Chandramoulishwar Sadhana

ग्रहों की अनुकूलता प्राप्त करने का
मंत्रतात्मक-तंत्रात्मक मार्ग
 
भगवान शिव का ग्रहाधिपति स्वरूप
चन्द्रमौलिश्‍वर साधना
भगवान् शिव अपने ‘चन्द्रमौलिश्‍वर स्वरूप’ द्वारा ग्रहों के दूषित प्रभावों से व्यक्ति को या साधक को छुटकारा दिलाते हैं, क्योंकि भगवान् चन्द्रमौलिश्‍वर देवाधिपति हैं, तंत्रेश्‍वर हैं, अतः समस्त मंत्र-तंत्र भी उनके अधीन हैं, ऐसे भगवान चन्द्रमौलिश्‍वर की साधना तो प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में एक बार अवश्य ही सम्पन्न करनी चाहिए।

 

ग्रह का शाब्दिक अर्थ पकड़ लेना, कब्जे में कर लेना होता है। नवग्रह पृथ्वी-वासियों के लिए एक ब्रह्माण्डीय प्रभाव है और प्रत्येक मनुष्य नवग्रहों के प्रभाव से सन्तप्त या प्रसन्न होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मनुष्य नवग्रहों के अधीन हैं। दुष्कर्म-सत्कर्म, पाप और पुण्य ग्रहों से ही संचालित होते हैं। ग्रहों के द्वारा त्रस्त होकर मनुष्य भांति-भांति के उपाय करता है, पर परिणाम आधा-अधूरा ही मिलता है। फिर मार्ग क्या है जिसके द्वारा रूष्ट ग्रह मनाए जा सकें और उनके प्रतिकूल प्रभावों को समाप्त किया जा सके।

 

यों तो ग्रह किसी को नहीं छोड़ते चाहे वह गरीब हो या अमीर, या फिर देवता ही क्यों न हों। ऐसे अनेकों उदाहरण हैं हमारे सामने, जिनसे यह ज्ञात होता है, कि ग्रहों का व्यक्ति के जीवन पर कितना अधिक प्रभाव पड़ता है – श्रीराम को भी शनि की दशा से ग्रस्त होकर महल को छोड़कर वन में चौदह साल तक दर-दर भटकना पड़ा, यह बात ओर है कि वाल्मीकि ने भक्ति भाव पूर्वक उस वनवास को कुछ और नाम दे दिया, किन्तु सत्य यही है कि राम को भी जीवन में ग्रहों के दूषित प्रभाव के कारण चौदह साल तक जंगलों में रहकर जीवनयापन करना पड़ा।

 

महात्मा बुद्ध को भी मंगल एवं राहु के दूषित प्रभाव से ग्रसित होकर, अपना राजपाट छोड़कर उन सबसे संन्यास लेना पड़ा और राजा हरिश्‍चन्द्र को भी शनि की साढ़े साती के प्रभाव के कारण अपना राज्य त्याग कर श्मशान में रहना पड़ा और यही नहीं, अपितु उनके जीवन में एक समय ऐसा भी आया, जब वह अपने पुत्र की लाश पर कफन भी न डाल सके, इस प्रकार की अनेकों ऐसी घटनाएं हैं, जिनसे यह सिद्ध होता है कि इतने बड़े-बड़े महापुरुष भी ग्रहों के दूषित प्रभावों से बच नहीं पाये, भले ही इन घटनाओं को समाज ने कोई और (नाम) रूप दे दिया हो, किन्तु सत्य यही है, कि ग्रहों के प्रभाव से ही उनकी यह गति हुई।

 

ग्रहों के दुष्प्रभाव को दूर करने के लिए अवश्य ही ऐसी सत्ता के पास जाना पड़ेगा जिनके अधीन सभी ग्रह और नक्षत्र हैं, पर इससे पहले यह समझते हैं कि शास्त्र इसके विषय में क्या कहते हैं?

 

देवाधीनम् जगत सर्वम् मंत्राधीनाश्‍च देवता –

 

देवताओं के अधीन समस्त जगत है, पर मंत्र के अधीन देवता हैं अर्थात् मंत्र जप द्वारा देवताओं को तुष्ट किया जा सकता है।

 

नवग्रहों को भी देवताओं का दर्जा दिया गया है। सूर्य जगत की आत्मा हैं, वे सौर मंडल के मुखिया हैं।

 

चंद्रमा मन को शीतलता प्रदान करने वाले देव हैं। मंगल युद्ध (पराक्रम) के देवता हैं। बुध को व्यापार का देवता माना गया है। बृहस्पति देवताओं और शुक्र दानवों के गुरु हैं। गुरु का स्थान तो सर्वोपरि है। शनि एक अर्ध देवता हैं। राहु उत्तर चंद्र आसंधि के देवता हैं और केतु दक्षिण चन्द्र आसंधि के देवता हैं।

 

ग्रह देवता स्वरूप हैं और सैद्धान्तिक रूप से मंत्रों के अधीन हैं। इसलिए ज्योतिषी आपकी जन्मपत्री का अध्ययन करके आपको ग्रहों की विपरीत दशा होने पर मंत्र जप की सलाह देते हैं और पंडित को यह कार्य देकर आप निश्‍चिंत हो जाते हैं। पर ग्रह दशा तो दूर नहीं होती है।

 

ज्योतिष के अनुसार प्रमुख नौ ग्रह होते हैं – सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु। यों तो आकाश में सैकड़ों ग्रह हैं, किन्तु ज्योतिष विज्ञान में मुख्य ग्रह नौ ही माने जाते हैं, जिनका प्रभाव जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे हमारे ऊपर पड़ता ही रहता है और इन्हीं के प्रभाव से हमें जीवन में सफलता-असफलता मिलती रहती है। हर ग्रह का मानव जीवन पर अपना अलग-अलग प्रभाव पड़ता है, जिसके फलस्वरूप मनुष्य को कई समस्याओं का सामना करना पड़ जाता है। इन नौ ग्रहों मेंे भी पांच ग्रह ऐसे हैं, जिनका प्रभाव प्रायः व्यक्ति पर मुख्य रूप से देखने को मिलता ही है।

 

1. सूर्य – जन्मपत्रिका में यदि सूर्य की स्थिति व्यक्ति को विपरीत फल देने वाली हो, तो उसे समाज में बदनामी, विश्‍वासघात एवं कष्टप्रदायक जीवन बिताते हुए असफलताओं का शिकार होना पड़ता है।

 

2. मंगल – यदि मंगल की स्थिति जन्मपत्री में अच्छी न हो, तो व्यक्ति का जीवन कई प्रकार की उलझनों से ग्रस्त रहता है, जिनसे उसे जीवन भर तनाव बना रहता है, यह ग्रह व्यक्ति को जेल की यात्रा, चोर या हत्यारा आदि भी बना देता है।

 

3. शुक्र – स्वप्न दोष, विवाह-बाधा आदि इस ग्रह बाधा के कारण ही होते हैं।

 

4. शनि – जन्मपत्रिका में शनि की अच्छी स्थिति में ना होती व्यक्ति को एक-एक पैसे का मोहताज बना देती है, जिसके कारण व्यक्ति का जीवन दरिद्रता और गरीबी में बीतने पर वह शारीरिक, आर्थिक और मानसिक तनावों से ग्रस्त होकर, मृत्यु तक को प्राप्त हो जाता है। इसके अलावा ऐक्सिडेन्ट, नौकरी छिन जाना, कोर्ट-कचहरी, डॉक्टरों आदि के चक्कर लगना आदि ये सब परेशानियां इस ग्रह बाधा के कारण ही मानव-मात्र को झेलनी पड़ती हैं।

 

5. राहु – इस ग्रह-दोष के कारण गृह कलह, आपसी मन मुटाव आदि अनेक प्रकार की समस्याओं से मनुष्य हर पल घिरा रहता है।

 

इस प्रकार अन्य ग्रह भी अपना दूषित प्रभाव मानव-जीवन पर डालते रहते हैं। जिनके चंगुल से बच निकलना मानव के लिए एक दुष्कर कार्य प्रतीत होता है। कई व्यक्ति ढोंगी पण्डित-पुरोहितों के चंगुल में फंसकर उपरोक्त समस्याओं के निवारण हेतु उनके द्वारा बताए गये उपायों को आजमाते हैं, परन्तु उनसे उन्हें कोई लाभ नहीं मिल पाता, अपने कार्यों की सिद्धि एवं सफलता के लिए वे उनसे कई प्रकार के छोटे-मोटे अनुष्ठान प्रयोग भी करवाते हैं, किन्तु फिर भी उनका अनुकूल फल उन्हें प्राप्त नहीं होता, तब उनका देवताओं आदि पर से विश्‍वास उठने लगता है, क्योंकि वे उन समस्याओं एवं परेशानियों का कारण नहीं जान पाते, जबकि इन आपदाओं-विपदाओं का मूल कारण ‘ग्रह-बाधा’ ही है।

 

कैसे करें ग्रहों के दुष्प्रभाव का पूर्ण शमन?

 

देवता मंत्रों के अधीन हैं और नवग्रह देवता स्वरूप हैं फिर भी ग्रह शांति मंत्र के लिए किया गया जप सफल क्यों नहीं होता। यही सोच रहे हैं ना आप? चलिए समझते हैं इसे-

 

इत्थं रूपेण कीलेन महादेवेन कीलितम्

 

दुर्गा सप्तशती के कीलक अध्याय में स्पष्टतः वर्णित है कि महादेव ने मंत्रों को कीलित कर दिया। महादेव ने मंत्रों पर ताला लगा दिया है जिससे ईर्ष्या और लोभवश इन मंत्रों का दुरुपयोग नहीं किया जा सके, इस कारण मंत्र कीलित हैं।

 

जैसे हलवाई की दुकान पर आप विभिन्न प्रकार की मिठाईयां देखते हैं, उनकी खुशबू सूंघते हैं और क्षणिक तृप्ति का अहसास भी होता है, पर उससे आपकी भूख तो नहीं मिटेगी, क्षुधा तो तृप्त नहीं होगी क्योंकि मोल देकर आपने वह मिष्ठान खाया नहीं।

 

इसी तरह नवग्रह शांति हेतु पंडितों द्वारा किया मंत्र जाप क्षणिक संतोष दे सकता है, एक दिवास्वप्न की तरह, उनसे ग्रहों की अनुकूलता प्राप्त नहीं होगी क्योंकि मंत्र कीलित हैं और उनका जप कोई और आपके लिए कर रहा है। जब आपको भोजन खाना है तो उसे पकाना भी पड़ेगा और खाना भी आपको ही पड़ेगा।

 

मंत्रों का निष्कीलन कैसे होगा?

 

ये विद्या किसे आती है? शास्त्रानुसार यह विद्या सिर्फ गुरु को आती है। गुरु आपकी योग्यता को भांप कर आपको उसके अनुरूप मंत्र देते हैं और साथ ही शक्तिपात द्वारा आपको सार्मथ्यवान बनाते हैं कि आप सफलता पूर्वक मंत्र जप करें और आपके मनोरथ दुष्ट ग्रहों के दुष्प्रभाव से अछुते रहें। यही कारण है कि, गुरु आशीर्वाद देते हुए कहते हैं –

 

मंत्रार्था सफला सन्तुः
सफला सन्तुः मनोरथाः
जिस कार्य हेतु आप मंत्र जप कर रहे हैं, वह सफल हो आपके मनोरथ पूर्ण हों और जब गुरु आशीर्वाद देते हैं, तो उसके उपरांत कार्य सिद्धि अवश्यम्भावी है।

 

तात्त्पर्य है कि नवग्रह शान्ति हेतु निष्कीलित मंत्र गुरु आज्ञा के पश्‍चात् जप करें। पर ग्रह तो नव (नौ) हैं तो मंत्र भी निश्‍चित रूप से नौ तो होंगे ही फिर ग्रहों की दशा भी तो परिवर्तित होती रहती है, तो समयानुरूप मंत्र जप भी भिन्न -भिन्न होंगे।

 

एक साधे सब सधे

 

पर, अगर आप उस एक साधना की तलाश में हैं जो नवग्रहों के प्रतिकूल प्रभावों का आमूल नाश कर सके तब आपके लिए चंद्रमौलिश्‍वर साधना है।

 

मंत्रों को कीलित किया है शिव ने, सृष्टि के केन्द्र में शिव स्थित हैं, सभी देवों से श्रेष्ठ शिव हैं, महादेव रूप में। चन्द्रमा को जब दक्ष ने क्षय का श्राप दिया तो उसे अपनी जटाओं में स्थापित कर शिव ने पुनः जीवन दिया। इसी कारण से अमावस्या के बाद प्रतिपदा से हर दिन चन्द्रमा बढ़ता है और पूर्णिमा को अपने पूर्ण यौवन को प्राप्त होता है।

 

शिव आदि गुरु हैं। पार ब्रह्म परमेश्‍वर हैं और अगर बाधाएं ग्रह-दोष के कारण जीवन में आ रही हैं, तो उनका पूर्ण निवारण सिवाय शिव के किसी के पास नहीं है। शिव का चंद्रमौलिश्‍वर स्वरूप बाधाओं का पूर्ण संहार कर देगा।

 

चन्द्रोद्भासितशेखरे स्मरहरे गंगाधरे शंकरे,
सर्पैभूषित कण्ठकर्णविवरे नेत्रोत्थ वैश्‍वानरे।
दन्तित्वक् कृत सुन्दराम्बर धरे त्रैलोक्य सारे हरे,
मोक्षार्थ कुरुचित्तवृत्तिमचलाम् अन्यैस्तु किं कर्मभिः॥
अर्थात् – ‘सिर पर अर्धचन्द्र को धारण किए हुए भगवान् चन्द्रमौलिश्‍वर, जो कामदेव को भस्म करने वाले हैं, जिनके मस्तक से गंगा प्रवाहित हो रही है, कण्ठहार के रूप में सर्प को धारण किए हुए हैं, जिनके तृतीय नेत्र से वैश्‍वानर अग्नि निकल रही है, हस्ति चर्म को सुन्दर वस्त्र के रूप में धारण किए हुए तीनों लोकों में अद्वितीय भगवान् शंकर, जो अपने इस रूप-गुण के कारण ‘चन्द्रमौलिश्‍वर’ कहे जाते हैं, वे मेरे मन और बुद्धि को मोक्ष मार्ग की ओर प्रेरित करते हुए मेरे समस्त ग्रह जन्य दोषों को दूर करें।’

 

आप स्वयं सोचिए जब आपके बच्चे को नजर लग जाती है तब आप लाल मिर्च अग्नि में जलाकर, उसकी नजर उतारते हैं, पर जब बाधा ग्रहों के दूषित प्रभाव की हो, तब अग्नि भी तो प्रचण्ड होनी चाहिए और शिव के त्रिनेत्र की ज्वाला से विकराल कोई अग्नि नहीं है। उनके एक दृष्टिपात से विपरीत ग्रहों के दुष्प्रभाव भस्म हो जाएंगे।

 

ग्रहों के दुष्प्रभाव को समाप्त करने की ही साधना है – चन्द्रमौलिश्‍वर साधना। इस साधना के बल पर वह व्यक्ति अपने जीवन में समस्त नौ ग्रहों के दूषित प्रभावों से मुक्ति प्राप्त कर उन ग्रहों को अपने अनुकूल बनाने में सफल हो पाता है, और तब उसे जीवन में कभी भी किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं भोगना पड़ता।

 

ग्रहों की दशा यदि सही रहे, तो व्यक्ति के जीवन में उन्नति के स्रोत हमेशा के लिए खुले रहते हैं, और वह कामयाबी की मंजिल की ओर बढ़ते हुए अपने जीवन में पूर्ण सुखी एवं सम्पन्न हो जाता है, क्योंकि इस साधना-शक्ति के द्वारा व्यक्ति/साधक एक बार में ही अपनी समस्त परेशानियों एवं बाधाओं से मुक्ति पा लेता है।

 

सामग्री – चैतन्य पूरित रुद्राक्ष, रुद्राक्ष माला। दिवस – सोमवार या किसी रविवार के दिन। समय – रात्रि 7.36 से 9.12 तक।

 

साधना-विधान

 

रात्रिकालीन इस साधना में बैठने से पहले साधक स्नानादि करके पूर्णतया शुद्ध होकर, पीली धोती धारण कर, ऊपर गुरु चादर ओढ़ लें, तथा अपने सामने किसी लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछा दें और फिर आसन पर शांतचित्त तथा दत्तचित्त होकर बैठ जाएं, इसके पश्‍चात् तीन बार ‘’ की ध्वनि का उच्चारण करने के बाद 5 मिनट तक गुरु का ध्यान करें, और प्रार्थना करें कि मुझे समस्त परेशानियों से मुक्ति प्राप्त हो, ऐसा कहकर उनसे आशीर्वाद ग्रहण करें, तत्पश्‍चात् किसी प्लेट में कुंकुम से ‘ॐ’ लिखकर, उसमें उस विशिष्ट ‘रुद्राक्ष’ को स्थापित कर दें, फिर कुंकुम का तिलक करके उस पर ‘ॐ चन्द्रमौलिश्‍वराय नमः’ मंत्र बोलते हुए 11 बार थोड़े-थोड़े चावल चढ़ाएं, तथा 11 बार इसी मंत्र से काले तिल, काली सरसों, काली मिर्च अलग-अलग चढ़ाएं, और धूप या अगरबत्ती जलाकर सरसों या तिल के तेल का दीपक जलाएं, ध्यान रहे कि पूरे साधना काल में दीपक प्रज्वलित रहे।

 

फिर साधक मन ही मन शिव के ‘चन्द्रमौलिश्‍वर स्वरूप’ को नमस्कार कर ‘रुद्राक्ष माला’ से निम्न मंत्र का 9 माला मंत्र जप करें।

 

मंत्र

 

॥ॐ शं चं चन्द्रमौलिश्‍वराय नमः॥

 

जप-समाप्ति के बाद गुरु-आरती करें, फिर ‘चैतन्य पूरित रुद्राक्ष’ पर अर्पित सामग्रियों को रात्रि के समय पूरे घर व दुकान तथा जो भी अपके आवासीय या व्यापारिक संस्थान हैं, सब जगह छिड़क दें, जिससे दुष्ट ग्रहों का प्रभाव दूर हो सके तथा भविष्य में भी उन ग्रह-दोषों का प्रभाव न हो, इसके पश्‍चात् रुद्राक्ष तथा माला को किसी नदी या तालाब में विसर्जित कर दें।

 

यह साधना पूर्ण सफलतादायक है, जिसे पूर्ण श्रद्धा और लगन से करने की आवश्यकता है, तभी साधक को इससे निश्‍चित लाभ की प्राप्ति संभव है।

 

प्राण प्रतिष्ठा न्यौछावर – 370/-

Navagraha Dosh Shaanti

Mantraatmak-Tantraatmak Pathway

Planetary Lord Form of Lord Shiva

Chandramoulishwara Sadhana

 

Lord Shiva liberates the person/Sadhak from the imperfect planetary effects in His “Chandramoulishwara Form”.  Lord Chandramoulishwara is the Lord of all Gods. He is Tantreshwar and is the master of all Mantra-Tantra. Every person should perform Sadhana of Lord Chandramoulishwara at least once a year.

 

The literal meaning of the word Grah (planet) in Hindi  is to grab and capture. The Navagraha (Nine-Planets) bestow  cosmic effect on all earth inhabitants, and they effect every human positively or negatively. Astrology states that humans are governed by the Nine planets.  Virtuous and Sinful planets control the benefits and harms. A person tries out multiple methods to escape the malefic impacts of the planets, but none of them are fully effective. Then, what is the best method to make planets favorable and remove their malefic impacts?

 

Nobody can escape the clutches of the planets  – rich or poor, Gods or Demons. There are many examples illustrating the strength of their impact on all aspects of life. Lord Shree Rama had to leave His luxurious palace and wonder for fourteen years in the forests. He had to endure fourteen years of stay in forests due to malefic planetary impact, even though Sage Valmiki brilliantly tried to term this exile positively.

The malefic impact of Planets Mars and Rahu also forced Mahatma Buddha to leave his kingdom and take up ascetism. The Saade-Saati (7.5 year impact) of Planet Saturn forced King Harishchandra  to abandon his kingdom to live in a crematory. He even had to face the ignominy of inability to afford even a shroud to cover his dead son. There are thousands of such examples to illustrate that even distinguished saints could not escape the malefic impacts of planets. The society might have charitably cast a façade to cover these disgraces. However, the bitter truth is that  adverse planetary combinations forced these vagaries of fate on them.

The only way to counter these adverse impacts is to approach a superior power which can dominate these planets and constellations. Let us first try to see the opinion of holy texts.

 

Devaadheenam Jagata Sarvam Mantraadheenaasca Devataa –

The Gods control the entire universe,  however the Mantras dominate the Gods. The Gods can be pleased through chanting of Mantras.

The Navagrahas are equal to Gods in status. Lord Sun is the essence of the universe. He is head of the Solar system.

Lord Moon provides calmness to the mind. Lord Mars is the God of War (Courage). Lord Mercury rules over the business and commercial affairs. Lord Jupiter and Lord Venus are Gurus of Gods and Demons respectively. Guru is paramount. Lord Saturn is a demi-God. Rahu and Ketu are Nodal Gods of North and South sides of Planet Moon.

These planets have been accorded the status of Gods, and therefore, are philosophically under the control of Mantras. Therefore the astrologers advise you to chant specific Mantras to counter the adverse effects of malefic planets in your horoscope. You smartly  outsource these actions-activities to a Pandit. However, this does not eradicate the planetary predicament from your life.

The astrological science mentions nine major planets – Sun, Moon, Mars, Mercury, Jupiter, Venus, Saturn, Rahu and Ketu. Actually there are hundreds of planets in the sky. However these major planets cast the maximum degree of influence in all aspects of our life, knowingly or unknowingly. This influence results in success or failure within our lives. Every planet influences a different aspect of the person’s life causing cropping up of multiple problems in life. Every person is strongly impacted by the five main planets out of these nine.

  1. Planet Sun– The adverse position of Planet Sun in the horoscope causes disgrace and betrayal leading to a distressed life full of failures.
  2. Planet Mars– If the position of Mars in the horoscope is not good, then the person has to suffer from multiple conflicts throughout his life causing untold misery and stress. This planet can also drive the person to a prison, or turn him into a thief or a murderer.
  3. Planet Venus– Adverse position of this planet causes night-falls and problems in getting married.
  4. Planet Saturn– The unfavorable position of Planet Saturn in the horoscope drives the person to extreme poverty and destitution. These privations cause physical, economical and mental stresses leading even to death. This planet also forces the person to face sudden accidents, loss of job, court-suits and ill-health.
  5. Planet Rahu– The adverse faults of this planet engulfs the person within a thick web of domestic conflict and mutual discord etc.

 

The adverse positions of the remaining planets also cast malefic influence on various aspects of the person’s life. It is supremely difficult for humans to escape the clenches of the planets. Many people practice several rites-rituals advised by fraudulent priests-clerics, but to no avail. Even the anusthaans fail to yield any success. This results in erosion of faith and belief towards divinity. Such people fail to ascertain the basic causes of their problems and troubles. The malefic planetary combinations are the root causes of these adversities.

 

How to suppress malefic impact of adverse planetary combinations?

The Gods are under control of the Mantras, and the planets have been accorded the divine status. Why do we face lack of success even after chanting the Mantras. This is probably, what you are thinking about. Let us try to understand it-

 

Itthaam Roopena Keelena Mahaadevena Keelitam

 

The Keelak chapter of holy text Durga Saptashatee clearly mentions that Lord Mahadeva has tied the Mantras, rendering them ineffective. Lord Mahadeva has locked these Mantras to prevent their usage due to jealously or greed. This has bound the Mantras.

Let us try to explain with a simple example of a sweatmeat shop. If you walk into a sweatmeat shop, you can view the sweets, smell their sweet fragrance and get momentary satiation. However, mere sight or smell does not gratify your hunger or quench your senses, because you have not bought and eaten them.

Similarly, the chanting of Mantras for Planetary conduciveness  by a Pandit can give you a fleeting momentarily satisfaction. However  their blessings or favors will still remain elusive since someone else is chanting bound-tied Mantras. You need to cook and eat the food yourself, to satisfy your hunger.

 

How to untie the Mantras?

Only the Guru knows the science of unbounding the Mantras. Guru bestows you a Mantra based on your abilities and suitability.  He also expands your capability through Shaktipaat, to enable you to successfully accomplish the Sadhana, and remain insulated from the malefic planetary influence. Hence Guru blesses though –

 

Mantraarthaa Safalaa SantuH

Safalaa SantuH ManorathaaH

 

i.e. Let your desired task for which you are chanting Mantras, be successful and may you realize all your wishes. The success is inevitable after Guru Blessings.

The main point is that you should chant the unbound Mantras to make planets favorable to you, after taking blessings and permission from Gurudev. There are nine planets, and there should be at least nine different Mantras. Moreover, there will be different Mantras for different stages and states of the Planets.

 

 

Ek Saadhe Sab Sadhe (Single Cure for All)

If you are searching for a particular Sadhana to destroy adverse effects of all malefic planets, then you have come to the right place. You should perform  Chandramoulishwara Sadhana.

Lord Shiva has bound all the Mantras and Lord Shiva is present at the center of the universe. Lord Shiva is the Highest God, in His Mahadeva form. He restored Lord Moon to life by setting Him up in His tresses, when Daksha cursed Lord Moon to obliteration. Thus Planet Moon slowly grows after New-Moon night  and attains His full form on the Full Moon night.

Lord Shiva is the Paramount Guru since times immemorial. He is Paar-Brahma  Parmeshwar, the Supreme Almighty. Only Lord Shiva has the cure to eradicate the obstacles-problems arising due to adverse planetary combinations. Nobody else has it. The Chandramoulishwara form of Lord Shiva will complete annihilate all troubles and obstacles.

 

Chandrodbhaasitashekhare Smarahare Gangaadhare Shankare ,

Sarpeibhushita Kanthakarnavivare Netrouttha Veishvaanare |

Dantitvak Krita Sundaraambara Dhare Trilokya Saare Hare ,

Mokshaartha Kuroochittavrattimachalaam Anyeistu Kim KarmabhiH ||

 

i.e. “Adorned with Half-Moon on Head, Lord Chandramoulishwara, the Destroyer of Kaamdeva, Ganges Flowing from His Head, Neck decorated with Snake, Pure Ferocious Fire emanating from His Third-Eye, Attired beautifully in Deer-skin garments,  the Supreme Almighty Lord Shankar,  in this divine “Chandramoulishwara” form, May He eradicate all malefic planetary impacts, leading my mind and intellect towards Salvation.”

 

Try to recollect. You drop red-chilly into fire to remove evil-eye from your child. The Fire to consume the evil-eye of planets should be strong-furious. And no fire is more ferocious than that emanating from the Third-Eye of Lord Shiva. A single sight is enough to destroy all malefic adversities.

Chandramoulishwara Sadhana is the Sadhana to eradicate the malefic adversities of hostile planetary combinations. Accomplishment of  this Sadhana bestows liberty from all malefic impacts from adverse nine planets, thereby making them conducive and favorable. Such a person does not have to suffer any kind of pain in life.

Favorable planetary combinations open doors of success in life. The person continues to prosper and achieve success in life. He can get riddance from all kinds of  troubles and obstacles in a single shot through this Sadhana.

 

Sadhana Materials – Mantra Consecrated-Sanctified Rudraksh and Rudraksh Mala

Sadhana Day – Monday or Sunday during night – 7.36 pm to 9.12 pm

 

Sadhana Procedure

The Sadhak should purify himself with bath at night, adorn yellow Dhoti, and wrap Guru Chadar. He should spread Red cloth on a wooden board in front of him, and sit calmly and energetically on the asana.  After chanting “OM” sound three times, he should meditate on divine form of Gurudev for five minutes. He should mentally obtain blessings with prayer to obtain complete liberation from all problems-obstacles. Write “OM” with Kumkum on a plate, and setup the unique “Rudraksh” on it. Worship with Kumkum, and offer rice-grains 11 times chanting “Om Chandramoulishwaraaya NamaH“. Separately offer Black-Sesame, Black-Mustard and Black-Pepper seeds 11 times through this Mantra. Light incense or incense-sticks, along with an oil lamp of either Mustard or Sesame oil. The lamp should be lit throughout the Sadhana period.

 

Thereafter the Sadhak should mentally pray to “Chandramoulishwara Form” of Lord Shiva, and chant 9 mala of following Mantra using “Rudraksh Mala“.

 

Mantra

||  Om Sham Cham Chandramoulishwaraaya NamaH ||

 

Perform Guru-Aarti after completion of Mantra chanting. Sprinkle all articles offered on the “consecrated-sanctified Rudraksh” all over your home and shop.  You should sprinkle all over your residence and commercial campus, to ensure elimination of negative effects of malefic planets, and future protection from those malefic impacts. Drop the Rudraksh and Rudraksh Mala in a river or pond.

This Sadhana bestows complete success, and should be accomplished with full  devotion and perseverance. Only then will the Sadhak be able to achieve all benefits.

 

Praana Pratishthaa Nyouchaawara –  370 /-

 

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