण कर सकें। हम सबमें स्थित शिव और शक्ति के मध्य मिलन का सूत्रपात ‘शिव चक्र सहस्रार महादीक्षा’ प्राप्ति के उपरान्त आरम्भ होता है। जन्म – जन्मांतरों में एक बार प्राप्त होने वाले इस सौभाग्य के क्षण से जीवन को उन्नत, समृद्ध और शान्त बनाने के लिए आरोग्यधाम में 28-29-30 दिसम्बर 2018 को अवश्य आएं।

Arogya  Dham Delhi

29-30 December 2018

Shiv Chakra Sahastraara MahaDiksha

Incessant journey of divine Joy

 

Come to Delhi Arogya Dham

Taste Divine Love with Gurudev

– Ram Cheitanya Shastri


 

Continuous contact between Guru and the disciple is mandatory, and curiosity is the first expression of the disciple. This curiosity imbibes a strong desire to deeply intensify the inner and outer-physical powers.  However, care must be taken to ensure that the desire does not engulf the entire inquisitiveness. The Sadhak experiences the innate supreme power by channeling this curiosity into his inner being. This divine power activates his dormant powers and he becomes  conscious of the supreme divine.

Gurudev explains serious topics with ease. It becomes very easy to understand the  Veda Mantras,  Upanishads and Tantra scriptures just by listening to His simple discourses.  One wonders why the so called intellectuals, scholars and sages made them so confusing and difficult to comprehend.

Words become effective only when they can be easily understood.  Any complicated word can be simplified by breaking it into simple parts, for example Tatvamasi = Tatvam  + Asi i.e. I exist due to Praana element. Similarly, Gurudev simplifies and breaks down complex mysterious texts into an easy to comprehend form. This transmission of knowledge to the disciples is akin to a mother feeding her baby with her own hands. A father maintains the discipline by ordering the child to eat her food. Similarly, the knowledge of Gurudev always imbibes the joint feelings of mother and father.

Shakti, Shiva, Naad, Bindu, Tantra, Kala, Chakra, Urdhavpaat are all highly complex and esoteric topics. Gurudev simplifies this complexity to teach these topics to the disciples in plain language.

 

Swam Kartavyam Kimapi Kalayanlloka Eksha Prayatnaata,

Nou Paarakyam Prati Ghatayate Kaanchan Swaatmavrittim |

Yastu Dhwastaakhilabhavamalo BheiraveebhaavapoornaH,

Kritya Tasyaa Sfutimadamiyallokakartavyamaatram ||

 

The rise of virtues, logic and a sense of duty within the person evaporates all bonds. The expression of the Poorna Shiva transforms into a calm accomplished Guru. He does not need to do anything for Himself, as His soul is ever-engaged. His sole objective is benevolence towards all.

Gurudev uses external mediums till the disciple becomes pure and clean.  He endeavors to – “I shall move my disciple towards this path of Sadhanas”, and-or ” I shall provide this grace”. This expression complies with the classical limitations. Inspite of being an embodiment of Shiva-sense Himself,  the Guru bestows varying kinds of Sadhana spiritual knowledge to the disciples according to their mental nature and potential.

 

Yatheikam Bheshajam Gyaatvaa Na Sarvatra Bhishajyati |

Tatheikam Hetu Maalamnbya Na Sarvatra Gururbhavet ||

Knowledge of just one single medicine does not make one a  doctor of all diseases. Similarly, one cannot attain Guru form by following a single path or adopting a single purpose. Guru is omnipotent, eternal, supreme being who bestows grace, imparts wisdom and grants Shaktipaat to the Sadhak according to his or her nature.

The scriptures contain a wealth of information about the power of Kundalini Shakti. Thousands of scriptures and their commentaries elucidate details on this topic. Every person entering the field of Tantrik spiritual practices understands that the human body has following  Kundalini Chakras –

 

Chakra Nature
Moolaadhaara Chakra BhooH  Material
Swaadhishthaana Chakra BhuvaH Material
Manipura Chakra SwaH Material
Anaahata Chakra MahaH Material-Spiritual
Vishuddha Chakra JanaH Pure Consciousness
Aagyaa Chakra TapaH Pure Consciousness
Sahastraara Chakra SataH Truth

 

Moolaadhaara Chakra – The consciousness of  99.99 percent of population remains  stuck within this chakra. Such people prefer lust, luxury, sexual intercourse and sleep.

However, the transformation starts when the energy flow rises onto higher Chakras.

 

Swaadhishthaana Chakra – Accumulation of energy within this Chakra leads to prioritization of enjoyment, travel and entertainment. Accumulation of energy within this Chakra, turns the core priorities of life into fun, travel and entertainment. Eventually mirth-merriment consumes the life and nothing gets achieved.

 

Manipura Chakra – Accumulation of energy within this Chakra intensifies action and work. Such people worship work and are real Karmayogis. Activation of this Chakra causes eradication of senses of craving, shame, fear, hatred and temptation, and firms up the will power and self-determination.

 

Anaahata Chakra – Accumulation of energy within this Chakra activates the  creative powers. Such people think something new every second. Activation of this Chakra intensifies the feelings of love and he automatically becomes knowledgeable and wise.

 

Vishuddha Chakra – Goddess Saraswati resides within the Kantha. Activation of this Chakra intensifies knowledge of sixteen Kalas and Vibhutis. Activation of this Chakra makes the person immune from the pangs of thirst-hunger or environmental inclements (cold or heat).  The Sadhak prepares for the next higher level.

 

Aagyaa Chakra – Activation of this Chakra transcends the energy into consciousness. The person attains Buddha. He becomes sensitive as well as calm.

 

Sahastraara Chakra – The final stage of Kundalini activation is the  flow of energy within Sahastraara. The attainment of this state elevates him onto Paramhans i.e. the state of Lord Shiva. Resplendent with divine Joy.

 

All of the above was readable literature. Even the teachers of physical asanas who nowadays call themselves as Yoga Gurus have started to provide guidance on activation of Kundalini chakras. They even claim to activate the Moolaadhaara within twenty days,  Swaadhishthaana within forty days, Manipur within fifty and so on for Anaahata, Vishuddha, Aagyaa and Sahastraara Chakras. It isn’t worthwhile to discuss about them here.

 

SadGuru states that – These chakras of the human body are not visible. These are special combinations of nerve bundles which get activated at multiple places within the body. Gurudev explained this to me in a very simple way by taking example of a rope.  A rope contains thousands of strands of fiber. Each one of those strand contains millions of particles of cotton. These cotton particles are weaved together in three core threads.  Intertwining of these threads leads to formation of a strong rope which can be used in thousands of different ways. The cotton particle makeup  the basic elements, and the overall rope signifies the final eventual stage of the journey of this cotton particle. If the weaving, threading or intertwining of the strands or threads is not proper, then the rope cannot attain the sufficient strength.

These strands of cotton cannot weave or intertwine on their own.  Only a weaver can interlace them together. Similarly, the Guru works on the disciples. Only a Guru can identify the position of these Chakras in the disciple’s body,  and ascertain their condition -strengths and-or weaknesses. A minor deficiency within a single spot can drastically reduce the strength of the rope.

The situation of the Sadhaks and disciples is similar. Someone is afflicted with a certain illness, someone’s memory is weak, or someone’s body is afflicted with sins of a past life. Some may have a special talent while other might have deficiencies. The important factor to note is that – Chakras are present in everyone’s body and they do vibrate. However, if their vibration is not in resonance or at similar elevating frequency, then this entire power will decompose into nothing. This power will not be meaningful.

The power should be the one that is meaningful. It should lead life to liberation from grief and anguish; thence from liberation towards joy, from joy towards Parmaanand  and from Parmaanand towards Shiv Ananda.

 

SadGurudev had stated the following while explaining the Shiva Chakra in a camp in Ujjain –

Aatmaa Twam Girijaa MatiH SahacharaaH PraanaaH Shareeram Griham

Pooja Te Vishayopabhogarachanaa Nidraa SamaadhisthitiH

SanchaaraH PadayoH PradakshinavidhiH Stotraani Sarvaa Giro

Yadhyatkarma Karomi Tattadakhilam Shambho Tvaaraadhanam ||

 

O Shambho! You are my soul. Mother Bhawani is my intellect.  My senses are Your Ganas and my body is Your abode. The composition of entire sensuality is prayer onto You. The state of my sleep, is Your Samaadhi state. My walk revolves around You.  My words are Your own stotras. In fact, whatever I do, is all Your worship.

Shiva means calm,

Shiva means above confusion,

Shiva, where there is no grief or rage,

Shiva means complete absorption in the self.

 

Gurudev explained to me that awakening of Kundalini Chakras is a serial sequential process, which cannot be understood by mere reading of the texts. It cannot be comprehended by one on his own.  Hard austerity is not necessary to achieve this.  Even if you chant One Lac, Ten Lac, Fifty Lac or even Ten Crore Mantras, or perform any intense Vaamamargi Hatha Yoga Sadhana, even then it is not certain that the divine energy will flow upwards in resonance through your Chakras. This is simply not possible through mere Sadhanas, austerities, Mantra chanting or literary knowledge.

To achieve success in this endeavor, you require a person immersed within the Shiva expression. Only His touch can provide a resonant sequential upwards movement within the Chakras of the Sadhak’s body. Such a person is Param Tatva SadGurudeva.

 

I asked Gurudev – Why is this world so full of suffering?

Nanak Dukhiya Sab Sansaar, So Sukhiya Jinha Naam Aadhaar“.

Why does everyone need to undergo sufferings of multiple kinds?

Is the goal of human life just to bear these sufferings?

What, then is the utility of this human life?

Has Almighty sent us into this world just to bear these travails of human life?

Does a person travel through this life bearing the burden of sins of his past lives?

Does this travel continue eternally, just like this?

What is the end goal of this journey?

Can this journey change its route to joyfulness?

 

Gurudev replied that – Shastri, there is one single basis to all your questions. The experience of pain-suffering intensifies within the person, and when this sensation intensifies in the direction towards grief, then the streams of sadness, pain and anxiety accompany it.

 

Your basic question is – How to transform the sensation of sorrow towards happiness. You want to understand – How to change the direction of life? This is the most significant question. Your question is – how to make the intense inner flame of power bearable. How to soften this blow of this flame?

Listen carefully, every person wants to achieve physical success at the primary level of his life, and spiritual advancement at the second level.  Physical success is related only to the physical body, while the spiritual success is related to knowledge.  You cannot attain success in these streams at different points of time. A balance has to be kept between both streams.  The Tantra system involves balance between Aagam-Nigam. Similarly, life requires balance between material and spiritual senses. This balance between the two needs to be maintained at all levels, to enable a strong-powerful body and intelligent-thoughtful mind full of emotionally intense sense.

 

Your question is whether the level of  energy-power and knowledge in every person can become intense and high.

Of course. A thought, a single snippet of Knowledge can assimilate the levels of our physical body and mental contemplation. Guru is that element of knowledge.  SadGurudev can bestow intense vibrations within our inner sense. The entry of SadGurudev in our life is always accompanied with transformation. Material or spiritual transformation is simply not possible on its own.

 

Gurudev! What should a general person do?

Gurudev answered that – Generation of intense will power is essential for the Sadhak and the disciple. The intensity of will power can trigger vibration of Moolaadhaara Chakra for activation of divine flow energy on the elevated path. Guru’s presence is required at this moment to enable merger of this will-power with the knowledge-wisdom. This ensures union of the body and soul and imparts a gentle smooth upwards flow to the thoughts-ideas.  The emotional-sensations move onward on the smooth path to merge with their supreme destination, The Shiva, and Sahastraara. This process initiated by SadGuru to bestow this flow, is called the action of Shaktipaat.

 

Therefore, there is no limit on the personality and greatness of Guru. Only Guru can transform and concentrate the cells-atoms-molecules of the Sadhak by bestowing him discipleship, to enable progress upwards onto the elevation path.

This Shaktipaat process initiated by Guru causes not one or two, but rather thousands of bursts-explosions within the disciple’s body. Only the disciple can experience and feel these bursts. Human life is full of frequently occurring multiple bursts, which are either constructive or destructive. If a person tries out this process with his own efforts, he himself will not know what direction these bursts will take. However these sequential bursts at various Chakras always progress upwards when initiated though the Shaktipaat process.

Guru never initiates an intense Shaktipaat.

 

Initially, in the first stage, Guru grants a low intensity Shaktipaat. Gradually, moderate Shaktipaat is granted after strengthening of will-power of the Sadhak. Finally, one attains the capability to receive the extremely intensive Shaktipaat. This extremely intensive Shaktipaat is the burst-explosion of the “Shiv Chakra“. This triggers the flow of divine energy in all Chakras towards the same upwards direction. This is the actual Chakra path – from the Moolaadhaara to Sahastraara.

It is important to note that this Chakra journey does not terminate at Sahastraara. A cycle is created from the Sahastraara to Moolaadhaara, and then again, from Moolaadhaara to Sahastraara. Thus this infinite cycle continues unabated.

 

Gurudev, can a general person understand the expression-meaning of these chakras?

Gurudev answered that nobody in this world is general. God has not crafted statues or robots while imparting life to humans. Every person is special and unique. Every creation of Almighty is  uniquely exclusive in itself. Nobody in this world can be same as any other. The body, mind  and intellect of everyone is different. Therefore, you should not term any person in this world as a general person. Humans are an intrinsic component of the omnipotent Almighty Brahma. The words Aham Brahmaasmi indicate this basic thought, Tatvamasi reflects this expression.

Every person is engaged in the path of accomplishing Sadhanas and achieving success in his desires. He is performing austerities, doing hard work, and taking specific actions to realize this. Union with Guru takes him towards the direction of favorable results and success, to make him rejoice with divine taste of Amrit nectar of Shiva in his Sahastraara.

SadGuru nurses the pained-anguished heart, He bandages the wounds on the Chakras, to liberate the cells of this anguished body to an everjoyful state.

This is the Shiva Chakra Sahastraara, Guru sets up the Shivatava in the disciple through the Shaktipaat.

 


Shiva Chakra Sahastraara Mahadiksha

May the Sadhaks of the Nikhil Mantra Vigyan continue to tread on this constructive creative path.

Hope they continue to perform actions supplemented with optimism and faith, as it is but natural that the disciples of Karmayogi Sadgurudev will also be self-motivated  on the path of karma. However, they should engage in the Karmas in the Shiva expression, unaffected by the Karma itself.

This is the divine flow of immortal  Ganges.

The union of the Guru and the disciple heightens the combination of the materialism and spirituality , which intensifies only during the divine merger of  the Guru and the disciple.  The silent dialog of the eyes at that moment, initiates the divine Kundalini  energy flow within the Chakras with the transient touch of the thumb.

Pujya Gurudev has agreed to again grant the “Shiva Chakra Sahastraara Diksha” to the Nikhil disciples on the eve of new year after my humble supplications and prayers of innumerable Sadhaks over the past many years.  The  opportunity to receive Shiv Chakra Shaktipaat Diksha is possible only due to virtuous deeds in previous births and infinite grace of Pujya Gurudev. The trigger of union of Shiva and Shakti present within all of us initiates with the Shiva Chakra Shaktipaat Diksha. Utilize these wonderful moments which come but once  in several lifetimes to come to Arogyadham on 28-29-30 December 2018 to make your life successful, prosperous and peaceful.

 

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