Rambha Sadhana

जीवन में वसन्त का आगमन
रम्भा साधना

 

जीवन का उत्स काल अर्थात् जिस काल में मनुष्य अपने जीवन का निर्माण सतत् रूप से करता रहता है, वह 21 से 50 वर्ष के मध्य का होता है। पचास वर्ष के बाद किसी नवीन भाव को स्वीकार करने की चेतना अथवा किसी नये कार्य को हाथ में लेने की क्षमता कम होने लग जाती है।

 

जीवन का यह मध्य काल केवल शारीरिक व मानसिक क्षमता की दृष्टि से ही नहीं वरन् पचास वर्ष के पश्‍चात के जीवन को भी क्षमतावान बनाए रखने की दृष्टि से महत्वपूर्ण काल होता है।

 

जीवन के ऐसे ही क्षणों में ऐसी विशेष साधना को सम्पन्न कर लेना चाहिए, वह होती है अप्सरा साधना, क्योंकि अप्सरा साधना से शरीर को जो ऊर्जा, और शारीरिक ऊर्जा से भी अधिक आवश्यक मानसिक उल्लास प्राप्त होता है वह पूरे जीवन के लिए अनेक रूपों में लाभप्रद सिद्ध होता है।

 

यह एक अनुभूत तथ्य है कि यदि अप्सरा साधना को सम्पन्न करने के उपरान्त अन्य साधनाओं को प्रारम्भ किया जाए तो उनमें अपेक्षाकृत अधिक तीव्रता से सफलता प्राप्त होने की स्थिति बन जाती है क्योंकि अप्सरा साधना करने के पश्‍चात निश्‍चय ही साधक के शरीर में ऐसे परिवर्तन आ जाते हैं, जो उसे आन्तरिक रूप से नित्य यौवनवान बनाए रखने में सहायक सिद्ध होते हैं।

 

रम्भा-उच्चतम अप्सरा

 

उच्चकोटि की अप्सराओं की श्रेणी में रम्भा अप्सरा का प्रथम स्थान है, जो शिष्ट और मर्यादित मानी जाती हैं, सौन्दर्य की दृष्टि से अनुपमेय कही जा सकती हैं। शारीरिक सौन्दर्य, वाणी की मधुरता नृत्य, संगीत, काव्य तथा हास्य और विनोद यौवन की मस्ती, ताजगी, उल्लास और उमंग ही तो रम्भा हैं, जिसकी साधना से वृद्ध व्यक्ति भी यौवनवान होकर सौभाग्यशाली बन जाता है। जिसकी साधना से योगी भी अपनी साधनाओं में पूर्णता प्राप्त करते हैं। इच्छित पौरुष एवं सौन्दर्य प्राप्ति के लिए प्रत्येक पुरुष एवं नारी को इस साधना में अवश्य रुचि लेनी चाहिए। सम्पूर्ण प्रकृति-सौन्दर्य को समेट कर यदि साकार रूप दिया जाय तो उसका नाम रम्भा होगा। सुन्दर मांसल शरीर, उन्नत एवं सुडौल वक्षस्थल, काले, घने और लम्बे बाल, सजीव एवं माधुर्य पूर्ण आंखों का जादू, मन को मुग्ध कर देने वाली मुस्कान, दिल को गुदगुदा देने वाला अंदाज, यौवन भार से लदी हुई रम्भा अप्सरा बड़े से बड़े योगियों के मन को भी विचलित कर देती हैं। जिसकी देह यष्टि से प्रवाहित दिव्य गंध से आकर्षित देवता भी जिसके सानिध्य के लिए लालायित देखे जाते हैं।

 

* सुन्दरतम वस्त्रालंकारों से सुसज्जित चिरयौवना, जो प्रेमिका या प्रिया के रूप में साधक के समक्ष उपस्थित रहती हैं, साधक को सम्पूर्ण भौतिक सुख के साथ मानसिक ऊर्जा, शारीरिक बल एवं वासन्ती सौन्दर्य से परिपूर्ण कर देती हैं।

 

* रम्भा अप्सरा साधना के सिद्ध होने पर वह साधक के साथ छाया की तरह जीवन भर सुन्दर और सौम्य रूप में रहती हैं तथा उसके सभी मनोरथों को पूर्ण करने में सहायक होती हैं।

 

* रम्भा साधना सिद्ध होने पर सामने वाला व्यक्ति स्वयं खिंचा चला आए, यही तो चुम्बकीय व्यक्तित्व है।

 

* इस साधना से साधक के शरीर से रोग, जर्जरता एवं वृद्धता समाप्त हो जाती है।

 

* यह जीवन की सर्वश्रेष्ठ साधना है; जिसे देवताओं ने सिद्ध किया, इसके साथ ही ॠषि-मुनि, योगी संन्यासियों आदि ने भी इसे सिद्ध किया है, यह सौम्य साधना है।

 

* इस साधना से प्रेम और समर्पण की कला व्यक्ति में स्वतः प्रस्फुटित होती है क्योंकि जीवन में यदि प्रेम नहीं होगा तो व्यक्ति तनावों से, बीमारियों से ग्रस्त होकर समाप्त हो जाएगा। प्रेम की अभिव्यक्ति करने का सौभाग्य और सशक्त माध्यम है रम्भा साधना। जिन्होंने रम्भा साधना नहीं की है, उनके जीवन में प्रेम नहीं है, तन्मयता नहीं है, प्रफुल्लता भी नहीं है।

 

साधना-विधान

 

सामग्री – प्राण प्रतिष्ठित रम्भोत्कीलन यंत्र, अप्सरा माला, सौन्दर्य गुटिका तथा साफल्य मुद्रिका। यह रात्रिकालीन 7 दिन की साधना है। इस साधना को किसी भी पूर्णिमा को, शुक्रवार को अथवा किसी भी गुरु पुष्य, रवि पुष्य, सर्वार्थ सिद्धि योग के दिन से प्रारंभ करें।

 

साधना प्रारंभ करने से पूर्व साधक को चाहिए कि स्नान आदि से निवृत्त होकर अपने सामने चौकी पर गुलाबी वस्त्र बिछा लें, पीले या सफेद किसी भी आसन पर बैठें, आकर्षक और सुन्दर वस्त्र पहनें, पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें, घी का दीपक जला लें, सामने चौकी पर एक थाली या प्लेट रख लें, दोनों हाथों में गुलाब की पंखुड़ियां लेकर रम्भा का आह्वान करें।

 

॥भो रम्भे आगच्छ पूर्ण यौवन संस्तुते॥

 

यह आवश्यक है कि यह आह्वान कम से कम 101 बार अवश्य हो। प्रत्येक आह्वान मंत्र के साथ एक-एक पंखुड़ी थाली में रखते जाएं इस प्रकार आह्वान से पूरी थाली पुष्प-पंखुडियों से भर दें।

 

अब अप्सरा माला को पंखुडियों के ऊपर रख दें इसके बाद अपने बैठने के आसन पर और अपने ऊपर इत्र छिड़कें। रम्भोत्कीलन यंत्र को पुष्प आसन पर स्थापित करें। गुटिका को यंत्र के दायीं ओर तथा साफल्य मुद्रिका को यंत्र के बांयीं ओर स्थापित करें। सुगन्धित अगरबत्ती एवं घी का दीपक साधनाकाल तक जलते रहना चाहिए।

 

सबसे पहले गुरु पूजन और गुरु मंत्र का जप कर लें। फिर यंत्र तथा अन्य साधना सामग्रियों का पंचोपचार से पूजन सम्पन्न करें।  इसके बाद बायें हाथ में गुलाबी रंग से रंगे हुए चावल रखें, और निम्न मंत्रों को बोलकर यंत्र पर चढ़ावें।

 

ॐ दिव्यायै नमः। ॐ प्राणप्रियायै नमः।

ॐ वागीश्‍वयै नमः। ॐ ऊर्जस्वलायै नमः।

ॐ सौन्दर्य प्रियायै नमः। ॐ देवप्रियायै नमः।

ॐ यौवनप्रियायै नमः। ॐ ऐश्‍वर्यप्रदायै नमः।

ॐ सौभाग्यदायै नमः। ॐ धनदायै रम्भायै नमः।

ॐ आरोग्य प्रदायै नमः।

इसके बाद उपरोक्त अप्सरा माला से निम्न मंत्र का 5 माला प्रतिदिन जप करें।

 

मंत्र

 

॥ॐ ह्रीं रं रम्भे! आगच्छ आज्ञां पालय मनोवांछितं देहि ऐं ॐ स्वाहा॥

 

प्रत्येक दिन अप्सरा-आह्वान करें और प्रत्येक दिन गुलाब की दो मालाएं रखें। एक माला स्वयं पहन लें, दूसरी माला को यंत्र के पास रखें, जब भी ऐसा आभास हो कि किसी का आगमन हो रहा है अथवा सुगंध एक दम बढ़ने लगे, अप्सरा का बिम्ब नेत्र बन्द होने पर भी स्पष्ट होने लगे तो दूसरी माला सामने रखे यंत्र पर पहना दें।

 

7 दिन की साधना में प्रत्येक दिन नये-नये अनुभव होते हैं चित्त में सौन्दर्य भाव बढ़ने लगता है। कई बार तो रूप में अभिवृद्धि स्पष्ट दिखाई देती है। स्त्रियों द्वारा इस साधना को सम्पन्न करने पर चेहरे पर अद्वितीय ताजगी प्राप्त होती है।

 

सातवें दिन साधना की पूर्णता के पश्‍चात् मुद्रिका को शिव मन्दिर में अर्पित कर दें, शेष सभी सामग्रियों को अगले दिन जल में प्रवाहित कर दें। पूर्ण मनोयोग से साधना करने पर मनोकामना अवश्य पूर्ण होती ही है।

 

साधना सामग्री – 490/-
 
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