Riddance of Shani Dosh through Hanuman Sadhana

हनुमान साधना द्वारा
शनि दोष निवृत्ति
पूर्ण अभय, चिन्ता मुक्ति, शौर्य जागरण

 

निखिल मंत्र विज्ञान के इस अंक में जानें हनुमान और शनिदेव के गुप्त रहस्य और उनके सम्बन्धों के अनछुए पहलू, सूर्य संहिता के अनुसार हुनमान जी का जन्म शनिवार को हुआ और शनिवार तो शनिदेव का दिन है।

 

शनि को लेकर जन साधारण के मन में भय का भाव है। कुछ हद तक यह भाव उचित भी है क्योंकि शनि कर्म-फल प्रदाता देव हैं। शनि देव दण्डाधिकारी हैं और पाप और पुण्य का मंथन करके तद्नुरूप फल देते हैं। वर्तमान युग में जब आप बुद्धि के अधीन होकर कई निर्णय लेते हैं, तो जाने-अनजाने में आपसे पापकर्म हो जाते हैं और उन सभी कर्मों के भुगतान का समय शनि की दशा होता है।

 

शनि सूर्य पुत्र हैं, पर पिता के साथ भी उनका सम्बन्ध सहज और उदार नहीं हैं। जैसे हर सेर को सवा सेर मिल जाता है उसी प्रकार शनि भी एक शक्ति के सम्मुख नतमस्तक हैं और वो शक्ति हैं हनुमान और हनुमानजी के उपासक को शनिदेव ने अभय प्रदान किया है।

 

को नहीं जानत है जग में, कपि संकट मोचन नाम तिहारो

 

हनुमानजी संकट मोचन के रूप में पूजे जाते हैं और संकट जीवन में मुख्यतया शनि की दशा में आते हैं। राजा को रंक बना दे, ऐसा है शनि का प्रकोप। शनि की दशा में महादेव साढ़े सात वर्ष तक गुफा में बिना खाए पिये तप करते रहे; फिर साधारण मनुष्यों के विषय में क्या कहा जाए। अब, हनुमानजी तो जाग्रत देवता हैं। कलियुग में एक वे ही हैं जो विद्यमान हैं और शीघ्रता से प्रसन्न होते हैं। यही कारण है कि हनुमानजी जनदेवता बन गए हैं।

 

जनदेवता से मेरा तात्त्पर्य उन देवताओं से हैं जो वैदिक, तांत्रिक पौराणिक पूजा उपासना के साथ-साथ उससे बाहर भी लोक में वीर, ग्राम देवता या लोक परम्परा के देवता के रूप में पूजित होते हैं। झाड़-फूंक, अभिचार आदि में भी उनका पूजन वन्दन होता है। इनके पूजन द्वारा ही मंत्र और तंत्र को जगाया जाता है और उसे सिद्ध किया जाता है।

 

हनुमानजी सभी संकटों का शमन कर देते हैं और उनकी साधना द्वारा शनिदोष जनित कष्टों से निवृत्ति संभव है।

 

शनि के गुरु शिव हैं

 

अन्जनीगर्भ सम्भूतो हनुमान पवनात्मजः
यदा जातो महादेवो हनुमान सत्यविक्रमः
वायुपुराण में वर्णित है कि भगवान शिव ने सत्य पराक्रमी पवनपुत्र हनुमान के रूप में अन्जनी के गर्भ से जन्म लिया है। इस दृष्टिकोण से हनुमान शिवांश या रुद्रांश हो गए।

 

विवेचना की जाए तो हनुमानजी और शनिदेव में गुरु और शिष्य का सम्बन्ध है। महादेव की आज्ञा से ही शनिदेव कर्मफल का विश्‍लेषण करते हैं, पर साथ ही जो व्यक्ति महादेव या महावीर हनुमान का साधक है, उस पर शनिदेव की कृपा दृष्टि सदैव बनी रहती है। शिव और हनुमान भिन्न नहीं हैं। रुद्र का एकादश रूप हनुमान हैं।

 

ॐ वायुपुत्राय विद्यमहे वज्रांगाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्।

 

शिव की साधना, शिव की शिष्यता से शनि की शक्तियां हैं, पर हनुमान तो स्वयं रुद्र हैं, शिव हैं और गुरु तो हर हाल में गुरु ही होते हैं। इसलिए शनि दोष शांति के लिए उनके गुरु श्री हनुमान के शरणागत हो जाइए और बजरंग बली शनि को साध देंगे।

 

हनुमानजी के गुरु सूर्य नारायण हैं

 

सूर्य के पुत्र होने के बाद भी शनि उनसे कुछ रूष्ट रहते हैं। आज भी शनि का प्रतीक काले बादल(शनि का रंग काला है) सूर्य की तीक्ष्ण किरणों को ढंक देते हैं। तेज गर्मी में(सूर्य की रोशनी में) गाड़ी में काला शीशा चढ़ाकर, काला चश्मा पहनकर सूर्य की तेज किरणों से राहत मिलती है, जो पिता और पुत्र के असहज सम्बन्धों की अभिव्यक्ति है।

 

सूर्यदेव से हनुमानजी ने सम्पूर्ण शिक्षा-दीक्षा ग्रहण की।  सूर्यदेव जगत के पिता हैं और ऐसी भी मान्यता है कि ब्रह्माण्ड के अधिपति अर्थात् ईश्‍वर ही सूर्यरूप में जगत का पालन-पोषण करते हैं।

 

अब, जिसने ईश्‍वर के श्रीचरणों में विद्या ग्रहण की, वह वीरों का वीर महावीर होगा ही; और वे महावीर रामभक्त श्री हनुमानजी हैं।

 

शनि दोष में, आपके जीवन बाधाएं बार-बार आती हैं और बाधाओं पर विजय पाने के लिए शौर्य तत्त्व आवश्यक है। हनुमानजी महावीर हैं और उनकी साधना से साधक में शौर्य तत्त्व उदित होता है जो शनि दोष निवृत्ति हेतु आवश्यक है।

 

क्यों शनिदेव पर तेल चढ़ाया जाता है

 

रावण अपनी स्वर्ण नगरी लंका के वासियों को नवग्रहों के प्रभाव से मुक्त रखना चाहता था। उसने अपने बल से सभी ग्रहों को जिनमें शनिदेव भी एक हैं, बन्दी बना लिया। जब हनुमानजी मां सीता की खोज में लंका पहुंचे तो वहां उन्होंने शनिदेव को, शेष ग्रहों के साथ बन्दी देखा। इसी बात से क्रुद्ध होकर हनुमानजी ने सारी लंका जला दी और सभी ग्रहों को मुक्त करा दिया।

 

चूंकि शनिदेव उल्टा लटक रहे थे, उनके शरीर को कष्ट हो रहा था। उन्हें पीड़ा-मुक्त करने के लिए हनुमानजी ने तेल से उनके शरीर की मालिश की। उस दिन से शनिदेव ने वचन दिया कि जो भी व्यक्ति उन पर शनिवार को तेल चढ़ाएगा उसे वे कष्ट नहीं देंगे।

 

शनि को बांध दिया –

 

एक अन्य कथा अनुसार एक बार हनुमान जी रामसेतु के नजदीक भगवान श्रीराम की भक्ति में लीन थे। उसी समय वहां शनिदेव विचरण करते आ गए। राम भक्त हनुमान के बल, पराक्रम से परिचित शनि को यह अहंकार था कि मेरे सामने तो अच्छे-अच्छे बलशाली, बलशून्य हो जाते हैं तो फिर यह हनुमान क्यों नहीं मेरे प्रभाव के आगे झुकेगा?

 

बल का अहं भी बड़ा अजीब होता है, विशेष रूप से जब ऐसे व्यक्ति को बल प्राप्त हो जाए जो दूसरों के जीवन में परेशानी उत्पन्न कर आनन्दित होता हो यदि कोई दूसरों को कभी भी प्रताड़ित कर सकेतो उसको तो अपने बल, शक्ति पर ज्यादा ही अहं आ जाता है।

 

कुछ ऐसा ही शनिदेव के साथ था, अपने अहंकार के मद में बड़े-बड़े कदम भरते हुए शनिदेव हनुमानजी की तरफ बढ़ने लगे। हनुमान जी के नजदीक पहुंचकर, उनकी साधना में व्यवधान डालने के उद्देश्य से कहा कि – ‘हे वानर मुख हनुमान! ध्यान, भक्ति छोड़कर मुझे प्रणाम करो, देखो तुम्हारे सामने शनिदेव उपस्थित हुए हैं।’

 

शनिदेव बोलते रहे परन्तु हनुमान जी ने कुछ भी नहीं कहा, वे उसी प्रकार अपनी भक्ति में लगे रहे।

 

शनि को यह अपमान सहन नहीं हुआ और उन्होंने पुनः हनुमानजी से कहा – ‘हे वानरराज, तुम मेरे प्रभाव से परिचित नहीं हो जो व्यक्ति मेरे को प्रसन्न नहीं रखता है और मेरा आदर नहीं करता है उसको मैं प्रताड़ित कर सकता हूं। मेरे प्रभाव से मनुष्य ही नहीं देवता तक भी भयभीत होते हैं और तुम मेरे आने पर भी मेरा स्वागत नहीं कर रहे हो?’

 

परन्तु हनुमानजी तो फिर भी ध्यान में ही लगे रहे। शनि अपने इस अपमान से आग-बबूला हो गये। शनि ने निश्‍चय कर लिया कि वे हनुमानजी को प्रताड़ित करके ही रहेंगे।

 

इसी बीच हनुमानजी के राम सेतु की परिक्रमा का समय हो चुका था, इस कारण हनुमान जी राम सेतु की परिक्रमा हेतु आगे बढ़े।

 

हनुमानजी द्वारा शनि का इस प्रकार परित्याग किये जाने से शनि व्याकुल हो उठे। शनि आये तो थे हनुमानजी को प्रताड़ित करने, परन्तु हो यह रहा था कि शनि देव खुद ही प्रताड़ित हो रहे थे।

 

शनिदेव ने हनुमानजी का मार्ग रोकते हुए कहा – ‘हनुमान! तुमने मेरा आदर नहीं किया है, इस कारण तुम्हें मुझसे युद्ध करना पड़ेगा। तुम्हारा समय बहुत खराब चल रहा है इस कारण तुमने मेरा सम्मान नहीं किया।’

 

हनुमानजी ने बड़ी विन्रमता से कहा – हे ग्रहराज शनि! आप भली प्रकार परिचित हैं कि मैं अपने प्रभु श्रीराम की साधना में लीन था इस कारण आपके आने का मुझे ज्ञान नहीं हुआ तथा अभी मुझे रामसेतु की परिक्रमा करनी है। इस कारण आप थोड़ा इंतजार करें, रामसेतु की परिक्रमा पूरी करने के पश्‍चात् ही मैं आपसे बैठकर बात कर पाऊंगा।

 

शनिदेव हनुमानजी के वचन सुनकर और भी अधिक क्रोधित हो गये और कहा कि – ‘हे हनुमान! आज से तुम शनि ग्रह बाधा से पीड़ित हो चुके हो। तुमको शनि ग्रह शांति तभी प्राप्त होगी जब तुम मेरा आदर सत्कार करोगे। तुम्हें अब रामसेतु की परिक्रमा करने की आवश्यकता नहीं है। तुम तो अब मेरी साधना-पूजा करो, तभी तुम्हारा भला होगा।’

 

शनि के कठोर वचनों को सुनकर भी हनुमानजी शांत रहे और कहा – ‘आप मुझे अभी रामसेतु की परिक्रमा करने दें उसके बाद ही मैं आपसे वार्तालाप कर सकता हूं।’

 

परन्तु इस पर भी जब शनि शांत नहीं हुए और लगातार कठोर वचनों से हनुमानजी का परिहास ही करते रहे तो हनुमान जी ने उन्हें अपनी पूंछ में बांध दिया और रामसेतु की परिक्रमा के लिये दौड़ने लगे। शनि लाख प्रयत्न करते रहे परन्तु हनुमान जी की पूंछ से बंधन मुक्त नहीं हो पाये। हनुमानजी राम सेतु की परिक्रमा करते हुए अपनी पूंछ को सेतु की शिलाओं पर जोर-जोर से पटकाने लगे। पूंछ को शिलाओं पर पटकाने के कारण शनि लहूलुहान हो गये। शनि ने मुक्त होने के लिये अपनी पूरी शक्ति लगा दी, लेकिन बंधन मुक्त नहीं हो पाये, अब वे हनुमान जी से बंधन मुक्त करने की प्रार्थना करने लगे। हनुमान जी ने भी शनि का घमण्ड समाप्त होने पर उन्हें मुक्त कर दिया।

 

शिलाओं से टकराने के कारण शनि लहुलुहान हो गये तो हनुमान जी ने दया कर पीड़ा निवारण हेतु तेल प्रदान किया। शनि ने हनुमान के बल, पराक्रम को स्वीकार कर यह वचन दिया कि जो भी व्यक्ति हनुमान का भक्त होगा उसको मैं अर्थात् शनि कभी कष्ट नहीं दूंगा तभी से हनुमान के भक्तों को शनि कष्ट और पीड़ाएं नहीं देते हैं।

 

शनि की शान्ति के लिए आपको अवश्य ही, एक ऐसी सत्ता के समीप जाना पड़ेगा जिसका पलड़ा शनि पर भारी है और वह सत्ता रुद्रांश श्री हनुमान हैं। पर मनुष्य की प्रवृत्ति है कि वह आसान मार्ग ढूंढ़ता है, इसलिए शनि पर तेल चढ़ाने की परम्परा शुरू हुई। शनिदेव पर तेल चढ़ाने से आपको शनिदोष शान्ति में सिर्फ उत्तीर्ण होने जितने अंक मिलेंगे, अर्थात् ग्रह बाधाओं से क्षणिक शांति प्राप्त होगी, पर अगर आपको बाधाओं का पूर्ण शमन करना है तो प्रतीकात्मक उपायों से काम नहीं चलेगा। पूर्ण शान्ति के लिए हनुमान साधना कीजिए और शनिदोष से पूर्ण निवृत्ति प्राप्त कीजिए।

 

साधना-विधान

 

इस साधना को आप किसी भी मंगलवार अथवा शनिवार को सम्पन्न कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त शनि अमावस्या, शनि जयंती अथवा हनुमान जयंती विशेष सिद्धिकारक दिवस हैं। इन दिवसों पर यह साधना सम्पन्न करने से साधना का फल कई गुना बढ़ जाता है।

 

यह एकदिवसीय रात्रिकालीन साधना है। साधना से पूर्व ही साधना स्थल झाड़-पौंछ कर साफ कर लें। पूर्व दिशा की ओर मुंह कर अपने सामने एक बाजोट पर पीला वस्त्र बिछा लें। इस साधना हेतु पीले रंग के वस्त्र धारण कर पीले आसन पर ही बैठें। स्वयं भी गुरु चादर ओढ़ लें।

 

सर्वप्रथम बाजोट पर गुरु चित्र स्थापित कर उसका संक्षिप्त पूजन सम्पन्न करें तथा गुरु माला से गुरु मंत्र की 1 माला अवश्य सम्पन्न कर लें।

 

इसके पश्‍चात् गुरु चित्र के समक्ष ही हनुमान चित्र स्थापित कर, चित्र पर पीले पुष्पों की माला अर्पित कर दें। उसके पश्‍चात् एक ताम्र पात्र में पीले पुष्पों का आसन देकर उसमें ‘हनुमान यंत्र’ स्थापित कर दें। हनुमान यंत्र एवं चित्र पर तेल मिले हुए सिन्दूर का तिलक करें तथा उसकी बिन्दी अपने मस्तक पर भी लगाएं।

 

उसके पश्‍चात् हनुमान यंत्र के समक्ष तेल का दीपक प्रज्वलित कर तेल के दीपक में एक लौंग डाल दें।

 

इसके पश्‍चात् दोनों हाथ जोड़कर हनुमान जी का स्मरण करते हुए निम्न श्‍लोकों का 5 बार पाठ करें –

 

हनुमानंजनी सुनुर्वायुपुत्रो महाबलः।
रामेष्टः फाल्गुनसखः पिंगाक्षोऽमितविक्रमः॥
उदधिक्रमणश्‍चैव सीताशोक विनाशनः।
लक्ष्मणप्राणदाता च दशग्रीवस्य दर्पहा॥
एवं द्वादश नामानि कपीन्द्रस्य महात्मनः।
स्वाल्पकाले प्रबोधे च यात्राकाले च यः पठेत्॥
तस्य सर्वभयं नास्ति रणे च विजयी भवेत्।
राजद्वारे गह्वरे च भयं नास्ति कदाचन॥
इसके पश्‍चात् ‘हनुमान गुटिका’ को सिन्दूर से रंग कर हनुमान यंत्र पर चढ़ा दें तथा पान के पत्ते में लौंग, इलाचयी डालकर यंत्र पर अर्पित करें।

 

इसके पश्‍चात् ‘मूंगा माला’ से निम्न मंत्र की 1 माला मंत्र पांच शनिवार जप करें।

 

मंत्र
ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय वज्रदेहाय वज्रनखाय वज्रमुखाय वज्ररोम्णे वज्रनेत्राय वज्रदंत्ताय, वज्रकराय वज्रभक्ताय, रामदूताय स्वाहा॥
मंत्र जप के पश्‍चात् वीर मुद्रा में बैठकर हनुमानजी का ध्यान करें तथा हनुमान जी से शनि ग्रह बाधा शांति की प्रार्थना करें।

 

इस प्रकार यह पूजन सम्पन्न होता है और इसके पश्‍चात् गुड़ का नैवेद्य हनुमानजी को अर्पित करें तथा प्रसाद स्वयं भी ग्रहण करें। अगले दिन समस्त साधना सामग्री किसी हनुमान मन्दिर में अर्पित कर दें।

 

प्राण प्रतिष्ठा न्यौछावर – 490/-

Shaneshchari Amavasya – 17 March 2018

Hanuman Jayanti – 31 March 2018

Termination of Malefic Effects of Shani (Saturn)

Through

Hanuman Sadhana

Perfect Boldness,  Serenity and Courage

Let us explore the secret mysteries of Lord Hanuman and Lord Saturn and their enigmatic relationship in this issue of Nikhil Mantra Vigyan. According to Surya Sanhita, Lord Hanuman was born on a Saturday, and Saturday is the favorite day of Lord Saturn.

 

Generally, people fear Lord Saturn (Planet Saturn). Lord Saturn always bestows fruits of past Karmas, and thus this fear is justified to a certain extent. Lord Saturn judges the past karmas-actions, and punishes or rewards as per the deeds performed. Sometimes, our current intelligent  decision leads to sinful wicked  actions,  and we pay for these sins during the Dasha influential period of Lord Saturn.

Lord Saturn is son of  Lord Sun, however His relationship with His parent is neither tender nor indulgent. Everyone finds his or her match, and similarly, Lord Saturn bows to a particular power. This specific power is Lord Hanuman. Lord Saturn has assured a protection boon to all  devout worshipper of Lord Hanuman.

 

Ko Nahi Jaanat Hai Jag Mey, Kapi Sankat Mochan Naam Tihaaro

Lord Hanuman is worshipped for protection from distresses, and generally such critical disasters strike during the Dasha influence of Lord Saturn. The malevolent influence of Lord Saturn can turn a king into a pauper within seconds. Even Lord Mahadev had to continuously perform penance confined within a cave without any food for seven and a half years during  the Dasha influence of Lord Saturn. We can only imagine what the fate of any common person will be during such misfortune Dasha period. Lord Hanumanji is an active God. He is the only  spirited deity during the Kaliyuga era. He also gets pleased very easily. These divine attributes have enhanced the popularity of Lord Hanuman and He has become a “Deity of the People”.

The term  “Deity of the People” is being used here to describe the Gods, who are worshipped as Veer, Graam Devata (Village deity) or Lok Parampara Devata (Society deity), along with being worshipped through Vedic, Tantric and Purannic worship rites. He is also worshipped in various simple rituals like Evil-eye removal, beneficial-protection etc. His worship ignites Tantra and Mantra, leading to accomplishments.

Lord Hanumanji terminates all kinds of agonies and His Sadhana provides protection from miseries of Lord Saturn’s malefic influence.

 

Lord Shiva is Guru of Lord Saturn

Anjanigarbha Sambhooto Hanumaan PawanaatmajaH

Yadaa Jaato Mahaadevo Hanumaan SatyavikramaH

 

Vayupuraan states that Lord Shiva has incarnated as True, Brave, Pawan’s son through Mother Anjani’s womb. Thus Lord Hanuman is a form of Lord Shiva or Lord Rudra.

A detailed analysis reveals that the relationship between Lord Hanuman and Lord Saturn is that of a Guru and His disciple. Lord Saturn analyzes and judges as per command of Lord Mahadeva, and so His benevolence always extends to any Sadhak of Lord Mahadeva or Lord Hanuman. There is absolutely no difference between Lord Shiva and Lord Hanuman. Lord Hanuman is the Eleventh form of Lord Rudra.

 

Om Vaayuputraaya Vidyamahe Vanjraagaaya Dheemahi Tanno RudraH Prachodayaata |

 

Lord Saturn’s divine powers originate from the Sadhana and discipleship of Lord Shiva. Lord Hanuman is Himself Lord Rudra, or Lord Shiva; and the Guru is always supreme. Thus one can take protection from Lord Saturn’s malevolence by taking solace under the divine shade of His Guru, Lord Hanuman.  Lord Bajrang Bali will instruct Lord Saturn accordingly.

 

Lord Sun is Guru of Lord Hanumanji

Lord Saturn generally remains discontent with His parent, Lord Sun. Black clouds (Black color denotes Lord Saturn) symbolizes Lord Saturn, and these dark clouds completely cover the intense rays of Sun. One can obtain solace from Sun’s hot glaring rays by using dark films on car windows, and by wearing dark glasses. This is a practical expression of the turbulent relationship between the Father and the Son.

Lord Hanuman received His entire education from Lord Sun. Lord Sun is the holy father of the world. There is a general belief that Almighty God, the Providence of the Universe, nourishes this world in the divine form of Lord Sun.

Now,  one who has received education from the divine Providence Himself,  will obviously, be the bravest of the braves, the Mahaveer. Lord Hanumanji, the devotee of Lord Rama, is this Mahaveer.

The malefic affliction of Lord Saturn causes troubles and problems to repeatedly appear in your life, and these troubles can be resolved only through steadfast courage. Lord Hanumanji is Mahaveer, the bravest of the braves. Sadhana of Lord Hanuman ignites this courage element in the Sadhak, and active enhancement of this courage element eliminates all afflictions of Lord Saturn.

 

Why is oil offered on Lord Saturn

Ravana wanted to protect residents of Lanka, his golden city, from Lord Saturn’s influence. He used his powers to imprison all the planets, including Saturn.  Lord Hanuman noticed this captivity of planets, during His search for Mother Sita in Lanka. An enraged Lord Hanuman burnt Lanka and freed up all the planets.

Lord Saturn was suffering from deep pain since He was hanging upside down. Lord Hanuman massaged His body with oil to ease His pain. Lord Saturn proclaimed that He will not give any trouble to the person, who offered oil on Saturday.

 

Tied up Lord Saturn-

According to another legend, once Lord Hanumanji was meditating in devotion to Lord Rama near Rama-Setu. Lord Saturn wandered up to Him.  Lord Saturn was familiar with the power and strength of Lord Hanuman.  Like other such powerful strong beings, his mind was full of ego. A vain desire flashed in His mind to get Lord Hanuman to bow to Him.

Egotism is a strange quality. Especially in case of someone, who  derives pleasure by making others suffer. Harassing others automatically enhances pride in self strength and power.

Lord Saturn was also affected with similar egoistic thoughts. He started towards Lord Hanuman, vainly taking long strides. He started to interrupt Lord Hanuman’s Sadhana by saying – “O Monkey face Hanuman! Stop this devotion-meditation, and salute me. I, Lord Saturn have appeared in front of you.”

Lord Saturn kept on speaking, but Lord Hanumanji did not bother. He continued His meditation.

Lord Saturn could not tolerate this insult, and He again repeated to Lord Hanumanji – “O Monkey-King! You do not know me. I can torment anyone who does not please or respect me. Even Gods fear my influence. And yet, you are ignoring me, instead of extending a warm welcome.”

However, Lord Hanumanji continued with His meditation. Lord Saturn got furious and decided to torment Lord Hanuman.

Meanwhile, it was time for Lord Hanumanji to circumbulate the Rama-Setu. He got up and started to walk towards Rama-Setu.

This repeated  affronting by Lord Hanumanji enraged Lord Saturn. It now seemed that Lord Hanuman was tormenting Lord Saturn, who had originally intended to torment Him.

Blocking His path, Lord Saturn thundered to Lord Hanuman – “Hanuman! You have slighted me and I shall punish you in a battle. You are passing through hard luck, as You did not accord me due respect-honor.”

Lord Hanuman politely replied – “O Lord Saturn, King of Planets! As you observed, I was deeply immersed in Sadhana of my Lord Shree Rama, and therefore, I did not notice your arrival. I have to circumbulate Rama-Setu now. Please wait a little while. I shall definitely sit and talk to you after my circumbulation of Rama-Setu.”

Lord Hanuman’s words infuriated Lord Saturn’s anger, and He roared – “O Hanuman! From today you will be tormented by Planet Saturn. You will attain peace only when you respect and honor Me. You do not need to circumbulate  Rama-Setu. Only my worship-Sadhana will help you to progress ahead.”

Lord Hanumanji remained calm  even after listening to the harsh words of Saturn and humbly replied- “Please let me complete my circumbulation of Rama-Setu, and I shall talk you immediately after that.”

However Lord Saturn did not calm down and continued to taunt Lord Hanumanji with His strong harsh words. Lord  Hanumanji tied Him in his tail and started running for the circumbulation of Rama-Setu.  Lord Saturn tried His best, but He could not release Himself from this bondage.  Lord Hanuman started hitting His tail strongly against the rocks while circumbulating. Lord Saturn got badly injured due to this. Lord Saturn tried to become free with His full strength, but could not succeed. Now, He started to pray to Lord Hanumanji to free Him up. Lord Hanumanji freed Him after vanquishing His pride.

When Lord Saturn got badly injured due to battering against the rocks, then Lord Hanumanji mercifully offered Him oil to relieve His pain. Lord Saturn accepted the supremacy of divine powers and strength of Lord Hanuman and promised that  He will never torment any devotee of Lord Hanuman. Since then, Lord Saturn does not give pain and sufferings to the devotees of Lord Hanuman.

To obtain peace from Planet Saturn’s torment, you must approach a superior power, who exercises dominance over Lord Saturn, and Lord Hanuman, the Rudraansh, is that power.

However, the natural human instinct to find an easy way, led to offering of oil to Lord Saturn.  This offering of oil to Lord Saturn will grant you  marginal success for few limited moments only.  However, if you want to completely eliminate all obstacles-troubles, then such symbolic gestures are not enough. Perform Hanuman Sadhana to attain complete peace and obtain total riddance from torment of Lord Saturn.

 

Sadhana Procedure

You can accomplish this Sadhana practice on any Tuesday or SaturdaySaturn Amavasya, Saturn Jayanti or Hanuman Jayanti are special days to obtain accomplishments in this Sadhana. The fruits of Sadhana enhance manifold by accomplishing Sadhana on these days.

This is a single-day nocturnal Sadhana. Clean the Sadhana site carefully before starting the Sadhana.  Sit facing East direction and spread a yellow cloth on a wooden board. The Sadhak should wear yellow colored clothes and sit on a Yellow colored Asana. You should also wear Guru Chadar.

First, setup Guru picture on  the wooden board and perform worship. Chant 1 mala of Guru Mantra using Guru Mala.

After this, setup Lord Hanuman picture near Guru picture and offer a garland of Yellow colored flowers. Then create a seat of Yellow flowers in a copper plate, and setup “Hanuman Yantra” on the floral seat. Mark a tilak on Hanuman Yantra and Picture  using  oil-vermilion (sindoor) mixture. Also make a mark on your own forehead.

Thereafter light an oil lamp in front of “Hanuman Yantra”, and place one clove (Loung) in it.

Then, with folded hands, meditate on  Lord Hanuman chanting following Shlokas 5 times-

 

Hanumaananjani Sunurvaayuputro MahaabalaH |

RaameshtaH FaalgunasakhaH PingaakshoSmitavikramaH ||

Udadhikra Manashcheiva Seetaashoka VinaashanaH|

Lakshmanapraanadaataa Cha Dashagreevasya Darpahaa ||

Evam Dwaadasha Naamaani Kapeendrasya MahaatmanaH |

Swaalpakaale Prabodhe Cha Yaatraakaale Cha YaH Pathet ||

Tasya Sarvabhayam Naasti Rane Cha Vijayee Bhavet |

Raajadwaare Gahrare Cha Bhayam Naasti Kadaachana ||

 

Thereafter color “Hanuman Gutika” with sindoor (vermilion) and offer it to Hanuman Yantra. Wrap loung (clove), Elaichi (cardamom) in a paan-leaf and offer it to the Yantra.

Then chant 1 mala of following Mantra with “Moonga Mala” for 5 consecutive Saturdays –

 

Mantra

Om Namo Hanumate Rudraavataaraaya Vajradehaaya Vajranakhaaya Vajramukhaaya Vajraromne Vajranetraaya Vajradanttaaya, Vajrakaraaya Vajrabhaktaaya, Raamadootaaya Swaahaa ||

 

After completion of Mantra chanting, meditate on Lord Hanuman, sitting in Veer Mudra. Pray to Lord Hanuman to grant peace from the torments of Lord Saturn.

 

Thus, this worship gets completed. Offer Neivedhya of Jaggery to Lord Hanumanji. Eat some prasaad yourself. Next day offer the entire Sadhana articles in any  Hanuman temple.

 

Consecrated-Sanctified Sadhana Materials –  490/-

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