New Year Diksha – Jeevan Vijay Siddhi Ashwamedh Viraat Diksha

गीता के 18 वें अध्याय में जगद्गुरु भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं –

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥

हे अर्जुन! (शिष्य) तुम सब धर्मों का त्याग कर मेरी शरण ग्रहण कर, मैं तुझे सब पापों से, संशय से, चिन्ता से मुक्त कर दूंगा। इसमें जगद्गुरु श्रीकृष्ण का कोई अहंकार नहीं है, इसमें जगद्गुरु श्रीकृष्ण के भीतर व्याप्त गुरु तत्व ही क्रियाशील होकर पूर्ण विश्‍वास के साथ यह कहता है। जगद्गुरु श्रीकृष्ण कहते हैं – तुम्हारे मन के कुःसंस्कारों का मैं स्वयं शमन कर सकता हूं। तुम्हारे संशय, सन्देह, चिन्ताओं को मिटा सकता हूं। आवश्यकता इस बात की है कि मेरा गुरु तत्व तुम्हारी आत्मा में स्थापित हो और तुम अनन्य भाव के साथ इस बात पर विश्‍वास करो कि तुम मेरी शरण में हो एवं तुम्हारा गुरु तत्व के साथ, तीव्र शक्ति के साथ मिलन होना चाहिए।

गुरु शक्तिपुंज है और शिष्य में जो शक्ति है वह गुरु द्वारा प्रदत्त मंत्र द्वारा, शक्तिपात द्वारा और अधिक जाग्रत, प्रकट और क्रियाशील हो जाती है, गुरु द्वारा प्रदत्त शक्तिपात की क्रिया के माध्यम से शिष्य के मलीन संस्कारों का क्षय होने लगता है और शिष्य में एकाग्रता का भाव उदय होता है। इसीलिये जो शिष्य गुरुदेव को नमन और समर्पण करता है उसका मन सदैव उल्लास से भरा रहता है। इसी उल्लासता को चित्त प्रसाद कहा गया है। उल्लासता के बिना व्यवहार, साधना, कार्य में पूर्णता नहीं आ सकती है। गुरु के प्रति शिष्य का भाव बाह्य नमन न होकर आन्तरिक और मानसिक होना चाहिए तभी मन में प्रसन्नता आती है। समर्पण करते ही साधक अपने आपको भार से मुक्त अनुभव करने लगता है क्योंकि वह अपना सारा भार गुरुदेव को सौंप देता है और गुरुदेव इतने शक्तिशाली होते है कि उन पर कोई बोझ नहीं पड़ सकता, इस क्रिया को समर्पण भाव से सम्पन्न करने से साधक की चिन्ता समाप्त हो जाती है।

मेरा विचार है कि गुरुदेव की प्रत्येक क्रिया उद्देश्य से युक्त रहती है। उनका प्रत्येक वचन एक गहरा अर्थ लिये होता है। उनका आह्वान एक विशेष क्रिया होती है। गुरु द्वारा बुलाना और शिष्य द्वारा गुरु के पास जाना कोई सामान्य मेल-मिलाप की क्रिया नहीं है। जब चित्त में तीव्र ज्ञान अंकुरित होता है तो उस ज्ञान के प्रभाव से शिष्य संसार की सारी बाधाओं को छोड़छाड़ कर गुरुदेव से मिलने हेतु आतुर हो जाता है। उनके समक्ष समर्पण हेतु उसके मन में क्रिया, भाव का जागरण होने लगता है तब उसे संसार की सामान्य शक्तियां, रिश्ते नाते, कामकाज रोक नहीं पाते हैं। उसके मानस का एक ही उद्देश्य हो जाता है कि मैं गुरु चरणों में अपने आपको समर्पित कर दूं।

गुरु की प्रत्येक क्रिया एक विशेष संकेत देती है, गुरु तत्व का दीपक तो शिष्य की आत्मा में प्रकाशित है लेकिन जन्म-जन्मों के गहन अंधकार से उस पर एक विशेष आवरण पड़ा हुआ है, गुरु तत्व रूपी शक्ति का कार्य यही है कि प्रकाशमान आत्मा पर पड़े हुए आवरण को हटाकर शिष्य के मन में पुनः जागृति का भाव ले आए।

गुरु कृपा क्या है? इसे सीधे सरल शब्दों में इस प्रकार कहा जा सकता है कि गुरु शिष्य की अन्तर्मुखी शक्ति जाग्रत करते हैं। सद्गुरु सब कुछ देने में समर्थ हैं वे शिष्य को भौतिक दृष्टि से सफल बनाना चाहते हैं। शिष्य को हर समय यह ध्यान रखना चाहिए कि गुरु कृपा से ही उसके कार्य सिद्ध हुए हैं। उसे यह भी ध्यान रखना चाहिए कि कार्य सिद्धि के कारण उसकी आसक्ति और अधिक तो नहीं बढ़ गई है। गुरु का कार्य शिष्य के मन के निर्मल भाव को विकसित करना है।

गुरु ही शिष्य की हर स्थिति में रक्षा करते हैं और भूत-पिशाच राक्षसों को भगा देते हैं। वास्तव में इस जगत में कई लोग अकारण ही अन्य मनुष्यों को अपने कर्म, वाणी द्वारा दुःख देते हैं। इसमें उन्हें आनन्द प्राप्त होता है लेकिन जब-जब गुरु की शक्ति उसे प्राप्त होती है, तो उसकी अन्तःशक्ति जागृत होती है उसके योग द्वारा शिष्य के कुसंस्कार भस्म हो जाते हैं और इसी शक्तिपात क्रिया द्वारा वह अपने जीवन के भूत-पिशाच, राक्षसों को नष्ट करने में सफल रहता है और उसे निर्मल जीवन का आनन्द प्राप्त होता है।

मनुष्य के भीतर गुण-अवगुण दोनों होते हैं, मानस में भी जन्म-जन्म के भावों का एक आवरण होता है। वह इस संसार में विषय भोग की लालसा लेकर ही आता है। इसके उपरान्त भी वह सद्गुरु से यही प्रार्थना करता है कि हे गुरुदेव! आप मेरे चित्त के विचारों की ओर ध्यान न देकर, मुझे पूर्ण दोष सहित अपनी शरण में स्वीकार कर अपना शिष्य बना लें, क्योंकि आप ही मेरे अन्तःमन में जागृत और क्रियाशील होकर मेरे अज्ञान जन्य सभी कुसंस्कारों को निर्मूल कर देने में सर्व समर्थ हैं, आपसे यही प्रार्थना है कि मेरा मन कभी भी विकारों और कुभावों से प्रभावित न हो। मेरे हृदय में गुरु के प्रति पूर्ण प्रेम बना रहे।

जब शिष्य गुरु से बार-बार शक्तिपात प्राप्त करता है तो उसे गुरु कृपा प्राप्त होती है। उसका मन निर्मल हो जाता है और बुद्धि आगे हो जाती है। याद रखिये गुरु कृपा से बुद्धि के विवेक युक्त निर्णय के प्रकाश में ही शिष्य संकल्प लेता है तभी उसे आन्तरिक आनन्द प्राप्त होता है। जब गुरुदेव शिष्य के मन में योग अग्नि और ज्ञान अग्नि जागृत करते हैं तो वह तीव्र ऊर्जा से युक्त होती है। जागृत शक्ति रूपी अग्नि में सभी दोष जलकर भस्म हो जाते हैं। चित्त एक हवनकुण्ड का रूप ग्रहण करता है और उसमें जागृत शक्ति रूपी अग्नि की ज्वालाएं धधकती रहती हैं। पूर्व जन्म के कुसंस्कार, पूर्व जन्म के दोष जलकर भस्म हो जाते हैं। यही पापांकुशा क्रिया है। इसे ही आन्तरिक यज्ञ, यौगिक यज्ञ और आध्यात्मिक यज्ञ कहा गया है। शिष्य के लिये बाह्य यज्ञ की अपेक्षा यह यौगिक यज्ञ, आध्यात्मिक यज्ञ आवश्यक है।

इस क्रिया को ही अश्‍वमेघ यज्ञ क्रिया कहा गया है। जब शक्ति द्वारा दोषों की समाप्ति हो और जीवन पराजय से विजय की ओर तथा विजय से जय की ओर तथा जय से आत्मशांति की ओर बढ़ जाये।
इस यौगिक यज्ञ में गुरु की महती कृपा है कि वे शिष्य को अपने समीप बुलाकर उसके मस्तक पर हाथ रखकर उसके नेत्रों में देखकर, उसके हृदय में अश्‍वमेघ विजय क्रिया का सूत्रपात कर देते हैं।
यह क्रिया ऐसी महान् क्रिया है जिसके द्वारा शिष्य के जीवन में नवीन चैतन्यता, नवीन दृष्टि, नवीन भाव, नवीन विचार एवं नवीन दृष्टिकोण आ सकता है।

जिसने गुरु को केवल चर्म चक्षुओं से देखा है वह गुरु को पूरी तरह से समझ ही नहीं पाता है। जिसने अपने मन के भावों द्वारा आन्तरिक चक्षुओं द्वारा गुरु को अनुभव किया है, वही गुरु को जान सकता है, समझ सकता है अनुभव कर आनन्द से जी सकता है।

इतनी अग्नि होते हुए भी गुरु तत्व सदैव शांत रहता है। गुरु तत्व का कार्य शक्ति द्वारा तीव्र, उग्र, अश्‍वमेघ क्रिया को प्रारम्भ करना है। गुरु शक्ति तो उस दीपक की तरह है जिसके प्रकाश में विभिन्न क्रियाएं घटित होती रहती हैं लेकिन प्रकाश सदैव निर्मल ही बना रहता है।

देहधारी गुरु जिन्हें गुरु कहा गया है। उनकी किसी शारीरिक चेष्टा अथवा संकल्प से शक्ति जागृत नहीं होती। देहधारी गुरु के भीतर जाग्रत गुरु तत्व कृपा से ही शिष्य में शक्ति जाग्रत होती है। शिष्य में शक्ति जाग्रत करना ही, गुरुदेव की वास्तविक कृपा है।

गुरु द्वारा यह शक्तिपात ही उसके जीवन में भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति के द्वार खोल देती है। आध्यात्मिक उन्नति के लिये भी पहली क्रिया भौतिक दृष्टि से सबल, सम्पन्न बनना है। भौतिकता की कठोर पहाड़ी को पार किये बिना आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त नहीं हो सकती है। इसीलिये गुरुदेव का शक्तिपात भौतिक उन्नति के लिये विशेष रहता है।

जब शिष्य के भीतर शक्ति जाग्रत हो जाती है तो वह अपनी इच्छाओं, कामनाओं पर स्वयं विजय प्राप्त कर सकता है, बाह्य रूप से शिष्य समझता है कि उसने स्वयं यह उन्नति प्राप्त की है लेकिन वास्तव में इसका सूत्रपात गुरु द्वारा प्रदत्त शक्तिपात से ही होता है। गुरु की शक्ति से ही उसकी शक्ति बाह्य बाधाओं पर विजय प्राप्त कर उसे घर-परिवार की सम्पन्नता, सौभाग्य प्रदान करती है और उसके बाद उसकी शक्ति अन्तर्मुखी हो जाती है जो उसके अन्दर नवीन संस्कार को उदय करती है। इस क्रिया द्वारा शरीर में ही आनन्द भाव रोम-प्रतिरोम में व्याप्त होने लगता है। यह क्रिया ही जीवन विजय सिद्धि अश्‍वमेघ दीक्षा है।

देहधारी समर्थ गुरु तो अपने आप में शिव का ही प्रत्यक्ष, प्रकट रूप है। सद्गुरुदेव के जागृत और प्रत्यक्ष दृश्य स्वरूप गुरु तत्व शिव रूपी है। यह शिव नहीं शिव की शक्ति है जो शिव भाव से प्रकट होकर साधक के चित्त में क्रियाशील हो रही है। सद्गुरु तो देह रूप में यही शिव भाव शिष्य के अन्दर प्रवाहित करते हैं जिससे उसके चित्त में भी शक्ति प्रकट होकर उसे और अधिक क्रियाशील बनाते हैं। गुरु शब्द का शाब्दिक अर्थ तो यही है कि जो अंधकार को दूर करे और प्रकाश को फैला दें, जीवन यज्ञ में अश्‍वमेघ की क्रिया का सूत्रपात कर दें। जब शिष्य के भीतर जाग्रति आ जाती है तो प्रथम किरण से ही उसके चित्त से अंधकार हट जाता है। साधक में जब गुरु की शक्ति प्राप्त होती है तभी वह पूर्व जन्म के दोषों को और इस जीवन के दोषों का निराकरण कर अपने शुद्ध अन्तःकरण में शांति और आनन्द का अनुभव कर सकता है।

गुरु का आह्वान हो, गुरु की एक आवाज हो और शिष्य के कदम ठिठककर कर रुक जाये, वह अपने आपको संसार की बेड़ियों से जकड़ा अनुभव करता हुआ, अपने आप को रोक दे तो वह शिष्य, शिष्य नहीं है। वह तो कामना पूर्ति का इच्छुक एक सामान्य मनुष्य है। जब गुरु का आह्वान हो तो सारे बन्धनों को तोड़ता हुआ गुरु से मिलने के लिये चल पड़े वह वास्तव में शिष्य है। इसीलिये गुरुदेव कभी-कभी परीक्षा लेने और कभी परखने हेतु अपने शिष्य को अपने पास बुलाते हैं। गुरु के बुलाने में ही एक विशेष उद्देश्य रहता है। गुरु जब भी बुलाते हैं तो कुछ देने के लिये ही बुलाते हैं, गुरु जब भी बुलाते हैं शिष्य के अन्तद्वर्द्व, अन्तवेदना को समाप्त कर उसमें आनन्द भाव को जागृत करने के लिये ही बुलाते हैं।

इस बार गुरुदेव ने आपको आरोग्य धाम में 27-28 दिसम्बर को नववर्ष की पूर्व संध्या पर दिल्ली बुलाया है, तो आपको अवश्य आना ही है। इसमें किसी भी किन्तु, परन्तु के लिये स्थान नहीं है। मैंने जितना गुरु को समझा है उसे निम्न शब्दों में कह सकता हूं –

जिस प्रकार पिता, अपने पुत्र पर स्नेह करता है, उसी तरह गुरु भी अपने शिष्य पर कृपा करते हैं। पिता मोह के वशीभूत, पुत्र पर स्नेह करता है, किन्तु गुरु, शिष्य के आध्यात्मिक कल्याण के लिए कृपा करते हैं। यह कृपा कई रूपों में प्रकट होती है। कभी तो गुरु स्नेहपूर्वक व्यवहार से, शिष्य को युक्तियों से समझाते हैं तथा कभी डांटकर समझाते हैं, किन्तु सभी अवस्थाओं में शिष्य की मंगल-कामना ही गुरु के अभिमुख रहती है। गुरु कभी शिष्य को अपमानित करके, उसका अहंकार तोड़ते हैं, तो कभी प्रशंसा करके उसका उत्साह बढ़ाते हैं। किसी शिष्य को उसकी भूमिकानुसार कठिन साधना में लगा देते हैं, तो किसी को अपेक्षाकृत कहीं सरल साधना में लगाकर ही संतोष कर लेते हैं। यह सब कृपा के ही विभिन्न स्वरूप हैं। साधक शिष्य को अपने मन में यह बात अच्छी तरह समझ लेना चाहिए, कि गुरु उसे किसी भी अवस्था में रखें, कैसा भी व्यवहार करें, किन्तु गुरु चाहते शिष्य का मंगल ही हैं। उसके ही लिए वह कई प्रकार के उपाय अपनाते हैं। यदि यह बात शिष्य की समझ में आ जाए, तो उसका कल्याण अवश्यम्भावी होता है।

आप सभी इस अश्‍वमेघ विराट् दीक्षा में सम्मिलित हों, आप सभी सहयोग के साथ विराट् कार्य करें, आप सभी गुरुदेव के कंठ में पड़ी हुई माला के मोती हैं। आप सभी समर्थ योग्य, प्रज्ञावान, चैतन्य शिष्य हैं। आपको इस विराट् दीक्षा में अवश्य ही आना है।

आप आइये और गुरुदेव के साथ अपने आपको पूर्णरूप से जोड़ दें। गुरु तत्व और शिष्य के मिलन की यह महान् वेला है गुरुदेव की कृपा से जीवन में अवश्य पूर्णता आयेगी।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥

-राम चैतन्य शास्त्री

Jeewan Vijay SidhiAshwamedh Viraat Diksha

SadGuru and Disciple

Revolutionary Initiation towards a  New Life

JagadGuru Bhagwan Shree Krishna advised Arjuna in 18th Chapter of Geeta –

Sarvdharmaanparityajya Maamekam Sharanam Vajra |
Aham Tvaa Swarnapebhayo Mokshyishyami Ma Suchah ||

Hey Arjuna ! (disciple), You discard all religions to take sanctuary in me, I will purge all your sins, doubts and worries. This does not show any pride of JagadGuru Shree Krishna, rather the activated Guru Tatva imbibed in JagadGuru Shree Krishna confidently guides Arjuna. Jagad Guru Shree Krishna guides – I can eradicate all the wicked instincts in your mind. I can remove your doubts, hesitations and worries. It is essential to imbibe  my Guru Tatva in your soul and you should completely and confidently trust that you are in my bliss and will rendezvous with Guru Tatva with a  powerful and energetic force.

Guru is the supreme cradle of Energy and the disciple’s energy becomes more marked, strong and activated through the Mantra and Shaktipaat, bestowed by the Guru. The immoral deleterious thoughts starts getting eradicated and positive concentration awakens in the disciple  through  Gurudev’s  Shaktipaat. So, the mind of a disciple who prays and dedicates himself, is always full of joyful zeal and eagerness. This joyful zeal and enthusiasm is called Chitta- Prashada. Life, Sadhana and, Tasks cannot achieve perfection without joyful zeal. The disciple’s emotions towards Gurudev should be inward and mental instead of physically external, only then it will bring joy and happiness. The sadhak starts feeling lighter, after surrender, since he has yielded all his burdens to Gurudev, and Gurudev is so powerful that any burden cannot affect Him. Performing this dedication process with totality results in removal of all worries from the disciple’s mind.

I believe that there is a specific reason for each of Gurudev’s actions. His every word carries a deeper meaning. His invocation is a special process. Gurudev inviting disciple and the disciple visiting Gurudev is not a normal rendezvous. When deep knowledge activates the mind, then under the divine influence of this knowledge,  the disciple ignores all worldly problems, and becomes impatient to meet Gurudev. His mind starts getting activated with thoughts and emotions of total submission and immersion. At this stage, the normal worldly powers,  relations, tasks etc. cannot stop him. His mind becomes filled with a single thought to offer himself completely and totally to Gurudev.

Each action of Guru points to a specific message. The light of Guru Tatva is already present in the soul of the disciple, but it is covered with a thick layer due to darkness from various births. The Guru Tatva energy removes this thick layer and activates the disciple’s soul.

What is Guru kripa? In simple words, we can state that Guru activates the inner soul of the disciple. SadGuru is capable to bestow  everything to the disciple, He wishes to make the disciple successful in all worldly material aspects. The disciple should always remember that he achieved success in all his tasks due to benign Guru kripa,. He should also be careful to check if the success in endeavors has affected his devotion. Guru constantly strives to nurture and develop the inner pure soul of the disciple.

The Guru watches over and protects disciple in all situations and vanquishes  the ghosts and demons. Many people in this world become happy by giving sadness to others through their words and actions, without any cause or reason. Whenever one obtains Guru’s energy, then his inner soul awakens., this rendezvous eradicates the ill-thoughts of disciple and he can use this Shaktipaat process to eliminate the ghosts and demons of his life, and live a joyful and blissful life.

Every person has both good and bad qualities, and his mind is full of different emotions from various past lives. He takes birth in this world with a wish to enjoy various pleasures. Even then, he prays to Gurudev that – Hey Gurudev, please grant me sanctuary in spite of my deficiencies and accept me as your disciple while ignoring the various thoughts floating in my mind, because only you are capable of removing my ignorance and insufficiencies by energizing and activating my subconscious; so my prayer to you is to ensure that my mind does not get influenced by bad and malicious thoughts in future. My heart should keep on loving you for ever after.

When a disciple repeatedly obtains Shaktipaat from Gurudev, then he obtains the divine blessings from Gurudev. His mind becomes pure, and filled with intelligence. Always remember that the disciple experiences inner joy after he submits himself to Gurudev  with inspiration from the light of sensible decision taken intelligently through Guru blessings. The Divine Knowledge and Yoga flame kindled by Gurudev into disciple’s inner soul bursts with strong energy. All of his deficiencies and mistakes get destroyed in the flames of awakened energy. Mind assumes the form of a Havan-kund and it gets packed with numerous flames of awakened energy. The mistakes and deficiencies of the past lives are burned out in this Havan-kund.  This is the Papakunsha process. It is also called as Inner Yagya, Yogic Yagya and Spiritual Yagya. This Yogic and spiritual Yagua is much more significant for the disciple than the external Yagya.

This process is the Ashwamedha Yagya.  This involves destruction of deficiencies by inner-energy, and transformation of life from defeat to victory, victory to fame, and fame to inner-peace.

Gurudev’s mercy in this Yogic Yagya is significant in that He initiates the Ashwamedha Vijay Kriya in the disciple’s heart by inviting him, blessing him and gazing into his eyes.

This process is so important that it can usher in new awakening, new vision, new emotions, new thoughts and a new outlook into the disciple’s life.

You cannot understand Guru completely if you see Him only through physical eyes. Only the one who has experienced Guru though inner emotions of mind, can discern Gurudev, understand Him and experience the Divine joy of His benign presence.

The Guru Tatva always remains peaceful in spite of so much surrounding energy and force. Guru Tatva is responsible to initiate the swift and strong spirited Ashwamedh Kriya through spiritual power. The Guru power is like the lamp which quietly witnesses the various processes occurring around it, without getting influenced by them.

The Divine Energy does not get activated by any physical action or activity of a physically present Guru. The awakened Guru Tatva present in the physical Guru activates this Divine energy in the disciple. The actual blessing or mercy of Gurudev is to activate this inner soul of the disciple.

This Shaktipaat from Gurudev opens new avenues for disciple’s material and spiritual progress in life. One should become strong and prosperous in material life, before progressing on spiritual elevation. The spiritual progress cannot start without crossing the major hurdles of material life. Therefore Gurudev’s Shaktipaat for material progression is very significant.

When the inner-energy of a disciple activates, then he can himself control his wishes and desires. A disciple physically feels that he himself has achieved this growth. However, in reality, this process was initiated from Gurudev’s Shaktipaat. Guru’s energy nurtured the disciple’s energy to enable him to overcome various obstacles leading to prosperity and fortune for the disciple and his family. Then this energy routes to his inner-self, to initiate a novel spiritual process within him. This provides inner joy and bliss to his entire physical self. This process is the Jeewan Vijay Siddhi Ashwamedh Diksha.

A proficient and physically existing Guru is a visual realization of Lord Shiva. The activated and visible Guru Tatva of SadGurudev is a manifestation of Shiva. This Shiva Energy, and not Shiva, which emanates from Shiva expression, stimulates the Sadhak’s inward soul. SadGuru transmits this Shiva expression in physical form into the disciple, so that the Divine energy in his soul becomes more active and dynamic. The syntactic meaning of Guru word is one who dispels darkness and spreads light, and invokes the Ashwamedh process in the Life Yagya. When the disciple realizes this, then the first ray of illumination removes all darkness from his mind. When a Sadhak receives Guru element, he is able to experience joy and inner peace by removing the insufficiencies of this and prior births.

If a Sadhak hesitates, gets shackled by worldly responsibilities, and halts in spite of  the invocation by Guru, the invitation by Guru; then he cannot be  a true disciple. He is just a common man searching to fulfill his wishes. A person who breaks all barriers on the call of Guru, and immediately proceeds to join him, is the actual disciple. Therefore, sometimes Gurudev invites the disciple to evaluate and examine him. There is a special purpose behind Gurudev’s invitation. When the Guru invites, it is to grant something ; when the Guru summons, it is to augment the inner joy within disciple  by removing the inner troubles and problems.

This time Gurudev has invited you to Arogyadham on 27-28 December on the New Year eve, and you have to certainly come. There is no space for ifs and buts in this. Whatever I have understood about Guru, I can outline in following words –

Like a father loves his son, similarly Guru also nurtures and blesses his disciple. A father bestows love out of attachment, however the Guru bestows blessings to elevate the disciple’s spirituality. This piety is expressed in many ways. The Guru explains the techniques  to the disciple either by affection  or by admonition; but in all cases, Guru is always focused on the elevation and well-being of the disciple. Sometimes Guru shatters a disciple’s pride through humiliation, and sometimes enhances his enthusiasm through praises. He may assign a difficult Sadhana to an able disciple, or stays content by assigning a simple Sadhana to another one. These are all various expressions of his benign blessings. A sadhak disciple should completely comprehend that  Guru may keep him in various conditions, or may behave differently, but in all cases, He has his best at heart. He uses various methods for the disciple. If a disciple understands this fact, then he is sure to speedily and surely progress forward.

All of you should assemble for the Ashwamedh Viraat Diksha, you should collaborate for this great venture, as all of you are like the pearls of rosary around Gurudev’s neck. All of you are fully able, accomplished and awakened disciples.  You certainly should come to this great Diksha.

Come and assimilate yourself totally with Gurudev. This is a magnificent moment of integration of Guru Tatva and disciple. You will achieve Completeness and Totality through Gurudev’s divine blessings.

Om Poornmadah Poornmidam Poornaat Poornmudachayate

Poornasya Poornmadaye Poornmevavashishayate ||

-Ram Cheitanya Shashtri

To obtain this diksha, use the attached form and introduce 5 new people to the Nikhil Mantra Vigyan family. You can download New Year Diksha – Prapatra.
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