व्यक्तित्व विकास (Personality Development)

 व्यक्तित्व विकास

व्यक्तित्व के चार शत्रु
क्रोध, अभिमान, माया, लोभ
व्यक्तित्व के चार मित्र
शांति, मधुरता, सरलता संतोष

 

व्यक्तित्व का तात्पर्य है, व्यक्ति के भीतर तत्व क्या है? व्यक्ति के भीतर का तत्व मन कहलाता है। एक व्यक्ति को समझने के लिये उसकी देह को समझना आवश्यक नहीं है। देह के भीतर स्थापित उसके मन को समझना आवश्यक है। इसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति अपने व्यक्तित्व के शत्रु, मित्र, गुण, अवगुण को पहचानने के लिये अपनी केवल बाह्य इन्द्रियों से विचार न करें। अपितु उसकी देह में स्थित मन के द्वारा विचार करें। मन ही व्यक्तित्व को स्पष्ट करता है।

 

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प्रत्येक व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का विकास करना चाहता है। उसकी यही इच्छा रहती है कि सब लोग उसे जानें, पहचानें, उसे यश की प्राप्ति हो, वह आंतरिक और बाह्य दोनों रूपों में बलशाली हो। जीवन में उसे निरन्तर विजय प्राप्त हो, उसका चरित्र श्रेष्ठतम् हो।
किसी के व्यक्तित्व को पहिचानने के लिए मनोविज्ञान, नीति शिक्षा, दर्शन, अध्यात्म और धर्म को आधार माना जाता है। क्या यह संभव है कि मनुष्य का व्यक्तित्व मनोविज्ञान की दृष्टि से, नीति की दृष्टि से, अध्यात्म की दृष्टि से और धर्म की दृष्टि से श्रेष्ठ हो सकता है? तो इसका उत्तर है ‘हां’, निश्‍चित रूप से मनुष्य साधारण व्यक्तित्व से उत्तम व्यक्तित्व बन सकता है। पुरुष से पुरुषोत्तम बन सकता है। अपने व्यक्तित्व को उत्तम शिखर पर ले जा सकता है। इस सम्बन्ध में जो व्याख्या हजारों वर्ष पहले सत्य थी वह आज भी सत्य है।
मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास में किन सद्गुणों का होना आवश्यक है यह बहुत विस्तृत विषय है लेकिन मनोविज्ञान, नीति शिक्षा, दर्शन सारे सूत्र मनुष्य के व्यक्तित्व विकास के चार पक्षों पर विशेष जोर देते हैं और उन सब का एक ही मत है। हजारों ॠषियों, मनीषीयों, शास्त्रकारों, नीतिकारों और धर्माचार्यों ने चार शत्रुओं को मनुष्य का अवगुण माना है। ये चार अवगुण मनुष्य के व्यक्तित्व के महाशत्रु कहे गये हैं। ये चारों अवगुण मनुष्य के मन में जाग्रत अथवा सुप्तावस्था में सदैव विद्यमान रहते हैं। जब ये चारों अवगुण फैलने लगते हैं तो मनुष्य का चारित्रिक, नैतिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक और भौतिक पतन भी हो जाता है। हम इन सबकी व्याख्या करने का प्रयास करते हैं कि मनुष्य के मन में कौन से ऐसे चार भाव हैं जो तीव्रतम भाव हैं और जिन्हें उसके व्यक्तित्व का शत्रु माना गया है जो अपना सिर बार-बार उठाने का प्रयास करते हैं।

 

मनुष्य के व्यक्तित्व के चार शत्रु हैं – 1. क्रोध, 2. अभिमान (मद, अंहकार),  3. माया (कपट, छलपूर्ण व्यवहार) और 4. लोभ (लालच, तृष्णा)
यह भी सत्य है कि प्रत्येक मनुष्य में यह चारों दुर्गुण, चारों दोष, ये चारों शत्रु थोड़ी बहुत मात्रा में अवश्य उपस्थित होते हैं। विशेषता इस बात की है कि – इन शत्रुओं को निरन्तर निष्क्रिय करते रहना है, इन पर नियन्त्रण करना है। जहां भी इन चारों दोषों में से किसी एक दोष के साथ भी समझौता कर लिया तो व्यक्तित्व हल्का हो जाता है। मनुष्य को बार-बार समझौता करना पड़ता है इसलिये इन चारों शत्रुओं से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करना है। इन्हें पूरी तरह से बलहीन करना है एवं इनका दमन करना है। विराट व्यक्तित्व बनने का यही तो मार्ग है आगे हम और अधिक समझने का प्रयास करेंगे कि क्रोध, मद,  माया और लोभ क्या हैं और इन पर विजय कैसे प्राप्त की जा सकती है?

 

मनुष्य के व्यक्तित्व का प्रथम शत्रु – क्रोध
किसी भी शत्रु पर विजय प्राप्त करने से पहले वह शत्रु कौन है, कैसा है, उसका कार्य कैसा है, वह किस प्रकार प्रहार करता है, उसकी कार्य योजना क्या है? इसे समझ लेना अति आवश्यक है।

 

आखिर क्रोध क्या है?
मनुष्य के व्यक्तित्व में, मन में मोहवश उत्पन्न आवेश के परिणाम को क्रोध कहा गया है। मानव का मन कई प्रकार के बंधनों से बंधा होता है और जब मन की इच्छाओं के अनुकूल कार्य नहीं होता है तो वे प्रतिकूल स्थितियां ही क्रोध का कारण बनती हैं। अतृप्त इच्छाएं क्रोध के लिये एक वातावरण का निर्माण करती हैं। क्रोध की स्थिति में मनुष्य किसी भी बात को सहन नहीं करता है, वह प्रतिशोध अवश्य लेता है लेकिन प्रतिशोध लेने के पश्‍चात् भी क्रोध पूरी तरह से समाप्त नहीं होता है। प्रतिशोध के पश्‍चात् भी क्रोध का चक्र किसी सुख पर समाप्त नहीं होता है।
क्रोध मनुष्य के विवेक का हरण कर लेता है। विवेक मनुष्य को यह बताता है कि क्या कार्य करना चाहिए और क्या कार्य नहीं करना चाहिए? क्रोध सबसे पहले विवेक को हरा देता है। अविवेक में आकर मनुष्य ऐसे कार्य कर लेता है जो उसे नहीं करने चाहिए। कितने आश्‍चर्य की बात है कि क्रोध के आते ही मनुष्य का विवेक चला जाता है और व्यक्ति असंतुलित हो जाता है। क्रोध की अग्नि सबसे पहले अपने स्वामी को जलाती है और उसके बाद दूसरे को जला देती है। यह बहुत बड़ा भ्रम है कि वीरता क्रोध के द्वारा उत्पन्न होती है। अन्याय, अत्याचार के विरुद्ध दृढ़ रहने के लिये क्रोध की कोई आवश्यकता नहीं है। क्रोध का एक ही उद्देश्य है – दूसरों का अहित कर देना। इस भाव से मनुष्य का हृदय प्रतिशोध से भर जाता है और क्रोध हृदय में एक बहुत बड़ा बोझा रखकर चलने के समान है। व्यक्ति के विकास के लिये क्रोध का दमन पूर्ण रूप से अति आवश्यक है। क्रोध के सम्बन्ध में महापुरुषों की सूक्तियां –
  • क्रोधो हि शत्रुः प्रथमो नराणामः
  • मनुष्य का प्रथम शत्रु क्रोध ही है। (माघ कवि)
  • क्रोधः शमसुखर्गला
  • क्रोध सुख शांति में बाधक है। (योग शास्त्र)
  • क्रोध एक तरह का पागलपन है। (होरेस)
  • क्रोध मूर्खों के हृदय में ही बसता है। (अल्बर्ट आइन्स्टाइन)
  • क्रोध वह तेजाब है जो किसी भी चीज पर डाला जाये तो वह उससे ज्यादा उस पात्र को अधिक हानि पहुंचा सकता है जिसमें उसे रखा गया है अर्थात् क्रोध जिस पर किया जाता है उसका नुकसान नहीं होता बल्कि जो क्रोध करता है उसी का नुकसान होता है। (मार्क ट्वेन)
  • मूर्ख मनुष्य क्रोध को जोर-शोर से प्रकट करता है, किन्तु बुद्धिमान शांति से उसे वश में करता है। (बाइबिल)
  • क्रोध में मनुष्य अपने मन की बात नहीं कहता, वह केवल दूसरों का दिल दुखाना चाहता है। (प्रेमचंद)
  • जिस तरह उबलते हुए पानी में हम अपना, प्रतिबिम्ब नहीं देख सकते उसी तरह क्रोध की अवस्था में यह नहीं समझ पाते कि हमारी भलाई किस बात में है। (महात्मा बुद्ध)
प्रतिशोध लेने की इच्छा, क्रोध को आश्रय देना कई कष्टों का आधार है। जो व्यक्ति क्रोध को आश्रय देता है वह जीवन के सामान्य सुख और आनन्द से वंचित रह जाता है। दूसरों से मेल-मिलाप, प्रेम, प्रतिष्ठा, आत्म-संतोष सभी स्वाभाविक गुण क्रोधी व्यक्तित्व से बहुत दूर हो जाते हैं। इस कारण क्रोध से भरा व्यक्ति सदैव अनिष्ट संघर्ष और तनाव के उतार-चढ़ाव में ही अपने जीवन का आनन्द समझता है। वह समझता है कि क्रोध ही उसका कर्म है और क्रोध पुरुषार्थ का प्रतीक है। ये केवल और केवल भ्रम है और जो इस भ्रम में जीवन बिताते हैं उनका जीवन तनाव में ही गुजरता है।
क्रोध को शांति और क्षमा से ही जीता जा सकता है और ऐसा मत सोचना की क्षमा केवल शत्रुओं के लिये, प्रतिपक्षियों के लिये ही हो। स्वयं के हृदय को तनाव और दुर्भाव से मुक्त करने की क्रिया क्षमा और दया ही है। किसी भी बात को तूल देने से बचाने के लिये उस बात को भुला देना, खुद को क्षमा करना ही है। जैसे ही कोई आवेशपूर्ण क्रोधपूर्ण विचार आये उस विचार को क्षमा कर देना, समाप्त कर देना ही शांति का उपाय है। जीवन में आने वाली समस्याओं ओर कलह के विस्तार को रोकने का उद्यम करना, क्रिया करना भी क्षमा ही है। यदि हमारे भीतर करुणा और क्षमा का झरना निरन्तर बहता रहता है तो क्रोध की चिंगारी उठते ही करुणा और क्षमा की शीतलता से शांत हो जायेगी। विकास तो क्षमाशील भाव का करना है, पराक्रम क्रोध में नहीं है, पराक्रम क्षमा में है। क्रोध को जीत कर ही व्यक्तित्व को उच्च बनाया जा सकता है।

 

मनुष्य के व्यक्तित्व का दूसरा शत्रु – मान (मद, अहंकार)
प्रत्येक मनुष्य के मन में मोह अवश्य होता है यह मोह मन को चलाता है। इस मन पर बुद्धि का अधिकार रहता है और जब इस बुद्धि में ॠद्धि, सिद्धि, समृद्धि, सुख और जाति का प्रभाव और उसी का चिंतन आ जाता है तो उसे अभिमान कहा जाता है। अभिमान के स्वरूप हैं – मद, अहंकार, घमण्ड, गर्व, दर्प, ईगो और ‘मैं’ का भाव। मनुष्य किस बात पर अभिमान करता है, मनुष्य अपने कुल, जाति, बल, रूप, तप, ज्ञान, विद्या, कौशल, लाभ और ऐश्‍वर्य पर अभिमान (मद) करता है।
अभिमान वश मनुष्य अपने आपको बड़ा और दूसरों को छोटा समझता है। अहंकार के कारण व्यक्ति दूसरों के गुणों को सहन नहीं कर पाता है वह दूसरों की और उनके गुणों अवहेलना करता है। अभिमान के कारण ही मनुष्य को अपने ‘मैं’ पर घनघोर आसक्ति पैदा हो जाती है। घमण्ड ही दर्प और ईर्ष्या का उत्पादक है। अपने घमण्ड की रक्षा के लिये अपने गर्व के बोझ से भारी मन गिर जाता है, अभिमान के लिये प्रशंसा एक चारे के समान है। जहां भी व्यक्ति के अहंकार को सहलाया जाता है, उसकी प्रशंसा की जाती है, वह उस व्यक्ति का गुलाम सा बन जाता है। याद रखिये, अभिमान और स्वाभिमान अलग-अलग हैं। अभिमान, स्वाभिमान को कभी टिकने नहीं देता है। स्वाभिमान में व्यक्ति शांत होता है और अभिमान में व्यक्ति अपने अहंकार को बढ़ाने के लिये अपने यश को बढ़ाने के लिये दूसरों को छोटा दिखाने का और दूसरे से अपने आपको बड़ा बताने के भाव का निरन्तर विकास करता रहता है। अहंकार की वृद्धि का मूल ईर्ष्या का भाव ही है। ईर्ष्या बीज है और अहंकार उसका पौधा है और ईगो उसका फल है।
मान (अहंकार) के सम्बन्ध में महापुरुषों की सूक्तियां –
  • अहंकारो हि लोकानाम् नाशय न वृद्ध्ये।
  • अहंकार से लोगों का केवल विनाश होता हैं, न कि वृद्धि। (तत्वामृत)
  • अभिमांकृतं कर्म नैतत् फल्वदुक्यते।
  • अभिमान युक्त किया गया कार्य कभी फलप्रद नहीं हो सकता। (महाभारत पर्व 12)
  • मा करू धन जन यौवन गर्वम्।
  • धन-सम्पत्ति, स्वजन और यौवन का गर्व मत करो क्योंकि यह सब पुण्य से ही प्राप्त होते हैं और पुण्य समाप्त होते ही खत्म भी हो जाते हैं। (शंकराचार्य)
  • अभिमान नौका में छिद्र के समान है। नौका छोटी हो या बड़ी, एक दिन छिद्र नौका को डूबो देता है। (कालिदास)
  • समस्त महान् गलतियों की तह में अभिमान ही होता है। (रस्किन)
  • जिस त्याग से अभिमान उत्पन्न होता है, वह त्याग नहीं है। त्याग से शांति मिलनी चाहिए। अंततः अभिमान का त्याग ही सच्चा त्याग है। (विनोबा भावे)
  • अभिमान करना अज्ञानी का लक्षण है। (सूत्रकृतांग)
  • जिनकी विद्या विवाद के लिए, धन अभिमान के लिए, बुद्धि का प्रयोग ठगने के लिए तथा उन्नति संसार के तिरस्कार के लिए है। उनके लिये प्रकाश भी निश्‍चय ही अंधकार है। (क्षेमेन्द्र)

सबसे विचित्र बात यह है कि अभिमान से मनुष्य ऊंचा बनना चाहता है किन्तु अभिमान का परिणाम सदैव दूसरों को नीचा बनाने का ही आता है।

अपनी बुद्धि का अभिमान ही मनुष्य के अन्तर मन में शास्त्रों और संतों के विचारों को आने ही नहीं देता है। अभिमान केवल यही समझता है कि मैं ही परम ज्ञानी हूं। मैं ही सबसे बड़ा जानकार हूं। अभिमान मनुष्य के विवेक को भी उससे दूर भगा देता है। अभिमान ही मनुष्य को शील, सदाचार से गिरा देता है। अभिमान ही मनुष्य के मन में यह भाव लाता है कि ‘मुझे किसी की कोई परवाह नहीं है।’, ‘मेरा कोई क्या बिगाड़ सकता है।’। अभिमान में मनुष्य अंधा बन जाता है, वह अपने अभिमान को बनाये रखने के लिये, दूसरों का अपमान पर अपमान करता रहता है और उसे कुछ भी गलत करने का अहसास ही नहीं होता है। अभिमान इतना अंधा होता है कि वह यह भूल जाता है कि प्रतिपक्ष भी अपने मान को बचाये रखने के लिये पूरा संघर्ष करेगा। इस स्थिति में आत्म चिन्तन का भाव समाप्त हो जाता है। अभिमान यह सोचता है कि यह मेरा स्वाभिमान है और कभी कहता है कि यह मेरी बुद्धिमत्ता है। वास्तव में व्यक्तित्व के शत्रुओं में अभिमान ही सबसे अधिक प्रभावशाली और प्रबल शत्रु है।
अपने स्वाभिमान को कभी अभिमान तक पहुंचने मत दो, अपने स्वाभिमान को सुरक्षित रखो लेकिन किसी को भी कम बुद्धिमान मत समझो।
अभिमान को केवल और केवल मधुरता और कोमल वृत्ति भाव से जीता जा सकता है।
अहंकार को शांत करने का एकमात्र उपाय है विनम्रता। सोचो दुनिया भर ने यह जान लिया कि संसार में किसी का अभिमान स्थायी नहीं रहा है चाहे वह रावण जैसा दुर्जेय क्यों न हो, अभिमान तो समाप्त हुआ ही है। इसलिये व्यक्तित्व विकास के लिये अभिमान को समाप्त कर विनम्रता का विकास आवश्यक है।

 

मनुष्य के व्यक्तित्व का तीसरा शत्रु – माया (कपट, छल पूर्ण व्यवहार)
मनुष्य के व्यक्तित्व का प्रधान अंग है मन और इसी मन में मोह उत्पन्न होता है। न मनुष्य के मन को खराब कहा गया है और न मोह को खराब कहा गया है। लेकिन जब इसी मन में मोह वश मन, वचन, काया की कुटिलता द्वारा कपट, धूर्तता, धोखाधड़ी और ठगी उत्पन्न होती है तो उसके परिणाम को ‘माया’ कहा गया है। माया मनुष्य के व्यक्तित्व का वह प्रस्तुतीकरण है जिसमें मनुष्य तथ्यों को गलत रूप से रखता है। माया के स्वरूप है – कुटिलता, प्रवंचना, चालाकी, चापलूसी, वक्रता, छल और कपट। साधारण रूप से इन सबको बेईमानी कहा गया है। माया का मतलब केवल धन नहीं है। माया का तात्पर्य है, अपने विचार, अपनी वाणी और अपने व्यवहार के प्रति ईमानदार नहीं रहना। दुर्गुणी माया का अर्थ – प्रचलित धन-सम्पत्ति नहीं है, धन के कारण जो झूठ उपजता है, झूठे सुख का आभास होता है, लालच का विकास होता है, कुटिलता का विकास होता है उसे माया कहा गया है। माया के वशीभूत व्यक्ति सत्य का प्रस्तुतीकरण भी इस प्रकार करता है जिससे उसका स्वार्थ सिद्ध हो। माया रूपी दुर्गुण के वश व्यक्ति केवल और केवल अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिये ही सोचता है। माया ऐसा कपट है जो सर्वप्रथम मनुष्य के ईमान और निष्ठा को काट देती है। माया में उलझा व्यक्ति कितना भी सत्य समर्थक रहे लेकिन वह अविश्‍वसनीय ही रहता है।
तथ्यों को तोड़ना मरोड़ना और जालसाजी कर विश्‍वसनीय रूप देना एक कपट है और इस कपट को ही माया कहा गया है। दूसरों को भरोसे में रखकर अपनी जिम्मेदारी से मुख मोड़ना भी माया ही है। इस माया के वश में होकर हर मनुष्य सोचता है कि वह अपने घर-परिवार को पाल-पोस रहा है। अपनी उन्नति के लिये कार्य कर रहा है वास्तव में व्यक्तित्व की नैतिक निष्ठा को समाप्त कर देेने वाला दुर्गुण माया ही है।
जैसे एक जादूगर माया जाल दिखाता है और दर्शक भ्रमित हो जाते हैं उसी प्रकार माया के वशीभूत व्यक्ति स्वयं को भ्रमित करता है अपने घर-परिवार समाज को भ्रमित करने का प्रयास करता है लेकिन अन्ततः स्वयं माया का शिकार हो जाता है क्योंकि माया के वश में वह स्वयं अपने ‘स्व’ को भूल जाता है।
माया (कपट) के सम्बन्ध में महापुरुषों की सूक्तियां –
  • माया दुर्गति-कारणम्।
  • माया दुर्गति का कारण है। (विवेक विलास)
  • मायावशेन मनुजो जन-निंदनीयः।
  • कपटी मनुष्य जन-जन में निंदनीय होता है। (सुभाषित रत्न संदोह)
  • बुद्धिमत्ता की पुस्तक में ईमानदारी पहला अध्याय है। (थॉमस जैफर्सन)
  • कोई व्यक्ति सच्चाई, ईमानदारी तथा लोक-हितकारिता के राजपथ पर दृढ़तापूर्वक रहे तो उसे कोई भी बुराई क्षति नहीं पहुंचा सकती। (हरिभाऊ उपाध्याय)
  • मनुष्य की प्रतिष्ठा ईमानदारी पर ही निर्भर है। (अज्ञात)
माया से जीतने का एक ही उपाय है, वह है मन की सरलता, व्यवहार की सरलता। मन और व्यवहार में कुटिलता आ गई तो मनुष्य असत्य बोलता है, असत्य आचरण करता है। दूसरों को भ्रमित करने का प्रयास करता है और स्वयं उसी भ्रम का शिकार हो जाता है। शास्त्र कहते हैं कि संसार माया चक्र है तो उनके कहने का सरल अर्थ है कि इस जगत के भ्रम को तुम समझो और सरल भाव से व्यवहार करो। अपने आपको किसी भ्रम में मत रखो। यह जीवन ईश्‍वर का दिया हुआ उपहार है इसे सरलता और सद्भाव के साथ जीओ।

 

मनुष्य के व्यक्तित्व का चौथा शत्रु – लोभ (लालच, तृष्णा, असंयम, प्रलोभन)
व्यक्ति के मन का अंतिम और महत्वपूर्ण शत्रु लोभ है। लोभ का तात्पर्य केवल इच्छा, लालसा, कामना नहीं है। इच्छा, लालसा, कामना तो जीवन के आवश्यक अंग हैं। यहां तक कि भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं गीता में कहा है कि – ‘इच्छाविहीन नरस्य पशुर्समान’ अर्थात् इच्छाहीन व्यक्ति तो मनुष्य रूप में पशु ही है। लेकिन जब इच्छा पर लोभ आ जाता है और लोभ मोह के कारण द्रव्य इत्यादि वस्तुओं पर अति ममत्व आ जाता है और उसके परिणाम स्वरूप जो असंतोष मन में उत्पन्न होता है उसे लोभ कहा गया है। लोभ के स्वरूप हैं – लालच, प्रलोभन, तृष्णा, असंयम के साथ अनियन्त्रित एषना।
संग्रह प्रवृत्ति, अदम्य आकांक्षा, कृपणता (कंजूसी), प्रतिस्पर्धा, प्रमाद आदि लोभ के ही भाव हैं।
धन, द्रव्य एवं भौतिक पदार्थों सहित अपनी कामनाओं की प्राप्ति के लिये असंतुष्ट रहने की वृत्ति को लोभ वृत्ति कहा गया है। लोभ की दुर्भावना में मनुष्य में हमेशा और अधिक… और अधिक… पाने की चाहत बनी रहती है।
लोभवश मनुष्य अपने जीवन के समस्त कार्य, समय, प्रयास, चिन्तन, शक्ति और संघर्ष केवल और केवल स्वयं के हित साधने में ही लगे रहते हैं। इस प्रकार लोभ मनुष्य के स्वार्थ को महाबली बना देता है।
लोभ (लालच) के सम्बन्ध में महापुरुषों की सूक्तियां –
  • लोभो व्यसन मंदिरम्
  • लोभ अनिष्ट प्रवृत्तियों का मूल स्थान है। (योग सार)
  • लोभ मूलानि पापानि
  • लोभ पाप का मूल है। (उपदेश माला)
  • त्याग यह नहीं कि मोटे और खुरदरे वस्त्र पहन लिए जायें और सूखी रोटी खायी जाये, त्याग तो यह है कि अपनी इच्छा अभिलाषा और तृष्णा को जीता जाये। (सुफियाना सौरी)
  • जरा (बढ़ती उम्र) रूप को, आशा धैर्य को, मृत्यु प्राण को, क्रोध श्री को, काम लज्जा को हरता है पर अभिमान सब को हरता है। (विदुर नीति)
  • क्रोध को क्षमा से, विरोध को अनुरोध से, घृणा को दया से, द्वेष को प्रेम से और हिंसा को अहिंसा की भावना से जीतो। (दयानंद सरस्वती)
जब लोभ व्यक्ति के जीवन में आ जाता है तो सबसे पहले उसके धैर्य को खा जाता है। लोभ सदैव व्यक्ति से जल्दबाजी में कार्य करवाता है। लोभी व्यक्ति अपना हित साधने में आने वाली विपत्तियों पर भी ध्यान नहीं दे पाता है क्योंकि उसके मस्तिष्क में केवल और केवल स्वयं का स्वार्थ साधने का उद्देश्य प्रबल रूप से स्थापित हो जाता है। इसीलिये लोभ ईमान का शत्रु है और लोभवश व्यक्ति सबसे पहले अपनी नैतिकता को खो बैठता है। वह सामाजिक मर्यादा को, आचार-विचार संहिता को बिल्कुल भूल जाता है। लोभ सदैव मनुष्य को दुष्कार्यों की ओर ले जाता है। इसीलिये लोभ को महाशत्रु कहा गया है।
अब प्रश्‍न उठता है कि लोभ को कैसे जीता जा सकता है? लोभ रूपी महाशत्रु को केवल और केवल संतोष से जीता जा सकता है। लोभ रूपी शत्रु को अनासक्त भाव से जीता जा सकता है। लोभ रूपी शत्रु को केवल इस भाव से जीता जा सकता है कि ‘जो मुझे ईश्‍वर ने दिया है, उसके लिये ईश्‍वर का धन्यवाद लेकिन मैं मेरी शक्ति को और अधिक प्राप्त करने के लिये शांति, मधुरता, सरलता और बुद्धि के साथ प्रयास अवश्य करूंगा।
याद रखिये संसार में आपका शत्रु कोई व्यक्ति, घटना और स्थान नहीं है। केवल व्यक्ति, घटना और स्थान पर केन्द्रित कर जीवन की यात्रा श्रेष्ठ रूप से पूरी नहीं की जा सकती है। जीवन की यात्रा आनन्द पूर्वक पूर्ण करने के लिये अपने व्यक्तित्व के भीतर छुपे शत्रुओं को पहचान कर उनका मर्दन करना आवश्यक है। शांति, मधुरता, सरलता, संतोष आपके मित्र हैं। इन मित्रों को बढ़ावा देना है, अपने मन में इन मित्रों का विकास करना है। हर विपरीत परिस्थिति में अपने इन चारों मित्रों को याद कीजिये, ये हर समय आपको सहयोग देने के लिये दौड़े-दौड़े चले आयेंगे और आज से यह निश्‍चिय कर लीजिये कि आप अपने जीवन से, अपने व्यक्तित्व से क्रोध, अभिमान, माया और लोभ रूपी शत्रुओं को समाप्त कर देंगे।
Personality and Moral Development 

Four Foes of Your Personality

Anger, Pride, Deceit, Greed

Four Friends of Your Personality

Peace, Sweetness, Simplicity Satisfaction

The basis of Personality is – What are the inherent elements within the individual? The core element within a person is called “Mind”. It is not required to understand a person’s physical body to comprehend a person. It is essential to understand the mind within a person’s body. Similarly a person should not perceive the friend, foe, goodness or vileness from the external sensory senses. Rather, he or she should deeply consider them from the mind. The mind shapes an individual’s personality.
Everyone wants to develop their personality. Everybody  has an inherent desire that all people know him, recognize him, he gains fame, and he gathers power in both internal and external forms.  He wishes to continue to win in life, and wishes his character to become the finest.

Psychology, policy, education, philosophy, spirituality and religion are considered as base tools to decipher someone’s personality. Is it possible that a person’s personality can be superior in terms of psychology, in terms of policy, and in terms of spirituality and religion? Yes, the answer is yes, human personality can definitely turn from an ordinary personality into an outstanding personality, he can turn from an ordinary mortal into a superior being. He can achieve the pinnacle of his personality.  The explanation which was valid  thousands of years ago is still true.

The question that What virtues are essential for personality development, is  a very broad topic;  but the  psychology, philosophy and moral-ethics  have a consensus and they place a special emphasis on four areas of the human personality. Thousands of sages, ascetics, philosophers and religious leaders have considered four basic reasons of human misconduct.  These four vices have been considered as arch-enemy of the human personality. These four iniquities always exist in the human mind, whether dormant or active. The expansion of these evils always leads to  moral, ethical, intellectual, spiritual and physical decline. We endeavor to explain the four expressions in the human mind which are very sturdy enemies of his personality and constantly strive to strike repeatedly.

There are four enemies of the human personality – 1. Anger, 2. Pride (Ego, Vanity), 3. Maya (Deceit, Fraud) and 4. Greed (Avarice, Craving).

It is also true that every man has these faults, these evils, these four foes in small amounts. It is important to continuously subdue these enemies, to control them. Whenever one gives a concession to one of these enemies, the personality gets compromised, and one starts on the path of continuous compromise. So, one should not concede to these evils. They have to be completely decimated and suppressed. This is the path to develop a great personality. We will try to deeply understand the basis of Anger, Pride, Conceit and Greed and how to overcome these.

The first foe of the human personality – Anger

To conquer any enemy, we have to first understand who it is, what it is like, how it works, how it strikes, what is its modus-operandi etc. It is essential to comprehend these facts first.

What, then, is anger?

The result of a strong urge caused by attachments, within a human personality is called Anger. A person’s mind is bound by various types of shackles, and when the actions do not occur as per the wishes; then these adverse situations result in anger. The unquenchable desires create an environment of anger. A person with rage cannot tolerate anything, he definitely takes revenge; but the anger does not completely subside even after taking vengeance. Even after avenging, the cycle of anger does not terminate on any joyous note.

The anger seizes control of wisdom. The wisdom directs a person what he should or should not do. The wisdom is the first casualty of anger. A person filled with rage commits actions which he should not do. It is so surprising that the onset of anger eliminates wisdom and the person’s mind becomes unbalanced. The fire of anger first burns the self, and then the others. It is a great misconception that bravery and heroism are spawned by anger. Anger is not required to counter injustice, or to take a stand against tyranny. Anger has only one purpose – to cause harm to others. This feeling fills the human heart with vengeance and anger is akin to walking around with a huge burden on the heart. The suppression of anger is absolutely essential for the development of the individual.

Several maxims relating to anger are –

· Krodho Hi Shatruh Prathmo Naraanam

· Man’s first enemy is anger. (Magh poet)

· Krodhah Samsukhrgla

· Anger is an impediment to peace. (Yoga scriptures)

· Anger is a kind of madness. (Horace)

· Anger dwells only in the heart of fools. (Albert Einstein)

· Anger is the acid which, when poured into a vessel; causes more damage to the container itself. The rage does not cause damage to the person it is directed onto, rather it damages the owner itself. (Mark Twain)

· A Fathead manifest anger vigorously, but a wise subdues it calmly. (Bible)

· A person does not open his mind in anger, he just wants to hurt others. (Premchand)

· As we cannot see our reflection in boiling water, similarly while in rage, we cannot understand what is good for us. (Mahatma Buddha)

The desire of revenge, giving in to rage is the basis of many sufferings. The person who harbors anger gets deprived of normal happiness and joy in life. A grump personality moves away from interaction with others, love, honor, self-satisfaction etc. So, a person filled with fury always finds joy in unnecessary conflict and tension. He thinks that anger is his primary task, and that it symbolizes his potential. This is only a confusion and myth, and the people who live with this mis-perception fills their lives with stress.

Anger can be won only by  peace and forgiveness, and do not consider that pardon is only for enemies and foes. The only way to free our heart from stress and malevolence is forgiveness and mercy. Forgetting the matter instead of escalating it, is to forgive self. Immediately stopping and terminating any passionate thought coming into mind, is the way to peace. Countering the problems in life and stopping the strife, too is forgiveness. If the stream of compassion and forgiveness continuously flows in our heart, then any spark of anger will be cooled by the coolness of compassion and forgiveness. We need to develop the forgiving spirit; the power is not in anger, it resides within forgiveness. A winning personality can be created only by conquering anger.

The second foe of the human personality – Esteem ​​(ego, self-importance)

Every human mind contains attachment and this attachment drives the mind. The intellect directs this mind and when this intellect gets influenced by accomplishment, wealth, prosperity, happiness, and superiority of race; then it becomes pride. The various forms of pride are – esteem, ego, arrogance, haughtiness and expression of ‘I’. What is a person proud of?  A person takes pride in clan, race, strength, appearance, tenacity, wisdom, knowledge, skills, wealth and prosperity.

Pride causes a person to feel himself as superior and others inferior. The individual’s ego cannot tolerate other’s qualities and he disregards others and their abilities. The pride leads to strong attachment with the self and “I” “myself”. Pride produces arrogance and envy. This protection of pride causes mind’s fall from grace due to the heavy burden of ego, and the praise is the bait for the ego. Whomsoever caresses a person’s ego, praises it; makes him his slave. Remember, pride and self-respect are different. Pride does not let self-esteem to stay. Self-respect leads to a peaceful mind while the pride makes a person to continuously inflate self and demean others, so as to enhance his own ego and fame. The envy is the basic emotion to cause growth of pride.  You may consider envy as the seed, pride as the plant and ego as the overall fruit.

Several maxims relating to pride (ego) are –

· Ahankaro Hi Lokanaam Naashaye Na Vridhdhaye

· The ego can only destroy people, instead of their development (Tatwamrit)

· Abhimaankritam Karmam Netat Falvaduktye

· Any action performed with ego can never be fruitful (Mahabharata Chapter 12)

· Ma Karu Dhan Jan Youvan Garvam

· Do not boast about wealth, kinsfolk and youth, because you obtain them through the virtues, and these finishes after depletion of  virtues (Shankaracharya)

· Pride is like a hole in the boat. The boat may be big or small, the hole makes it sink one day. (Kalidasa)

· The cause of all major mistakes is the arrogance. (Ruskin)

· The sacrifice which causes arrogance is not a sacrifice. Sacrifice should lead to peace. Finally, the true sacrifice is sacrifice of ego. (Vinoba Bhave)

· Pride is a sign of ignorance. (Sutrakritang)

· A person whose knowledge is used for dispute, wealth for pride, intelligence for deceit and development for disdain of the world ; for him the light is indeed darkness. (Kshemendra)

It is amazing that a person wishes to elevate himself through pride, but the result of pride is always used to humiliate others.

The ego of intellect does not allow a person to imbibe the scriptures and views of the saints.

The pride only considers that I am the most wise and intelligent. I am the most knowledgeable. The arrogance also drives away the person’s wisdom. It causes his fall from piety and virtues. It brings only one thought to his mind, “I do not care for anyone. No one can affect me.” The individual becomes blind with ego, he keeps on insulting and humiliating others to maintain his pride, and does not realize anything is wrong. Pride is so blind that he forgets that other person will also try his utmost to counter him, to preserve his own respect. In such situation, the self-contemplation doesn’t get any chance. The pride considers itself to be self-respect, and sometimes thinks of arrogance as intelligence. In fact the most influential and dominant enemy of the personality is the pride. Do not ever let your self-respect become your ego, maintain your self-esteem, but do not consider others to be less intelligent.

The only method to counter ego is humility.  Think, it is globally recognized that the pride is never permanent, even the pride of a formidable person like Ravana vanquished, so pride always falls. Thus, it is necessary to develop humility to eliminate pride and arrogance.

The third foe of the human personality – Maya or Illusion (fraud, deceitful behavior)

The principal organ of the human personality is the mind and attachment grows from this mind. The human mind is not evil and the infatuation is not evil either. But when this obsession within mind causes fraud, deceit, deception and trickery through the dishonest words and actions; then the result is called “Maya”. Maya or illusion is the aspect of human personality through which he represents distorted facts. The various forms of illusion are – cynicism, trickery, cunning, flattery, deceit and fraud. All of these are generally classified as dishonesty. Maya is not just about money. Maya denotes not being honest with your  thoughts, your words and your behavior. This illusory maya  means – not proper wealth and luxury, the deceit which arises from wealth, the false pretense of pleasure, the development of greed, and growth of delusion and deception. An illusion -ridden person thus modifies truth to suit his convenience. Such a person only thinks only about his own selfish self-interest.  The deceit is a fraud which cuts off the man’s faith and loyalty. Even if a deceit-driven person tries his utmost to support truth, he will still be considered as treacherous and disloyal.

The distortion of facts and presenting altered facts credibly is a fraud and this fraud is called illusion. Keeping others in confidence while abstaining from responsibilities is also called illusion. Every person within this illusory net believes that he is bringing up his family, and is working for their progress. However, the destruction of moral integrity in a person’s personality is caused only by illusion.

A magician displays illusion and the viewers get tricked, similarly a deceit driven person tricks himself. He tries to deceive his family and society, but finally becomes a victim of illusion himself, because he forgets his own “self” within the illusory web.

Several maxims relating to illusion (deceit) are –

• Maya Durgati-Kaaranam.

• Maya causes misery. (Vivek Vilas)

Mayavsen Manujo Jan-Nindaniyah.

• A Rogue is infamous everywhere. (Subhaashit Ratna Sandoh)

• Honesty is the first chapter in the book of wisdom. (Thomas Jefferson)

• If a person stays firmly on the golden path of truth, honesty and public-welfare, then nobody can cause him any harm. (Haribhau Upadhyaya)

•  A man’s reputation depends on his honesty. (Unknown)

There is only one way to conquer Maya or illusion, and that is simplicity within mind and a gentle behavior. If deception enters human mind or behavior, then the person speaks untruth, and displays dishonest conduct. He attempts to mislead others and falls prey to same delusion. When the scriptures state that the world is an illusory-cycle, then they mean that you should comprehend the deception of this world and behave simply. Do not delude yourself. This life is a gift granted by God, you should live it with simplicity and harmony.

The fourth foe of human personality – avarice (greed, craving, impatience, seduction)

The final and crucial enemy of  mind is greed. Greed does not imply only the desires, wishes and yearnings. The desires, wishes and yearnings are an essential aspect of life. Even Lord Krishna stated in the Gita itself – ‘Ichchhavihin Narasaye Pashursmaan’ i.e. a desireless person is  an animal in human form. But when the greed overpowers desire and one covets money due to an attachment with greediness; then the resultant discontent generated in the mind is called as avarice. Various forms of avarice are – greed, temptation, craving, and uncontrolled impatience.

Collective nature, irrepressible desire, parsimony (stinginess), competition, neglect etc. are various expressions of greed.

The dissatisfied instinct to obtain money, wealth and material goods for realization of desires is called greediness nature. The ill nature of  greed in man always drives him to want more, more … and more …

A greedy person spends all his actions, time, effort, thoughts, energy and struggle throughout life to pursue his own self-interest. Thus greed enhances the selfishness of man.

Several maxims relating to avarice (greed) are –

• Lobho Vyasanam Mandiram

• Greed is the root of all evil tendencies. (Yoga abstract)

Lobh Moolani Paapani

• Greed is the root of sin. (Updesh Mala)

• Wearing coarse, rough clothes and eating dry bread is not sacrifice, the real sacrifice is to renounce desires, wishes and cravings. (Shufiyana Saory)

• Old age defeats beauty, hope defeats patience, death defeats life, anger defeats wealth, lust defeats shame but egoistic pride defeats all. (Vidur Niti)

• Win over anger by forgiveness, antagonism by supplication, hatred by mercy, malice by love, and violence by non-violent emotions. (Dayanand Saraswati)

When greed enters a person’s life, it first consumes his patience. Greed always makes a person act in haste. A greedy person does not even take heed of various troubles coming in the way, because his brain concentrates only towards enhancing self-interest. So greed is the enemy of faith and a greedy person first loses his morality. He completely forgets the  social decorum, good conduct and manners. Greed always leads man to wickedness. Thus the greed is called the archenemy.

Now the question arises that how to conquer greed? This archenemy in the form of greed can only and only be subjugated by contentment. The greed can be conquered by detachment.  This greed foe can only be won by taking following approach – “I thank God for whatever He has granted me, but I will firmly endeavor to enhance my powers by peace, sweetness, simplicity and wisdom. ‘

Remember, no person, event or place is your enemy in this world. You cannot accomplish the journey of life by concentrating on a person, place or event. You need to seek, recognize and demolish the hidden enemies within your personality to complete the journey of life joyfully. Your friends are peace, sweetness, simplicity and contentment. You need to promote these pals, you need to develop these chums in your mind.  Please remember these four friends in every adverse situation, they will always rush to support you; and decide from today to terminate the anger, pride, delusion and greed enemies from your personality for ever.

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Life will be full of attachments

Every human mind has a deep connection with the attachment to his soul, and love arises from the same situation. This attachment is of two forms – passion and envy.

When attachment is in the favorable position of the mind, it is called passion. The passion is always enjoyful, it is full of joy. However, when the attachment is in the unfavorable position, then it is called envy. Therefore, two of the four enemies viz deceit and greed are motivated by passion; while the remaining two anger and ego are motivated by envy.

In this sense, attachment is the source of all enemities; however, our scriptures have not termed attachment as an inadequacy, and in fact attachment has been described as an essential aspect of life.

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It is important to note that lust has not been considered as any failing. Temptation is not a disorder in general. It is a normal accepted aspect for a person committed to his or her spouse.  Similarly, it is a form of self-control for a celibate ascetic. Lust in distorted form is a deficiency, a disorder.

So normally lust is not considered an enemy of the human personality, but the lustful  disorder is included in the covetousness and greed.

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The ego has been considered as the most significant and formidable enemies among these four foes, but it will not be proper to assume only ego as the main enemy and try to vanquish only it and leave the other three enemies – anger, deceit and greed free. These three foes do not let the ego succeed. All four are interrelated. If you try to control one leaving the other free, then the remaining one will surely try to strike your personality. So it is important to continually struggle against all four enemies. It is important to vanquish all foes and keep them in control.

The envy and laziness are both servants of ego. These two promote their owner’s ego and laziness furthers the greed. So now it is clear that anger, arrogance, dishonesty and greediness prevent creation of an effective human personality. All four need to be completely controlled to create a perfect personality.

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