शक्तिपात युक्त तीव्रतम बगलामुखी मानस दीक्षा (Quick acting Shaktipaat Bagalamukhi Manas Diksha)

सद्गुरु देव की कृपा बरसती हैतब वे शिष्य को

  • अपने हाथों से सजाते संवारते हैं
  • वीरता का भाव प्रदान करते हैं
  • बाधा विनाश की शक्ति प्रदान करते है

बगलामुखी साधना में ही समाहित है शक्ति और शौर्य

बगलामुखी साधना

सम्पन्न करें और प्राप्त करें

गुरुदेव से वरदान और आशीर्वाद

शक्तिपात युक्त तीव्रतम बगलामुखी मानस दीक्षा

चैत्र नवरात्रि 27 मार्च 2015

बगलामुखी जयंती 26 अप्रैल 2015

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गुरुदेव ने 18 मई 2013 में शिष्यों को विशेष मानस बगलामुखी दीक्षा प्रदान की थी। वह दिन साधकों के जीवन का स्वर्णिम दिन था जिस दिन गुरुदेव ने उनके भाल पर विजय और शौर्य का टीका लगाया था। उन्हें तीव्रतम शक्तिपात प्रदान किया था। जिन साधकों ने यह शक्तिपात प्राप्त किया था, वे साधक आपके बीच ही हैं और उनसे आप स्वयं पूछिये कि – उनके जीवन में बगलामुखी दीक्षा प्राप्त करने के बाद कितना महान परिवर्तन आया है? उनके रोम-रोम में ओज भर गया है, संघर्ष करने की क्षमता में वृद्धि हो गई है और वे अपने जीवन में बाधाओं को निरन्तर पछाड़ते ही जा रहे हैं। अपनी बाधाओं को समाप्त कर रहे हैं। अपने शत्रुओं का स्तम्भन कर रहे हैं।

यह सब गुरुदेव की असीम कृपा का ही फल है, जिसके कारण शिष्यों में विशेष चेतना आई है।

कई साधकों ने बगलामुखी दीक्षा के पश्‍चात् अपने अनुभव भेजे थे, कई साधक प्रारम्भिक स्थिति में घबरा गये थे, विचलित हो गये थे, किसी को ज्वर आ गया था लेकिन गुरुदेव ने आदेश दिया था कि बगलामुखी मंत्र का जप निरन्तर करते रहें। इसका प्रभाव यह हुआ कि कुछ दिनों में उन साधकों को यह अनुभव होने लगा कि शक्तिपात और मंत्र जप के माध्यम से उनके जीवन के रोग-शोक बाहर निकल रहे हैं, विलीन हो रहे हैं, भीतर ही भीतर एक तीव्र ऊर्जा का प्रादुर्भाव हो रहा है।

तीव्र शक्ति बगलामुखी के सम्बन्ध में, मैं पुनः उन वचनों को दोहराना चाहूंगा, जिन्हें सद्गुरुदेव परमहंस स्वामी निखिलेश्‍वरानन्द जी ने अपने एक प्रवचन में कहा था, उसके कुछ प्रमुख अंश –

‘जीवन में यदि कोई भय है, तो वह भय दूर होना चाहिये और संकटों पर पूर्ण रूप से विजय प्राप्त करने की क्रिया को बगलामुखी साधना कहते हैं। यह अत्यन्त उग्र साधना भी हैऔर सौम्य साधना भी है, यानि उग्रतम और सामान्य दोनों प्रकार की साधना है। मैं दोनों रूपों को इसलिए बता रहा हूं क्योंकि बगलामुखी साधना दोनों ही रूपों की उच्चतम साधना है।

बगलामुखी साधना कितनी भी तीव्रतम हो मैं इस तीव्रतम बगलामुखी साधना को अपने शिष्यों, साधकों एवं भक्तों को अवश्य सम्पन्न करा सकता हूं क्योंकि यह तीन स्टेज की क्रमशः साधना है। पहली स्टेज पूरी होने पर… दूसरी स्टेज, दूसरी होने पर… तीसरी स्टेज… लेकिन इस बीच गुरु चैक करता रहता है।

पुरुष और स्त्री दोनों इस साधना को सम्पन्न कर सकते हैं। यदि आप वासना युक्त हैं तो आपमें न्यूनता है, यदि आप इन्द्रिय लोलुप हैं तो आप दोषी हैं, यदि हम अपने आप पर कन्ट्रोल नहीं कर पाते, संयमित जीवन नहीं है तो साधना में सिद्धि नहीं मिल सकती और बगलामुखी साधना में सफलता हेतु संयमित जीवन आवश्यक है।

सन्तान भी हो, नौकर चाकर सब हों लेकिन चौबीस घण्टे केवल उन्हीं का चिन्तन करना अपने शरीर का दास होना है। संयमित जीवन होना चाहिए। जो स्त्री बगलामुखी साधना सम्पन्न करती है उसके पुत्र भी अत्यन्त तेजस्वी होते हैं।

बगलामुखी साधना-दीक्षा भी बिल्कुल सात्विक है, आपके लिये यह साधना कल्याणकारी है, क्योंकि पग-पग पर अड़चने हैं, बाधाएं हैं, कठिनाइयां, भय… से मुक्ति के लिए इससे बड़ी कोई साधना नहीं है। अगर आप में क्षमता होगी तो आप इसे ग्रहण कर सकते हैं।

सारी वृत्तियों को बगलामुखी साधना तेजस्वी बना देती है और जो साधक निर्भीक बनता है तो फिर रोता नहीं है, हाथ नहीं जोड़ता, गिड़गिड़ाता नहीं क्योंकि उसका सारा शरीर चैतन्य हो जाता है एवं उसका रोम-रोम ऊर्जा का पुंज बन जाता है।

जो साधक सिद्धाश्रम साधना या कुण्डलिनी जागरण साधना सम्पन्न करना चाहते हैं उनको भी पहले बगलामुखी साधना सम्पन्न करनी ही चाहिये तभी जाकर आगे की साधनाओं में सफलता प्राप्त होती है अन्यथा कुण्डलिनी जागरण में अत्यधिक विलम्ब होता है। इसे पीताम्बरा साधना भी कहते हैं।’

– सद्गुरुदेव निखिल

जिह्वाग्रमादाय करेण देवीं वामेन शत्रूं परिपीडयन्तीम्।

गदाभिघातेन च दक्षिणेन पीताम्बराढ्यां द्विभुजां नमामि॥

भगवती बगलामुखी के ध्यान से स्पष्ट हो जाता है कि पीताम्बरा श्री विद्या बगलामुखी अमृतत्व प्राप्ति के मार्ग में आने वाले शत्रु, कलह, तिरस्कार और भय (विष रूपी) को पूर्ण रूप से समाप्त कर देती हैं। देवी विरोधियों – शत्रुओं की वाणी एवं बुद्धि को ही कुंठित कर देती हैं, जिससेशत्रु आपके प्रति षड्यंत्र कर ही नहीं सकते। वाणी का कीलन एवं बुद्धि का नाश कर देने से शत्रु आपके जीवन में बाधाएं, कलह एवं समस्याएं उत्पन्न नहीं कर सकते।

बगलामुखी शत्रुओं की प्रगति, उन्नति ही समाप्त कर देती हैं। शत्रु पक्ष उसके भक्तों का तिरस्कार नहीं कर सकता और भय पैदा करने वाले शत्रुओं को मां बगलामुखी अपने प्रहार से चूर-चूर कर समाप्त कर देती हैं अर्थात् मात्र बगलामुखी देवी की साधना-आराधना द्वारा जीवन की सभी बाधाओं और समस्याओं को समाप्त कर आनन्द एवं प्रसन्नतापूर्वक जीवन व्यतीत किया जा सकता है।

अमृत प्रदाता – गुरुदेव और सदाशिव

शिष्य के जीवन में हजारों पी़ड़ाएं होती हैं और उसमें स्वयं इतनी शक्ति नहीं होती कि वह अकेला संसार की बाधाओं पर अपनी शक्ति से विजय प्राप्त कर ले। आलेख के प्रारम्भ में जो बाधाएं लिखी हैं उनको हर व्यक्ति जीवन में किसी न किसी रूप में भोगता है और इसी कारण उसे कई बार विचार आता है कि ‘क्या यह जीवन अभिशाप है या वरदान?’ यह कहा जाता है कि लाखों योनियों के बाद मनुष्य योनि प्राप्त होती है तो फिर इस मनुष्य योनि में इतना दुःख और पीड़ा क्यों? इन्हीं प्रश्‍नों का समाधान और अपने जीवन की पीड़ा को समाप्त करने के लिये साधक-शिष्य ईश्‍वर की शरण में जाता है, शक्तियों का स्मरण करता है, उसी कारण उसे जीवन में गुरु भी मिलते हैं।

गुरु को देवाधिदेव महादेव शिव की संज्ञा दी गई है क्योंकि गुरु भी शिव का स्वरूप ही हैं और उनका उद्देश्य भी इस जगत के शिष्यों, साधकों, भक्तों के हलाहल विष को अपने पास सीमित रखकर अपने भक्तों का उद्धार और उन्हें पीड़ा से मुक्ति दिलाना है। शिष्य भी गुरु के पास इसी आशा और विश्‍वास से पहुंचता है कि मुझे गुरु कृपा से जीवन संघर्ष में विजय प्राप्त हो।

गुरु शिष्य की पीड़ा को अपने ऊपर लेते हुए उस पीड़ा के हलाहल विष को ग्रहण करते हुए, उसे अपनी शक्ति प्रदान करते हैं। गुरु द्वारा शिष्य के विष का हरण उसके जीवन से पीड़ा रूपी विष निकालकर अमृत सिंचन की क्रिया ही दीक्षा कहलाती है। दीक्षा का सीधा अर्थ है – ‘शक्तिपात’। जहां शक्ति का तीव्र गति से प्रवाह होता है, वहां बाधा और पीड़ा, मन और तन दोनों से निकल जाती है। जब बाधा-पीड़ा निकल जाती है तो रोम-रोम में अमृत का प्रवाह संचारित होने लगता है।

सद्गुरु भी अपने शिष्यों, साधकों को अमृत पान कराते हैं, वे (सद्गुरु) शिष्यों के जीवन से विष को निकालकर उनको आनन्द, मस्ती और ऊर्जा से आपूरित कर देते हैं, उनके जीवन में अमृतत्व का संचार कर देते हैं, जिससे उनकी रुकी हुई नाव पुनः सांसारिक समुद्र में आगे बढ़ने लगती है। जीवन के मार्ग में आने वाली बड़ी बाधाओं में एक बाधा है – शत्रु बाधा।

शत्रु बाधा से पीड़ित व्यक्ति का चिन्तन, मनन, उसकी दिनचर्या सभी कुछ प्रभावित हो जाता है। वह निर्भयतापूर्वक आचरण नहीं कर सकता, वह मुक्त पक्षी की तरह नील गगन में नहीं उड़ सकता। वह हर पल, हर क्षण इसी चिन्तन में खोया रहता है कि किस प्रकार अपनी इस बाधा को समाप्त करे।

शत्रु का नाश करिए

गुरुदेव ने कहा कि – शत्रु व्यक्ति विशेष नहीं होता, आप की शक्ति कम है और दूसरे की शक्ति आपसे ज्यादा है, इस कारण आपको वह व्यक्ति शत्रु लगता है। जिस दिन आपकी शक्ति बढ़ जाती है तो वह शत्रु अपने आप परास्त हो जाता है।

यदि घर-परिवार में आपसी कलह है, सामंजस्य नहीं है, एक दूसरे की बात को समझ नहीं पा रहे हैं तो यह भी जीवन की एक विशेष बाधा कारक स्थिति है। इस बाधा का भी शत्रु बाधा की तरह निवारण आवश्यक है।

शरीर मन के कहने में नहीं है और मन शरीर के कहने में नहीं है तो यह भी जीवन की शत्रुता है। रोग रूपी शत्रु यदि आपके शरीर पर अधिकार जमाना चाहते हैं। यदि चिन्ता रूपी शत्रु आपके मन बुद्धि पर अधिकार जमा रहे हैं तो उनका स्तम्भन, कीलन भी आवश्यक है। आप अपने कार्य में जितना प्रयास करते हैं, उसका आधा फल भी नहीं मिलता है तो यह भी एक बाधा है जो शत्रुता का विकराल रूप लेकर खड़ी है।

गुरुदेव कहते हैं कि इन सब विपरीत स्थितियों का पूर्ण रूप से मारण होना चाहिए। ये जो बाधाएं हैं, वे जड़ मूल से समाप्त होनी चाहिए। इसके लिये हर मनुष्य, हर साधक में बाधा को स्तम्भित करने की, कीलन करने की और विनाश करने की क्षमता का पूरा विकास होना चाहिए।

साधना और दीक्षा दोनों आवश्यक

अभी कुछ दिन पहले मैंने गुरुदेव से संकोच करते हुए पूछा कि – हे गुरुदेव! क्या कारण है कि कुछ शिष्यों के सभी कार्य समय पर पूर्ण हो जाते हैं और कुछ शिष्यों के कार्य समय पर पूर्ण नहीं होते। आप सब पर अपनी विशेष कृपा क्यों नहीं करते हैं?

गुरुदेव ने कहा कि – ईश्‍वरीय कृपा दृष्टि तो सब पर समान रहती है। व्यक्ति अपने प्रारब्ध से दुःख उठाता है एवं सुख भोगता है लेकिन जो व्यक्ति शिष्य बनता है वह भी कई बार गलतियां कर बैठता है। शिष्य जिस दिन गुरु धारण करता है उसे दो बातें अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिए और ये दो बातें है – शक्तिपात दीक्षा और साधना।

इन दोनों में निरन्तर समन्वय होना चाहिए, जो साधक केवल साधना के मार्ग पर ही चलता है और समय-समय पर गुरु से शक्तिपात प्राप्त नहीं करता है तो उसके कार्य पूर्ण तो होते हैं लेकिन समय पर पूर्ण नहीं हो पाते, इसलिये उसके मन में निराशा, हताशा आ जाती है। इसी प्रकार कोई शिष्य गुरु से शक्तिपात तो प्राप्त करता है लेकिन मंत्र जप साधना के मार्ग पर नहीं चलता है तो गुरु द्वारा प्रदान किये गये, वरदान स्वरूप शक्तिपात का वह उचित उपयोग नहीं कर पाता। इसलिये प्रत्येक शिष्य में साधना एवं शक्तिपात दोनों तत्व का समायोजन होना चाहिए। यह प्रारम्भिक अवस्था वाले शिष्य के लिये भी आवश्यक है और कई-कई वर्षों से जुड़े प्रौढ़ वृद्ध शिष्य के लिये भी आवश्यक है।

गुरुदेव ने आगे कहा कि – साधना का तात्पर्य केवल भक्ति नहीं है, साधना का तात्पर्य दैवीय शक्ति की ऊर्जा को अपने मन, वचन, भावना, शरीर और प्राण में स्थापित करना। इसी प्रकार शक्तिपात दीक्षा में भी गुरु द्वारा इन पांचों तत्वों को जाग्रत किया जाता है। इसीलिये प्रत्येक साधक को साधना और दीक्षा दोनों तत्वों से निरन्तर ऊर्जा प्राप्त करना आवश्यक है।

इसीलिये इस बार बगलामुखी शक्ति तत्व को पूर्ण चैतन्य करने हेतु मैं प्रत्येक साधक, शिष्य को बगलामुखी साधना सम्पन्न करवाकर शक्तिपात युक्त दीक्षा प्रदान करूंगा।

बगलामुखी साधना के मंत्र बहुत कठिन नहीं है, अभ्यास द्वारा इस साधना को सरलता पूर्वक सम्पन्न किया जा सकता है। गुरुदेव ने निर्देश दिया है कि – आगे आने वाले दिनों में साधक को विशेष मुहूर्तों (चैत्र नवरात्रि 27 मार्च 2015 और बगलामुखी जयंती 26 अप्रैल 2015) में बगलामुखी साधना सम्पन्न करवाकर शक्तिपात युक्त बगलामुखी दीक्षा प्रदान करेंगे।

बगलामुखी साधना की दृष्टि से चैत्र और वैशाख मास में दो विशेष सिद्धि दिवस है। गुरुदेव के निर्देशोंनुसार प्रत्येक साधक को इन दोनों विशिष्ट मुहूर्तों में बगलामुखी साधना अवश्य सम्पन्न करनी है और बगलामुखी साधना के उपरान्त गुरुदेव द्वारा साधक-शिष्य को शक्तिपातयुक्त बगलामुखी मानस दीक्षा प्रदान की जायेगी।

चैत्र नवरात्रि में 27 मार्च 2015 को होमाष्टमी है और यह बगलामुखी साधना का सिद्ध मुहूर्त है, इस दिन साधना के पश्‍चात् गुरुदेव बगलामुखी दीक्षा का प्रथम चरण सम्पादित करते हुए मानस दीक्षा प्रदान करेंगे।

इसी प्रकार 26 अप्रैल 2015 को बगलामुखी जयंती है, उस दिन भी पूर्ण विधि-विधान सहित बगलामुखी साधना-पूजन करना है। बगलामुखी जयंती के दिन गुरुदेव द्वारा शक्तिपात युक्त बगलामुखी मानस शक्तिपात दीक्षा का दूसरा चरण प्रदान किया जायेगा।

साधना और दीक्षा दोनों की क्रिया का समायोजन होना आवश्यक है अर्थात् प्रत्येक साधक को विधि-विधान सहित साधना भी सम्पन्न करनी है और शक्तिपात दीक्षा भी प्राप्त करनी है।

ये दो चरणों की साधना और दीक्षा आपके जीवन की सबसे अधिक क्रांतिकारी घटना होगी, आप स्वयं इसके साक्षी बनेंगे, आप स्वयं कर्त्ता बनेंगे, आप स्वयं भर्त्ता बनेंगे, आप स्वयं शक्तितत्व से आपूरित होंगे। मैं आपको बगलामुखी साधना दीक्षा की अग्रिम बधाई देता हूं।

– राम चैतन्य शास्त्री

When the Divine Grace of SadGuru ShowersThen He

  • Decorates with His own hands
  • Provides the Courage
  • Bestows Energy to Destroy Barriers

To the disciple

The Baglamukhi Sadhana embodies both Strength and Courage

Baglamukhi Sadhana

Accomplish and Obtain

Blessings and Boons from Gurudev

Shaktipaat Yukt Teevratam Baglamukhi Manas Diksha

Cheitra Navratri March 27, 2015

Baglamukhi Jayanti April 26, 2015

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Gurudev imparted Special Manas Baglamukhi Diksha to disciples on May 18, 2013. That day was a glorious day in the life of the disciples, when Gurudev planted Victory and Valor on their foreheads. He conferred the most powerful Shaktipaat. The Sadhaks who received this Shaktipaat are in your midst, and you yourself may enquire from them about the massive change in their life after obtaining Baglamukhi Diksha? Each atom of their body is filled with divine energy, their ability to struggle has increased manifold, and they have been continuously quelling the obstacles within their lives. Their problems are getting eradicated. They have been restricting their enemies.

This all is the fruit of Gurudev’s grace , which has awakened novel consciousness in the disciples.

Many Sadhaks had wrote their experiences after receiving Baglamukhi Diksha, many Sadhaks had become nervous after the initial initiation, got distracted, some got fever, but Gurudev’s instructions to them were to continuously chant Baglamukhi Mantra. This resulted in the fact that after some days, the disciples began experiencing removal of diseases and sorrow from their lives through Shaktipaat and Mantra-chanting; and an emergence of a new intense energy from within.

I will like to reiterate the words which SadGurudev Nikhileshwaranand Paramhans Swamiji had said in a sermon, a few extracts –

“If there is any fear in life, then that fear should be removed and the process of achieving complete victory over obstacles in life is called Baglamukhi Sadhana. This is the most precarious Sadhana and also the most benign Sadhana as well; i.e. both invigorated and normal Sadhana. I am telling you about both forms because Baglamukhi Sadhana is the best Sadhana in both these forms.

The Baglamukhi Sadhana is very potent, I can bestow and make my disciples, Sadhaks and worshippers realize this potent Baglamukhi Sadhana, because this Sadhana has three consecutive stages. At the conclusion of the first stage … the second stage, after second stage …. The third stage, but the Guru continuously watches and checks the disciple.

Both men and women can perform this Sadhana. If you are lewd, then this is your shortcoming, if you are lustful, then you are guilty, if we cannot control ourselves, cannot lead a disciplined life, then we cannot achieve Siddhi in Sadhana and a disciplined life is a pre-requisite for success in Baglamukhi Sadhana.

You may have children, may have servants and luxury; but to think only about that for entire twenty-four hours will make you a slave to your body. There should be a disciplined orderly life. The woman who accomplishes Baglamukhi Sadhana, she bears highly magnificent children.

Baglamukhi Sadhana-Diksha is absolutely Saatvik (virtuous), and this is a very beneficial Sadhana for your welfare; since you face obstacles, constraints, difficulties, fear at each step of your life; and there is no better Sadhana to obtain freedom from these. If you have the capability, you can accomplish it.

The Baglamukhi Sadhana converts all qualities and attributes into stunning magnificence, and when a Sadhak becomes bold, he does not cry any more, does not fold hands to plead or beg; because his entire body energizes, and each atom of his body galvanizes into action.

The Sadhaks desirous of realizing Siddhashram Sadhana or Kundalini Jagran Sadhana, should also first accomplish Baglamukhi Sadhana, only then they will achieve success in these Sadhanas; else Kundalini awakening takes a lot of time. This is also called Pitambara Sadhana. “

– SadGurudev Nikhil

Jihwagrmadaye Karen Devi Wamen Shatrun Paripeedyantim |

Gadaabhighaten Cha Dakshinen Pitambradyan Dvibhujam Namami ||

The meditation of Bhagwati Baglamuhi clarifies clearly that Pitambara Shree Vidhya Baglamukhi completely eliminates all the enemies, discord, disdain and fear (poison like) coming in the path to obtain Amritatva (nectar). The Goddess curbs the intelligence and voice of the enemies-opponents, so that they cannot conspire against you. The enemies cannot cause obstacles, strife or problems in your life due to their frozen voice and stifling intelligence.

Baglamukhi destroys the progress or rise of the enemies. The enemies cannot humiliate her worshippers and Mother Baglamukhi quells the fear causing foes. Thus the life can be made peaceful and joyful by destroying all obstacles and problems through the Sadhana-worship of Goddess Baglamukhi.

Nectar Benefactor – Gurudev and SadaShiv

A disciple’s life contains thousands of discomforts, and he himself is not capable enough to overcome the various odds with his own strength and power. Every person experiences the problems listed in the beginning of the article; and he often thinks ‘Is this life a curse or a blessing? ” It is said that one obtains human life after passing though millions of other life-forms, and then why there is so much suffering and pain in this human life? The Sadhak-disciple approaches and seeks shelter of God, meditates upon divine powers and meets his Guru; to obtain answers to these very questions.

Guru has been designated as Dewadhidev Mahadeva Shiva, because Guru is a form of Lord Shiva and his objective is to partake the deadly poison of disciples, Sadhaks and devotees of this world; and grant them salvation and freedom from the suffering. A disciple also approaches his Guru with the same hope and faith to obtain victory over the life-struggles through Gurudev’s grace.

The Guru grants His power to the disciple, while taking over the pains of the disciple on Himself and consuming the deadly venom Himself. The process of bestowing nectar to the disciple, while removing the poison of disciple’s pains from disciple’s life is called Diksha. The Diksha directly means – ‘Shaktipaat’. The rapid strong flow of Energy removes out the obstacles and problems from the mind and flesh. When the toxins of obstructions and sufferings get eradicated, then each atom of body starts getting filled with divine nectar.

SadGurudev grants this heavenly nectar to His disciples, He (SadGurudev) bestows joy, happiness and energy to his disciples by removing the toxins from their life. He transmits the nectar sap into them, thereby pushing ahead the stationary ship of their life. One of the major impediment in the path of life is – the enemy problem.

The Enemy-hurdle completely affects a person’s thoughts, opinions along with his daily-schedule. He cannot move around fearlessly, he cannot fly in the blue sky freely like a bird. Every moment and second of his life is lost in contemplating plans to eliminate this obstacle.

Destroy the Enemy

Gurudev has said – A particular individual is not your enemy. Your strength and power is less than the strength and power of the other person, and so you perceive that person as the enemy. The day your strength and power increases, the enemy gets defeated automatically.

If there is mutual discord and disharmony in a family, if they cannot understand each other, then it is also an obstruction in the life. This impediment should also be resolved like the enemy obstacle.

If the body is willing but the mind is not, or if the mind is willing but the body is not; then this is also a situation of conflict in life. The foe-like diseases and afflictions wish to control your body. If the antagonists like worry and tension are controlling and influencing your mind, then it is important to restrict and eliminate them. If you make a huge effort in your work, but you do not obtain even half the results of your labors, then this is also an hindrance, in the form of an hostile foe.

Gurudev advises that such adverse conditions should be completely eliminated. These are obstacles, they must be fully rooted out. Every man, every Sadhak should develop the ability to restrict, impede and destroy such hindrances.

Both Sadhana and Diksha are Essential

A few days ago, I reluctantly asked Gurudev – Hey Gurudev! What is the reason that some disciples achieve completion on time, while others keep waiting. Why you do not bestow your special grace on everyone?

Gurudev replied – Divine grace is the same at all. A person suffers or enjoys due to his own destiny. One who becomes a disciple, sometimes commits mistakes. A disciple should fully understand two points on the day of disciplehood, and these two points are – Shaktipaat Diksha and Sadhana.

There should be continuous harmony between these two. A Sadhak who continues to performs Sadhanas but does not obtain Shaktipaat regularly, he does achieve success, but this success gets delayed. Such disciples become frustrated and exasperated. Similarly a disciple receives Shaktipaat but does not perform mantra-chanting Sadhanas, then he is not able to make proper use of the Shaktipaat gift bestowed by Gurudev. So there should be an appropriate correlation between Sadhana and Shaktipaat in each disciple. This disciple is important for the initial beginners, as well as mature disciples.

Gurudev further elaborated – Sadhana does not imply only plain devotion, Sadhana entails establishment of divine power and energy into the mind, voice, emotion, body and spirit. Similarly these five elements are activated during Shaktipaat Diksha. So each Sadhak should obtain sustainable energy through both Sadhana and Diksha aspects.

So, this time I will grant Shaktipaat Diksha to each Sadhak and disciple after accomplishment of Baglamukhi Sadhana, to totally energize the Baglamukhi Shakti Tatva.

The mantra of Baglamukhi Sadhana is not very difficult. This Sadhana can be performed easily though practice. Gurudev has directed that – in the coming days He will grant Shaktipaat Yukt Baglamukhi Diksha after accomplishment of Baglamukhi Sadhana to Sadhaks on special Muhurats (Cheitra Navratri March 27, 2015 and Baglamukhi Jayanti April 26, 2015).

There are two special Siddhi Days in Cheitra and Veishakh months for Baglamukhi Sadhana. Every Sadhak should perform Baglamukhi Sadhana on these two muhurats as per Gurudev’s direction; and after Baglamukhi Sadhana, Gurudev will bestow Shatipaat Yukt Baglamukhi Manas Diksha to each Sadhak-disciple.

March 27, 2015 during Cheitra Navratri is Homashtami and it is a Siddh muhurath for Baglamukhi Sadhana. Gurudev will bestow the Manas Diksha of First Stage of Baglamukhi Diksha after conclusion of Sadhana.

Similarly April 26, 2015 is Baglamukhi Jayanti, you have to perform complete Baglamukhi Sadhana-worship with proper rites and rituals. Gurudev will bestow the Second Stage of Shaktipaat Yukt Baglamukhi Manas Diksha on Baglamukhi Jayanti.

There should be complete congruence between Sadhana and Diksha processes, so every Sadhak should perform Sadhana with proper rites and rituals, and should also obtain Shaktipaat Diksha.

This twin-stage Sadhana and Diksha will be the most revolutionary event of your life, you yourself will witness it, you yourself will be the subject, you yourself will be the object and you will be filled with divine Shakti-tatva energy. I congratulate you in advance for Baglamukhi Sadhana Diksha.

– Ram Cheitanya Shastri

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