Shaman Diksha

आवश्यक है प्रत्येक शिष्य हेतु

शमन दीक्षा

 

पूर्व जन्मकृत दोषों का निवारण

 

पाप कर्म आपके जीवन को जीर्ण-क्षीर्ण कर देते हैं। सुख और शान्ति आपके जीवन से लुप्त हो जाते हैं और साधना पथ पर आपकी प्रगति संशंकित हो जाती है क्योंकि साधना में आगे बढ़ने के लिए इह जन्म और पूर्व जन्मों के दोषों का शमन होना आवश्यक है।

 

शमन का शाब्दिक अर्थ शान्ति या समाप्त करना है, पर शमन करना किसका है? शमन तो पाप-जनित दोषों का करना है जो इस जन्म या विगत जन्म के हो सकते हैं। इन दोषों का पूर्ण रूपेण संहार करने पर ही साधनात्मक पथ पर प्रगति संभव है।

 

न्यूटन के तीसरे सिद्धान्त की तरह जीवन में भी प्रत्येक क्रिया की एक प्रतिक्रिया होती है। ये प्रतिक्रियाएं बार-बार आपके जीवन में दो रूपों में उपस्थित होती हैं- पाप और पुण्य। पुण्य सद्कर्मों द्वारा अर्जित किये जाते हैं और पाप दुष्कर्म जनित हैं। बहुत सरल व्याख्या है पुण्य और पाप की, जिस कर्म से किसी का मन दुःखी हो, जिससे किसी को कष्ट पहुंचे उसे पाप कहते हैं और वे कर्म जो दूसरों के मन को हर्षित करें उन्हें पुण्य कहते हैं।

 

कई बार मन में उलझन होती है क्योंकि कुछ कर्म ऐसे होते हैं जिन्हें किया जाए तो किसी एक को प्रसन्नता मिलती है, वहीं दूसरी ओर कोई और अप्रसन्न भी हो सकता है। ऐसी अवस्था में धर्मानुसार आचरण करें, जो धर्म कहता है, उसी अनुसार आचरण करें।

 

पुण्य और पाप के चक्र से मुक्ति जीवन पर्यन्त सम्भव नहीं है और पाप जब फलीभूत होता है तब आप अनायास दुःखों की गर्त में डूब जाते हैं। जीवन एक विचित्र खालीपन में घिर जाता है। बनता हुआ काम अचानक बिगड़ जाता है। बरसों से जिस पर आपने भरोसा किया होता है अचानक धोखा दे देता है, दुःखों का पहाड़ टूट पड़ता है, या फिर रोग-जनित कष्ट, दाम्पत्य में क्लेश, सन्तान से कलह आ जाते हैं। ये सब पूर्व जन्म या इस जन्म में किए गए पाप कर्मों के परिणाम हैं। पुण्य और पाप ये दोनों ही हमें कर्मों में बांधते हैं जब तक कर्त्तापन के भाव के साथ कर्म किए जाते हैं, तब तक कर्म बांधेगा और बार-बार बांधेगा, पर पाप कर्म आपके जीवन से शान्ति और सुख छीन लेते हैं। दूसरी बात, पुण्य कर्मों को जोड़ने से पाप कर्मों का खाता वहीं खत्म नहीं हो जाता। अगर ऐसा होता तो चोर, लुटेरे दान देकर पुण्य जोड़ लेते और पाप को समाप्त कर देते। पर, ऐसा नहीं है- जो कर्म आप करते हैं, या फिर विचार करते हैं, वे आपके सामने बार-बार आएंगे।

 

इसलिए, अगर बिना प्रयास किए, अनायास शुभ संयोग बनें, कार्य पूर्ण होने लगें तब समझें कि पुण्य कर्म उदय हुए हैं। इन्हीं अच्छे कर्मों का प्रभाव होता है कि सद्गुरु से भेंट होती है।

 

पर बुरे कर्म कटु शब्दों से किसी का मन दुखाना, उसके साथ छल करना, उसके प्रति द्वेष रखना, उसकी सम्पत्ति चोरी कर लेना, पाप कर्म हैं और ये कर्म न्यूटन के तीसरे सिद्धान्त की तरह आपका पीछा करेंगे जब तक उनका शमन नहीं किया जाए।

 

शमन को साधारण क्रिया समझने की भूल नहीं करें। जप, अनुष्ठान, पूजा-पाठ से आप पुण्य एकत्रित करते हैं, पर पाप नष्ट नहीं होते हैं और पाप आपके साथ तब-तक चलते रहेंगे, जब तक आपके जीवन में ऐसे सद्गुरु का प्रादुर्भाव नहीं होगा जो उन पाप कर्मों का शमन कर सकें।

 

कैसे समझें कि पाप कर्म फलित हो रहा है?

 

जिसे कठिन समय कहा जाता है, वह आपके या आपके पितरों द्वारा किए गए पाप कर्मों का परिणाम है। शास्त्रानुसार ऐसी मान्यता है कि पाप कर्म आवश्यक नहीं हैं कि आपने ही किए हों, आपकी वंश बेल में कोई और भी कर सकता है। अगर एकाएक रोग, शोक और दुःख घेर लें, मन अवसाद से घिर जाए, सब कुछ होने के बाद भी खालीपन लगे, तब  समझ लें कि आपके पाप कर्म आप पर हावी हो रहे हैं।

 

उन्हें समाप्त करने के लिए शमन दीक्षा ग्रहण करें।

 

शमन दीक्षा आपको प्रारब्ध पर विजय प्राप्त करने की शक्ति देती है। इसलिए, कोई बड़ा प्रॉजेक्ट शुरू करने से पूर्व, या किसी महत्त्वपूर्ण कार्य को आरम्भ करने से पहले, समय और प्रारब्ध को अपने अनुकूल करने के लिए शमन दीक्षा अवश्य ग्रहण करें।

 

शमन दीक्षा, वर्तमान समय में पापमोचन करने का प्रामाणिक उपाय है। इलाज से बेहतर हमेशा बचाव होता है। पाप जब जीवन को ग्रस्त करते हैं, तब जीवन में संकट के बादल गहराते हैं और संकट के उन बादलों को छांटने का मार्ग सिर्फ शमन दीक्षा है।

 

शमन दीक्षा आपके लिये जीवन की बाधाओं सेपार जाने का मार्ग सुनिश्‍चित कर देती है। आप गौर करें तो पाएंगे कि जीवन को जीने के दो तरीके हैं – एक मार्ग को हरि इच्छा कहते हैं। जो मिल गया, जितना मिल गया उसमें तृप्त हो गए और दूसरे मार्ग में संघर्ष है, उसमें जुझारूपन है। इसी मार्ग को श्रीराम ने चुना, अर्जुन ने चुना और सद्गुरुदेव निखिल ने चुना।

 

साधना और संघर्ष में अधिक अन्तर नहीं है। साधना का अर्थ तपना है और प्रतिकूल परिस्थितियों को अपने वश में करना है। इसके लिए शमन दीक्षा अनिवार्य है क्योंकि शमन दीक्षा पाप-जनित दोषों के भार से आपको मुक्त कर देती है। एकाएक आपके मन पर जो दुःखों और कष्टों का भार जमा हो जाता है, वह शमन की क्रिया और साधना से हट जाता है और आप प्रसन्नचित्त हो जाते हैं।

 

शमन को आप एक चिंगारी समझें और दोषों को सूखा घास। एक छोटी सी चिंगारी सूखे घास को नष्ट करने के लिए पर्याप्त है।

 

साधक तथा शिष्य अपने गुरु के पास इसी उद्देश्य से आते हैं, कि वे अपने-आप को पूर्ण समर्पित कर गुरु के दिव्य ज्ञान एवं प्रभाव से अपने भीतर के विकारों का, अपने इस जन्म और पूर्वजन्म के दोषों का नाश कर सकें। शिष्य अपना मार्ग स्वयं नहीं पहचान सकता, वह केवल गुरु द्वारा बताये गये मार्ग पर चलना जानता है और जब वह सही मार्ग पर चलता है, तो उसे सिद्धि व सफलता अवश्य प्राप्त होती है।

 

रुद्रयामल तंत्र’ के अनुसार जो साधक अपने गुरु के पास जाकर पूर्ण सिद्धि प्राप्त करना चाहता है, उसे किसी भी रूप में भूत शुद्धि कराकर पाप मोचिनी दीक्षा अवश्य ग्रहण करनी चाहिए, इस दीक्षा का स्वरूप अत्यन्त ही उपयोगी और प्रभावकारी है, यह तो आगे बढ़ने की दिशा में पहला प्रयास है। पाप मोचिनी दीक्षा के सम्बन्ध में शास्त्रों में जिस प्रकार विस्तृत वर्णन दिया गया है उसकी एक झलक हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं।

 

शास्त्रों में दीक्षाओं को विभिन्न चरणों में स्पष्ट किया गया है। प्रत्येक दीक्षा के अलग-अलग चरण और क्रम निर्देशित हैं। दीक्षाओं की शास्त्रोक्त जटिलताओं को सरल करने के उद्देश्य से ही सद्गुरुदेव द्वारा शक्तिपात दीक्षाओं की क्रियाओं को प्रारम्भ किया गया। साधक शक्तिपात दीक्षा के माध्यम से गुरुदेव से तेजस्विता प्राप्त कर सरल रूप में दीक्षा ग्रहण कर सकते हैं।

 

शक्तिपात युक्त शमन दीक्षा के सरलतम स्वरूप को शिष्य-साधकों के लिये उसके चरणों सहित पत्रिका के इन पन्नों के माध्यम से आपके लिये प्रकाशित किया जा रहा है।

 

शमन दीक्षा –

 

तीन चरणों की यह दीक्षा आप स्वयं गुरुदेव के समक्ष उपस्थित होकर ग्रहण कर सकते है। गुरुदेव के समक्ष आप साधना शिविर, दीक्षा दिवस अथवा किसी व्यक्तिगत भेंट में भी गुरुदेव से अनुरोध कर यह दीक्षा ग्रहण कर सकते हैं। विशेष दिवसों (गुरु पूर्णिमा, नवरात्रि, गुरु जन्मोत्सव, संन्यास दिवस, शिवरात्रि इत्यादि) पर गुरुदेव से यह दीक्षा ग्रहण करना शिष्य का सौभाग्य है।

 

इसके अतिरिक्त आप गुरुदेव को अपना फोटो भेज कर भी इस दीक्षा को प्राप्त कर सकते हैं। फोटो से प्राप्त दीक्षा भी प्रत्यक्ष दीक्षा के समान ही फलप्रद है। साधक यह शमन दीक्षा फोटो से प्राप्त करने के लिये निखिल मंत्र विज्ञान कार्यालय में डाक के द्वारा, ई-मेल के द्वारा अथवा वॉटसप के द्वारा, किसी भी प्रकार से फोटो भेज सकते हैं। विशेष ध्यान रखनें योग्य यह है कि फोटो स्पष्ट हो।

 

शमन दीक्षा तीन चरण की दीक्षा है। आप यह तीन चरण की दीक्षा बारी-बारी से अथवा एक साथ भी ग्रहण कर सकते है। इस क्रिया में दीक्षा ग्रहण के पश्‍चात् विशिष्ट दीक्षा मंत्र जप अनिवार्य है। आपने जिस चरण की दीक्षा प्राप्त की है, उसी चरण का दीक्षा मंत्र बताए गए निर्देशानुसार जप करें अथवा आपने तीनों चरणों की दीक्षा यदि एक साथ ग्रहण की है तो तीनों चरणों के मंत्र बताए गए निर्देशानुसार जप करें।

 

आपने यदि गुरु के समक्ष उपस्थित होकर यह दीक्षा ग्रहण की है तो दीक्षा स्थल पर ही मंत्रों का जप करना श्रेष्ठकर होगा और आपने फोटो के माध्यम से दीक्षा ग्रहण की है तो दीक्षा फोटो प्राप्त होने के पश्‍चात् पत्रिका में प्रकाशित विधि के अनुसार ही मंत्र जप सम्पन्न करें।

 

शमन दीक्षा क्रिया में प्रत्येक चरण की दीक्षा ग्रहण करने के पश्‍चात् केवल और केवल बताई गई माला की संख्या के अनुसार एक दिवसीय मंत्र जप करने का विधान है। आप अपनी इच्छानुसार एक दिवसीय मंत्र जप करने के पश्‍चात् और अधिक संख्या में भी मंत्र जप कर सकते हैं।

 

शमन दीक्षा प्रथम चरण मंत्र
प्रथम चरण की दीक्षा प्राप्त करने के पश्‍चात् साधक को ‘गुरु माला’ से निम्न मंत्र की 5 मालाएं जप करनी है।
बीज मंत्र

 

ॐ परमशिव सुषुम्नापथेन मूलश्रृंगाटक उल्लस उल्लस ज्वल ज्वल, प्रज्वल प्रज्वल सोऽहं हंसः स्वाहा॥

 

इस मंत्र जप के पश्‍चात् साधक के शरीर में हलचल सी प्रारम्भ होती है भीतर ही भीतर विशेष मंथन प्रारम्भ होता है, यह पाप मोचन (शमन) की पहली प्रक्रिया है।

 

शमन दीक्षा द्वितीय चरण मंत्र

 

शमन दीक्षा के द्वितीय चरण की प्राप्ति के पश्‍चात् साधक को ‘गुरु माला’ से निम्न मंत्र की 7 माला जप करनी है।
बीज मंत्र

ॐ यं लिंगशरीरं शोषय शोषय स्वाहा॥

इस दूसरे क्रम की समाप्ति होते-होते साधक को इस प्रकार का आभास होता है कि उसके शरीर में से कुछ निकल कर बाहर जा रहा है, और भीतर ही भीतर एक खालीपन अनुभव होता है, रोम-खड़े हो जाते हैं… लेकिन चिन्ता की कोई बात नहीं है, जब भी आन्तरिक स्वरूप से दोष, अणु स्वरूप में बाहर निकलते हैं, तो शरीर रोकता है, शुद्धि प्रक्रिया में कष्ट अवश्य होता है लेकिन कुछ समय बाद ही एक शांति, स्थिरता का अनुभव होता है।

 

शमन दीक्षा तृतीय चरण मंत्र –
शमन दीक्षा के तृतीय और अंतिम चरण की प्राप्ति के पश्‍चात्  ‘गुरु माला’ से निम्न मंत्र की 11 माला जप करनी है।
बीज मंत्र

ॐ ह्रीं वैष्णवै प्रतिष्ठा कमलात्मनै हुं नमः

तीसरे क्रम में साधक के वर्तमान जीवन के दोषों का शमन क्रम पूर्ण किया जाता है, जब तक शरीर के आतिरिक्त मन भी निरोगी नहीं हो जाता, तब तक किसी भी कार्य में अथवा साधना में सिद्धि नहीं हो पाती।

 

तृतीय चरण (अंतिम चरण) के दीक्षा मंत्र जप के पश्‍चात् शिष्य गुरु का पूजन करें, गुरु को शिव स्वरूप मानते हुए आरती, पुष्प इत्यादि से पूजन सम्पन्न कर अपने-आप को पूर्णरूप से समर्पित कर दें।

 

इस प्रकार पूजन कार्य सम्पन्न कर शिष्य नैवेद्य एवं दक्षिणा समर्पित करे तथा अपने दोषों के पूर्ण नाश हेतु प्रार्थना कर गुरु का आशीर्वाद प्राप्त करें।

 

यह दीक्षा साधारण दीक्षा नहीं है, जब इस दीक्षा द्वारा इष्ट देव और गुरुदेव के ध्यान में चित्त तन्मय हो जाता है, और दीक्षा द्वारा उनकी कृपा प्राप्त होती है तो चित्त पूर्णरूप से शुद्ध होकर एक विशेष आनन्द का अनुभव करता है, और पवित्रता, शक्ति, शांति की शत्-शत् धाराएं उसके ‘स्व’ को आप्लावित कर अत्यन्त दिव्य बना देती हैं।

 

– समर्पण न्यौछावर प्रति चरण – 2100/-
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