Narsingh Sadhana

पुरुष से पुरुषोत्तम बनने की क्रिया
जीवन का शौर्य, पराक्रम प्राप्त करने की क्रिया
नृसिंह साधना
प्रत्येक साधक अवश्य सम्पन्न करें

 

यह तो ध्रुवसत्य है कि जीवन केवल रास रंग से नहीं चल सकता, जीवन में नवरंग अर्थात् दया, करुणा, मोह, ममता, वीरता, तेजस्विता, आरोग्य, बल, पराक्रम, बुद्धि इत्यादि सभी गुण होने चाहिए तभी व्यक्ति का जीवन सामान्य जीवन नहीं होकर आदर्श जीवन बनता है, व्यक्ति की समाज में पहचान बनती है। ऐसा व्यक्ति केवल अपने घर परिवार के भरण-पोषण तक ही सीमित नहीं रहता अपितु वंश के लिए और समाज के लिए भी बहुत कुछ करने में समर्थ रहता है। अपने लिए तो पशु भी जीते हैं, कीट पतंगे भी जीवन यापन करते हैं लेकिन हमें मनुष्य जीवन इस प्रकार बिताने के लिए प्राप्त नहीं हुआ है। मनुष्य का जीवन तो बना ही इसलिए है कि वह अपने परम जीवन में अपने लक्ष्य को प्राप्त करे और जीवन में धर्म अर्थ काम मोक्ष चतुर्वर्ग से जीता हुआ परम तत्त्व को प्राप्त करें और इस परम तत्व की प्राप्ति नृसिंह साधना से ही संभव है।

 


पराक्रम का अर्थ है दो या दो से अधिक व्यक्तियों में प्रतिस्पर्धा की स्थिति में विजयी होना। जो प्रतिस्पर्धा में विजयी होता है उसका पराक्रम अधिक होेता है। पराक्रम के बिना मनुष्य का जीवन अर्थहीन है। पराक्रम व्यक्ति को लक्ष्य देता है। यदि जीवन में लक्ष्य न हो तो जीवन अर्थहीन हो जाता है।

 

पराक्रम की आवश्यकता हर किसी को है फिर चाहे वह विद्यार्थी हो, व्यापारी हो, नौकरीपेशा या प्रतिदिन मेहनत करके रोटी कमाने वाला मजदूर। हर किसी को प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है। इस प्रतिस्पर्धा में हमेशा विजयी रहने वाले लोग आगे चलकर दूसरों के लिए पात्र बन जाते हैं ।

 

सारगर्भित शब्दों में यदि कहें तो – जीवित रहने के लिये जैसे प्राणवायु की आवश्यकता पड़ती है उसी तरह समाज में रहने और जीवनयापन के लिए पराक्रम आवश्यक है।

 

पराक्रमी व्यक्ति अपने जीवन में आने वाली हर बाधा को पार कर लेता है। विजय उसके कदम चूमती है। परन्तु हर किसी को यह दिव्य गुण प्राप्त नहीं होता है। पराक्रमी बनने के लिए आपको कुछ विशेष करने की आवश्यकता नहीं है बस थोड़े से धैर्य और श्रद्धा के साथ आपका काम बन सकता है। नृसिंह जयंन्ती अथवा किसी भी शुभ मुहूर्त में ‘नृसिंह साधना’ सम्पन्न करें।

 

नृसिंह अवतार भगवान विष्णु के प्रमुख अवतारों में से एक हैं। नृसिंह अवतार में भगवान विष्णु ने आधा मनुष्य व आधा शेर का शरीर धारण करके दैत्यों के राजा हिरण्यकश्यप का वध किया था। भगवान विष्णु का यह स्वरूप पूर्ण पराक्रम का स्वरूप है। जिसमें नर अर्थात् मनुष्य सिंह की भांति अपने पराक्रम से दैत्यों अर्थात् जीवन की बाधाओं का वध करते हैं।

 

वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को नृसिंह जयंती के रूप में मनाई जाती है। भगवान श्री नृसिंह शक्ति तथा पराक्रम के प्रमुख देवता हैं, पौराणिक मान्यता एवं धार्मिक ग्रंथों के अनुसार इसी तिथि को भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार लेकर दैत्यों के राजा हिरण्यकश्यप का वध किया था। इस वर्ष 2017 में यह जयंती 9 मई, मंगलवार को मनाई जाएगी।

 

प्रत्येक अवतरण का स्वयं में एक संदेश भी निहित रहता है, उसी क्रम में चिंतन करने पर यह स्पष्ट होता है कि भगवान श्री विष्णु के इस विशिष्ट अवतरण (नृसिंह अवतरण) का भी एक गूढ़ संदेश है और वह संदेश है ‘नृ’ अर्थात् मनुष्य को, ‘सिंह’ अर्थात् पराक्रमी बनने का संदेश।

 

यह जीवन का एक सुस्वीकृत तथ्य है, कि केवल इस युग में ही नहीं वरन् प्रत्येक युग में वही व्यक्ति जीवित रह सका है, जिसने जीवन में संघर्ष किया है। जीवन संघर्षों का एक अविराम क्रम होता है तथा इसमें जो क्षण भर चूका, वइ इस जीवन में पराजित हो जाता है, वह जीवन ही क्या जिसकी प्राण शक्ति का हनन किया जा चुका हो क्योंकि यह आवश्यक नहीं कि जीवित रहते हुए भी वह जीवित व्यक्तियों की श्रेणी में हो केवल श्‍वास-प्रश्‍वास के चलते रहने को ही तो ‘जीवन’ नहीं कहा जा सकता।

 

वस्तुतः प्रत्येक अवतरण का एक निश्‍चित अर्थ रहा है और सामान्य लोक विश्‍वास से पृथक अवतरण की घटना के विशिष्ट अर्थ भी होते हैं। प्रत्येक अवतरण किसी एक या दो भक्तों की विपत्ति से रक्षा करने अथवा उनके उद्धार तक ही सीमित न रहकर अनेक गूढ़ संदेश भी छिपाए हुए होता है यद्यपि पौराणिक कथाओं से अभिव्यक्त ऐसा ही होता है मानों ईश्‍वर ने किसी भक्त-विशेष की पुकार पर इस धरा पर आना स्वीकार किया और यही बात भगवान श्री विष्णु के नृसिंहावतार के संदर्भ में भी पूर्ण प्रासंगिक है।

 

भगवान विष्णु का नृसिंह अवतार मनुष्यों को सिंह के समान पराक्रमी बनने का संदेश देता है। वास्तव में सफल जीवन तो उसका ही कहा जा सकता है, जो अपने जीवन के लक्ष्यों को सिंह की भांति झपटकर प्राप्त करने की क्षमता से युक्त हो। वन्य प्राणियों में सर्वाधिक ओजस्वी पशु सिंह को ही माना गया है जो अनायास कभी किसी पर हमला नहीं करता किन्तु आवश्यकता पड़ने पर अथवा कु्रद्ध हो जाने पर जब वह हुंकार भरकर खड़ा हो जाता है तो अन्य छोटे-बड़े जानवरों की कौन कहे मस्त गजराज भी कतराकर निकल जाने में ही अपनी भलाई समझते हैं। ॠषियों ने भी पुरुष की इसी ‘सिंहवत’ रूप में कल्पना की थी। ‘सिंहवत्’ बनना केवल शौर्य प्रदर्शन की एक घटना नहीं होती वरन् सिंहवत् बनना इस कारण से भी आवश्यक है, कि सिंहवत् प्रबल स्वरूप ग्रहण करके ही जीवन की गति को सुनिर्धारित किया जा सकता है, प्रबल नहीं बने तो एक-एक आवश्यकता के लिए वर्षों घिसट-घिसट कर लक्ष्य प्राप्त करने में जीवन का सारा सौन्दर्य, सारा रस समाप्त हो जाता है।

 

मनुष्य के जीवन में तो प्रतिदिन नूतन राक्षस आते रहते हैं, जो हिरण्यकश्यप की ही भांति अस्पष्ट होते हैं, ऐसे अस्पष्ट राक्षसों (बाधाओं) को समाप्त करना है। यह भी सत्य है, कि यदि जीवन में अभाव, तनाव, पीड़ा (शारीरिक, मानसिक अथवा दोनों), दारिद्र्य जैसे राक्षसों से एक-एक करके निपटने का चिंतन किया गया, तो मनुष्य की आधी से अधिक क्षमता तो इसी विचार-विमर्श में निकल जाती है शेष जो आधी बचती है, वह किसी भी प्रयास को सफल नहीं होने देती साथ ही जीवन के ऐसे राक्षसों से तो केवल सामान्य प्रयास से ही नहीं वरन् ऐसे क्षमता युक्त प्रयास से जूझना आवश्यक होता है, जो साक्षात् नरकेसरी की ही क्षमता हो तभी जीवन में कुछ ऐसा घटित हो सकता है जिस पर गर्वित हुआ जा सकता है।

 

सामान्यतः साधना का क्षेत्र दुष्कर प्रतीत होता है क्योंकि साधना ही जीव को वास्तविकताओं का यर्थाथ प्रस्तुतीकरण व विवेचन कराती है। व्यक्ति का हित, साधना से ही साधित होता है और साधना जीवन की कटु वास्तविकताओं का यथार्थ वर्णन करने के साथ-साथ उससे मुक्त होने का उपाय भी वर्णित करती है। वस्तु स्थितियों का विवेचन इस कारणवश आवश्यक होता है, जिससे साधक के मन में एक सुस्पष्ट धारणा बन सके कि उसकी समस्या क्या है किस प्रकार से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है? यहां नृसिंहावतार की संक्षिप्त व्याख्या से भी यही तात्पर्य था और साधकों की सुविधार्थ उस साधना विधि का प्रस्तुतीकरण किया जा रहा है, जिससे साधक उस नृसिंह शक्ति को आपने भीतर स्थापित कर सकें और अनुभूत कर सकें और एक बदलाव व उर्जा महसूस कर सकें। इस साधना के द्वारा कोई भी साधक अपने जीवन को संवारता हुआ अपनी रग-रग में सिंह की ही लपक और शौर्य को भरता हुआ जीवन की उन समस्याओं पर झपट्टा मार सकता है क्योंकि बाधाएं तो नित नये स्वरूप में आती रहती हैं जब तक जीवन रहेगा तब तक समस्याएं भी आएंगी ही, लेकिन जो साधक दृढ़ निश्‍चयी होते हैं, जिनके मन में सर्वोच्च बनने का भाव हिलोरे लेता है वे अवश्य ही ऐसी साधना सम्पन्न कर अपने जीवन में एक नया औज व क्षमता प्राप्त करते हैं।

 

साधना विधान

 

नृसिंह साधना को मूलरूप में सम्पन्न करने के इच्छुक साधक के पास ताम्रपत्र पर अंकित नृसिंह यंत्रनृसिंह माला आवश्यक उपकरण के रूप में होनी चाहिए। यह साधना नृसिंह जयंती दिनांक 9-5-2017 अथवा किसी भी रविवार की रात्रि में सम्पन्न की जा सकती है। साधक ध्यान दें कि हमें दिन प्रतिदिन नृसिंह बने रहना है अतः आवश्यक नहीं कि केवल नृसिंह जयन्ती को ही साधना की जाय, यह तो किसी भी रविवार की रात्रि को प्रारम्भ की जा सकती है। इस साधना में साधक अपने वस्त्र आदि का रंग काला रखें तथा दक्षिण दिशा की ओर मुख करके साधनारत हों।

 

विनियोग
अस्य नृसिंह मन्त्रस्य ब्रह्मा ॠषिः। अनुष्टप्छन्दः। सुरासुरनमस्कृत नृसिंहो देवता। सर्वेष्टसिद्धये जपे विनियोगः।

 

ध्यान
माणिक्याद्रिसमप्रभं निजरुचा संत्रस्तरक्षोगणं।
जानुन्यस्तकराम्बुजं त्रिनयनं रत्नोल्लसद्भूषणम्॥
बाहुभ्यां धृतशङ्खचक्रमनिशंदंष्ट्रग्रवक्त्रोल्लस-
ज्ज्वालाजिह्वमुदग्रकेशनिचयं वन्दे नृसिंहं विभुम्॥
ध्यान के पश्‍चात् साधक सामने चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर गुरु पूजन करें पहले गुरु चित्र को स्नान कराएं, फिर तिलक करें, उसके बाद धूप और दीप दिखाकर गुरुचित्र को हार पहना दें तथा दोनों हाथ जोड़कर प्रार्थना करें।

 

गुरुर्ब्रह्मा गुरु र्विष्णुः गुरु र्देवो महेश्‍वरः।
गुरु साक्षात् पर ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

 

इसके बाद सामने ताम्र पात्र में कुंकुंम या केशर से षट्कोण बनाकर उस पर प्राणप्रतिष्ठित नृसिंह यंत्र को स्थापित करें। साधना काल में घी का दीपक लगातार जलते रहना चाहिए।

 

फिर इसके पश्‍चात् यंत्र पर एक-एक लौंग चढ़ाते हुए निम्न मंत्रों का उच्चारण करें –

 

ॐ वं वज्राय नमः॥1॥
ॐ शं शक्तयै नमः॥2॥
ॐ दं दण्डाय नमः॥3॥
ॐ खं खङ्गाय नमः॥4॥
ॐ पं पाशाय नमः॥5॥
ॐ अं अंकुशाय नमः॥6॥
ॐ गं गदायै नमः॥7॥
ॐ त्रिं त्रिश्ाूलाय नमः॥8॥
ॐ पं पद्माय नमः॥9॥
ॐ चं चक्राय नमः॥10॥
इसके बाद निम्न मंत्र की 21 मालाएं ‘नृसिंह माला’ से दत्तचित्त भाव से करें –

 

मंत्र
॥ॐ क्ष्रौं क्रौं नृसिंहाय नमः॥

 

यह साधना तीन दिवसीय साधना है। चौथे दिन प्रातः सभी सामग्रियों को दक्षिण दिशा में जाकर कहीं सूनसान में गड्ढ़ा खोदकर दबा दें और यदि यह संभव न हो तो सूनसान जगह पर सामग्री फेंक दें तथा घर आकर स्नान कर लें। यह संभव है मंत्र जप के पश्‍चात् साधक को आगामी दस-पन्द्रह दिनों तक शरीर में विचित्र से खिचांव आदि महसूस हो सकते हैं। किन्तु ये सभी साधना में सफलता के विशेष लक्षण होते हैं।

 

साधना सामग्री – 450/-
Narsingh Jayanti

9 May 2017

 

Transformation from Human to Braveheart

Achieve Power and Victory in Life

 

Narsingh Sadhana

 

Every Sadhak should certainly perform it

 

It is the absolute truth that one cannot lead life just through pleasures alone. A life should contain nine major attributes i.e. Kindness, Pity,  Attachment, Compassion, Bravery, Intensity, Health, Strength, Power, Wisdom, etc. Combination of all these qualities turn it into an ideal life. This creates a unique identity of the person within the society. Such a person is not only limited to the maintenance of his family, rather he attains capability to do much more for his family as well as the society. Even an animal lives life for its own self, an insect leads a life for its own existence, but we have not received the human life just for mere survival. A human birth is destined to achieve the supreme goal in his life, and to attain the ultimate salvation by leading a life through the quadratic set of spirituality, wealth, desires and liberation. Such realization of this ultimate element is possible only through Narsingh Sadhana.


 

Strength means obtaining victory in a competition between two or more contestants. The winner in the competition has more strength. A human life is meaningless without strength. The strength provides a target goal to the person. Absence of any goal in life makes it meaningless.

Everyone needs strength and power, whether he is a student, a businessman, a job-professional, or a worker earning his bread by working hard daily. The people who are always victorious in this competition become a role model for others.

In summary, we can state that  the strength is as much a necessary requirement to survive in a society and leading a life, as air is required to stay live.

A courageous strong person crosses every obstacle that comes in his life. He kisses victory at each step. However not everyone has this divine quality. You do not need to do anything special to become strong, it is possible through a little bit of patience and faith. Perform “Narsingh Sadhana” on Narsingh Jayanti or at any other auspicious time.

Narsingh Avatar is one of the principal incarnations of Lord Vishnu. In Narsingh Avatar, Lord Vishnu slaughtered King Hiranyakashayap, the king of the demons by attaining a body of half-man and half-lion. This form of Lord Vishnu is a complete form of strength and mightiness, in which humans  destroy the demons of obstacles within life, like a lion.

The Chaturdashi (Fourteenth day) of Shukla Paksha (Bright Fortnight) of the Veishakh month is celebrated as Narsingh Jayanti. Lord Shree Narsingh is the principal God of Strength and Power. According to the purannic and other spiritual literature, Lord Vishnu incarnated as Narsingh Avatar on this day to kill King Hiranyakashayap of the demons. This Jayanti will be celebrated this year on Tuesday, 9th May, 2017.

Every incarnation contains a message in itself, it is evident that in the same vein, this particular incarnation Avatar of Lord Vishnu has also an enigmatic message, and that message literally is “Nar” which means that “man should”, and  “Singh” means “become as mighty as a lion”.

It is an accepted fact of life that not only in this era but in every era only the fittest fighters have survived. Life is an endless series of struggles and even a slight miss in the struggle, results in a defeat. Can we call that a life, in which the life-force itself is a spent force. A breathing lung or a beating heart cannot be termed as a life, as life truly is about being alive.

In reality, each incarnation has a definite message, and there are always some specific meanings of a unique incarnation, which are usually different from the general thinking. Every incarnation embodies many mysterious messages, apart from being an event of protecting or granting salvation to one or two devotees. The purannic stories express the willingness of God Almighty to incarnate on this earth to respond to a call of the devotee. This fact is also relevant to Narsingh incarnation Avatar of Lord Vishnu.

The Narsingh incarnation Avatar of Lord Vishnu sends a message to humans to become as mighty as a lion. In fact, only those people can be considered to lead a successful life, who have the capability to snatch the opportunities like a lion. Lion has been considered as the most glorious animal as it does not invariably attack anyone, but it rises in roar when the need arises or when it becomes furious. Even the large elephants do not dare to step in its way at these times. The ancient sages also imagined the man in this “lion” form. Becoming a “lion” does not only depict an act of bravery, but it is also necessary to adopt a furious lion form to justify the intensity of life. In absence of any strength, achieving the goals of life by realizing each necessity only after long years of continuous struggle completely eliminates beauty and happiness from the life.

Novel demons appear daily in the human life, who are as obscure as Hiranayakashayap, we ought to destroy such obscure monsters (obstacles). It is a definite fact that half of our energy will just get spent in countering these demons (like deficiency, stress, anguish (physical,mental or both) or poverty), if we start tackling them one by one. The remaining half is not enough to achieve success in any effort. It is also necessary to counter such monsters with a strong intense effort, instead of a plain ordinary one. Strong lion-like abilities are needed, only then we can achieve something in life, which we can be proud of.

Generally the Sadhana practice is considered as a difficult discipline  as it forces a disciple to face the actual realities of life. A person can make progress only through the Sadhanas. The Sadhanas also provide a mechanism for liberation from the harsh realities of life, apart from giving us a good introduction-perspective of them. It is necessary to describe the realities, so that a Sadhak can interpret his actual problem, and understands the perfect technique to resolve that problem.This was the sole reason to provide a brief explanation of Narsingh incarnation. A spiritual Sadhana practice is being presented ahead, so that the Sadhaks can imbibe that Narsingh energy within their own self, and experience a transformative energy flow. Any Sadhak can utilize this Sadhana to enhance his life by imbibing the power and valor of lion into each cell of his body. This will enable him to counter the various problems of life. New problems and obstacles will continue to appear in life, as life is always full of new obstacles.The determined Sadhaks whose mind is full of a perseverant spiritual wave, accomplish such Sadhanas to add new intensity and capability within their life.

 

Sadhana Procedure

 

The Sadhaks desirous of accomplishing Narsingh Sadhana in its basic original form should have Narsingh Yantra inscribed on a copper plate and Narsingh Mala rosary. This Sadhana can be performed in the night of Narsingh Jayanti on 9-5-2017 or on any Sunday. The Sadhaks should note that we ought to stay Narsingh everyday, so it is not necessary to perform it on Narsingh Jayanti, rather it may be performed on any Sunday night. The Sadhak should adorn black coloured garments and should sit facing South direction.

 

Viniyoga

Asya Narsinha Mantrasya Brahmaa RishiH |

AnushtapchandaH |

Suraasuranamaskrita Narsinho Devataa |

Sarveshtasidhyaye Jape ViniyogaH |

 

Dhyaan Meditation

Maanikyaadrisamaprabham Nijaruchaa Santrastarakshoganam |

Jaanunyastakaraambujam Trinayanam Ratnollasadbhushanam ||

Baahubhayaam Dhritashankhachakra Manisamdamshtragrvaktrollasa –

Jjwaalaajihvamudagrakeshanichayam Vande Narsinham Vibhum ||

 

After completion of meditation, the Sadhak should spread red cloth on a wooden board in front of him.  First he should perform Guru poojan. He should first bathe Guru picture, then make a tilak mark, thereafter offer a garland of flowers after showing Dhoop (incense) and Deep (lamp); and pray with folded hands.

 

GururBrahmaa GururVishnuH Gururdevo MaheshwaraH |

GuruH Saakshaat Par Brahmaa Tasmei Shree Guruve NamaH ||

 

Thereafter make a hexagon on a copper plate with Kumkum (vermilion) or Kesar (Saffron) and set up the Praanpratisthit sanctified and consecrated Narsingh Yantra on it. The ghee lamp should be continuously lit during the entire Sadhana duration.

Then chant the following Mantras while offering 1 piece of loung (Clove) every time –

 

Om Vam Vajraaya NamaH ||1||

Om Sham Shaktayei NamaH ||2||

Om Dam Dandaaya NamaH ||3||

Om Kham Khargaaya NamaH ||4||

Om Pam Paashaaya NamaH ||5||

Om Am Ankushaaya NamaH ||6||

Om Gam Gadaayei NamaH ||7||

Om Trim Trishulaaya NamaH ||8||

Om Pam Padmaaya NamaH ||9||

Om Cham Chakraaya NamaH ||10||

 

Then chant 21 malas of following  Mantra with full focus and concentration using Narsingh Mala.

 

Mantra

|| Om Kshoum Kroum Narsinhaaya NamaH ||

 

This is 3 day Sadhana. Bury the entire Sadhana materials on the morning of the fourth day in a pit dug up in a lonely spot in the South direction, and if it is not possible then throw away the Sadhana materials in a lonely spot and take a bathe after returning home. You may feel certain strange tensions-tears within the body for the next 10-15 days. However all these are special signs of achieving success in the Sadhana.

 

Sadhana Materials – 450/-

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