Mahamritunjay Sadhana

मार्कण्डेय ॠषि रचित
महामृत्युंजय साधना
रोग मुक्ति, आरोग्य प्राप्ति, अकाल मृत्युदोष निवारण

 

मत्यु एक ऐसा भयावह शब्द है, जिसका नाम सुनते ही शरीर में सिहरन दौड़ जाती है। किंतु यह भी एक शाश्‍वत् सत्य है कि मृत्यु एक दिन सभी को आनी है। लेकिन दुःखद स्थिति तब उत्पन्न हो जाती है जब किसी की अकाल मृत्यु होती है। यह अकाल मृत्यु किसी घातक रोग या दुर्घटना के कारण होती है। इससे बचने का एक ही उपाय है – महामृत्युंजय साधना। यमराज के मृत्युपाश से छुड़ाने वाले केवल भगवान मृत्युंजय शिव ही हैं जो अपने साधक को दीर्घायु देते हैं।

 

महामृत्युंजय शिव षड्भुजा धारी हैं, जिनमें से चार भुजाओं में वे अमृत कलश रखते हैं, अर्थात् वे अमृत से स्नान करते हैं, अमृत का ही पान करते हैं एवं अपने भक्तों को भी अमृत पान कराते हुए अजर-अमर कर देते हैं। इनकी शक्ति भगवती अमृतेश्‍वरी हैं। महामृत्युंजय मंत्र का भावार्थ यह है कि हे भगवान त्र्यम्बक शिव! मैं अपने जीवन में पूर्ण पुष्टि, आरोग्यता प्राप्त करूं और अपने जीवन में पुष्टि, वृद्धि के साथ जीवन के बंधन से मुक्त रहूं और मेरी जीवन यात्रा में मेरी काया सदैव निरोगी रहे।

 

ऋषि-मुनियों ने महामृत्युंजय मंत्र को वेद का हृदय कहा है। चिंतन और ध्यान के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले अनेक मंत्रों में गायत्री मंत्र के साथ इस मंत्र का सर्वोच्च स्थान है।

 

महामृत्युंजय मंत्र का स्वरूप और भाव-

 

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

 

शिव के सूर्य, चंद्र एवं अग्नि के प्रतीक त्रिनेत्रों के कारण उन्हें त्र्यम्बकं कहा गया है। त्र्यम्बकं शिव के प्रति यज्ञ आदि कर्मों से संबंध जोड़ते हुए स्वयं को समर्पित करने की प्रक्रिया यजामहे हैजीवनदायी तत्वों को अपना सुगंधमय स्वरूप देकर विकृति से रक्षा करने वाले शिव सुगंधिम् पद में समाहित हैं। पोषण एवं लक्ष्मी की अभिवृद्धि करने वाले शिव पुष्टिकर्ता अर्थात् पोषण कर्ता तथा वर्धनम् अर्थात् वृद्धिकर्ता, उन्नतिप्रदायक एवं विस्तार करने वाले हैं। रोग एवं अकालमृत्यु रूपी बंधनों से मुक्ति प्रदान करने वाले मृत्युंजय उर्वारुकमिव बंधनात पद में समाहित हैं। तीन प्रकार की मृत्यु से मुक्ति पाकर अमृतमय शिव से एकरूपता की याचना मृत्योर्मुक्षीय मामृतात पद में है।

 

त्र्यंबकम् मंत्र के 33 अक्षर हैं जो महर्षि वशिष्ट के अनुसार 33 देवताओं के द्योतक हैं। उन तैंतीस देवताओं में 8 वसु 11 रुद्र और 12 आदित्य 1 प्रजापति तथा 1 षट्कार हैं। इन तैंतीस देवताओं की सम्पूर्ण शक्तियां महामृत्युंजय मंत्र में निहीत होती हैं जिससे महामहामृत्युंजय का पाठ करने वाला प्राणी दीर्घायु तो प्राप्त करता ही है। साथ ही वह आरोग्य, ऐश्वर्य युक्त धनवान भी होता है। महामृत्युंजय का पाठ करने वाला प्राणी हर दृष्टि से सुखी एवं समृद्धिशाली होता है। भगवान शिव की अमृतमयी कृपा उस पर निरन्तर बरसती रहती है।

 

महामृत्युंजय साधना के विशेष तथ्य –

 

1.  अनुष्ठान शुभ दिन और शुभ मुहूर्त में करना चाहिए।
2.  इस अनुष्ठान को प्रारम्भ करते समय सामने भगवान शंकर का चित्र स्थापित करना चाहिए और साथ ही साथ, भक्ति भावना भी रखनी चाहिए।
3.  जहां जप करें, वहां का वातावरण सात्विक हो तथा नित्य पूर्व दिशा की ओर मुंह करके साधना या मंत्र जप प्रारम्भ करना चाहिए।
4.  जप करते समय घी का दीपक जलते रहना चाहिए।
5.  इसमें रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करना चाहिए तथा ऊन का आसन बिछाना चाहिए।
6.  पूरे साधना काल में ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।
7.  यथाशक्ति एक समय भोजन करना चाहिए।
8.  अनुष्ठान करने से पूर्व मंत्र को संस्कारित करके ही पुरश्‍चरण करना चाहिए।
9.  नित्य निश्‍चित संख्या में मंत्र जप करना आवश्यक है, कभी कम, कभी अधिक करना ठीक नहीं है।
10.  शास्त्रों के अनुसार भय से छुटकारा पाने के लिए इस मंत्र का 1100 जप, रोगों से छुटकारा पाने के लिए 11,000 जप तथा पुत्र प्राप्ति, उन्नति एवं अकाल मृत्यु भय समाप्ति हेतु 1,00,000 जप का विधान है।

 

धर्म शास्त्रों में मंत्र शक्ति से रोग निवारण एवं मृत्यु-भय दूर करने तथा अकाल मृत्यु पर विजय प्राप्त करने की जितनी साधनाएं उपलब्ध हैं, उनमें महामृत्युञ्जय साधना का स्थान सर्वोच्च है।

 

साधना विधान

 

इस विशेष साधना में ‘महामृत्युंजय यंत्र’ तथा ‘तीन मधुरूपेण रुद्राक्ष’, ‘रुद्राक्ष माला’ आवश्यक है। इसके अतिरिक्त साधना को साधक पूर्ण भक्ति से साधना प्रारम्भ करे, अपने सामने एक पात्र में ‘महामृत्युजंय यंत्र’ स्थापित कर, तीनों मधुरूपेण रुद्राक्ष सामने रखें और फिर दोनों हाथों की अंजलि में पुष्प लेकर शिव का ध्यान करें।

 

हस्ताभ्यां कलशद्वयामृत रसैराप्लावयन्तं शिरो,
द्वाभ्यां तौ दधतं मृगाक्षवलये द्वाभ्यां वहन्तं परम्।
अंकन्यस्तकरद्वयामृतघटं कैलाशकान्तं शिवं,
स्वच्छाम्भोजगतं नवेन्दुमुकुटं देवं त्रिनेत्रं भजे॥

 

अर्थात् दो हाथों से दो अमृत घटों द्वारा अपने ही सिर पर अभिषेक करते हुए मृग चर्म तथा रुद्राक्ष माला को धारण किये हुए और अन्य दो हाथों में अमृत से परिपूर्ण दो कुम्भ अपनी गोद में रखे हुए कैलाश पर्वत के समान और सुवर्ण, स्वच्छ आसन पर विराजमान नवीन चन्द्रमायुक्त मुकुट वाले, त्रिनेत्र भगवान मृत्युंजय शिव का मैं स्मरण करता हूं।

 

इसके बाद हाथ में जल लेकर विनियोग करें –

 

विनियोग –

 

अस्य श्री त्र्यम्बक मंत्रस्य वशिष्ठ ॠषिः अनुष्टुप् छन्दः, त्र्यम्बक पार्वति पतिर्देवता त्रं बीजं, बं शक्तिः, कं कीलकं, मम सर्व रोग निवृत्तये सर्व कार्य सिद्धये अकाल मृत्यु निवृत्तये महामृत्युंजय त्र्यम्बक मंत्र जपे विनियोगः॥

 

तत्पश्‍चात् हाथ का जल भूमि पर छोड़ दें।

 

ॠष्यादिन्यास –

 

ॐ वशिष्ठ ॠषये नमः (शिरसे)
ॐ अनुष्टुप् छन्दसे नमः (मुखे)
ॐ त्र्यम्बकं देवतायै नमः (हृदये)
ॐ त्रं बीजाय नमः (गुह्ये)
ॐ बं शक्तये नमः (पादयोः)
ॐ कं कीलकाय नमः (नाभौ)
ॐ विनियोगाय नमः (सर्वांगे)॥

 

करन्यास –

 

ॐ त्र्यम्बकं (अंगुष्ठाभ्यां नमः)
ॐ यजामहे (तर्जनीभ्यां नमः)
ॐ सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् (मध्यमाभ्यां नमः)
ॐ उर्वारुकमिव बन्धनान् (अनामिकाभ्यां नमः)
ॐ मृत्योर्मुक्षीय (कनिष्ठिकाभ्यां नमः)
ॐ मामृतात् (करतलकर पृष्ठाभ्यां नमः)

 

हृदयन्यास –

 

ॐ त्र्यम्बकं (हृदयाय नमः)
ॐ यजामहे (शिरसे स्वाहा)
ॐ सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् (शिखायै वषट्)
ॐ उर्वारुकमिव बन्धनान् (कवचाय हुं)
ॐ मृत्योर्मुक्षीय (नेत्र त्रयाय वौषट्)
ॐ मातृतात् (अस्त्राय फट्)

 

इस क्रिया के पश्‍चात् महामृत्युंजय यंत्र का पंचोपचार पूजन करें तथा महामृत्युंजय यंत्र के साथ तीनों मधुरूपेण रुद्राक्ष पर भी केसर से तिलक करें और इन्हें यंत्र के सामने स्थापित कर दें। तीन मधुरुपेण रुद्राक्ष सुगन्धी, पुष्टि और वर्धन शक्ति का स्वरूप है। अब रुद्राक्ष माला को अपने हाथ में लें और यह प्रार्थना करें कि – हे सदाशिव! ये रुद्राक्ष आपका स्वरूप है मैं साधक (अपना नाम बोलें) आपका लघु स्वरूप हूं। जिस प्रकार आपने सर्पमाला एवं रुद्राक्ष माला धारण की हुई है और यह रुद्राक्ष सभी बंधनों से मुक्ति देने वाला, रोग हरने वाला है इसे मैं मंत्र जप द्वारा चैतन्य कर धारण करता हूं।’

 

महामृत्युंजय साधना मंत्र

 

ह्रौं जूं सः भूर्भुवः स्वः त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् स्वः भुवः भूः सः जूं ह्रौं ॥

 

इसके पश्‍चात् महामृत्युंजय मंत्र जप की (4) माला जप करें। सोमवार के दिन महामृत्युजंय मंत्र जप अवश्य करना चाहिए। इस प्रकार नित्य प्रति (4) माला जप कर ग्यारह हजार मंत्र जप का अनुष्ठान होता है। कई शास्त्रों में सवा लाख मंत्र जप का भी विवरण आया है।

 

नित्य प्रति की साधना के लिये महामृत्युंजय का लघुतम मंत्र अवश्य जपना चाहिये। जब आप सुबह पूजा करें तो इस रुद्राक्ष माला को हाथ में लेकर 21 बार लघु महामृत्युजंय जप अवश्य करना चाहिये।

 

महामृत्युञ्जय का लघुतम मंत्र इस प्रकार है –

 

॥ ॐ ह्रौं जूं सः ॥

 

अनुष्ठान पूर्ण होने पर निम्न मंत्र से समर्पण प्रार्थना भगवान् मृत्युंजय को ‘बिल्व पत्र’ समर्पित करना चाहिए –

 

॥ॐ ह्रौं ह्रीं जूं सः नमः शिवाय प्रसन्न पारिजाताय स्वाहा॥

 

अनुष्ठान पूर्ण होने के पश्‍चात् महामृत्युंजय यंत्र तथा रुद्राक्ष माला को नदी में प्रवाहित अवश्य करें। वस्तुतः यह साधना आरोग्यता प्राप्त करने की और किसी भी प्रकार की तंत्र बाधा हो उसे समाप्त करने की साधना है।

 

महामृत्युंजय प्रयोग के लाभ

 

अपने बालकों की बीमारी से रक्षा के लिये महामृत्युंजय साधना करें, अपने शरीर से रोग बाधा निवारण हेतु महामृत्युंजय साधना करेें। प्रत्येक प्रकार की तंत्र बाधा की शांति हेतु महामृत्युंजय साधना करें।

 

समस्त पाप एवं दु:ख भय शोक आदि का हरण करने के लिए महामृत्युंजय साधना ही श्रेष्ठ है।

 

साधना सामग्री – 550/-

Shraavan Month

10 July 2017 to 7 August 2017

Shraavan Month – Immortality Month

Composed by Sage Markandeya

Mahamrityunjaya Sadhana

Everyone should perform during this Shraavan month

For Riddance from Illness, Obtain Good Health and Avoid Premature Death

 

Death is such a horrible word that mere mention of it sends shudders throughout the spine. However it is an eternal fact that everyone will die  one day. Premature death of anyone causes a sad situation. This premature death may occur due to a fatal disease or an accident. There is only one way to avoid this – Mahamrityunjaya Sadhana. Only God Mahamrityunjaya Shiva has the power to save us from the clutches of Yamraaj, only He can grant a long life to His devotee-Sadhaks.

God Mahamrityunjaya Shiva has six arms. He holds the pot of divine elixir-nectar in His four arms. He bathes with nectar, drinks the elixir and makes His devotees immortal by granting them the nectar. His power consort is Bhagwati Amriteshwari. The literal meaning of Mahamrityunjaya Mantra is that – O Lord Trayambak Shiva! May I obtain full strength and good health in my life, and may I attain complete growth-development in life while staying free from the bondages of life, and may my body remain healthy and disease-free during my entire life.

The ancient sages-ascetics have termed the Mahamrityunjaya Mantra as the heart of the Vedas. This Mantra has been accorded the highest place along with Gayatri Mantra among the various mantras used for meditation and peace.

 

The nature and expression of Mahamrityunjaya Mantra –

Om Triyambakam Yajaamahe Sugandhim Pushtivardhanam |

Urvaarukamiva Bandhanaanmrityormuksheeya Maamritaata ||

 

Lord Shiva has been addressed as Triyambakam due to presence of three eyes symbolizing Sun, Moon and Fire. Yajaamahe is the process of dedicating the self towards Triyambakam Shiva through actions like Yagya etc. Lord Shiva is imbibed within Sugandhim as He grants His aromatic fragrant form to the life-giving elements while protecting from the deformities. The nurturing and wealth-enhancing expression of Lord Shiva is termed as Pushtikartaa or nurturer, and He is named Vardhanam due to promotion of growth, development and expansion. Mrityunjaya Urvaarukamiva Bandhanaat form grants protection from the diseases and death like bondages. The prayer to Mrityormuksheeya Maamritaata form is done to solicit protection from the three kinds of deaths leading to attainment of a single form from the immortality bestowing Shiva.

 

According to Maharishi Vashishtha, the 33 characters within the Triyambakam Mantra represent 33 Gods. These 33 Gods include 8 Vasus, 11 Rudras, 12 Adityas, 1 Prajapati and 1 Shatkaar. The combined power-energy of these 33 Gods are imbibed within the Mahamrityunjaya Mantra. Thus any person chanting Mahamrityunjaya Mantra attains longevity, apart from perfect health, wealth and prosperity. The Sadhak chanting Mahamrityunjaya is always happy and prosperous from all perspectives. He is continuously blessed with the divine grace elixir of Lord Shiva.

 

Special facts of Mahamrityunjaya Sadhana –

  1. The Anushthaan rituals should be performed on a auspicious day at the  auspicious time.
  2. A picture of Lord Shiva should be setup while starting this Anushthaan, and devotion to Lord Shiva should be maintained.
  3. The environment of the Sadhana-place should be pure (Sattvik), and the Sadhana (or Mantra chanting) should be performed daily facing East direction.
  4. A ghee lamp should be continuously lit during Mantra chanting.
  5. The Rudraksha Mala should be used. One should sit on a woollen seat-asana.
  6. Brahmaacharya (celibacy) should be observed throughout the entire Sadhana period.
  7. Food should be eaten only once in a day.
  8. The purascharan should be performed only after completing Mantra Sanskarit (purification) before starting the Anusthaan
  9. It is important to chant same number of mantras daily. It is not correct to do more or less across each day.
  10. The scripture-Shashtras specify that one should chant 1100 chants of this mantra to get rid of fear, 11,000 chants to get riddance from diseases and 100,000 chants to attain child, progress-development and prevention of premature-death.

The religious scriptures proclaim that the Mahamrityunjaya Sadhana is the best Sadhana to use Mantra power to obtain riddance from diseases, removal of fear of death, and to conquer premature death through Mantra power.

 

Sadhana Procedure

“Mahamrityunjaya Yantra”, “three Madhurupen Rudraksha”, and“Rudraksha Mala” are important Sadhana articles for this special Sadhana. The Sadhak should start Sadhana with full devotion. He should setup “Mahamrityunjaya Yantra” on a plate and keep the three Madhurupen Rudraaksha in front and meditate on the holy form of Lord Shiva taking flowers in the palm of both hands.

Hastaabhyaam Kalashadavyaamrita Raseiraaplaavayantam Shiro,

Dwaabhyaam Tou Dadhatam Mrigaakshavalaye Dwaabhyaam Vahantam Param |

Ankanyastakaradvayaamritaghatam Kailaashakaantam Shivam,

Swachchaambhojagatam Navendumukutam Devam Trinetram Bhaje ||

 

That is – I meditate on the holy novel moon crowned, three-eyed God Mrityunjaya Shiva seated on the pure golden seat, anointing His own head with the two nectar-elixir pots held by two hands, holding two nectar-elixir pots with other two hands in own lap, looking like Mount Kailash, adorning deer-skin and Rudraksha Mala.

 

Thereafter perform Viniyoga taking water in palm –

Viniyoga-

Asya Shree Trayambak Mantrasya Vashisht RishiH Anushtup ChandaH, Trayambak Paarvati Patirdevataa Tram Beejam, Bam ShaktiH, Kam Keelakam,  Mam Sarva Roga Nivrattaye Sarva Kaarya Siddhaye Akaala Mrityu Nivrattaye Mahaamrityunjaya Trayambaka Mantra Jape ViniyogaH ||

 

Then let the water from palm flow onto the ground.

 

Rishyaadinyaasa –

Om Vashishta Rishaye NamaH (Head)

Om Anushtup Chhandse NamaH (Mouth)

Om Trayambakam Devataayei NamaH (Heart)

Om Tram Beejaaya NamaH (Private part)

Om Bam Shaktaye NamaH (Legs)

Om Kam Keelakaaya NamaH (Navel)

Om Viniyogaaya NamaH (Entire body)

 

Karnyaasa –

Om Trayambakam (Angusthaabhyaam NamaH)

Om Yajaamahe (Tarjanibhyaam NamaH)

Om Sugandhim Pushtivardhanam (Madhyamaabhyaam NamaH)

Om Urvaarukamiva Bandhanaan (Anaamikaabhyaam NamaH)

Om Mrityormuksheeya (Kanishthikaabhyaam NamaH)

Om Maamritaata (Karatalakara Pristhaabhyaam NamaH)

 

Hridyanyaasa –

Om Trayambakam (Hridayaaya NamaH)

Om Yajaamahe (Shirase Swaaha)

Om Sugandhim Pushtivardhanam (Shikhaayei Vashat)

Om Urvaarukamiva Bandhanaan (Kavachayaaya Hoom)

Om Mrityormuksheeya (Netra Trayaaya Voushat)

Om Maatritaata (Astraaya Phat)

 

After this process, perform panchopachaar poojan-worship of Mahamrityunjaya Yantra. Apply the holy tilak mark with Kesar (Saffron) on Mahamrityunjaya Yantra along with the three Madhurupen Rudraksha. Set them up in front of the Yantra. The three Madhurupen Rudraksha symbolize the form of Sugandhi (Fragrance), Pushti (Strength) and Vardhan (Progress) Shakti powers. Now take Rudraksha Mala in your hand and pray that – O Sadaashiva! This Rudraksha is your nature-form. I, Sadhak (your name) am a miniature form of yours. As you wear serpent-rosary and Rudraksha Rosary, similarly this Rudraksha will grant me liberation from all kinds of bondages and rid all my diseases. I wear it after energising it with Mantra chanting.

 

Mahamrityunjaya Sadhana Mantra

Hroum Joom SaH BhurbhuvaH SwaH Triyambakam Yajaamahe Sugandhim Pushtivardhanam Urvaarukamiva Bandhanaan Mrityormuksheeya Maamritaata SwaH BhuvaH BhuH SaH Joom Hroum ||

 

Then chant 4 malas of the Mahamrityunjaya mantra. One should definitely chant Mahamrityunjaya Mantra on Monday. Thus one completes the Anushthaan of Eleven thousand Mantras by chanting 4 Malas daily. Some scriptures have described chanting of 1.25 lakh Mantras.

One should definitely chant the miniature form of Mahamrityunjaya Mantra in daily Sadhanas. You should certainly chant Miniature Mahamrityunjaya Mantra 21 times holding this Rudraksha Mala in your hands during your morning worship.

The miniature form of Mahamrityunjaya Mantra is –

|| Om Hroum Joom SaH ||

 

After completion of the Anushthaan-ritual, “Bilwa-Patra” should be offered to God Mrityunjaya by chanting following offering Mantra –

|| Om Hroum Hreem Joom SaH NamaH Shivaaya Prasanna Paarijaataaya Swaaha ||

 

You should definitely drop the Mahamrityunjaya Yantra and the Rudraksha Mala in a flowing river after completion of the Anushthaan. This Sadhana practice bestows perfect disease-free health and riddance from Tantrik Black-Magic problems.

 

Benefits of Mahamrityunjaya Prayog practice

Perform Mahamrityunjaya Sadhana to protect your children from the diseases, and to rid your body from illness. You may perform Mahamrityunjaya Sadhana to obtain peace for all kinds of Tantrik black-magic problems.

Mahamrityunjaya Sadhana is the best Sadhana to get riddance from all kinds of sins, sorrows, fear and grief.

 

Sadhana Materials – 550 / –

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