Kriya Yog

हमारा चेतन मन बुद्धि से प्रभावित होकर अधिक क्रियाशील हो जाता है, जबकि अवचेतन मन उपेक्षित सा रह जाता है और इसका दुष्प्रभाव यह होता है, कि यदि जीवन में एकाएक विपरीत परिस्थिति आ जाये, तो अवचेतन मन साथ नहीं देता है और नर्वस ब्रेकडाउन की स्थिति बन जाती है।

 

इसका एकमात्र व सरल निदान ही है – क्रिया योग द्वारा सूक्ष्म शरीर के माध्यम से सैकड़ों मील दूर जाया जा सकता है। दूरस्थ स्थानों का वार्तालाप सुना जा सकता है तथा इसी प्रकार के कार्य जो अचरज भरे प्रतीत होते हैं, मानसिक क्षमता के विस्तार से सम्भव हैं।

 

साधकों को चाहिये
साधना में सिद्धि
आवश्यक है
मन की एकाग्रता
आवश्यक है
श्रेष्ठ गुरु का निर्देशन
क्रिया योग
योग का उच्चतम सोपान
जो गुरु का वरदान है

 


जिनका चित्त चंचल है, मन भटकता रहता है, इन्द्रियां विषयों की ओर प्रवृत्त रहती हैं। उनके लिए अभ्यास और वैराग्य का होना कठिन है। ऐसी स्थिति में चित्त कैसे विशुद्ध बने, मन कैसे निर्मल और संयत हो सके, अभ्यास और वैराग्य का सम्पादन वे कैसे कर सकें – इस अभिप्राय से चित्त की एकाग्रता के लिए ॠषियों ने जो सरल उपाय बताया है, वह है क्रियायोग।

 

सरल चित्त और एकाग्र मन को बनाने वाले उपाय क्रियायोग की क्या पहचान है? उसका स्वरूप क्या है अथवा क्रियायोग किसे कहते हैं? इस प्रश्‍न के उत्तर में पातञ्जल योग सूत्र कहता है –

 

तपः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः
तप, स्वाध्याय और ईश्‍वर-प्रणिधान क्रियायोग है।

 

मानव शरीर इतना रहस्यमय है, कि हजारों वर्षों से वैज्ञानिक, चिकित्सक, योगी व साधक इसके रहस्य को समझने का प्रयत्न कर रहे हैं और प्रत्येक बार यही अनुभव होता है, कि अभी बहुत कुछ जानना बाकी है। फिर भी मानव का यह प्रयत्न रहा है कि वह अधिक से अधिक इस बारे में ज्ञान अर्जित करे और अपने ज्ञान का अनुभव आने वाली पीढ़ी को दे।

 

गहराई से विचार करने पर स्पष्ट होता है कि मानव मन दो हिस्सों में विभक्त है – अन्तर्मन एवं बाह्यमन। हम इसे अन्तश्‍चेतना तथा बाह्यचेतना भी कह सकते हैं। इससे अन्तश्‍चेतना सर्वदा सक्रिय, शुद्ध एवं निर्मल बनी रहती है। मानव जो भी दैनिक कार्य व्यवहार अपनाता है, उसकी प्रेरणा में बाह्यचेतना की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, अन्तश्‍चेतना की नहीं, क्योंकि अन्तश्‍चेतना मानव को विशुद्ध और उसमें देवत्व बनाए रखने में सहायक होती है।

 

बाह्य मन और अर्न्तमन

 

क्रिया योग में व्यक्ति अपनी बाह्यचेतना का सम्पर्क अन्तश्‍चेतना से करता है और अन्तश्‍चेतना प्रायः सभी विकारों से मुक्त रहती है। उस पर न तो किसी प्रकार के विकारों का प्रभाव पड़ता है और न ही वह बहकावों में आती है, क्योंकि उसमें पूर्ण देवत्व का भाव होता है। यह अन्तश्‍चेतना ही मानव को सही अर्थों में मानव बनाए रखती है और देवत्व की ओर अग्रसर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसलिए बाह्यचेतना को अन्तश्‍चेतना से जोड़ने की क्रिया महत्वपूर्ण होती है और मानव को विकारों से मुक्त कराने का यह एक सुन्दरतम प्रयास है।

 

जब अन्तर्मन और बाह्यमन परस्पर जुड़ जाते हैं तो इन दोनों मन को जोड़ने की क्रिया ही क्रियायोग कहलाती है। इस दशा में अर्थात् दोनों मनों के जुड़ने की प्रक्रिया में व्यक्ति एक दिव्य प्रकाश की अनुभूति अपने अन्दर महसूस करने लगता है, जिससे उसके तनाव समाप्त होने लगते हैं। उसे आनन्द की अनुभूति होने लगती है और वह समझ लेता है, कि वास्तविक सुख हमारे अन्दर मौजूद है, जिसे कहीं बाहर से नहीं लाना पड़ता है।

 

ध्यान – धारणा – समाधि

 

क्रिया योग के मुख्य रूप से तीन आधार हैं – ध्यान, धारणा और समाधि। इसमें ध्यान ऐसी प्रक्रिया है, जो व्यक्ति को निरन्तर, चैतन्यता, मानसिक विश्राम और गति प्रदान करती है। ‘ध्यान’ का तात्पर्य यह है कि मानो जल शांत हो और हम उसकी तलहटी में देख सकें। वास्तव में ध्यान अपने अन्दर की समस्त ऊहापोह, बैचेनी, छटपटाहट, व्यग्रता और तनाव को समाप्त करने की प्रक्रिया है।
ध्यान योग की दशा में जब साधक अपने अन्तर्मन में उतरता है तो प्रारम्भ में एक प्रकाश का बिन्दु दिखाई देता है धीरे-धीरे इस प्रकाश का घेरा बढ़ता जाता है। आरम्भ में यह बिन्दु छोटा सा एवं नीली आभा लिए होता है, किन्तु अभ्यास बढ़ने के क्रम में प्रकाश का घेरा बढ़ने लगता है और आगे बढ़ने पर कई रंग या सातों रंग स्पष्ट दिखने लगते हैं। यह ध्यान योग में प्रगति का परिचायक है। ध्यान में और अधिक एकाग्रता आने पर सातों रंग दिखाई देना बंद हो जाते हैं और सफेद तेज दिव्य प्रकाश दृष्टिगोचर होने लगता है। इस प्रकाश का दृष्टिगोचर होना ही तृतीय नेत्र खुलने की स्थिति है, जिससे साधक को स्वयं का तथा अन्य किसी का भी भूत-भविष्य-वर्तमान स्पष्ट होने लगता है। ध्यान से आगे की जो स्थिति है वह है ‘धारणा’।

 

धारणा’ का अर्थ है, अपने आप में लीन हो जाना। इस अवस्था में पहुंचकर व्यक्ति संसार में केवल साक्षी भाव से रहता है अर्थात् सांसारिक माया-मोह उस पर व्याप्त नहीं होते हैं और उसमें दृष्टा भाव उत्पन्न हो जाता है और वह परमहंस की स्थिति में आ जाता है।

 

धारणा के पश्‍चात् की जो अवस्था होती है, वह ‘समाधि’ की होती है। ‘समाधि’ का तात्पर्य यह है, कि अपने को विस्मृत कर देना, स्वयं को पूर्णता तक पहुंचा देना, पूरे ब्रह्माण्ड में स्वयं को एकाकार कर देना, समस्त ब्रह्माण्ड में सशरीर विचरण करने की क्षमता अर्जित कर लेना और प्रकृति के कार्यों में हस्तक्षेप करके उनको अपने अनुकूल बना देना।

 

ऐसी अवस्था में उसका चेहरा अपने आप में दैदीप्यमान हो जाता है और वह पूर्णता प्राप्त कर लेता है।

 

क्रिया योग – शरीर मन की शुद्धि

 

क्रिया योग वास्तव में अपने मन के मल का निवारण कर, जीवन को दिव्यतम बनाने का एक सुन्दर एवं विशिष्ट प्रयास है, जिससे उसमें ईश्‍वरत्व स्पष्ट हो जाता है। क्रिया योग की उच्चतम स्थिति निर्विकल्प समाधि की होती है, जिसे निर्विचार मन की प्राप्ति तक ले जाया जा सकता है। निर्विचार मन बनाकर व्यक्ति स्वतः ही अपना उपचार कर सकता है। विदेशों में इस तकनीक को ‘ऑटो हीलिंग’ कहते है। हमारे देश में प्रायः इसे योग निद्रा की संज्ञा दी जाती है।

 

क्रिया योग के लिए साधनात्मक मार्ग एक सबल एवं व्यवस्थित मार्ग के रूप में अपनाया जा सकता है। इसमें ज्यादा कठिन एवं यौगिक क्रियाएं, व्यायाम, आसन अथवा हठ योग की क्रियाओं की आवश्यकता नहीं होती है, अपितु अपने दैनिक कार्य को सम्पादित करते हुए भी साधक प्रतिदिन कुछ समय नित्य मंत्र जप कर अपने लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं।

 

क्रिया योग सिद्धि साधना

 

इस प्रयोग में आपको नित्य एकटक होकर यंत्र पर देखते हुए जप करना है, इससे ध्यान की स्थिति प्रारम्भ होती है। प्रारम्भ में ही घर की समस्याएं ऑफिस की उलझने स्वतः ही कम हो जाएंगी और आपको स्पष्ट मार्ग मिलने लगेगा।

 

इस प्रयोग को सम्पन्न करने पर निर्विचार मस्तिष्क की अवस्था आने लगती है, क्योंकि हमारे मस्तिष्क में एक सैकण्ड में लाखों विचार आकर चले जाते हैं, हम भविष्य के ताने-बाने इन विचारों से जोड़ते रहते हैं और इनका दुष्प्रभाव यह होता है कि मस्तिष्क के कोमल तन्तुओं पर अधिक दबाव पड़ता है और व्यक्ति मानसिक पंगु हो जाता है और उसके मस्तिष्क का विकास नहीं हो पाता है।

 

विचार शून्य की स्थिति में व्यक्ति अपनी लघु देह व लघु परिवेश से कटकर समस्त ब्रह्माण्ड का एक अंश बनने की प्रक्रिया में होता है और तब उसे भावना रखनी चाहिए – ‘मैं असीमित शक्ति के रूप में एक पुंजीभूत रूप में समस्त ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी व्याप्त है, उसमें विस्तारित हो रहा हूं।’ यह मात्र कल्पना का विषय नहीं है वरन् इस समस्त ब्रह्माण्ड में ईश्‍वर तत्व का जो विस्तार है और जिसके द्वारा ही तरंगों का संचरण सम्भव हो पाता है, उसके द्वारा व्यक्ति अपनी मानसिक तरंगों का विस्तार कर सकता है। एक स्थान पर बैठ कर ही सैकड़ों मील दूर बैठे व्यक्ति को आज्ञा दी जा सकती है।

 

सूक्ष्म शरीर के माध्यम से सैकड़ों मील दूर जाया जा सकता है। दूरस्थ स्थानों का वार्तालाप सुना जा सकता है तथा इसी प्रकार के कार्य जो अचरज भरे प्रतीत होते हैं, मानसिक क्षमता के विस्तार से सम्भव हैं।

 

जो साधक अपने जीवन में परम लक्ष्य को प्राप्त करना चाहें, वे इस साधना को सम्पन्न कर आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करने का सुन्दर सौभाग्य प्राप्त कर सकते हैं।

 

साधना विधान

 

1. इस प्रयोग को किसी भी रविवार को कर सकते हैं।

 

2. साधक प्रातः स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ सफेद वस्त्र धारण करें तथा सफेद सूती आसन पर उत्तर दिशा की ओर मुंह कर बैठें।

 

3. सर्वप्रथम अपने सामने स्थित बाजोट पर वस्त्र बिछाकर उस पर तांबे के पात्र में क्रिया योग यंत्र स्थापित करें। उसके सम्मुख क्रिया सिद्धि माला स्थापित कर दें।

 

4. सुगन्धित अगरबत्ती व घी का दीपक प्रज्वलित कर दें और दैनिक साधना विधि पुस्तक के अनुसार गुरु पूजन तथा यंत्र का पूजन करें।

 

5. इसके पश्‍चात् क्रिया सिद्धि माला से ही गुरु मंत्र की 1 माला मंत्र जप करें, फिर निम्न मंत्र की 11 माला मंत्र जप 5 दिन तक करें –

 

मंत्र
॥ॐ ह्रीं ह्रीं ऐं क्रिया सिद्धिं ॐ॥

 

6. प्रतिदिन मंत्र जप के पश्‍चात् पद्मासन या सिद्धासन में बैठे हुए मेरुदण्ड सीधा रखें और ध्यान नासिकाग्र पर कर यह अनुभव करें कि ‘मैं निरन्तर विराट पुरुष को अपने चारों ओर देख रहा हूं, मुझमें तेजस्विता, श्रेष्ठता और दिव्यता बढ़ती जा रही है, उनके संरक्षण में मैं अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता जा रहा हूं। मैं प्रसन्नचित्त हूं, मेरा रोम-रोम प्रसन्नता और संतोष से खिल रहा है, क्योंकि मेरी बुद्धि में सात्विकता, तेजस्विता, दिव्यता और सामर्थ्यता है।

 

इस तरह उक्त भावना का मनन धीरे-धीरे पांच या दस मिनट तक करें, ताकि इन विचारों की स्थायी छाप मन पर पड़ती रहे। इसके पश्‍चात् गुरुदेव जी को प्रणाम कर नित्य प्रयोग सम्पन्न करें।

 

7. पांच दिन के पश्‍चात् यंत्र तथा माला को किसी नदी में प्रवाहित कर दें।

 

8. पांच दिन के पश्‍चात् नित्य प्रातः 4 बजे से 6 बजे के बीच में कभी भी 10 मिनट तक उपरोक्त क्रम संख्या 6 का अनुसरण करें।

 

विशेष – साधना प्रारम्भ करने से पूर्व नित्य क्रम में शारीरिक योग, प्राणायाम, अनुलोम-विलोम अथवा हल्का सा व्यायाम कर लें, तो ज्यादा उचित है। प्रयोग सम्पन्न करने के उपरान्त हल्का फलाहार या दूध अपनी सुविधानुसार ग्रहण कर लें, तत्पश्‍चात् ही अपने दैनिक कार्यों को सम्पादित करें।

 

साधना सामग्री – 410/-
Our conscious mind becomes more active under the influence of the intellect, while the subconscious mind remains neglected. This causes a side-effect that, if we encounter opposite situations in life, the subconscious mind does not support the conscious mind leading to a nervous breakdown condition.

The only simple remedy for this is Kriya Yoga – One can travel hundreds of miles away through Kriya Yoga through the subtle body. One can listen to dialogue at remote locations; and all such surprising tasks are possible with the expansion of mental capacity.

Sadhaks seek

Success in Sadhanas

Requiring

Focused concentration of mind

Under

Direction of a learned Guru

 

Kriya Yoga

Highest stage of Yoga

a boon from Gurudev …


It is highly difficult to practice Sadhanas and attain detachment if one’s psyche is playful, mind wanders around, and the senses succumb to temptations. How to purify the mind, restrain and cleanse the mind, how to practice Sadhanas and attain detachment – a simple solution provided by the ancient sages to develop focused concentration of mind is Kriya Yoga.

How to recognize the Kriya Yoga, which creates a purer psyche and focused mind? What is its nature? What actually is Kriya Yoga? Patanjali Yoga Sootra answers these questions as –

TapaH Swadhyaayeshvarapranidhaanaani KriyaayogaH

 

i.e. Austerity, Study of Self and Surrender to Divine is Kriya Yoga.

 

The human body is so mysterious that the scientists, doctors, yogis and sadhaks have been trying to understand its mystery for thousands of years,  and every time we discover something, we realize that there is much more to learn about. Still mankind has been tenuously trying to obtain as much knowledge about it as is possible and pass on the experience-knowledge to the next generation.

Delving deeply into this analysis, it is evident that the human mind is divided into two parts – inner-mind and external-mind. We can also term them as sub-consciousness and external-consciousness. The sub-conscience always remains active, pure and virtuous. The external-consciousness plays a major part in the daily living practices of the man, instead of sub-consciousness, as the sub-consciousness is more focused on keeping the mind pure and maintaining the expression of the Divine.

 

External and Inner Mind

In Kriya Yoga, the person interfaces his external consciousness with his own sub-consciousness, as the sub-consciousness is always free from any kind of disorder. It is neither influenced by any disorder, nor does it get tempted by any illusion, since it is full of Divinity. This sub-consciousness keeps human beings in the right sense and plays an important role in transforming towards divinity. Therefore, the action of connecting external-mind to inner-mind is highly significant and it is a beautiful approach to liberate the humans from disorders.

When both external and inner mind get interconnected, then the action of connecting these two minds is called Kriya Yoga. In this condition of interconnection of the two minds, the person starts feeling a sensation of a divine light within his self, which reduces his stress levels. He starts feeling joyful and realizes that the actual joy is within our own self, we do not need to bring it from outside.

 

Dhyaan (Meditation) – Dhaarana (Focus) – Samadhi (Trance)

The three core foundations of Kriya Yoga are – Dhyaan (Meditation), Dhaarana (Focus) and Samadhi (Trance). The meditation process provides continuity, consciousness, mental rest and dynamism to the person. “Meditation (Dhyaan)” is equivalent to calmness of water such that we can view its underwater surface. In fact, meditation is the process to eliminate all  hypersensitivity, anxiety, embarrassment, worry and stress within us.

When the Sadhak starts entering deep within his sub-consciousness self, then initially he starts to see a single point of light. The diameter of this circular light enhances gradually. Initially this small point possesses a blue aura, but the size of light increases with continuous practice, and one can progress further to clearly view multiple or seven colours after regular practice. This symbolizes progression on the path of meditation. Deeper concentration in meditation hides the seven colours, and a bright white coloured divine light begins to appear. Visibility of this light is a sign of opening of the third eye. This enables the Sadhak to clearly view the past-present-future of self or of any other. The next step after meditation is – Focus or Concentration (Dhaarana).

Concentration (Dhaarana) means to become absorbed in self. Upon reaching this stage, the person acquires detachment from the world i.e. he becomes resistant to the worldly temptations and attachments. He develops a spectator perspective and he attains the state of Paramhansa.

The next state after Dhaarana (Focus-Concentration) is “Trance (Samadh)i“. Trance( Samadhi) means to forget one’s own self, to attain perfection, merge the self with the universe, acquire the capability to move anywhere physically in the universe, and to make the conditions favourable after interfering in actions of nature.

His face becomes glorious and he achieves perfection-totality.

 

Kriya Yoga – purification of body and mind

Kriya Yoga is actually a beautiful and unique attempt to transform our life towards Divinity, by removing the mental impurities, to achieve divine clarity. The highest state of Kriya Yoga is Nirvikalpa Samadhi (Continuous Trance) in which we can attain a thought-less mind. A person can cure himself on his own through thought-less mind. This technique is famous in the Western world as “Auto Healing”. It is generally called as Yoga-Nidra (Yogic Slumber) in our country.

The Sadhana method can be utilized in a strong, systematic manner for Kriya Yoga. Difficult Yogic actions, exercises, asanas or Hath-Yoga actions are not required. The Sadhak can achieve his or her goal by regularly chanting  Mantra for some time daily, along with his or her daily chores.

 

Kriya Yoga Siddha Sadhana

In this Sadhana practice, you have to chant Mantras while seeing a Yantra continuously without shifting your gaze. It initiates the meditation state. Initially the problems of office and conflicts of office will start getting reduced, and you will start seeing a clear path.

Accomplishment of this practice will inculcate the state of thought-less mind. We get millions of thoughts every second in our mind. We keep connecting our future with these thoughts, and this causes pressure-stress on the delicate brain neurons. This paralyses the mind and stops the mental growth.

The thought-less mind cuts the person away from his little body and his small surroundings-world, and he gets into the process to merge his self with the entire universe. At this stage, he should incorporate into his mind that – “I am expanding my self within whatever is in the entire universe, in an unlimited infinite form, with unlimited power”. It is not just mere imagination, rather the person can expand his mental waves, through the divine element omnipresent within the universe. One can order someone sitting hundreds of miles away.

It is possible to travel hundreds of miles through the astral body. One can listen to dialogue happening at remote locations. Many such impossible-sounding surprising feats, can be easily done with the expansion of mental capacity.

The Sadhaks desirous of achieving the ultimate goal within their life can obtain wonderful fortune spiritual progress through this Sadhana.

 

Sadhana Procedure

  1. This Sadhana practice can be done on any Sunday.
  2. The Sadhaks should adorn white garments after taking fresh bath early in the morning, and sit on a white cotton asana facing North direction.
  3. First, spread a cloth over the wooden board in front of you, and setup Kriya Yoga Yantra in a copper plate on it. SetupKriya Siddhi Mala in front of it.
  4. Light the aromatic incense and ghee lamp. Perform Guru-pujan and worship the Yantra according to the “Dainik Sadhana Vidhi” book.
  5. Then chant the one mala rosary-round) Guru Mantra using the Kriya Siddhi Mala. Thereafter chant 11 malas of following mantra for 5 days –

 

Mantra

|| Om Hreem Hreem Ayeim Kriya Siddhim Om ||

 

  1. After chanting the mantra daily, sitting in Padmasana or Siddhasana, with a straight spine, meditate on the tip of the nose and experience that – “ I am continuously watching the divine vastness around me, the intensity, superiority and divinity powers are enhancing within my self, and I am progressing towards my goals within their care and influence. My mind is full of joy, each of my cell is blossoming with happiness and contentment, because now my intellect has purity, intensity, divinity and capability.”

Meditate on these thoughts for five or ten minutes, so that these thoughts make a permanent impression on your mind. Then perform daily worship after bowing in the holy feet of Pujya Gurudev.

  1. After five days, drop the Yantra and the mala in a flowing water stream.
  2. After completion of 5 days, follow the above step number 6 daily for 10 minutes at any time between 4 AM and 6 AM.

Note– Perform physical exercise, yoga, pranayama, anulom-vilom or a light exercise for before starting the Sadhana-meditation. Take light fruit or milk as per your choice after completing the Sadhana practice. Thereafter start your daily activities.

Sadhana material – 410/-

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