Dhanvantri Kavach

धन्वंतरी जयंती 
17 अक्टूबर 2017

 

धन्वंतरी आरोग्य कवच
आरोग्य से अमरत्त्व का सार

 

स्वास्थ्य सम्बन्धित सर्वेक्षणों के अनुसार 30 वर्ष से अधिक उम्र के एक-तिहाई भारतीय लाइफ स्टाइल सम्बन्धित बीमारियों से ग्रस्त हैं, सीधे-सादे शब्दों में कहें तो ब्लड़-प्रेशर, कैंसर, थॉयरॉयड़ आदि ऐसी बीमारियां हैं। जिस देश में वेदों ने ‘सर्वे सन्तुनिरामयाः’ का सत्य घोष किया है, वहां पर स्वास्थ्य सम्बन्धित ऐसा सर्वे निःसंदेह एक भयावह तस्वीर प्रस्तुत करता है। उपाय क्या है जिसके द्वारा हम सब पूर्ण आयु को प्राप्त करें, क्रियाशील रहें और धर्म के मार्ग पर प्रवृत्त हों?

 

स्वस्ति वाचन में एक सुन्दर श्‍लोक है-

 

भद्रं कर्णेभिः श्रुणुयाम देवाम् भद्रं पश्येमक्षभिर्यजत्राः।
स्थिरैरङ् गैस्तुष्टुवाम् सस्तनूभिर्व्यशेम ही देवहितम् यदायुः॥

 

हमारे कान अच्छा सुनें, हमारे नेत्र अच्छा देखें, हम अपनी आंखों से मंगलमय घटित होते देखें, निरोग इन्द्रियों एवं स्वस्थ देह के माध्यम द्वारा ब्रह्मा द्वारा प्रदत्त सौ वर्ष की आयु प्राप्त करें।

 

हमारे जीवन की यात्रा आरोग्य से अमरता की ओर बढ़ने की यात्रा है। स्वस्थ शरीर में ही उर्जावान मन बसता है और इन्हीं के मेल से कार्य किए जाते हैं, पर आजकल तो बीमारियों का बोलबाला हो गया है, जितना ज्यादा इलाज के मापदण्ड बढ़ते गए उतना ही मर्ज बढ़ता गया। छोटे-छोटे बच्चों को भी बड़ी-बड़ी बीमारियां होने लगी हैं।

 

निःसन्देह एलोपैथी में बीमारियों का उपचार नहीं होता है, सिर्फ मर्ज से जुड़े चिन्ह दबाए जाते हैं। शरीर तो समय  के साथ अपनी आंतरिक रोग-प्रतिरोधात्मक शक्ति के बल पर अपने आप स्वस्थ हो जाता है।

 

बीमारियों का वास्तविक इलाज आयुर्वेद में है, जो सैकड़ों वर्षों पुराना विज्ञान है। आयुर्वेद दो शब्दों के मेल से बना है, आयुः+वेद। इसे प्राणों का वेद भी कहते हैं और पुराणों के अनुसार आयुर्वेद के प्रवर्त्तक भगवान धन्वंतरी हैं। इनका आविर्भाव कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को हुआ, जिसे धन त्रयोदशी भी कहा जाता है।

 

भगवान धन्वंतरी से संबंधित रोचक तथ्य

 

1.  भगवान धन्वंतरी की उत्त्पत्ति समुद्र मंथन के समय हुई थी अमृत-कलश लिए भगवान धन्वंतरी समुद्र मंथन के बाद अवतरित हुए। निःसन्देह भगवान धन्वंतरी दीर्घायु और अमरता का वरदान देते हैं, अर्थात् उनके आशीर्वाद से स्वस्थ शरीर के साथ आप अमरत्त्व के पथ पर आगे बढ़ते हैं।
2.  भगवान धन्वंतरी श्रीविष्णु के अंश हैं और उनका नाम लेने मात्र से रोगों का अंत हो जाता है। जैसे कुबेर देवताओं के खजांची हैं, वैसे ही धन्वंतरी देवताओं के चिकित्सक हैं और उन्हें बुढ़ापे से और अन्य बीमारियों से दूर रखते हैं। भगवान धन्वंतरी अपने इस स्वरूप में स्वास्थ्य के महत्व को बताते हैं।
3.  धन्वंतरी जब समुद्र मंथन से बाहर निकले उस समय श्रीविष्णु की तरह उन्होंने शंख और चक्र धारण किया हुआ था। उनके एक हाथ में अमृत कलश था और दूसरे हाथ में एक लीच(जालुक) आयुर्वेद चिकित्सा में लीचों की भी प्रधान भूमिका रही है।
4.  भगवान धन्वंतरी ने ही देवताओं के निरामय जीवन के लिये और मानव जाति के स्वास्थ्य के लिये आयुर्वेद शास्त्र का उपदेश ॠषि विश्‍वामित्र के पुत्र सुश्रुत को दिया। रोगों के सम्पूर्ण नाश के लिये भगवान धन्वंतरी द्वारा रचित धन्वंतरी संहिता आयुर्वेद का आधार ग्रंथ है।
5. आरोग्य प्राप्ति में मंत्रों की विशेष भूमिका रही है। धन्वंतरी संहिता में लिखा है कि शिव अमृत मंत्रों से प्राणप्रतिष्ठित विशेष आरोग्य धन्वंतरी कवच धारण कर लिया जाए तो व्यक्ति जटिल से जटिल रोग से मुक्ति प्राप्त कर सकता है। धन्वंतरी ने रोग मुक्ति से ज्यादा इस बात पर बल दिया कि मनुष्य किस प्रकार स्वस्थ रहे और उसके चारों ओर मंत्र-तंत्र का ऐसा प्रभाव होना चाहिए कि उसके पास रोग रूपी शत्रु आ ही ना सकें।
धन्वंतरी ने अपने प्रत्येक ॠषि, शिष्य और जन-जन को मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठायुक्त ‘धन्वंतरी कवच’ प्रदान किया और प्राण संजीवनी विद्या अपने शिष्यों को बताई।

 

प्राण संजीवनी महामृत्युंजय मंत्रों से आपूरित
 

धन्वन्तरी आरोग्य कवच

 

अहं हि धन्वन्तरिरादिदेवो जरारुजामृत्युहरोऽमराणाम्।
शल्याङ्गमङ्गैरपरैरुपेतं प्राप्तोऽस्मि गां भूय इहोपदेष्टुम्॥

 

धन्वन्तरी ने अमृत रूपी औषधि का सृजन कर सभी देवताओं को अजराः(वृद्धावस्था से रहित) अमराः(मृत्यु रहित) निरामयाः(सब प्रकार की आधिव्याधि और रोग-शोक से मुक्त) उसी प्रकार धन्वन्तरी मंत्रों से प्राण प्रतिष्ठित यह कवच पूर्ण आरोग्य का सुरक्षा चक्र है, जिसे धारण करने वाला सदैव निरोगी रहता है।

 

इस कवच को धारण करने वाला व्यक्ति सदैव ही प्रसन्न और जोशीला तथा उत्साहित रहता है, उसकी कार्य-क्षमता बढ़ जाती है तथा रोग उसके पास नहीं फटकते हैं।

 

आरोग्य मंत्रों से आपूरित यह कवच धारण करना जीवन का सौभाग्य है। गुरुदेव ने इस कवच को अपनी विशिष्ट शक्ति एवं मंत्रों से ऊर्जित किया है, जिससे इस कवच को धारण करने वाले को आरोग्य, आशीर्वाद स्वरूप प्राप्त होता है। धन्वंतरी आरोग्य कवच को धन्वंतरी के विशेष मंत्रों से प्राण प्रतिष्ठित किया गया है, यह कवच साधक के चारों ओर एक विशेष प्रकार का आरोग्य क्षेत्र तैयार कर देता है और धारण करने वाले साधक को असीम ऊर्जा प्रदान करता है।

 

यदि बालकों को किसी प्रकार का रोग हो अथवा बार-बार बीमार पड़ते हों, किसी प्रकार के मिर्गी इत्यादि के दौरें आते हों, भूत-प्रेत इत्यादि का भय रहता हो, बार-बार ज्वर आ जाता हो तो उन बालकों को यह कवच अवश्य ही धारण करवाना चाहिए।
धारण विधान

 

इस कवच को आप धन्वंतरी जयंती के दिन या फिर कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी के दिन धारण कर सकते हैं।

 

धन त्रयोदशी के दिन प्रातः अपने पूजा स्थान को शुद्ध, साफ कर लें। धन त्रयोदशी को दो कार्य किये जाते हैं प्रथम कार्य अपने वर्ष भर के हिसाब-किताब की नई पुस्तकें लाकर उनका पूजन किया जाता है। दूसरा कार्य आरोग्य हेतु भगवान धन्वंतरी का आह्वान और पूजन किया जाता है।

 

संकल्प

 

सर्वप्रथम अपने दाहिने हाथ में जल लेकर ‘आरोग्यता प्राप्ति की प्रार्थना करें’ और जल जमीन पर छोड़ दें। यह साधना आप स्वयं के लिये कर रहे हों तो स्वयं की आरोग्यता की प्रार्थना करें और यदि आप किसी अन्य के लिये यह साधना कर रहे हैं तो उसके नाम से प्रार्थना करें।

 

अपने सामने एक पात्र में पुष्प आसन देकर ‘धन्वंतरी आरोग्य कवच’ को स्थापित करें। उस पर कुंकुम, केशर, अबीर, गुलाल और चन्दन चढ़ाएं। पूजा स्थान में धूप, दीप अगरबत्ती अवश्य प्रज्वलित होनी चाहिए। वातावरण पूर्ण सुगन्धमय होना चाहिए।

 

अब अपने हाथ में गुलाब के पुष्प लेकर पुनः इस ‘धन्वंतरी आरोग्य कवच’ पर अर्पण करें और देवाधिदेव आरोग्य जनक धन्वंतरी देव का आह्वान करें। मन ही मन यह वचन बोलें कि हे देव धन्वतंरी आप मेरे पूरे परिवार से रोगों को समाप्त करें, परिवार के सभी सदस्य श्रेष्ठ आयु, बल और पुष्टि प्राप्त करें।

 

इसके पश्‍चात् धन्वंतरी का ध्यान करते हुए कवच पर पुष्प अर्पित करें –

 

सत्यं च येन निरतं रोगं विधूतं,
अन्वेषितं च सविधिं आरोग्यमस्य।
गूढ़ं निगूढ़ं औषध्यरूपम्,
धन्वंतरी च सततं प्रणमामि नित्यं॥

 

ध्यान के पश्‍चात् निम्न धन्वंतरी मंत्र का 108 बार जप करें –

 

मंत्र

 

॥ॐ रं रुद्र रोगनाशाय धन्वन्तर्यै फट्॥

 

प्रत्येक मंत्र जप के पश्‍चात् पुष्प की एक-एक पंखुडी कवच पर अर्पित कर देें। मंत्र जप अनुष्ठान के पश्‍चात् साधक अपने कवच को लाल धागे में पिरोकर अपने गले अथवा बाजु पर धारण कर लें। यदि किसी बालक के लिये आरोग्य कवच स्थापित किया है तो उसके नाम का संकल्प लें। यदि बालक पांच वर्ष से बड़ा है तो उस बालक को यह कवच अवश्य पहचानाएं। अगली कृष्ण त्रयोदशी तक नित्य उपरोक्त मंत्र का 21 बार जप करें तथा अगले मास की कृष्ण त्रयोदशी को पीले वस्त्र में दो मुट्ठी चावल के मध्य कवच को रखकर जल में प्रवाहित कर दें।
साधना सामग्री – 600/-
Dhanvantari Jayanti

17 October 2017

 

Dhanvantari Arogya Kavach

Journey from Wellness to Immortality

 

The health related surveys indicate that one-third of Indians above the age of 30 suffer from lifestyle related diseases. They are suffering from diseases like abnormal levels of blood-pressure, sugar, thyroid etc. In a  country where the Vedas proclaimed the truth of “Sarve Santu NiraamyaaH”, such health surveys certainly presents a very horrific picture. What is the solution to live until ripe old age, remain fully active and continue on the religious righteousness patḥ?

 

There is a beautiful stanza in Swasti Vaachan –

Bhadram KarnebhiH Shrunuyaam Devaam Bhadram PashyemakshabhiryajatraaH |

SthireirangaH Geistushtuvaam Sastanoobhivryashem Hreem Devahitam YadaayuH ||

i.e. Our ears should be able to listen well, our eyes should be able to see well, we should be able to observe good things happening around us, and we should be able to attain the age of Hundred years granted by Lord Brahma through our healthy senses and healthy body.

The journey of our lives is a travel from wellness-health to immortality. An energetic mind exists only in an healthy body, and this combination leads us to perform our actions. However the high prevalence of diseases has contaminated today’s environment. The more cures we find, the higher the number of diseases. Even small children have started suffering from major diseases.

Undoubtedly the Allopathic system of medicine does not treat the diseases, rather it subdues the symptoms of the diseases. The body becomes healthy automatically over the passage time, on the strength of its internal immune-antibody power.

Ayurveda which is hundreds of years old science has the real cure for the diseases. The word “Ayurveda” is composed of two words- “AayuH” (Age) + “Veda” (Treatise). It is also known as the Veda of life, and according to the Puranas, Lord Dhanvantari is the founder of Ayurveda. It was formed on Kartik Krishna Trayodashi, which is also known as Dhan Trayodashi.

 

Some interesting facts about Lord Dhanvantari

  1. Lord Dhanvantari originated at the time of the churning of the ocean. Lord Dhanvantari appeared after the churning. Undoubtedly Lord Dhanvantari grants the blessing of longevity and immortality, i.e. His blessings propel us towards the path of immortality with a healthy body.
  2. Lord Dhanvantari is a form of Lord Shree Vishnu. Diseases terminate just on uttering His name. Lord Dhanvantari is the doctor of the Gods like Lord Kuber is the treasurer of the Gods. He keeps Them away from the old age and other diseases. Lord Dhanvantari explains the importance of health in this form.
  3. When Lord Dhanvantari emerged out of the ocean-churning, He was adorned with a Conch-shell and Chakra like Lord Shree Vishnu. He had an urn of divine nectar-elixir in one hand, while his other hand had a leech (Kaluk). The leech have played a major role in Ayurvedic medicines.
  4. Lord Dhanvantari gave the guidance of Ayurvedic science to Sushruta, son of Vishwamitra, for the eternal life of the Gods and for the health of mankind. The basis of Ayurveda is Dhanvantari Samhita, a composition by Lord Dhanvantari for the complete eradication of diseases.
  5. Mantras have a special role in achieving health and wellness. The Dhanvantari Samhita states that if a person wears Vishesh Arogya Dhanvantari Kavach sanctified and consecrated through the Shiva Amrit Mantras, then that person can easily obtain riddance from all sorts of complex diseases. Lord Dhanvantari has stressed on prevention more than the cure. He has explained how a person can stay healthy. He has described how to create and live within an influencing circle of Mantra-Tantra which actively prevents any disease from reaching him.

Lord Dhanvantari provided a Mantra consecrated and enlivened-sanctified “Dhanvantari Kavach” to each of His Rishi, disciple and common-public. He described the Pran Sanjivani Vidya to his disciples.

 

Dhanvantari Arogya Kavach

Aham Hi Dhanvantariraadidevo JaraarujaamrityuharoSmaraanaam |

Shalyaangmagerapareirupetam PraaptoSsmi Gaam Bhuya Ihopadeshtum ||

Lord Dhanvantari created the medicines in the form of Amrit holy nectar to grant Ajaraah (riddance from old age), AmaraaH (riddance from death) and NiraamayaaH (riddance from diseases-illnesses) to Gods, thus liberating Them from all types of sorrows-maladies. This Kavach has been prepared with the same divine Mantras of Lord Dhanvantari. It is a complete health shield bestowing perfect-complete health, and the person wearing it always remains free from diseases.

The person wearing this Kavach always stays happy, enthusiastic and full of passion. His work-capacity enhances and the diseases do not bother him.

Wearing of this Kavach consecrated with divine Arogya Mantras is a fortune of life itself. Gurudev has imparted energy into this Kavach through His own distinctive power-Shakti and mantras. The wearer of this Kavach always receives good health through divine blessings of Gurudev. The Dhanvantari Arogya Kavach has been enlivened through special mantras of Lord Dhanvantari. This Kavach creates a circle of healthy influence around the wearer-Sadhak, and continues to provide unlimited energy to the Sadhak.

If a child is suffering from any kind of disease or frequent falls prey to  illness, if he or she gets epileptic fits, gets afraid of haunted ghosts or repeatedly gets fever, then such children should definitely wear this Kavach.

 

Wearing Procedure

 

You may wear this Kavach on Dhanvantari Jayanti or on the Trayodashi (13th) day of the Krishna (Dark) Paksha(fortnight).

On Dhan Trayodashi, clean and purify your worship-altar place in the morning. We perform two main tasks on Dhan Trayodashi. First we worship the new books of annual accounts. Secondly, we invoke and worship Lord Dhanvantari to obtain good health.

 

Resolution

First, take water in your right hand, pray for good disease-free health, and drop the water on the ground. You should pray for your own good health if you are performing this Sadhana from yourself. Otherwise if you are performing this Sadhana for someone else, then you should pray in his or her name.

Setup “Dhanvantari Arogya Kavach” on a seat of flower in a plate. Offer Kumkum (Vermilion), Kesar (Saffron), Abeer (colourful dye), Gulaal (colour) and Chandan (sandalwood). Dhoop (incense), deep (lamp) and Agarbatti (stick incense) should definitely be lit in the worship-place. The environment should be fully fragrant-aromatic.

Now, take a rose flower in your hand and offer it on this “Dhanvantari Arogya Kavach” and invoke the Lord Dhanvantari, the Lord of the health of the Gods. Say the following words in your own mind – “Hey Lord Dhanvantari, please remove all illnesses-diseases from my family, and please provide the most excellent age, strength and perfection to all members of my family.”

 

Thereafter offer flower on Kavach meditating on Lord Dhanvantari –

Satyam Cha Yen Niratam Rogam Vidhutam,

Anveshitam Cha Savidhim Aarogyamasya |

Goodam Nigoodam Aushadhyaroopam,

Dhanvantaree Cha Statam Pranamaami Nityam ||

 

After meditation, chant the following Dhanvantari Mantra 108 times –

Mantra

||Om Ram Rudra Roganaashaaya Dhanvantaryei Phat ||

Offer a petal of flower after each mantra chant. After completion of the Mantra-chanting Anusthaan, the Sadhak should wear the Kavach in his/her neck or arm in red thread. If you have setup the Kavach for a child, then you should take the resolution in his or her name. The child should definitely wear the Kavach if he or she is more than 5 years old. Chant the above Mantra 21 times daily till the next Krishna Trayodashi. Wrap the kavach in a yellow sheet of cloth between two fistful of rice, and drop in a flowing water stream.

Sadhana Materials – 600 / –

Share
error: Content is protected !!