Nabhi Apsara Sadhana

अप्सरा सिद्धि के अद्वितीय क्षण –

 

शरद पूर्णिमा – 05 अक्टूबर 2017
रमा एकादशी – 15 अक्टूबर 2017
रूप चतुर्दशी – 18 अक्टूबर 2017
 

 

जीवन्त साधकों की…..
जीवन्त साधना…
नाभिदर्शना अप्सरा
प्रेम, सौन्दर्य, मधुरता, रस, आनन्द साकार स्वरूप

 

प्रत्येक साधक के मन में अप्सरा साधना करने की इच्छा कभी न कभी जरूर होती है और हो भी क्यों न? शायद कोई पत्थर ही होगा जो रूप की अगाध राशि के दर्शन को लालायित नहीं होगा, सृष्टि में जो भी सत्य है, वह शिवमय है जिसमें भी शिव मौजूद हैं, वह सुन्दर है। अप्सरा तो रूप की खान है, एक ऐसा सौन्दर्य जो मृतप्रायः व्यक्तियों में भी प्राण और ऊर्जा का नया संचार कर दे। झील सी गहरी आंखें जिनमें प्रेम का भाव प्रतिपल डूबता और उतरता है, रस से भरे अधखुले अधर जिनके स्पर्श से जीवन की सारी त्रासदियां उड़नछू हो जाती हैं, फिर, विरला ही कोई साधक होगा जो ऐसी रूपसी सहचरी का कुछ क्षणों के लिये साथ नहीं चाहेगा। जीवन तो क्षणों में जीया जाता है, बाकी समय तो सिर्फ उत्तरदायित्त्व निभाने में खप जाता है।

 

 

हर कोई जो साधक है, उसके मन में सौन्दर्य का रस हिलोरें लेता है, बिना सौन्दर्य को जांचे-परखे कोई साधक साधना में ऊपर की ओर उठ नहीं सकता है क्योंकि साधक जिज्ञासु हैं। साधक सौन्दर्यबोध से ओत-प्रोत हैं और अप्सरा रूप की देवी हैं। विश्‍वामित्र ॠषि के तप को भंग कर दे, ऐसी अनिद्य सुन्दरी, मेनका सौन्दर्य की चरमोत्कर्ष परिभाषा है।

 

जब आप साधक बनते हैं, तब आप प्रकृति से जुड़ते हैं और प्रकृति में सौन्दर्य बिखरा पड़ा है। उगते सूरज की लालिमा, खिलते पुष्पों केे रंगों में, सागर के जल की तरंगों में, तितलियों की चंचलता में, मोर के अहंकार में, बादल की सजलता में, नदी के कटाव में, इन सभी में सुन्दरता का वास है और अप्सरा में ये सारे तत्त्व एक जगह पर सिमट जाते हैं।

 

जब साधक के आह्वान पर अप्सरा आती हैं, तब इत्र में घुली श्‍वासों का उच्छवास, उन तीखे नयनों की धार, रुन-झुन करती पायल की झंकार और हर श्‍वास के साथ उठता-गिरता प्रेमासिक्त हृदय साधक को यौवन और जीवन का वरदान दे देती हैं। जीवन के सारे ताप शरद पूर्णिमा की रात उस रूपसी के रूप की चांदनी में शीतल हो जाते हैं, एक ऐसी तृप्ति मिल जाती है, जिसकी जन्मों से प्यास है।

 

आखिर स्वर्ग का मुख्य आकर्षण अप्सराएं ही तो हैं, यही आकर्षण तो मनुष्य से सारी जिन्दगी अच्छे काम कराता है, क्योंकि मृत्यु उपरांत उस सौन्दर्य की देवी जिसे अप्सरा कहते हैं, उनके दर्शन करने का सौभाग्य मिलेगा, पर मंत्रों में इतनी शक्ति निहित है कि उनके द्वारा अप्सरा को नियंत्रित किया जा सकता है।

 

जो कामना नर को खींच कर सुरपुर ले जाती है।
वही खींच लाती है, मिट्टी पर अम्बर वालों को।

 

कौन हैं अप्सरा?

 

अप्सराओं की उत्पत्ति के सम्बन्ध में यह निश्‍चित तथ्य है कि समुद्र-मंथन में पहले रम्भा अप्सरा की उत्पत्ति हुई, और उसके पश्‍चात् अमृत घट और तत्काल पश्‍चात् भगवती लक्ष्मी प्रकट हुईं, इसलिए अप्सराओं का महत्व अन्य रत्नों की अपेक्षा अत्यधिक है। रूप, रस और जल तत्व प्रधान होने के कारण ही इनका नाम अप्सरा पड़ा और इनके गुण देवताओं के गुणों के समान ही पूर्ण रूप से प्रभावशाली हैं।

 

ये भी कहा जाता है कि इन्द्र ने 108 ॠचाओं की रचना करके इन अप्सराओं को प्रकट किया। रम्भा के अलावा जिन अन्य अप्सराओं का वेदों और पुराणों में जिक्र आता है, उनके नाम हैं उर्वशी, मेनका, और तिलोत्तमा।

 

साधना-पथ में साधक अपने मन पर नियंत्रण चाहता है जिससे कि वह अपने अंतर्मन में उतर कर मनन कर सके, पर मन में तो कामनाएं बसती हैं और वे मूलतः प्रेम-जनित होती हैं। अब हृदय अर्थात् उर में जो बस जाती है, उसे उर्वशी कहते हैं और उर्वशी तो हम सबके मन में है। उर्वशी-जनित भाव के कारण ही तो प्रेम की तरंगें मन में उठती हैं और प्रीत में किसी प्रकार की बंदिश नहीं होती। शरद पूर्णिमा की रात जब आसमान से चांदनी की शीतल किरणें भी प्रेम में संतप्त युगलों को दग्ध कर देती हैं, उस रात्रि में नाभि दर्शना अप्सरा साधकों के आह्वान पर सुरपुर से धरती पर आती है।

 

ब्रह्म साधना से भी आवश्यक और उसे करने से पूर्व अप्सरा साधना साधक को करनी चाहिए।

 

नाभिदर्शना अप्सरा –

 

सौन्दर्य की साक्षात् प्रतिमूर्ति, वय में षोडशी और कोमलता से लबालब कमनीय शरीर जो अपने यौवन से इतराया और प्रेम से सिंचित है। प्रतिपल भीनी खुशबू में नहाया तन नाभि-दर्शना के आने की सूचना देता है। इस अप्सरा की काली और लम्बी आंखें, लहराते हुए झरने की तरह केश और चन्द्रमा की तरह मुस्कुराता हुआ चेहरा, कमल नाल की तरह लम्बी बांहें और सुन्दरता से लिपटा हुआ पूरा शरीर एक अजीब सी मादकता बिखेर देता है, और इन्हें इन्द्र का वरदान प्राप्त है, कि जो इसके सम्पर्क में आता है, वह पुरुष पूर्ण रूप से रोगों से मुक्त होकर चिर यौवनमय बन जाता है, उनके शरीर का कायाकल्प हो जाता है, और पौरुष की दृष्टि से वह अत्यन्त प्रभावशाली बन जाता है।

 

साधना विधान

 

क्ष इस साधना को आप शरद पूर्णिमा 05 अक्टूबर 2017 को अथवा रमा एकादशी 15 अक्टूबर 2017  अथवा रूप चतुर्दशी 18 अक्टूबर 2017  अथवा किसी भी शुक्रवार को सम्पन्न करें।

 

क्ष यह रात्रिकालीन साधना है, इस साधना को रात्रि में 10 बजे के पश्‍चात् सम्पन्न करना चाहिये।

 

क्ष नाभिअप्सरा साधना साधक अपने घर में या किसी भी अन्य स्थान पर एकांत में सम्पन्न कर सकता है।

 

क्ष इस साधना में बैठने से पूर्व साधक स्नान कर सुन्दर, सुसज्जित वस्त्र पहनें एवं अपने वस्त्रों पर सुगन्धित इत्र का छिड़काव करें।

 

क्ष साधक उत्तर दिशा की ओर मुंह कर आसन पर बैठें।

 

क्ष इस साधना में सुगन्धित पुष्पों का प्रयोग करना चाहिये। साधक साधना से पहले ही दो सुगन्धित पुष्पों की माला की व्यवस्था कर लें।

 

क्ष सर्वप्रथम अपने सामने लकड़ी के बाजोट पर पीला वस्त्र बिछाकर उस पर गुरुचित्र स्थापित कर, पंचोपचार गुरु पूजन सम्पन्न करें। गुरुदेव से साधना में सफलता का आशीर्वाद प्राप्त कर, मूल साधना सम्पन्न करें –

 

क्ष बाजोट पर एक ताम्र पात्र में अद्वितीय ‘नाभि दर्शना महायंत्र’ को स्थापित करें।

 

क्ष केशर से यंत्र पर तिलक कर यंत्र का सुगन्धित पुष्पों, इत्र, कुंकुम इत्यादि से पूजन करें।

 

क्ष यंत्र के सामने सुगन्धित अगरबत्ती एवं शुद्ध घृत का दीपक लगावें।

 

क्ष इसके बाद हाथ में जल लेकर संकल्प करें, कि ‘मैं अमुक नाम, अमुक पिता का पुत्र, अमुक गौत्र का साधक नाभि दर्शना अप्सरा को प्रेमिका रूप में सिद्ध करना चाहता हूं, जिससे कि वह जीवन भर मेरे वश में रहे, और मुझे प्रेमिका की तरह सुख आनन्द एवं ऐश्‍वर्य प्रदान करे।

 

क्ष इसके बाद ‘नाभि दर्शना अप्सरा माला’ से निम्न मंत्र जप सम्पन्न करें, इसमें 21 माला मंत्र जप उसी रात्रि को सम्पन्न हो जाना चाहिए।

 

॥ ॐ ऐं श्रीं नाभिदर्शना अप्सरा प्रत्यक्षं श्रीं ऐं फट्॥

 

अगर बीच में घुंघरूओं की आवाज आवे या किसी का स्पर्श हो, तो साधक विचलित न हों और अपना ध्यान न हटावें, अपितु 21 माला मंत्र जप एकाग्रचित्त होकर सम्पन्न करें, इस साधना में जितनी ही ज्यादा एकाग्रता होगी, उतनी ही ज्यादा सफलता मिलेगी।
21 माला मंत्र जप पूरी एकाग्रता के साथ सम्पन्न करने के पश्‍चात् अप्सरा माला को साधक स्वयं के गले में डाल दें। तथा सुगन्धित पुष्पों की एक माला को यंत्र पर चढ़ा दे तथा दूसरी माला भी स्वयं के गले में डाल दें।

 

मंत्र जप की पूर्णता पर साधक को यह आभास या प्रत्यक्ष होने लगता है कि अप्सरा घुटने से घुटना सटाकर बैठी है। जब साधक को यह आभास या प्रत्यक्ष हो जाएं तो साधक नाभि दर्शना अप्सरा से वचन ले लें कि मैं जब भी अप्सरा माला से एक मंत्र जप करूं, तब तुम्हें मेरे सामने उपस्थित होना है, और मैं जो चाहूं वह मुझे प्राप्त होना चाहिए, पूरे जीवन भर मेरी आज्ञा का उल्लंघन न हो।

 

तब नाभि दर्शना अप्सरा साधक के हाथ पर अपना हाथ रखकर वचन देती है, कि मैं जीवन भर आपकी इच्छानुसार कार्य करती रहूंगी।

 

तब इस साधना को पूर्ण समझें, और साधक अप्सरा के जाने के बाद अपने साधना स्थल से उठ खड़ा हो।

 

साधक को चाहिए कि वह इस घटना को केवल अपने गुरु के अलावा और किसी के सामने स्पष्ट न करें, क्योंकि साधना ग्रन्थों में ऐसा ही स्पष्ट उल्लेख आया है।

 

साधना सम्पन्न होने पर नाभिदर्शना अप्सरा महायंत्र को अपने घर में किसी गोपनीय स्थान पर रख दें, जो गले में अप्सरा माला पहनी हुई है, वह भी अपने घर में गुप्त स्थान पर रख दें, जिससे कि कोई दूसरा उसका उपयोग न कर सके।

 

जब भी नाभिदर्शना अप्सरा को बुलाने की इच्छा हो, तब इस महायंत्र के सामने अप्सरा माला से उपरोक्त मंत्र की एक माला जप कर लें, अभ्यास होने के बाद तो यंत्र या माला की आवश्यकता भी नहीं होती, केवल मात्र सौ बार मंत्र उच्चारण करने पर ही प्रत्यक्ष प्रकट हो जाती हैं।

 

इस साधना को स्त्रियां भी सिद्ध कर सकती हैं, नाभि दर्शना अप्सरा के रूप में उन्हें अभिन्न सखी प्राप्त हो जाती है, और उस सखी के साहचर्य से साधिका के शरीर का भी कायाकल्प हो जाता है, और ऐसी साधिका अत्यन्त सुन्दर, यौवनमय और सम्मोहक बन जाती हैं।

 

वास्तव में ही यह साधना बालक या वृद्ध किसी भी वर्ण या जाति का व्यक्ति या स्त्री सम्पन्न कर सकते हैं, और यदि विश्‍वास एवं श्रद्धा के साथ इस साधना को सम्पन्न करें, तो अवश्य ही पूर्ण सफलता मिलती है।

 

साधना सामग्री – 450/-
Best moments to obtain  Apsara Siddhi –

Sharad Poornima – 05 October 2017

Rama Ekadashi – 15 October 2017

Roop Chaturdashi – October 18, 2017

 

Dynamic Sadhana of

Dynamic Sadhaks

 

Naabhidarshana Apsara

 

The full form of Love, Beauty, Sweetness, Passion and Joy

 

The desire to practice Apsaara Sadhana arises in the mind of every Sadhak and why should it not be? Only a stone-hearted person will not get captivated with a glimpse of the unsurpassed divine beauty. Whatever is True in the universe, it is Shivamaya (Shiva-essence), and  whatever is Shivamaya, will always have an essence of divine beauty. Nymph is the zenith of beauty, the beauty which can trigger energy and life in anyone.  The deep eyes radiating waxing- waning of love and full half-open lips, even a touch of which can annihilate all problems of life. Rare will be a Sadhak who would not want to seek such divine company. The life is really lived in such divine moments, our obligations-responsibilities consume the rest of it.

The love for beauty vibrates in the heart of every Sadhak. Due to his inherent curiosity, a Sadhak needs to do a thorough investigation of beauty to rise higher in the spiritual practices. The Sadhaks are passionate about beauty and Nymph is the very embodiment of beauty. An instance of this zenith of beauty is the unimaginable beauty of Menaka Nymph, who interrupted the penance of Sage Vishwamitra.

When you become a Sadhak, you take a step towards merger with the nature, and beauty is scattered everywhere in the nature. This beauty lies in the crimson rising sun, vibrating colors of the blooming flowers,  flowing waves of the ocean water,  flickering of butterflies,  pride of peacocks, changing shapes of the clouds and the shapely banks of the rivers. All these variant beautiful elements merge together within the Nymph .

When the Nymph arrives upon invocation by the Sadhak, then She grants the boon of eternal youth  to the Sadhak through the excitement of Her sensual breathing dissolved within sweet perfume, sharp edges of Her eyes, sweet chimes of Her anklets and the warm beats of Her heart. All worries and tensions of life melt away in the soft moonlight of that Sharad Poornima night. The thirst of many births gets quenched.

After all, the main attraction of the heaven are the Nymphs. A person performs good deeds throughout his life to achieve this paradise, to earn a fortunate opportunity of a divine rendezvous with the divine nymphs. However the Mantras  have the powers to easily control the Nymphs.

 

The desire which pulls the humans to paradise,

The same pushes the Gods to the earth

 

Who is a Nymph?

It is a definite fact about the origin of Nymphs that  Rambha Nymph was the first one to be borne in the sea-churning. The divine pot of Nectar and Goddess Lakshmi manifested thereafter,  so the Nymphs are more significant than other gems. They were termed as Apsaras due to dominating factors of beauty, passion and water within them. They are as powerful as the Gods.

It is also said that Indra composed 108 divinities to manifest these Nymphs. The most mentioned nymphs in the holy Vedas and Puranas after Rambha are – Urvashi, Menaka, and Tilottama.

The Sadhak treading the path of spiritual-meditation, wishes to attain complete control over his mind so as to be able to contemplate within deep recesses of his mind. However the mind is the treasure-trove of all desires, and all of them are essentially based on love. Now whatever gets settled in the heart (also called Ur) , can be termed as Urvashi, and this Urvashi resides in everyone’s mind. This Urvashi generates the feelings of love in the mind. Love knows no limitations. The soft rays of moonlight bathes even the estranged couple in love on the divine night of Sharad Poornima full-moon-night. Naabhidarshana Apsara manifests from the heavens onto the earth on the spiritual invocation of the Sadhaks.

This Sadhana is more significant than even the Brahma Sadhana. The Sadhaks should perform this Sadhana before attempting the Brahma Sadhana.

 

Naabhidarshana Apsara-

The essence of the beauty itself,  of sweet sixteen years, the wistful petite youthful  body full of love and affection. The sweet soothing fragrant aroma of Her body heralds the arrival of Naabhi-darshana Apsara. The deep black eyes, flowing mane of hair, sweet captivating smile, the moonlike smiling face,  the lotus stemmed delicate arms, and the overall beauty of the beauteous body stupefies-transfixes everyone. God Indra gave Her a boon that anyone coming within Her contact will re-attain youth, his body will be rejuvenated body and transformed into a disease-free state. He will become the very epitome of masculinity.

 

Sadhana Procedure

* You must accomplish this Sadhana on Sharad Poornima 05 October 2017 or on  Rama Ekadashi 15 October 2017 or on Roop Chaturdashi  October 18, 2017 or on any Friday.

* This is a nocturnal Sadhana and should be performed after 10 pm in the night.

* The Sadhak can accomplish this Sadhana in a lonely quiet location at his home or at any other place.

* The Sadhak should take a bath, wear pretty, adorable garments and sprinkle fragrant perfume before starting the Sadhana.

* The Sadhak should sit facing North direction on a Asana.

* Fragrant flowers should be used in this Sadhana practice. The Sadhak  shpuld arrange for two floral  garlands before starting the Sadhana.

* First, you should spread a yellow cloth on a wooden board in front of you. You should then setup Guru-picture and perform Guru worship. Start the main Sadhana after mentally taking blessings for success from Gurudev.

* Setup “Naabhi Darshana Mahayantra” on a copper plate on the wooden board.

* Make a mark on the Yantra with the Saffron, and worship with fragrant flowers, perfume and vermilion.

* Light a lamp of pure ghee and  fragrant incense sticks in front of the Yantra.

* Thereafter taking water in hand, take a resolve, “I <name>, son of <father’s name>, belonging to <gotra-name> gotra Sadhak wish to accomplish Nabhi-Darshana Apsara as a lover, so that She remains in my  control throughout my life, and provide me happiness, joy and luxury like a lover. ”

* Then chant following Mantra with “Nabhi Darshana Apsara Mala“. 21 rosary-rounds should be accomplished on the same night.

 

|| Om Ayeim Shreem Naabhidarshanaa Apsaraa Pratyaksham Shreem Ayeim Phat ||

 

The Sadhak should not get distracted or lose their focus upon hearing sound of anklets or getting touched by someone. They should continue to concentrate upon completing the 21 rosary-rounds with full focus. The deeper the concentration in this Sadhana, the higher the success.

The Sadhak should wear the Apsara rosary around own neck after completing 21 rosary rounds of the Mantra chanting. Adorn a floral garland on the Yantra and wear the second floral garland yourself.

The Sadhak starts to sense or perceive presence of Nymph sitting near him with knees touching each other, after completion of the Mantra chanting of 21 rosary rounds. When the Sadhak receives a direct impression of Her or perceives Her presence, he should make Her pledge to appear before him upon chanting of 1 rosary-round of the Mantra,  and to provide him with whatever he desires, and to obey his commands throughout his life.

Thereafter, you should consider accomplishment of this Sadhana and the Sadhak should get up from the Sadhana seat only after Her departure.

The Tantrik Sadhana scriptures recommends that the Sadhak should maintain confidentiality about this incident and should not discuss this with anyone except his Guru.

After accomplishing the Sadhana, the Nabhidarshana Apsara Mahayantra should be secured in a secret place in your house. The floral garland worn by you should also be kept  in a secret place in your house, so that no one else can use it.

Whenever you wish to invite Naabhidarshana Nymph, you should chant 1 rosary-round of the above Mantra with Apsara Mala in front of this Mahayantra. After practice, one does not even require the Yantra or the Mala, as the Nymph physically appears just by chanting the Mantra 100 times.

The women can also accomplish this Sadhana, and can acquire a close intimate friend in the form of Naabhi Darshana Nymph. The companionship of Sadhika with that friend will rejuvenate her body as well and such a Sadhika transforms into an extreme beautiful, youthful and attractive form.

Indeed, this Sadhana can be accomplished by any person- young or old, man or women, belonging to any caste or creed.  One certainly obtains complete success in this Sadhana, if it is performed with full faith, trust and reverence.

Sadhana Materials  – 450 / –

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