Jeevan Vijay Siddhi – Ashvamedha Viraat Diksha

विशेष ऐतिहासिक क्षण
जब आपका नवीन भाग्य लेखन होगा
जीवन विजय सिद्धि
अश्‍वमेघ विराट् दीक्षा
आरोग्यधाम दिल्ली
27-28 दिसम्बर 2014

 

सामान्य यज्ञ से सहस्त्र गुणा विशाल आयोजन अश्‍वमेघ यज्ञ होता है। यह आयोजन अत्यन्त विराट स्तर पर सम्पन्न किया जाता है।

 

राम के पूर्वज राजा दिलीप ने भी एक बार निश्‍चय किया कि मैं सौ अश्‍वमेघ यज्ञ सम्पन्न करूंगा। मेरी पूरी प्रजा इस यज्ञ में भाग लेगी। आर्यावर्त के सभी राजाओं को आमंत्रित करूंगा।

 

अश्‍वमेघ यज्ञ के बारे में यह गलत धारणा है कि इसमें राजा अपने यज्ञ हेतु एक अश्‍व और अपनी सेना को स्वतंत्र विचरण के लिये भेज देेता था और जो भी उसका विरोध करता उसके साथ युद्ध कर उसे अपने अधीन कर लिया जाता था।

 

 वास्तव में अश्‍वमेघ यज्ञ द्वारा अपने सभी मित्र राजागणों को व्यक्तिगत रूप से आमंत्रित किया जाता है और इसके लिये एक अश्‍व के साथ जो कि राजा का प्रतीक होता है विशेष राजपुरुष भेज दिये जाते थे।

 

इस प्रकार अश्‍वमेघ यज्ञ मैत्री, शांति और सहयोग का विशाल आयोजन होता था।
इस प्रकार राजा दिलीप ने अपने निश्‍चय अनुसार 99 बार यज्ञ आयोजन सम्पन्न किया और पूरे आर्यावृत्त को एकीकृत कर दिया।

 

जब 100 वां यज्ञ प्रारम्भ हुआ तो राजा दिलीप को मन ही मन आभास हुआ कि इस बार कुछ न कुछ बाधाएं अवश्य आयेगी। उन्होंने अपनी बुद्धि के अनुसार सारी बाधाओं पर विजय प्राप्त की। इसी यज्ञ के दौरान एक विचित्र घटना हुई, राजा का प्रतीक अश्‍व एकाएक गायब हो गया।

 

उस अश्‍व के बिना यज्ञ पूर्ण हो नहीं सकता था। इस स्थिति में राजा दिलीप के पुत्र राजकुमार रघु ने घोड़े की खोज करने का निर्णय लिया और अंततः उन्होेंने पाया कि देवराज इन्द्र ने अयोध्या के इस अश्‍व को चुरा लिया है।

 

अब प्रश्‍न उठता है कि इन्द्र ने अश्‍व क्यों चुराया और उसको अश्‍वमेघ यज्ञ की चिन्ता क्यों थी?

 

उस समय तक देवराज इन्द्र ही ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने सौ अश्‍वमेघ यज्ञ पूर्ण किये थे। इसीलिये उन्हें ‘शत् कृतु’ कहा जाता था। इन्द्र ने विचार किया कि यदि राजा दिलीप ने अपने 100 यज्ञ सम्पन्न कर लिए तो राजा दिलीप भी ‘शत् कृतु’ कहलाने लग जायेंगे। इन्द्र नहीं चाहता था कि यह पदवी किसी ओर को भी प्राप्त हो। वे अपने आप में अद्वितीय बने रहना चाहते थे। इसीलिये इन्द्र ने अश्‍वमेघ यज्ञ का प्रतीक अश्‍व चुरा लिया था।

 

इस बात को जानकर राजकुमार रघु को अत्यन्त क्रोध आया और उन्होंने निश्‍चय किया कि मैं राज्य के प्रतीक इस अश्‍व को पुनः अयोध्या अवश्य लाऊंगा चाहे इसके लिये मुझे इन्द्र से साक्षात् युद्ध ही क्यों न करना पड़े।

 

वे इन्द्र के समक्ष उपस्थित हुए और इन्द्र को युद्ध के लिये ललकारा
राजकुमार रघु तो इन्द्र की उम्र और उनके अनुभव की अपेक्षा बहुत ही छोटे थे, उनका अनुभव, योग्यता और युद्ध कला भी सीमित थी लेकिन स्वाभिमान बहुत अधिक था। वे किसी भी कीमत पर अपना अश्‍व वापिस चाहते थे। पहले तो देवराज इन्द्र को बहुत अधिक क्रोध आया कि एक छोटा सा राजकुमार कैसे मुझे युद्ध के लिये ललकार रहा है। इन्द्र ने अपनी पूर्ण शक्तियों के साथ राजकुमार रघु को जीतने का प्रयास किया लेकिन रघु ने हार नहीं मानी। कई बार उन्हें युद्ध में धराशाही होना पड़ा लेकिन पुनः पूर्ण शक्ति के साथ उठ खड़े हुए। इस पर इन्द्र ने सोचा कि मैं सामान्य युद्ध द्वारा रघु को नहीं जीत सकता हूं, तब उन्होंने अपने सर्वाधिक प्रभावशाली अस्त्र वज्र का प्रयोग किया लेकिन इस वज्र युद्ध का भी रघु पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

 

कई वर्षों तक यह युद्ध चलता रहा, धीरे-धीरे राजकुमार रघु की युद्ध क्षमता देखकर इन्द्र उसे चाहने लगे। इन्द्र ने कहा कि – राजकुमार तुम मुझसे यह युद्ध जीत नहीं सकते हो लेकिन मैं तुम्हारी वीरता और स्वाभिमान से बहुत प्रभावित हूं। मैं तुम्हें वरदान देना चाहता हूं, तुम मुझसे जो कुछ चाहते हो मांगो, बस केवल यह अश्‍व मत मांगो।

 

रघु ने तत्काल उत्तर दिया कि – हे इन्द्र देव! मैं आपके वरदान का आभारी हूं। आप मुझे अश्‍व वापिस न दें तो यह आपकी इच्छा है लेकिन मैं वरदान के रूप में यह मांगता हूं कि मेरे पिता को सौ अश्‍वमेघ यज्ञ का पुण्य प्राप्त हो।

 

वास्तव में राजकुमार रघु का यह उत्तर एकदम सटीक था, रघु ने तत्काल निश्‍चय कर लिया कि  – तात्कालिक लाभ आवश्यक नहीं है, लक्ष्य प्राप्ति आवश्यक है और लक्ष्य प्राप्ति है अश्‍वमेघ यज्ञ का पुण्य।

 

इन्द्र ने वरदान दे दिया और राजा दिलीप को सौ अश्‍वमेघ यज्ञ के पुण्य का फल प्रदान कर दिया। राजकुमार रघु अपने पिता के पास वापिस आये। सामान्य रूप से देखा जाए तो रघु इस युद्ध में हार गये लेकिन यह हार कोई मायने नहीं रखती। रघु ने अपना पूर्ण प्रयत्न किया और उस लक्ष्य को ध्यान रखा जो आवश्यक है।

 

तात्कालिक असफलता को भी स्वीकार किया। इसलिये कि तात्कालिक असफलता में ही आगे की लक्ष्य सिद्धि प्राप्त की जा सकती है।

 

वास्तव में अश्‍वमेघ की क्रिया सम्मान, प्रतिष्ठा, यश को स्थापित करने की क्रिया है। संसार का सारा धन भी प्रतिष्ठा के ही अधीन है। प्रतिष्ठा जीवन का परमतत्व है। राजकुमार रघु वरदान में इन्द्र से उसका राज्यपद भी मांग सकते थे लेकिन उन्होंने यज्ञ के लाभ का वरदान मांगा। जीवन में हार-जीत का महत्व नहीं है। प्रतिष्ठा प्राप्त होने पर जीत तो निरन्तर मिलती ही रहती है। रघु ने भी यही विचार किया कि मुझे और मेरे पिता को आर्यावर्त में प्रतिष्ठा प्राप्त करनी है। उन्हें इन्द्र के पद का कोई लोभ नहीं था। इसीलिये उन्होंने इस जीवन यज्ञ की पूर्णता का फल मांगा।

 

त्रेता युग की घटना आज के इस जीवन में भी बिल्कुल सही है। हमें तीन प्रश्‍नों का नित्य उत्तर देना पड़ेगा।

 

  1. क्या सही है और क्या गलत है?
  2. यदि मैं सही हूं और दूसरा पक्ष गलत है तो क्या उसके लिये मुझे संघर्ष करना चाहिए? या मैं दूसरे व्यक्ति को तात्कालिक तर्क में तो जीतने दूं क्योंकि मेरे जीवन का लक्ष्य और भी अधिक बड़ा है और मैं उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये अपने आपको केन्द्रित करूं।
  3. यदि मैं गलत हूं और दूसरे सही हैं तो क्या मुझे अपनी गलतियां मान लेनी चाहिए जिससे मैं अपने लक्ष्य की ओर पुनः केन्द्रित हो सकूं।यह हमें विचार करना है कि हमारे लिये तत्कालिक लाभ अथवा तत्कालिक हानि आवश्यक है अथवा जो हमारा लक्ष्य है उसे प्राप्त करने की ओर ध्यान देना ज्यादा आवश्यक है।राजकुमार रघु ने भी विचार किया कि – मेरे लिये आवश्यक है कि मेरे पिता अश्‍वमेघ यज्ञ सम्पूर्ण करें। राजकुमार रघु की तीव्र बुद्धि और निर्णय लेने की क्षमता के कारण आगे राजा दिलीप के कुल को रघुकुल कहा गया और एक समय पर भगवान राम ने यह वचन दोहराया कि –
रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाये पर वचन न जाये।
आगे इसी वंश में रघु महाराज बने और उन्होंने अपने कुल के नीति नियम, मर्यादाएं बनाईं।

 

कालान्तर में यही घटना पुनः दोहराई गई तब गुरु विश्‍वामित्र ने राम को कहा कि ‘तुम्हें अपने कुल की मर्यादा का पालन करते हुए भी जो कार्य महाराज दिलीप और रघु सम्पन्न नहीं कर सके वे कार्य तुम्हें सम्पन्न करने हैं। राजकुमार रघु को तो इन्द्र ने वचनों में बांध लिया था, लेकिन तुम अब स्वतंत्र हो, अब जीवन में किसी भी प्रकार के छल का शिकार मत होना। तुमने अपने जीवन में कैकयी का छल देखा है, लंका नरेश रावण का छल देखा है। तुमने रावण को समाप्त भी कर दिया है, तुम विजयी बन गये हो लेकिन तुम्हारे जीवन की यात्रा अभी पूर्ण नहीं हुई है। ’

 

ॠषि विश्‍वामित्र के कालजयी वचन थे – ‘तुम्हें छल, पराजय को समाप्त कर विजय की यात्रा करनी है और एक बार विजय प्राप्त कर संतोष नहीं कर लेना है। विजय से आगे जय की यात्रा करनी है।

 

विश्‍वामित्र के वचनों का अर्थ था संसार में प्रत्येक मनुष्यों को अपने पराजय का भाव भुलाकर बाधाओं पर विजय प्राप्त करनी है लेकिन उससे भी आगे विजय के भाव को स्थाई रखने के लिये जय की यात्रा अर्थात् सम्मान, यश, प्रतिष्ठा प्राप्त करना है। असली विजय लोगों का मन जीत लेने में है। यशस्वी व्यक्ति को ही संसार में अमर कहा गया है।

 

यह ॠषि विश्‍वामित्र का ही शक्ति प्रवाह था जो राम के मनोमस्तिष्क में प्रवाहित हुआ और उन्होंने अश्‍वमेघ यज्ञ को सम्पूर्ण किया।

 

केवल विश्‍वामित्र ने ही जीवन संघर्ष, सफलता, जय-विजय के बारे में आह्वान नहीं किया, आगे भी गुरुओं ने अपने-अपने विचार और भावनाएं अपने शिष्यों को प्रदान कीं।

 

इतिहास साक्षी है कि महाभारत युद्ध में पांडवों को तात्कालिक जीत तो अवश्य प्राप्त हुई लेकिन उनका यश-सम्मान, प्रतिष्ठा और गौरव समाप्त हो गया था तब कृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को कहा कि युद्ध में विजय प्राप्त करने से कुछ भूमि जीत लेने से तुम संसार में यशस्वी नहीं बन सकते हो। यदि तुम्हें पूरे आर्यावर्त में यश प्राप्त करना है तो अश्‍वमेघ क्रिया सम्पन्न करनी होगी।

 

अश्‍वमेघ क्रिया धन-वैभव-सुख से बहुत आगे सम्मान प्राप्त करने की क्रिया है। अश्‍वमेघ क्रिया भौतिक पक्ष की पूर्णता से आगे आध्यात्मिक पक्ष में भी पूर्णता प्राप्त करने की क्रिया है।

 

अश्‍वमेघ क्रिया द्वारा ही जीवन में परमशांति, संतोष और आनन्द प्राप्त हो सकता है।
आप जानते ही हैं कि धर्मराज युधिष्ठिर को पांडवों सहित आज भी आदर के साथ सम्मान दिया जाता है उनकी यशगाथा इतिहास में युगों-युगों तक गाई जाती रहेगी।
अब प्रश्‍न उठता है कि प्रत्येक मनुष्य लघु से विराट की ओर क्यों नहीं सोचता है वह अपने जीवन में छोटी-मोटी विजय के बारे में ही क्यों सोचता है? उसके जीवन में केवल धन प्राप्ति का ही लक्ष्य क्यों होता है? उसके जीवन में धन के साथ-साथ पूर्णता प्राप्त करने का लक्ष्य क्यों नहीं होता?

 

मेरे विचार से इसका एकमात्र कारण है कि सभी व्यक्ति गुरु के विचारों को पूर्ण रूप से आत्मसात् नहीं करते हैं, वे गुरु के सामने उपस्थित होकर भी अपने सांसारिक जीवन की छोटी-मोटी बाधाओं का समाधान पूछते हैं।

 

जिन शिष्यों ने गुरु द्वारा प्रदत्त विचार और शक्ति को ग्रहण कर लिया वे इतिहास में यशस्वी हो गये, अमर हो गये। बाकी सब इतिहास की गर्त में समाप्त हो गये।
इस जीवन संघर्ष के बारे में प्रत्येक मनुष्य को विचार करना आवश्यक है।
इस सम्बन्ध में कुछ विशेष विचार, सुक्तियां इस प्रकार हैं –
  1. संघर्ष के समय मजबूत बनना आवश्यक है, भय के समय बहादुर बनना आवश्यक है और जीत के समय नम्र बनना आवश्यक है।
  2. विजय उन्हीं के लिये सुरक्षित हैं जो संघर्ष द्वारा इसका मूल्य चुकाने के लिये तैयार हैं।
  3. जिन्हें बिना संघर्ष जीत मिलती है, उनके लिये यह केवल जीत होती है और जिन्हें संघर्ष के बाद सफलता मिलती है वे इतिहास पुरुष बन जाते हैं।
  4. यदि आप अपने शत्रु को पहचानते हैं और उसके साथ ही अपने आपको भी पहचानते हैं तो हजार संघर्षों के परिणाम से भी डरने की आवश्यकता नहीं है। अपने आपको पहचानो और अपनी बाधा और शत्रु को भी पहचानो।
  5. पहली जीत के बाद विश्राम मत करो, दूसरी जीत के लिये अपने आपको तैयार करो, अन्यथा लोग यही कहेंगे कि आपको पहली जीत भाग्यवश ही मिल गई।
  6. संघर्ष में किसी भी समय आपको असफलता मिलती है, तो आप यह जानिये कि आप सफलता के और नजदीक हैं।
  7. संघर्ष का दर्द, अस्थाई भाव है वह तो चला जाता है लेकिन सफलता का स्वाद जीवन भर रहता है।
  8. बिजलियों का भय त्यागे बिना कोई वृक्ष ऊंचा नहीं हो सकता है।
  9. प्रयत्न करने पर असफलता मिल सकती है, लेकिन प्रयत्न न करने की असफलता और भी अधिक बड़ी हो जाती है।

गुरु ही प्रदान करते हैं शक्ति

संसार में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं हुआ हैं, जिसके जीवन में बाधाएं नहीं आई हों। यह सभी जानते हैं कि हर व्यक्ति को संघर्ष करना ही है। संघर्ष के समय मजबूत बनना आवश्यक है लेकिन यह मजबूती कौन दे सकता है? सफलता के समय आपके हजार सहयोगी हो सकते हैं, आपकी सफलता में आपके मित्र, सम्बन्धी परिवार के सदस्य सभी अपनी-अपनी दावेदारी बताते हैं लेकिन संघर्ष के समय आपके पास केवल और केवल एक ही शक्ति रहती है और वह शक्ति है, ईश्‍वरीय शक्ति और गुरु जो इस ईश्‍वरीय शक्ति का प्रतिरूप हैं।

 

गुरु के मन के संकल्प से ही शिष्य में शक्ति जाग्रत होती है। शिष्य में इस शक्ति जागरण के लिये, गुरु के मन में शिष्य के कल्याण का ही भाव होता है। गुरु के संकल्प अनुसार शक्ति बाहर प्रवाहित होती है और शिष्य की चित्त शक्ति से संयोग में आती है। यह सारी क्रियाएं अत्यन्त ही सूक्ष्म स्तर पर घटित होती हैं। शक्ति के इस आवागमन को गुरु द्वारा शक्ति प्रदान करना और शिष्य द्वारा शक्ति ग्रहण करना केवल गुरु और शिष्य ही आपस में समझ सकते हैं। इन भावों को पास बैठा तीसरा व्यक्ति भी समझ नहीं पाता। यह सब क्रिया जो गुरु के मन के संकल्प से होती है। उसे ही दीक्षा कहा जाता है। यह दीक्षा स्पर्श से, वाणी से, दृष्टि से भी दी जाती है। लेकिन हर स्थिति में संकल्प अवश्य रहता है, हर शिष्य का गुरु के साथ एक अलग शक्ति प्रवाह का सम्बन्ध रहता है।

 

जब शिष्य इस प्रकार की शक्ति तत्व दीक्षा ग्रहण करता है तो यह शक्ति जाग्रत होकर अन्तर्मुखी क्रिया प्रारम्भ कर देती है तब शिष्य के भीतर संचित संस्कार जो उसे कई प्रकार के विघ्न, बाधाएं, कठिनाइयां, समस्याएं देती हैं, अपने आप क्षीण होना प्रारम्भ कर देती हैं। विषयों के प्रति चित्त का आकर्षण हट कर शक्ति के प्रति आन्तरिक आनन्द के प्रति शिष्य का आकर्षण बढ़ने लगता है और वह एक विशिष्ट आन्तरिक शक्ति अनुभव करने लगता है। जगत के झंझट उसे छोटे लगने लग जाते हैं।

 

देखने में गुरु और शिष्य अलग-अलग हैं लेकिन वास्तव में गुरु अपने शिष्य को अभिन्न मानते हैं। वे अपने ही आत्मा और ज्ञान का विस्तार शिष्य में व्याप्त करते हैं। इस संसार में प्रत्येक व्यक्ति थोड़ा बहुत सुख कहीं न कहीं से प्राप्त कर लेता है लेकिन जीवन संघर्ष में विजय प्राप्ति का आनन्द तो केवल और केवल गुरु कृपा से, गुरु आशीर्वाद से ही प्राप्त हो सकता है।

 

गुरु ही शिष्य की चेतना और ज्ञान में मार्गदर्शन करता है, उसकी प्राण शक्ति को जगाता है।

 

गुुरु ही आपके असली स्वभाव का प्रतिबिम्ब है। गुुरु ही आपको अग्रसर करने के लिये मार्गदर्शक हैं, जिस क्षण तुम गुरु को अपना लेते हो, उस क्षण उनके सभी गुण प्राप्त कर लेते हो।

 

गुरु आत्म शक्ति का स्वरूप हैं

 

जब गुरु ही आपके उपाय बन जाते हैं तो आप जीवन में कभी पराजित नहीं हो सकते। याद रखिये, इस जगत में गुुरु आपके लिये ही हैं और हर अच्छे बुरे समय में आपके साथ हैं। किसी भी स्थिति में आप अकेले नहीं हैं। गुरु को खोजना नहीं है, गुरु को पाकर अपने अन्तर्मन को जगाना है। जब भाव जाग्रत हो जाता है तो शब्द छोटे हो जाते हैं। जब हृदय से गुरु से सम्बन्ध बन जाता है तो यह आत्मिक सम्बन्ध हो जाता है। संसार के सारे सम्बन्ध मन और शरीर के हैं, लेकिन गुरु के साथ सम्बन्ध आत्मिक सम्बन्ध है। गुरु तो अपनी सारी तपस्या का अंश अपने शिष्य के लिये बहा देता है, यह गुरु की करुणा है, गुरु का गुरुतत्व है, गुरु की महिमा है। गुरु कोई छोटी-मोटी वस्तुएं नहीं देता है।

 

गुरु समान दाता नहीं याचक शिष्य समान
तीन लोक की सम्पदा सो दे दिन्ही दान…
गुरु की सारी क्रियाएं ही शिष्य के लिये हैं, क्योंकि शिष्य ही गुरु का आत्म तत्व है। गुरु की विराटता में ही शिष्य समाहित है। गुरु की क्रिया तो महान् है। गुरु तो वह है जो अपने प्रत्येक शिष्य से अश्‍वमेघ की क्रिया सम्पन्न कराये। गुरु में शक्ति है, वह शक्ति अपने शिष्य के भीतर अंकुरित करना चाहते हैं। यदि एक बार अंकुरण हो गया तो इस जीवन यात्रा में अश्‍वमेघ की विराट क्रिया सम्पन्न अवश्य हो जायेगी। अपने जीवन की भूमि को श्रद्धा और समर्पण से सिंचित रखिये। उसको केवल और केवल श्रद्धा और समर्पण के द्वारा मन की भूमि को निरन्तर ऊर्वर, उपजाऊ करते रहिये। गुरु ज्ञान का बीज रोपना चाहते हैंं तो हर समय तैयार रहिये। याद रखिये कि श्रद्धा के लिये कोई कारण नहीं होता, जब हृदय से हृदय का मेल होता है तो श्रद्धा का भाव उत्पन्न होता है।

 

गुरु तो आह्वान करते हैं, जिस प्रकार कृष्ण ने अर्जुन को आह्वान किया था, विश्‍वामित्र ने राम को आह्वान किया था।
आज कोई एक नया क्षण नहीं आया है, लेकिन महत्वपूर्ण क्षण अवश्य आया है। जब गुरु का आह्वान है तो आपको रुकना नहीं है। इस जीवन में संघर्ष इसलिये करना है कि आपको विजय प्राप्त करनी है और विजय प्राप्ति के लिये कोई दूसरा आपको आकर शक्ति प्रदान नहीं करेगा। गुरु ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश स्वरूप बनकर शक्ति प्रदान कर सकते हैं।

 

एक क्षण के लिये यही विचार करना है कि आपको गुरु के पास सद्गुरु की तपस्या स्थली आरोग्यधाम अवश्य पहुंचना है। आप पराधीन नहीं हैं, स्वाधीन हैं। किसी का आपके ऊपर अधिकार नहीं है। आपका स्वयं अपने ऊपर अधिकार है। आप परतंत्र नहीं हैं, स्वतंत्र हैं।

 

अपने आपको संसार के बंधनों में रोक मत देना, जिस प्रकार नदी सारी बाधाओं को तोड़ती हुई समुद्र में जा मिलती है उसी प्रकार गुरु में समाहित हो जाना है।
गुरु ही प्रत्येक शिष्य में अश्‍वमेघ विराट् क्रिया का सूत्रपात कर सकते हैं, बीजारोपण कर सकते हैं और इसीलिये गुरुदेव ने बुलाया है। आप सभी सद्गुरु के सिद्धाश्रम के योगी हैं, इसी कारण आपने अपना सम्बन्ध सद्गुरु से जोड़ा है। अपने कर्मों को आगे बढ़ाना है। आईये 27 दिसम्बर 2014 को आरोग्य धाम दिल्ली अवश्य पहुंच जाये। गुरु का प्रत्यक्ष आशीर्वाद प्राप्त कर – जीवन विजय सिद्धि विराट् अश्‍वमेघ दीक्षा प्राप्त करें।

 

– राम चैतन्य शास्त्री
Distinctive Historic MomentsWhen your Destiny will be re-written

Jeevan Vijay Siddhi – Ashvamedha Viraat Diksha

Arogya Dham

27-28 December 2014

The organization of Ashvamedha Yaga is thousand times superior to that of normal yagya. This organization is done on a very huge scale.

King Dileep, forefather of Lord Rama, once decided to conduct hundred Ashvamedha Yagya. He wanted to involve the entire population of his kingdom into it and invite all kings of Aryavrata.

It is an incorrect myth about Ashvamedha Yagya that a king sent his army and a horse to roam freely, and conquer anyone who dared to stop the horse.

In reality, a personal invitation is sent to all friendly kings and chieftains. Distinct royalty officials accompany the horse, which is a symbol of the king.

Thus, Ashvamedha yagya was a large organization to symbolize Amity, Peace and mutual Collaboration.

King Dileep organized Ashvamedha Yagya 99 times and untied entire Aryavrat.

When the hundredth Yagya started, the king had some premonitions of upcoming troubles and problems. He resolved all the upcoming problems using his sharp mind. An exceptional incident occurred, the King’s symbol – the horse, disappeared.

The Yagya could not be concluded without the horse. Prince Raghu, King Dileep’s son initiated a comprehensive search and found that Indra, the Lord of the Gods, had stolen the horse.

Now a question arises. Why did Indra steal the horse and why was he vexed about the Ashvamedha Yagya.

Indra, the Lord of the Gods, was the only person at that time, to have successfully concluded Hundred Ashvamedha Yagyas and obtained title of “Shat Kritu”.Indra thought that King Dileep will also get “Shat Kritu” title on conclusion of hundred Ashvamedha Yagyas. He wished to remain superior and did not want anyone else to earn this unique title. So he stole the King’s symbol, the horse.

Prince Raghu became highly incensed on realizing this and decided to bring back the horse to Ayodhya, even if it entailed a war with Indra, Lord of the Gods.

He met Indra and challenged him to fight.

Prince Raghu was very young and inexperienced compared to Lord Indra. He had limited military skill, Warcraft ability and battle experience but had High Self-Confidence. He wanted to bring back the horse at any cost. Initially Lord Indra became livid when the young prince challenged him to fight. Lord Indra used all his powers to subdue Prince Raghu, but the young prince did not relent. He got defeated in multiple battles but he again resumed hostilities with full energy and strength. Ten Lord Indra recognized that He could not defeat Raghu with normal arms and armaments. So He used the most powerful and mighty Vajra Astra, but it did not have any effect on Raghu.

The war continued for many years. Slowly Lord Indra started appreciating the fighting skills of prince Raghu. He told him that – Prince Raghu, you cannot beat me in battle but I am impressed with your bravery and self-confidence. I wish to grant you a boon. You wish for anything except this horse.

Raghu immediately responded – “Hey Lord Indra! I am grateful for the boon. It is fine if you do not wish to return the horse, but I wish that my father should get the goodness and benefits of hundred Ashvamedha Yagyas.”

In reality, prince Raghu’s answer was accurate and precise. Raghu had instantly decided – Immediate gain is not important, Realization of goal is most important and the goal is – Benefits of Ashvamedha Yagya”.

Lord Indra granted the boon and King Dileep obtained benefits and goodness of conducting hundred Ashvamedha Yagyas. Prince Raghu returned back to his father. A cursory glance shows defeat of Raghu in this war, but this defeat is immaterial. Raghu tried his best and prioritized his goal, which is much more important.

He accepted current loss. The current loss leads to achievement of main goals.

The process of Ashvamedha Yagya establishes honor, esteem and fame. Respect and Esteem are the foundation of the riches of the entire world. It is the main basic essence of life. Prince Raghu could have wished for Lord Indra’s kingdom in the boon, but he requested only for benefits of the Yagya. Winning and Losing are not important in the life. The Respect and Esteem constantly drives victories. Raghu also thought that he had his father wanted to establish their esteem in Aryavrat. They were not greedy for Lord Indra’s position. So they desired for Completeness and Goodness of the Life’s Yagya.

This incident of Treta Yuga is equally relevant for us in this age and time. We have to regularly answer the three questions –

  1. What is correct and what is wrong?
  2. If I am correct and the other party is wrong, then should I struggle for my argument? Or should I let the other person win the current argument because my life Goal is much bigger and I should concentrate on achieving my life goal.
  3. If I am wrong and others are correct, then should I accept my mistakes, so that I can again resume my concentration to achievement of life goals

We have to examine if it is more significant to concentrate on accomplishment of our main life goals than worrying over current gain or current loss.

Prince Raghu also pondered – “It is imperative that my father concludes Ashvamedha Yagya. “ The sharp mind and quick decision making ability of Prince Raghu led to titling of King Dileep’s dynasty as Raghukul and even Lord Rama said – The Raghukul tenet  is perpetual, the life may pass but the promises will not.

Raghu became a king in this line and he setup values, traditions and standards for his dynasty. Similar event got repeated down the timeline, when Guru Vishwamitra advised Ram – “Continuing the traditions of your clan, you have to accomplish tasks which even King Dileep and Raghu could not complete. Prince Raghu got tied to the words of Lord Indra, but you are independent. Do not fall prey to anyone’s guile in your life. You have witnessed cunningness of Kaykei and slyness of King of Lanka, Ravana. You have killed Ravana and have become victorious, but your life journey still remains incomplete.

Rishi Vishwamitra’s words were immortal – “You have to attain victory after subduing guile and defeat, and you should not become content with one victory. You have to travel to Fame beyond Victory.

The meaning of Vishwamitra’s words was – Every human in the world has to conquer problems and troubles whilst disregarding defeats, but to retain constant victory, has to walk on road to fame i.e. honor, esteem and respect. Real victory is to win over the minds of people. Famous and Illustrious person is Immortal in this world.

This Shakti power of Rishi Vishwamitra travelled into Lord Rama, and he accomplished Ashvamedha Yagya.

Vishwamitra was not alone in discussing about life-struggles, success and victory-fame. The Gurus down the timeline have provided similar guidance and advice to their disciples.

History is witness to the fact that Pandavas won instant victory in Mahabharat War, but it consumed their honor, esteem and reputation. Then Krishna advised Dharamraj Yudhisthir that he cannot become illustrious by winning some land in a battle. He has to accomplish Ashvamedha Yagya to attain fame throughout Aryavrat.

Ashvamedha Yagya is a much superior process to realize veneration rather than wealth-luxury-happiness. This leads to progression towards spiritual totality after attaining material completeness.

One can achieve true Peace, Contentment and Joy though Ashvamedha Yagya.

You know that Dharamraj Yudhisthir is venerated and respected along with his brother pandavas. His fame will continue throughout the ages.

Now that question arises as to why every person does not think of little through Greatness. Why does he keep pondering about trivial, insignificant achievements in his life? Why is his life goal confined to attaining wealth and riches? Why does he not aim towards spiritual totality along with wealth?

I believe that the only reason for this is that all individuals do not fully ingrain Guru’s thoughts into themselves. They worry and solicit advice only about minor insignificant problems and obstacles of their life.

The disciples who imbibed Guru Thoughts and energy into themselves, became illustrious and immortal. All others died in the dust of history.

Every individual should ponder about this life struggle.

Some beliefs and opinions about this topic are:

  1. It is important to become strong during struggle, brave during fight and polite after victory.
  2. The Success is reserved for those who are willing to pay for it through struggle and toils.
  3. Those who attain success without struggle become only successful, but those who attain success after struggle become Memorable.
  4. If you fully understand your enemies and yourself, then you do not have fear the result of even thousand struggles. Know yourself and fully comprehend your obstacle and your enemy.
  5. Do not rest after initial success, prepare yourself for next success; otherwise people will opine that you were first time lucky.
  6. When you taste failure during struggle, realize that you are nearer to success.
  7. The pains of struggle are temporary and transient, but the joy of success is permanent.
  8. A tree cannot reach height without disregarding fear of lightening.
  9. One can achieve failure after trying, but the failure enlarges in absence of trials.

Guru Provides Energy

There is none in world who did not face obstacles. Everyone knows that every person has to struggle. One should be strong during struggle but who will impart this strength? Thousands can accompany you during triumph; your friends, relatives and family folks will share your successes; but during struggle only one energy is your companion. And this energy is Divine Energy, and Guru imparts this Divine energy.

Guru’s Willpower awakens the subdued energy of the disciple. Guru has kind benevolence towards the disciple to awaken disciple’s energy. This Divine energy transfers out through Guru’s will and meets disciple’s inner soul. These processes occur at infinitesimal level. This transmission of celestial energy from Guru to disciple and inculcation into disciple can only be fathomed mutually by Guru and disciple. Anyone sitting beside them will not understand these emotions. This power diffusion though Guru’s willpower is called Diksha.  This Diksha can be granted through touch, speech or vision senses. However, the divine relationship though willpower and a unique energy channel with each disciple is always present.

When the disciple ingrains such energized Diksha, then this energy stimulates and initiates spiritual process in soul. It subdues the past sanskars and karmas which were causing to obstacles, problems and troubles. The disciple starts getting enticed towards transcendent joy instead of material objects; and he starts feeling an inner heavenly energy. The problems of world look trivial.

The Guru and disciple are separate in body but the Guru considers the disciple a part of his own self. He conveys his knowledge and soul to the disciple. Every being in this world obtains small pleasures here or there; but the joy of success over the struggles of this life can only be attained through Gurudev blessings and benevolence.

Guru guides and stimulates the mind and knowledge of the disciple and awakens his inner energy.

Guru is the reflection of your own personality. Guru is always ready to guide and take you to new heights. You imbibe Guru’s personality and persona, when you make Him your own.

Guru is personification of Spiritual Energy

When Guru becomes your mentor, then you can never fail in your life. Always remember that Guru is here for you in this world, and He is with you in both good and bad times. You are never alone at any moment, in any situation. You do not have to search for Guru, you have to imbibe Him to stimulate your spiritual energy. When emotions magnify, then the words become mere trifling. The heartfelt connection with Guru becomes a relationship between souls. All other relationships in this life are connected with mind and body. Only the relationship with Guru is coupled between souls. Guru transmits parts of His Penance power to the disciple, this is Guru’s benevolence, Gurutatva, magnanimity and nobility. Guru does not give petty materials.

Guru Samaan Daata Nahin Yachak Shishya Samaan

Teen Lok Ki Sampada So De Dinahi Daan…

All of the Guru’s actions are for the disciple, because the disciple is Guru’s spiritual matter. The disciple is part of Guru’s radiance. Guru’s actions are phenomenal. A Guru is one, who gets each disciple to accomplish Ashvamedha Kriya. Guru is boundless energy, He wishes to sparkle this energy into the disciple. If it sprouts even once, then the remarkable Ashvamedha Kriya will initiate. Fill your life with trust and confidence. Make it more fertile by enhancing your trust and confidence. Guru wishes to sow seed of knowledge in this fertile life. Always be ready. Remind yourself that trust does not have any reasoning.  The trust germinates, when the hearts meet.

Guru beholds and invites, like Krishna bade Arjuna, Vishwamitra called Rama.

This is not a novel moment, but it surely is a historic and important moment. When Guru invites, then you should not stop. You need to struggle in this life to achieve success and nobody else is going to grant you energy to obtain success. Only Guru can provide energy by becoming Brahma, Vishnu and Mahesh.

You have to think for a moment that you should certainly proceed to SadGuru Tapasya Sthali Arogyadham. You are not dependent on anyone. You are fully independent and free. Nobody owns you. You yourself own yourself.  You are free and liberated.

Do not tie yourself in worldly bonds. You have to come and immerse yourself in Guru, like a river in full flow breaks all boundaries to meet the sea.

Only Guru can kindle Ashvamedha Viraat Kriya in each disciple and germinate it; and therefore He invites you. All of you are Yogis of SadGurudev’s Siddhashram, and so have linked yourself to SadGurudev. You have to enhance yourselves. Come, reach Delhi Arogyadham on 27 December 2014, definitely. Obtain Jeevan Vijay Siddhi Viraat Ashvamedha Diksha, through Gurudev’s choicest blessings.

-Ram Cheitanya Shashtri

To obtain this diksha, use the attached form and introduce 5 new people to the Nikhil Mantra Vigyan family. You can download New Year Diksha – Prapatra.
Share
error: Content is protected !!