Kuldev – Kuldevi Sadhana

आपकी कुल देवी – आपके कुल देवता

कुलदेवी – महाकृपा

 

जो प्रत्यक्ष आशीर्वाद देती है
अगर आपसे प्रश्‍न किया जाए कि क्या आप अपने कुल देवी या कुल देवता का नाम ले सकते हैं तो 10 में से 9 लोग सकपका जाएंगे, अरे ये क्या प्रश्‍न है? बस कुल देवता होते है।

 

पूजा-आराधना का तो प्रश्‍न ही नहीं उठता है?
क्यों आवश्यक है कुल देवी या कुल देवता की पूजा?
और कैसे उनकी आराधना आपकी प्रगति से जुड़ी हुई है?
समझते हैं, इस लेख में।

 

एकेनापि सुपुत्रेण विद्या युक्ते च साधुना
आल्हादितं कुलं सर्व यथा चन्द्रेण सर्वरी

 

जिस प्रकार अकेला चन्द्रमा रात्रि की शोभा बढ़ा देता है, वैसे ही एक योग्य विद्वान संतान अपने पूरे कुल को आल्हादित रोशन करती है।

 

 

जब भी दीक्षा संस्कार होता है, तो उसके आरम्भ में, मैं निम्नलिखित मंत्र बोलता हूं –
ॐ लक्ष्मी नारायणाभ्याम् नमः वाणी हिरण्यगर्भाभ्याम् नमः स्थान देवताभ्योः नमः
कुल देवताभ्यो नमः
मातृ-पितृ चरण कमलेभ्यो नमः
सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः।
दीक्षा संस्कार का प्रारम्भ लक्ष्मी नारायण के आह्वान से होता है और कुल देवी या कुल देवता को नमन से होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि कुलदेवी या देवता व्यक्ति की वंशावली की सुरक्षा करते हैं और उस व्यक्ति विशेष या परिवार का सुरक्षा चक्र स्थापित करते हैं।

 

कुल देवी-देवता और इष्ट

 

कई बार लोग यह भूल करते हैं कि इष्ट को कुल देवी या देवता से सम्बन्द्ध कर लेते हैं। इष्ट आपके प्रिय देवी और देवता हैं जिनकी आराधना करके आपका मन प्रसन्न होता है। इसका अभिप्राय है कि पति और पत्नी के अलग-अलग इष्ट हो सकते हैं, पर कुल देवी या कुल देवता तो पूरे परिवार और खानदान के एक ही होते हैं।

 

इनकी इतनी अधिक महत्ता होने के बाद भी आपके घर के मन्दिर में कुल देवी या देवता स्थापित नहीं हैं, वो लोग जो गांव से शहर विस्थापित होते हैं, उनके कुल देवी-देवता गांव में ही रह जाते हैं और कालान्तर में उपेक्षित होते रहते हैं। कई बार इन भूले-बिसरे कुल देवी या देवता की याद बेटे-बेटी के विवाह के समय घर-परिवार को आती हैं। विवाह का पहला निमंत्रण पत्र कुल देवता को अर्पित किया जाता है। घर में जब नई बहू आती है तो उसे भी आशीर्वाद दिलाने हेतु कुल देवी या देवता की पूजा की जाती है। इसके मूल में भाव तो यही रहता है कि विवाह संस्कार द्वारा लड़के-लड़की नया जीवन आरम्भ कर रहे हैं और उन्हें कुल देवी या कुल देवता अपने सुरक्षा चक्र में ले लें।

 

कुल देवी- कुल देवता की कृपा

 

इतना तो आप समझ गए हैं कि कुल देवी-देवता की कृपा परिवार की चहुंमुखी उन्नति के लिए आवश्यक है, क्योंकि परिवार में कुल और वृक्ष में मूल (जड़) एक जैसे हैं। कुल किसी भी परिवार की मूलभूत इकाई है और एक कुल के लोगों का एक-दूसरे से रक्त-जनित सम्बन्ध है। बेशक वे समय के प्रवाह में एक-दूसरे से बहुत अलग हो गए हैं, पर वंशावलि तो एक ही है।

 

ऐसी मान्यता है कि कुल देवता और कुल देवी की पूजा छोड़ने के बाद तत्काल कोई प्रभाव नहीं दिखता है, पर जैसे-जैसे वह सुरक्षा चक्र टूटता है, परिवार में र्दुघटनाएं और नकारात्मक ऊर्जा बेरोक-टोक प्रवेश करती हैं।

 

इसका अर्थ हुआ कि अगर आपके परिवार में बार-बार दुर्घटनाएं  हो रही हैं या आप बाधाओं से त्रस्त हैं, तो जानने का प्रयास कीजिए कि आखिरी बार आपके परिवार में कुल देवी या देवता का पूजन कब हुआ था?

 

सफलता का आधार स्तम्भ

 

जीवन में जो भी वांछनीय है, उसके लिए दैवी कृपा अनिवार्य है। इसलिए आप साधनात्मक ऊर्जा द्वारा अपने लिए दैवी कृपा सुनिश्‍चित करते हैं, यही कारण है कि आप साधनाओं को सम्पन्न करते समय अपना पूर्ण परिचय देते हैं- नाम, गौत्र, ग्राम और दिनांक क्योंकि आप उस असीम सत्ता के दरबार में अपनी उपस्थिति रजिस्टर्ड कराना चाहते हैं।

 

अब जब आप कुल देवी या देवता की आराधना करते हैं, उस समय आपके अपने स्वजन आपका पक्ष लेकर उस असीम सत्ता के समक्ष उपस्थित होते हैं। जाहिर है, ऐसी अवस्था में अपनी साधनात्मक सफलता और सिद्धियां सुदृढ़ होती हैं, आपकी इच्छाएं पूर्ण होती हैं और आप साधना पथ पर प्रगति करते हैं।

 

व्यक्ति की पहचान – कुल देवी-देवता

 

व्यक्ति की पहचान सर्वप्रथम उसके कुल से होती है। जिस प्रकार नाम होता है उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति का गोत्र होता है, उसी प्रकार कुल भी होता है। ‘कुल’ अर्थात खानदान या उसकी वंश परम्परा। जिस वंश से वह सम्बन्धित होता है, वह वंश तो हजारों-लाखों वर्षों से चला आ रहा है, लेकिन आज सामान्य व्यक्ति अपने कुल की तीन-चार पीढ़ियों से अधिक के नाम नहीं जानता। यह कैसी विडम्बना है? यदि किसी व्यक्ति से उसके परदादा के भाइयों के नाम पूछे जाएं, तो वह बता नहीं पाता है। यह न भी याद रहे तो भी अपने कुल और गोत्र का सदैव ध्यान रखना तो आवश्यक ही है क्योंकि प्रत्येक कुल परम्परा में उस कुल के पूजित कोई देवी-देवता अवश्य होते हैं इसलिए वार, त्यौहार, पर्व आदि पर स्वर्गीय दादा, परदादा के साथ ही कुल देवता अथवा कुलदेवी को भोग अर्पण अवश्य ही किया जाता है।

 

कुल देवता का तात्पर्य है – जिस देवता की कृपा से कुल में अभिवृद्धि हुई है, परिवार को सदैव एक अभय छत्र प्राप्त होता रहा है।

 

वाल्मीकि रामायण में देखने को मिलता है कि विश्‍वामित्र के आश्रम में विद्या अर्जित कर पुनः अयोध्या लौटने पर भगवान राम ने अपने कुल के सभी देवी देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए साधना की थी। राजमहल के अन्दर ही एक मन्दिर में सभी देवी देवताओं की दिव्य जाग्रत मूर्तियां थीं। उन्हीं की साधना करने से भगवान राम को सभी कुल देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त हुआ था जिसके कारण वे आने वाले समय में युगपुरुष सिद्ध हो सके।

 

यदि ध्यान दिया जाए, तो विशेष साधनाओं के पूर्व जिस प्रकार गणपति पूजन, गुरु पूजन, भैरव स्मरण आदि आवश्यक रूप से सम्पन्न किया जाता है, उसी प्रकार संक्षिप्त रूप में ‘कुलदेवताभ्यो नमः’ शब्दों का भी उच्चारण किया जाता है। यह कुलदेवता के प्रति अभिवादन है जिससे हमें उनका आशीर्वाद प्राप्त हो एवं साधना में सफलता सुनिश्‍चित की जा सके। वस्तुतः कुल देवता ही साधक को समस्त प्रकार के वैभव, उन्नति, शक्ति, प्रतिष्ठा, सुख, शांति प्रदान करने में सक्षम होते हैं यदि उन्हें साधना द्वारा प्रसन्न कर लिया जाए तो।

 

अगर आप नहीं जानते हैं अपना कुल देवी-देवता

 

कई बार लोगों को अपने कुल देवी या देवता का ज्ञान नहीं होता है। ऐसी दशा में शिव और जगदम्बा आपके कुल देवी या देवता हैं क्योंकि इस संसार की सृष्टि शिव और शक्ति के संयोग से है।

 

कुलदेवता-कुलदेवी साधना विधान

 

यह दो सप्ताह की साधना है जो किसी भी अमावस्या से प्रारम्भ की जा सकती है। अर्थात् यदि साधना सोमवार को प्रारम्भ की जाए, तो पन्द्रह दिन बाद सोमवार को ही उस साधना का समापन भी किया जाना चाहिए। इस साधना हेतु ‘कुलदेवता यंत्र’, ‘कुलदेवी भैषज’ एवं ‘प्रत्यक्ष सिद्धि माला’ की आवश्यकता होती है। इसके अलावा साधना में कोई विशेष कर्मकाण्ड अर्थात् विधान नहीं होता है।

 

प्रातः अथवा रात्रि में स्नान कर पूर्व की ओर मुख कर अपने सामने गुरु चित्र रख कर सद्गुरु का संक्षिप्त पूजन सम्पन्न करें। फिर दाहिने हाथ में जल लेकर संकल्प करें, कि मैं अपने कुल देवता और कुल देवी को प्रसन्न करने के लिए इस साधना को सम्पन्न कर रहा हूं और उनकी कृपा प्राप्त करने की प्रार्थना कर रहा हूं जिससे वे मुझे जीवन में हर प्रकार की सफलता एवं समृद्धि प्रदान करें तथा विपत्तियों से मेरी रक्षा करें। इस भाव को मन में धारण कर निम्न संकल्प का उच्चारण करें –

 

ॐ अद्य अमुक गोत्रीयः (अपना गौत्र बोलें), अमुक शर्माऽहं (नाम बोलें) स्व कुलदेवता प्रीत्यर्थ सकल मनोकामना पूर्ति निमित्तं कुलदेवता साधनां सम्पत्स्ये।
जल को भूमि पर छोड़ दें, फिर कुलदेवता यंत्र को जल से धोकर पोछ दें और किसी पात्र में पुष्प का आसन देकर स्थापित करें। फिर यंत्र पर कुंकुम, अक्षत व नैवेद्य चढ़ाएं।

 

कुलदेवी भैषज’ को मौली से लपेट कर यंत्र के मध्य भाग में स्थापित करें, फिर निम्न मंत्र को पांच बार बोलते हुए भैषज पर कुंकुम से पांच बिन्दियां लगाएं –

 

ॐ एतोस्मानं श्री खण्डचन्दनं समर्पयामि ॐ कुल देवतायै नमः।

 

इसके बाद ‘प्रत्यक्ष सिद्धि माला’ से निम्न मंत्र की 5 माला पन्द्रह दिन तक नित्य करें –

 

कुल देवता मंत्र
॥ॐ ह्रीं कुल देवतायै मनोवांछितं साधय साधय फट्॥
अंतिम दिन यंत्र के समक्ष घर का बना हुआ नैवेद्य (मिष्ठान्न) अर्पित करें। साधना समाप्ति पर समस्त सामग्री को नैवेद्य के साथ किसी कपड़े में लपेट कर सरोवर, नदी अथवा मन्दिर में अर्पित कर दें। शीघ्र ही साधना के परिणाम सामने आते हैं, एवं साधक को अपने कुल देवता और कुल देवी के दर्शन होते हैं और उनकी कृपा प्राप्त होती है।

 

प्राण प्रतिष्ठा न्यौछावर – 480/-
Share
error: Content is protected !!