Kinnari Sadhana

शरीर निरोग हो…
यौवन से छलकता हो…
देह का कायाकल्प संभव है
धन्वन्तरी रचित
मृगाक्षी रूप गर्विता
किन्नरी साधना

 

जीवन रस सौन्दर्य परिपूर्णता साधना

 

आद्या शक्ति पार्वती की शक्तियों में एक शक्ति हैं – किन्नरी, जो रूप, सौन्दर्य, रस से परिपूर्ण हैं तथा शिव और शक्ति के साधकों को शीघ्र सिद्ध होकर पूर्ण रूप से उनका कायाकल्प करती हैं।

 

धन्वन्तरी महान्, ॠषि, योग विद्या से परिपूर्ण, सब प्रकार के रोगों का निदान करने में समर्थ, लेकिन एक चिन्ता उन्हें खाये जा रही थी, अवस्था के साथ-साथ जीवन आगे बढ़ रहा था। यौवन बीत गया था और वृद्धावस्था अपनी दस्तक दे रही थी। इसीलिए जीवन में रस नहीं आ रहा था, वे रसायन शास्त्री, औषध शास्त्री तो बन गये लेकिन ‘रस-शास्त्री’ नहीं बने एक दिन निराश होकर निढ़ाल बैठे थे चिन्ता में ही मगन थे, थके शरीर में तन्द्रा आ गई और नींद में स्वप्न में भगवान सदाशिव का आदेश आया। मैं रसेश्‍वर हूं तुम्हें रस से परिपूर्ण होना है और तुम्हें रस से परिपूर्ण कर सकती है मृगाक्षी रूप गर्विता किन्नरी, अचानक धनवन्तरी की नींद खुली और सब कुछ स्पष्ट हो गया और सम्पन्न की अद्वितीय मृगाक्षी रूपा गर्विता साधना और बस प्रारम्भ हो गई चिर यौवन प्राप्ति की यात्रा –

 


किन्नरी का सौन्दर्य… शीतकाल में वृक्ष पर गिरी बर्फ की भांति शीतल और आंखों को सुखद स्पर्श देने वाला, जो झलके उसके गोल और भोले चेहरे से। टुकुर – टुकुर देखती काली कजरारी आंखों में भोलापन ही भोलापन तो लिखा दिखता है। अप्सराओं के चकाचौंध भरे रूप रंग की जगह उसका सौन्दर्य लिए होता है एक ठहराव… और निर्मल जल की भांति शांत चेहरे में दिखाई देता है प्रेम का प्रतिबिम्ब, उसी की तरह निश्छल और शांत, जिसमें कोई उत्तेजना नहीं, कोई छिछलापन नहीं, वासनाओं का उमड़ता ज्वार नहीं और न कोई उद्वेलन। अप्सराओं के तीखे नयन नक्श की जगह किन्नरी के चेहरे पर बिखरी होती है मृदुता, उसके अंग – अंग की तरह ही कोमल और सुडौलता लिए हुए… सभी रूपों में, चाहे वह अण्डाकार चेहरा हो या भरे – भरे स्वस्थ कपोल, आंखों की नरमी भी तो… व्यवहार में घुली शालीनता, अपनापन लिए होंठों से मुखरित होती गुनगुनाहट में जीवन का मधुर संगीत सुनाती हुईं।

 

रूप गर्विता का रूप

 

ऐसी ही तो हैं मृगाक्षी रूप गर्विता। गर्व अपने रूप का, अपने हृदय में भरी गुणों की खान का और गर्व अपने नारीत्व का, ऐसा गर्व जिसमें कोई हेठी नहीं, गर्व जिसमें कि वह बोध हो कि मैं नारी हूं, पुरुष को पूर्ण करने में समर्थ, अपने हृदय से प्रेम-प्रदान करने में समर्थ, गर्व जो कि उसमें समाया हो अपनी आन्तरिकताओं को लेकर और ऐसा ही मादक गर्व जो घंटियों की तरह खनकते हुए आकर घुल जाता हो कानों में, जीवन को आश्‍वस्त करता हुआ। अपने रूप के प्रकाश से अपने यौवन की आभा से हल्की-हल्की, दबी-दबी उठती हंसी की फुलझड़ियों से, जब वह अपने ही यौवन की मादकता पर मुग्ध हो जाती है, खुद ही उसमें खोकर जब अपनी खिलखिलाहट बिखेर देती है, भूल जाती है कि वह कहां है, और कैसे है, तो घनी से घनी रात में भी जल जाते हैं सौ-सौ दीपक, जैसे दीपावली अभी गई न हो, जाते-जाते फिर से लौट आई हो… उसे भी पता लग गया हो कि मृगाक्षी जो उतर आई है, इस धरा पर… उसके कोमल होठों के भीतर से झांकती, स्वच्छ श्‍वेत छोटी और सुघड़ दंत पंक्ति की झिलमिलाहटों से भर जाता है, मन में, जीवन में उत्साह का वातावरण। दाड़िम के दानों की तरह एक पर एक चढ़ गये दांत और स्वस्थ कपोलों की आभा, जिनकी कोई उपमा ही नहीं, और जिस तरह से इसका ध्यान प्राचीन शास्त्र में मिलता है, वही इसके रूप की एक हल्की सी झलक है — ‘व्यर्थ है कामदेव के पंच बाणों की संज्ञा क्योंकि मृगाक्षी की मादक खिलखिलाहट की उसमें गणना ही नहीं की गई है, जिससे मुनिजन अपना चिंतन छोड़ इस भ्रम में पड़ जाते हैं कि यह नूपुर ध्वनि है अथवा किसी वाद्य यंत्र से निकला कोई संगीत का स्वर, कल्पना ही नहीं कर पाते, विश्‍वास ही नहीं होता कि ऐसी ध्वनि नारी की भी हो सकती है।

 

संगीत का मधुर स्वर

 

मंद पीत आभा के रेशमी वस्त्रों से सुसज्जित, सुडौल अंगों से युक्त, मादक छवि वाली, मध्यम कद की यह रूप गर्विता जिसके आभूषणों में यत्र-तत्र नूपुर का बाहुल्य है… पैरों में पड़ी पायजेब या कमर में पड़ी करघनी अथवा केशराशि और उन्नत वक्ष स्थल को मर्यादा में बांधने का असफल प्रयास करते स्वर्ण तारों से रचित आभूषण मण्डल… जिसके शरीर से आती मादकता की ध्वनि इन नूपुरों के संगीत को भी लज्जित कर रही है, वही तो है रूप गर्विता… रूप भी अपनी परिभाषा भूल गया हो और निहार रहा हो मृगाक्षी के चेहरे को खुद अपने-आप को वहां खिला-खिला देखकर आश्‍चर्यचकित और स्तम्भित होकर।’’

 

कैसे हो कायाकल्प

 

तभी तो धन्वन्तरी जैसे श्रेष्ठ आचार्य भी बाध्य हो गए ऐसी अद्वितीय सुन्दरी को अपने जीवन में उतार कर अपने शास्त्र को पूर्णता देने के लिए। सम्पूर्ण चिकित्सा शास्त्र लिखने के बाद भी उन्हें वह उपाय नहीं मिल रहा था, जो एक ही बार में उनका सम्पूर्ण काया-कल्प कर दे। शिथिल पड़ गए शरीर और इन्द्रियों को पुनः यौवनवान बना दे। क्योंकि यौवन के अभाव में तो फिर व्यर्थ है सारी चिकित्सा पद्धति। शरीर निरोग हो लेकिन उसमें यौवन की छलछलाहट न आए, उसमें कुछ प्राप्त कर लेने की, किसी को अपना बना लेने की अदम्य लालसाएं न उफन रही हों तो फिर वह यौवन किस काम का… और यही उपाय नहीं मिल रहा था धन्वन्तरी को और न वे बन पा रहे थे चिकित्सा जगत के अद्वितीय आचार्य। कितने प्रकार की जड़ी-बूटियां, कितने प्रकार की भस्म, कितने प्रकार के लेप और सभी प्रकार के रस का प्रयोग करके देख चुके थे, लेकिन कोई भी उपाय सिद्ध नहीं हुआ उनकी आशाओं पर पूर्ण रूप से खरा उतरता हुआ और तभी उन्हें प्राप्त हुआ यह साधना सूत्र। साधना जगत में वे तो कल्पना भी नहीं कर रहे थे, चिकित्सा जगत की इस समस्या के समाधान का, अद्वितीय यौवन प्राप्त करने का – यह रहस्य जो किन्हीं जड़ी-बूटियों में नहीं, जो जाकर छुप गया है मृगाक्षी रूप गर्विता की मादक देह में, वहीं से तो खिलेगी इस शरीर और मन में यौवन की तरंगें और सच भी तो है, बिना ऐसे सौन्दर्य का साक्षात् किए, बिना ऐसे सौन्दर्य को बांहों में भरे, फिर कहां से फूट सकती है इस जर्जर शरीर में यौवन की गुनगुनाहट और मृगाक्षी रूप गर्विता को पाकर उल्लासित हो गए आचार्य धन्वन्तरी, अपने चिकित्सा शास्त्र की इस परिपूर्णता का रहस्य प्राप्त कर।

 

धन्वन्तरी का साधना सूत्र

 

वे तो सिद्धतम आचार्य हुए हैं, इस चिकित्सा जगत के ही नहीं, साधना जगत के भी, और उन्होंने ढूंढ़ निकाली मृगाक्षी रूप गर्विता को अपने वश में करने की एक नवीन पद्धति। सच तो यह है कि मृगाक्षी खुद आतुर हो गयी, ऐसे युग पुरुष का सान्निध्य प्राप्त करने को, और इसी तालमेल का परिणाम बनी रूप गर्विता की यह साधना। इसने फिर आगे का मार्ग प्रशस्त कर दिया प्रत्येक ऐसे साधक के लिए जो आतुर हो अपने जीवन को नवयौवन से भरने के लिए। ऐसे सौन्दर्य का सान्निध्य पाकर अपने जीवन में कुछ नया रचित कर देने के लिए। एक साधारण सी अप्सरा साधना नहीं या सामान्य किन्नरी साधना नहीं यह तो किन्नरियों में भी श्रेष्ठ, रूप का आधार, रूप गर्विता की उपाधि से विभूषित, एक नारी देह में घुला सौन्दर्य, अपने रग-रग में बसा लेने की बात है।

 

आप भी करें, यह यौवन साधना –

 

शिव कल्प (28 जनवरी 2017 से 12 मार्च 2017) में किसी भी दिवस को यह साधना सम्पन्न की जा सकती है। शिवकल्प का प्रत्येक दिवस शिव साधना का ही दिवस है। शिव के साथ विराजित शिव की ही शक्ति शिवा के एक विशिष्ट स्वरूप किन्नरी की साधना सायंकाल सूर्यास्त के बाद ही सम्पन्न की जाती है। वैसे किन्नरी साधना के लिये किसी विशिष्ट मुहूर्त की आवश्यकता नहीं है। साधक जब भी स्वयं को ऊर्जाहीन, तनावयुक्त अनुभव करे तो इस साधना को सम्पन्न कर अपने आपको नवीन ऊर्जा से आपूरित कर सकता है।

 

किन्नरी साधना विधान में किसी विशेष सामग्री की आवश्यकता नहीं है लेकिन पुरुष साधक हों तो पीली रेशमी धोती और स्त्री साधिका हों तो पीले रंग की रेशमी साड़ी तथा पीले रंग की ही कन्चुकी पहन कर बालों को खुला रखें और इत्र आदि से अपने को सुगन्धित कर लें। दिशा दक्षिण के अतिरिक्त कोई भी हो सकती है।

 

अपने सामने चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर उस पर गुरु चित्र/विग्रह/यंत्र/पादुका स्थापित कर लें और किन्नरी साधना में सफलता एवं आशीर्वाद हेतु गुरुदेव निखिल को दोनों हाथ जोड़कर प्रार्थना करें –

 

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्‍वरः।
गुरुः साक्षात् पर ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

 

निखिल ध्यान के पश्‍चात् गुरु चित्र/विग्रह/यंत्र/पादुका को जल से स्नान करावें –

 

ॐ निखिलम् स्नानम् समर्पयामि॥

 

इसके पश्‍चात् स्वच्छ वस्त्र से पौंछ लें निम्न मंत्रों का उच्चारण करते हुए कुंकुम, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, धूप-दीप से पंचोपचार पूजन करें –

 

ॐ निखिलम् कुंकुम समर्पयामि।
ॐ निखिलम् अक्षतान समर्पयामि।
ॐ निखिलम्  पुष्पम् समर्पयामि।
ॐ निखिलम् नैवेद्यम् निवेदयामि।
ॐ निखिलम् धूपम् आघ्रापयामि, दीपम् दर्शयामि।                       (धूप, दीप दिखाएं)

 

अब तीन आचमनी जल गुरु चित्र/विग्रह/यंत्र/पादुका पर घुमाकर छोड़ दें। इसके पश्‍चात् गुरु माला से गुरु मंत्र की एक माला मंत्र जप करें –

 

ॐ परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः

 

इस प्रकार पंचोपचार गुरु पूजन सम्पन्न करने के पश्‍चात् पीले वस्त्र पर गुरु चित्र के सम्मुख ही एक तांबे के पात्र में कुंकुम से ‘अष्ट किन्नर्यै नमः’ लिखकर अष्ट किन्नरी यंत्र स्थापित करें जिसका तात्पर्य है कि मृगाक्षी अपनी अष्ट शक्तियों के साथ आह्वाहित और मुझमें समाहित हो। इसका पूजन पुष्प की पंखुड़ियों, अक्षत एवं सुगंधित इत्र से करें तथा निम्न मंत्र का एक सौ आठ बार उच्चारण करते हुए केशर की एक सौ आठ बिन्दियों को इस यंत्र पर लगाएं, इसके लिए आप सौन्दर्य माला का प्रयोग कर सकते हैं, अथवा यदि आपके पास पहले से कोई मंत्र सिद्ध और बिना प्रयुक्त की हुई स्फटिक माला पड़ी हो तो उसका प्रयोग भी कर सकते हैं। दाहिने हाथ से मंत्र जप करते हुए धीमे क्रम में बाएं हाथ की अनामिका से केशर की बिन्दियां यंत्र पर लगाते रह सकते हैं। घी का दीपक पूरे साधनाकाल में अवश्य ही जलते रहना चाहिए। यह साधना 7 दिनों की है। प्रतिदिन साधना के उपरान्त यंत्र एवं माला को वहीं स्थापित रहने दें तथा उसे किसी स्वच्छ वस्त्र में ढंक दें।

 

मंत्र
॥ ॐ मृगाक्षी अप्सरायै वश्यं कार्य सिद्धयै फट् ॥

 

प्रतिदिन एक माला अर्थात 108 बार उच्चारण करने के साथ-साथ अंतिम दिन अर्थात् साधना के सातवें दिन इस मंत्र की 11 माला मंत्र जप करना है। अतः उस दिन साधना में एकाग्र होकर सावधानी पूर्वक बैठें, वातावरण को सुगंध से भर दें और पूजा स्थान पर सुगंधित पुष्पों का आसन बना कर उस पर यंत्र स्थापित करें।

 

साधना पूर्ण होते-होते कमरे में सुगन्ध बढ़ने का अहसास हो सकता है या प्रकाश बढ़ता दिख सकता है या नूपुर ध्वनि सुनाई देना आरम्भ हो जाती है और ठीक यही समय है मृगाक्षी से वचन लेने का उसे जीवन भर अपनी प्रेमिका, अपनी सहचरी बना कर रखने का।

 

इस प्रकार यह जीवन की परिवर्तनकारी साधना सम्पन्न होती है और आधार बन जाती है आगामी साधनाओं की सफलता, का क्योंकि जहां ऐसी श्रेष्ठ किन्नरी का साहचर्य हो वहीं प्रेम की कोमलता है, फिर वहीं यौवन की चमकती बिजली जैसी तीव्रता है और जो आधार है किसी भी साधना या विद्या को प्राप्त कर लेने का।

 

अद्वितीय आचार्य धन्वन्तरी द्वारा प्राप्त, एवं अनुभूत यह पद्धति सौ टंच खरी तथा प्रामाणिक है ही।

 

साधना सामग्री – 430/-

Shiva Kalpa – Sadhana Festival – 28 January 2017 to 12 March 2017

Let the body be absolutely fit…

filled gracefully with Youth …

 

Rejuvenation of the body is possible

Composed by Sage Dhanvantari

Mrigaakshi Roop Garvita

Kinnari Sadhana

Sadhana to juice up the beauty of life to Perfection

One of the main Shaktis of Aadya Shakti Parvati is the – Kinnari, who is perfect in form, beauty and vitality; and transforms the Sadhaks of Shiva – Shakti after accomplishment.

Sage Dhanvantari, the great ascetic, supremely wise in Yogic knowledge, had the ability to treat all types of diseases. But one worry was slowly consuming his all thoughts, that his life was ageing with the passage of time. The Youth was getting over and old age was rapidly approaching. This was eroding interest in life, he had become a great chemist and pharmacist, but he was unable to sap the vital-juices of life. One day he fell asleep while contemplating in disappointment, with his mind full of worries. Lord Sadashiva transmitted a message in the dream. I am Rasheshwar, you have to attain perfection in vital-life juices, and Mrigaakshi Roop Garvita Kinnari can help you in transforming these vital juices. He got up with a jerk, and understood God’s message. He successfully accomplished the unique Mrigaakshi Roop Garvita Kinnari Sadhana, and this started the path of ever-youth in life.

 

The beauty of Kinnari … as cool as the snow lying on the tree in winter season, her simple innocent face yielding a soft touch pleasant to the eyes. One can only see naivety and innocence in those large staring black eyes. Her beauty is stable and calming, different from the glitzy glamorous form of the Apsara nymphs… Only a reflection of love is visible in that quiet face, full of innocence and calm, free from any excitement, liberated from levity, away from passions and fervour. Instead of sharp features of nymphs, the face of Kinnaris is full of softness, as tender and delicate as her limbs, in all forms, oval or round, rosy cheeks, softness in the eyes… manners dissolved in decency, the soft humming from the lips murmuring the sweet music notes of life full of kindness.

 

The beauty of Roop Garvita

Such is Mrigaakshi Roop Garvita. Proud of Her beauty, of the kind qualities in Her heart, and of Her femininity, a pride free from haughtiness or arrogance, a pride signifying Her femininity, ability to complete the masculinity, capable to bestow love-kindness from Her heart, a pride brimming with its intensity, whose sweet notes dissolve in the ears, reassuring the life. When she gets infatuated with the intoxication of Her own youth, in the light of Her own beauty, sparkling with the light aura and loving laughter of Her own creation, spreads Her laughter all around, losing Herself completely within, then hundreds of lights lit up even on the darkest of nights, reminding of the light-festival Diwali, the Mrigaakshi who has descended upon the earth, to spread excitement, energy and enthusiasm all around the life, mind full of laughters. Perfect neatly arranged white teeth like pomegranate seeds, surrounded with the graceful soft cheeks, without any metaphor. This is just a little glimpse of Her beauty, as described in ancient texts. The five-arrows of Kaamdev are useless as they cannot compare to Her hypnotic attractive laughter, which even confuses the sages, giving an illusion of a sweet note emanating from a perfect musical instrument. They cannot imagine, cannot believe that such sweet musical notes can emanate out of a female form as well.

 

Sweet Melody of Music

Adorned with yellow lustrous silky garments, shapely limbs, attractive captivating form, this Roop Garvita of medium height, bells enhancing Her jewellery … ankle bells in the legs, or waist bells in the waist or bells in the hair-braids, the ornaments trying to conceal the overflowing beauty… the captivating notes from her body drowning out these ornaments, such is Roop Garvita … Even the beauty forgets its own definition and takes inspiration, surprised and frozen, from the very form of Mrigaakshi.

 

How to Rejuvenate

Therefore, even masters like Dhanvantari Aacharya got compelled, to imbibe such heavenly beauty within their lives, to perfect the scriptures. Even after researching and composing the entire medical encyclopaedia, he could not find a method, which could, transform him at a single step. Something which could re-energize his tiring limbs and senses. Because, the entire science of medicine is useless in absence of the youth. A body may be healthy, but it is completely useless if it is bereft of the waves of youthfulness, if it has lost all desires to obtain anything, or to make someone your own… And Dhanvantari was unable to identify such a method, and so was unable to become the supreme master of the medical science. He had tried out various types of herbs, concoctions, mixtures with different kinds of experiments, but none of these methods showed promise to become the solution-cure. And then, he received this Sadhana process. He was not expecting to find a solution to this medical science problem in the spiritual Sadhanas, to obtain stunning Youth – the mystery which is embedded within the captivating form of Mrigaakshi Roop Garvita, the source of the youthful vibrations for the mind and the body. And truth be told, how can the youthful spirit arise in the old-tired bones, without meeting or embracing this beauty. Master Aacharya Dhanvantari got energised upon meeting Mrigaakshi Roop Garvita, and he achieved perfect solution to the medical problem.

 

Sadhana Sootra of Dhanvantari

He was an accomplished Aacharya Master, not only of medical sciences, but also of spiritual Sadhana realms. He researched and found a new method to control Mrigaakshi Roop Garvita. In reality, Mrigaakshi Herself got attracted towards this Master of the era, and this Sadhana resulted from this divine fusion. This made it very easy for future Sadhaks, to fulfil their desire to rejuvenate the life. To compose something new with partnership of this beauty. This is not an average Apsara nymph or Kinnari Sadhana, rather this is the most excellent, foundation of beauty, adorned with Roop Garvita title, to imbibe within the life.

 

You should perform, this Youthful Sadhana

This Sadhana can be performed on any day during the Shiva Kalp (January 28, 2017 to March 12, 2017). Each day of Shiva Kalp is suitable to perform Shiv Sadhana. This Sadhana of Lord Shiva along with His Shivaa Shakti Kinnari can be performed only in the evening after sunset. There is no need of any auspicious muhurath to perform this Kinnari Sadhana. The Sadhak can energise his self with youthful radiance whenever he feels berefit of energy or full of worries.

There is no need of any special Sadhana materials for Kinnari Sadhana, but men Sadhaks can wear Yellow silk dhoti and women Sadhaks can wear Yellow silk sari and Yellow upper garments. The hairs should be left untied and one should use perfume to enhance body fragrance. You should sit facing any direction except South direction.

Spread a yellow cloth on a wooden board in front and set up Guru Picture/ Guru Statue/ Guru Paaduka/ Guru Yantra. Meditate on the divine form of Gurudev Nikhil with folded hands to pray for success and blessings in the Kinnari Sadhana-

GururBrahmaa GururVishnuH Gururdevo MaheshwaraH |

GuruH Saakshaat Par Brahmaa Tasmei Shree Guruve NamaH ||

 

Bathe the Guru Picture / Statue/ Yantra / Paduka with water after Nikhil meditation –

Om Nikhilam Snaanam Samarpayaami ||

 

Then wipe with a clean cloth. Perform Panchopchaar worship-poojan with Kumkum (Vermilion), Akshat (Unbroken rice), Pushpa (Flowers), Neivedh (Sweets/Fruit offering), Dhoop (Incense) – Deep (Lamp); chanting following mantras –

Om Nikhilam Kumkum Samarpayaami ||

Om Nikhilam Akshtaan Samarpayaami ||

Om Nikhilam Pushpam Samarpayaami ||

Om Nikhilam Neivedhyam Nivedayaami ||

Om Nikhilam Dhoopam Aardhyaapayaami, Deepam Darshayaami ||

(Show Dhoop, Deep)

 

Now rotate three Achmaani (spoonful) water around the  Guru Picture / Statue/ Yantra / Paduka and drop it on ground. Then chant 1 rosary-round of Guru Mantra with Guru Mala –

Om Param Tatvaaya Naaraayanaaya Gurubhayo Namah

 

After completing Panchopchaar Guru poojan, place a copper plate on the yellow cloth near Guru picture. Write “Asht Kinnaryei NamaH” with kumkum and setup Asht Kinnari Yantra, to invoke Mrigaakshi to come and assimilate within the self. Perform its poojan with flower petals, Akshat and scented-perfume. Place a mark of Kesar (Saffron) One Hundred Eight times on the Yantra while chanting the following Mantra One Hundred Eight times. You may use Soundarya Mala for this purpose. If you have any old Mantra-consecrated but unused Sfatik Mala, then you can also utilize that Mala for this purpose. Chanting the Mantra with right hand, keep making the mark on the Yantra with the ring-finger of left hand slowly. The ghee lamp should continue to be lit throughout the entire Sadhana duration. This is a seven day Sadhana. After completing of the day Sadhana, leave the Yantra and Mala in the worship place, and cover them with a clean cloth.

 

Mantra

||Om Mrigaakshi Apsaraayei Vashyam Kaarya Siddhayei Phat ||

 

After chanting 108 times daily, on the last day i.e. on the seventh day, you also need to chant 11 mala (rosary-rounds) of this Mantra. Sit carefully with full concentration on that day and fill the air with aroma of scented perfume. Make a seat of scented flowers on the worship-place and place the Yantra on this seat.

You may feel a surge in the scented-aroma or an increase in light or hear musical notes of the anklets, while completing the Sadhana. This is the most appropriate time to get Mrigaakshi to promise to stay with you throughout your life as your lover, as your companion.

Thus this spiritual life transformational Sadhana gets accomplished, and it becomes the foundation-base for future Sadhanas, because the companionship of such beautiful Kinnari brings in the softness of love, leading to lightening flash youth, which is the main basis to obtain success in any Sadhana or to acquire any type of knowledge.

This Sadhana procedure, obtained from Aacharya Dhanvantari is unique, special, correct and hundred percent authentic.

Sadhana Materials – 430/-

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