विंध्यवासिनी साधना (Vindhyavasini Sadhana)

विंध्यवासिनी
शत्रुहन्ता, बाधा निवारण, तंत्र रक्षा, भौतिक सफलता
सब विंध्यवासिनी साधना से संभव

 

‘विंध्यवासिनी’ मां दुर्गा का ही रक्षा स्वरूप है, जो अपने साधक की हर क्षण रक्षा करती हैं, उसको जीवन की विभिन्न उलझनों से, परेशानियों से मुक्ति दिलाती हैं, और यदि साधक इस सिद्धि को प्राप्त कर ले तो उस पर किसी प्रकार की बाधा का प्रकोप-प्रभाव नहीं पड़ सकता, यहां तक कि कोई तांत्रिक ‘कृत्यावार’ जो एक प्रकार का तांत्रिक प्रयोग होता है, वह तांत्रिक वार भी इस साधना से निष्फल हो जाता है।

हमारे भारतवर्ष में पर्वतों को देवी-देवताओं का निवास स्थान माना गया है। मैदानी भागों में नदियों के किनारे मनुष्य का निवास स्थान माना गया है। पूरे भारतवर्ष में सात पर्वत श्रृंखलाएं प्रसिद्ध हैं, ये पर्वत श्रृंखलाएं हैं –

1. हिमालय, 2. विंध्याचल, 3. अरावली, 4. सतपुड़ा, 5. नीलगिरि, 6. पश्‍चिमी घाट, 7. पूर्वी घाट।
हिमालय के बारे में यह स्पष्ट है कि यह दिव्यतम कैलाश धाम शिव का स्थान है।
विंध्याचल पर्वत श्रृंखला के बारे में यह विशेष तथ्य है कि मैदानी क्षेत्र में भारतवर्ष को दो भागों में बांटती यह उष्ण पर्वत श्रृंखला है, जिसके किनारे-किनारे गंगा से लेकर कावेरी, कृष्णा, गोदावरी नदियां बहती हैं।

 

पौराणिक कथाओं के अनुसार पर्वतों ने भी साधना तपस्या सम्पन्न की जिसके फलस्वरूप इन्हें, वरदान प्राप्त हुए और पर्वतों के आधार पर देवताओं ने अपना निवास स्थान बनाया।

 

विंध्याचल पर्वत के बारे में द्वापर युग से पहले से भी देवी भागवत में एक विशिष्ट कथा आती है। इस कथा के अनुसार गंगा के किनारे विन्ध्याचल पर्वत का आकार निरंतर बढ़ता ही जा रहा था। गंगा के किनारे रहने वाले लोगों को असुविधा होने लगी क्योंकि विंध्याचल पर्वत की ऊंचाई ने सूर्य की रोशनी को ही मंद कर दिया था। उस क्षेत्र के निवासियों ने सोचा कि यदि विंध्याचल पर्वत इसी प्रकार बढ़ता रहा तो एक दिन सूर्य की रोशनी बिल्कुल ही नहीं आ सकेगी। तब इस स्थान में वनस्पति, जीव, जन्तु कैसे वृद्धि कर सकेंगे? कोई उपाय न मिलने पर एक महायज्ञ का आयोजन किया और यज्ञ पुरोहित के रूप में ॠषि अगस्त्य को आमंत्रित किया गया। उन्होंने यज्ञ को सम्पन्न कराया और कारण पूछा कि क्यों सभी लोग इतने दुःखी दिखाई दे रहे हैं? लोगों ने अपनी व्यथा बताई, इस पर ॠषि ने कहा कि मेरे पास इस समस्या का समाधान है। ॠषि अगस्त्य विन्ध्याचल पर्वत के सामने जाकर खड़े हो गये और ॠषि को देखकर विन्ध्याचल पर्वत ने झुक कर प्रणाम किया उसके झुकने पर ॠषि ने कहा कि मैं तुम्हें आशीर्वाद प्रदान करता हूं लेकिन पूरा आशीर्वाद रामेश्‍वरम् में अपनी तपस्या पूर्ण करके आऊंगा तभी प्रदान करुंगा। जब तक मैं नहीं आऊं तब तक तुम इसी स्थिति में ही रहना। ॠषि अगस्त्य अपनी तपस्या पूर्ण कर पुनः विंध्याचल पर्वत की ओर आये ही नहीं तथा विंध्याचल पर्वत झुका का झुका ही रहा।

 

अगस्त्य ॠषि के आशीर्वाद स्वरूप विंध्याचल पर्वत पर जगदम्बा स्वयं अपनी त्रि-शक्ति रूप में विराजमान हुईं। विंध्याचल पर्वत को ॠषियों का यह वरदान प्राप्त हुआ कि त्रि-शक्ति महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती चैतन्य रूप में यहां विराजमान होंगी और तीन महत्वपूर्ण शक्तिपीठ इस पर्वत के केन्द्र में स्थापित होंगे। इसके साथ ही विंध्याचल पर्वत को यह वरदान प्राप्त हुआ कि हिमालय की परिक्रमा के समान आपकी परिक्रमा भी पूर्ण फलदायिनी रहेगी। जो साधक विंध्याचल पर्वत पर आकर साधना सम्पन्न करेगा, उसकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होंगी।

 

श्रीमद्भागवद् और विंध्याचल पर्वत 

 

श्रीमद्भागवत में कृष्ण के जन्म की कथा तो सभी साधक भली भांति जानते हैं कि किस प्रकार देवकी के गर्भ से भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ और ठीक उसी समय वृंदावन में यशोदा और नंद के घर कन्या का जन्म हुआ। श्रीकृष्ण की लीला से कारागार के द्वार खुल गये और श्रीवसुदेव कृष्ण को  लेकर नंद के यहां पहुंचे और वहां से नंद पुत्री को लेकर पुनः मथुरा में कारागार में पहुंचे। जब प्रातः कंस को मालूम हुआ कि देवकी के गर्भ से पुत्र नहीं, पुत्री हुई है तो उसे बड़ा आश्‍चर्य हुआ, क्योंकि नारद ॠषि ने कहा था कि देवकी के गर्भ से आठवीं संतान पुत्र होगा और वही तुम्हारा संहार करेगा, लेकिन कंस ने सोचा कि शंका को क्यों रखा जाए, अतः उसने उस कन्या को ही मार डालने का निश्‍चय किया, जैसे ही उसने उस कन्या को पकड़ा और पत्थर पर मारने के लिये फेंका उसी समय वह कन्या हाथ से छिटक कर आकाश मार्ग को चली गई। वह कन्या कोई साधारण कन्या नहीं थी, शक्तिरूपा योगमाया थी। योगमाया ने आकाशवाणी करते हुए कंस को कहा कि तुम्हारा वध तो निश्‍चित है और तुम्हें मारने वाला इस संसार में उत्पन्न हो गया है।

 

इसके आगे की कथा तो सभी जानते हैं। वास्तव में भगवान श्रीकृष्ण ने शक्ति के रूप में योगमाया को रुप आदान प्रदान करने को कहा क्योंकि वे संसार को शक्ति से परिचित कराना चाहते थे और उस समय के युग में शक्तिपूजा को लोग भूल गये थे। राक्षसी प्रवृत्तियां अधिक हावी होने लगी थीं। ऐसे समय में शक्ति को प्रकट करना आवश्यक था। इस योगमाया शक्ति को भगवान श्रीकृष्ण ने वरदान दिया कि – हे शक्ति! आपने इस जगत में जो महान् कार्य किया है उसके फलस्वरूप आपकी पूजा संसार में हर समय होगी और पर्वतों के राजा विंध्याचल पर आप लक्ष्मी शक्ति रूप में विराजमान होंगी और आपके साथ ही, गुह्यकाली तथा अष्टभुजा सरस्वती विराजमान होंगी। आपका आसन पर्वत पर उस स्थान पर होगा जहां विराजकर आप गंगा को निरन्तर देख सकेंगी तथा काशी में स्थित विश्‍वनाथ आपके सम्मुख सदैव रहेंगे। 

 

विंध्यवासिनी मंदिर श्रीचक्र स्वरूप

 

विंध्यवासिनी मंदिर का पूरा समूह विंध्याचल पर्वत पर स्थित है और इसके स्वरूप की ओर ध्यान दिया जाये तो यह स्वरूप श्रीयंत्र के रूप में है उसी रूप में द्वार बने हुए हैं, उसी रूप में श्रीयंत्र में जहां मध्य रूप में जहां बिन्दु स्वरूप शक्ति स्थित है, उसी स्थान पर विंध्यवासिनी शक्तिपीठ है।

 

वर्तमान में उत्तर प्रदेश में मिर्जापुर के पास विन्ध्याचल पर्वत पर मां विंध्यवासिनी का शक्तिपीठ है और वहीं गुफा में स्थित एक ओर काली मंदिर है, दूसरी ओर अष्टभुजा स्वरूप में सरस्वती मंदिर है। तीसरी ओर महालक्ष्मी का स्थान है। पूरा मन्दिर श्रीचक्र रूप में स्थित है। विंध्यवासिनी देवी को पर्वत निवासिनी शक्ति रूपा दुर्गा का स्वरूप माना गया है जो त्रिशूल और मुण्ड धारण किये हुए है, जिनका स्वरूप अत्यन्त विशाल है जो शत्रुओं का संहार करती हैं तथा अपने भक्त को विशुद्ध बुद्धि प्रदान करती हैं।

 

मैंने अपने जीवन में कई प्राचीन मंदिरों की यात्रा की है, लेकिन विंध्यवासिनी मंदिर क्षेत्र में प्रवेश करते ही रोम-रोम में चेतना जाग्रत हो जाती है। ऐसा लगता है कि शक्ति अपने साकार रूप में विराजमान हैं। कुछ वर्षों पहले तक बलि प्रथा विद्यमान थी लेकिन अब इस प्रथा को बन्द कर दिया है। आज भी यह मान्यता है कि नव-विवाहित विवाह के पश्‍चात् आशीर्वाद प्राप्त करने जाते हैं तो उन्हें अक्षुण्ण सौभाग्य प्राप्त होता है।
एक ही देवी जिसके तीनों रूप साक्षात् हैं जो क्रिया, ज्ञान और इच्छा रूप में साधक का कल्याण कर सकती हैं, वह देवी विंध्यवासिनी हैं।

 

वर्तमान में शक्ति साधना परम आवश्यक है
आज के इस कलियुग में जीना कोई आसान बात नहीं होती, हर व्यक्ति एक-दूसरे पर हावी होने की कोशिश करता है, और अपने को शक्तिमान घोषित करने का प्रयास करता रहता है। आये दिन की परेशानियां, आपदाएं, जो गृहस्थ जीवन से सम्बन्धित होती हैं, प्रत्येक मनुष्य को झेलनी पड़ती हैं और ऐसे में उसे आवश्यकता पड़ती है एक ऐसी शक्ति की जिससे वह अपने जीवन को भली-भांति विभिन्न विपदाओं और बाधाओं से सुरक्षित रख सके, और मां के आशीर्वाद से बढ़कर उसके लिए कोई शक्ति नहीं होती, इस हेतु आद्या शक्ति पराम्बा आधार भूत शक्ति है, इसलिए उसे अपने इस भौतिक जीवन को सुरक्षित एवं श्रेष्ठ बनाने हेतु ‘देवी शक्ति’ की पूजा-आराधना करनी ही चाहिए।

 

शक्ति साधना द्वारा अपने भौतिक जीवन को श्रेष्ठ बनाने के साथ-साथ उसे अपने आध्यात्मिक जीवन को भी श्रेष्ठ बनाना चाहिए, क्योंकि मात्र भौतिक जीवन में पूर्णता प्राप्त करना ही सब कुछ नहीं होता, एक मनुष्य के लिए उसका श्रेष्ठ जीवन तो गृहस्थ के उन्नति पथ पर बढ़ते हुए आध्यात्मिक स्तर की ऊंचाई को प्राप्त कर लेना और उस ब्रह्म में लीन हो जाना है, जिसका वह अंश है।

 

गृहस्थ जीवन को पूर्णता के साथ जीते हुए अध्यात्म की ओर बढ़ना तो तलवार की धार पर चलने के समान ही होता है, जिस पर चलकर पैर लहूलुहान हो जाते हैं, किन्तु ‘भगवती विंध्यवासिनी’, जो कि अपने दिव्य स्वरूप से सुशोभित पूर्ण शक्तिमान स्वरूपा हैं, साधक या व्यक्ति को उस पथ की ओर गतिशील होने के लिए ऐसा वृहद् अस्त्र प्रदान करती हैं, जिससे वह जीवन की सर्वोच्चता को (जहां पहुंचना मानव-जीवन का ध्येय होता है) प्राप्त कर लेता है।

 

विंध्यवासिनी आद्या शक्ति
ॠषियों के वचन

 

विंध्यवासिनी साधना’ अत्यन्त गोपनीय साधनाओं में से एक है, यह अपने-आप में इतनी पूर्ण है, कि महाविद्याओं की साधना से साधक को जो शक्ति प्राप्त होती है, वैसी ही शक्ति इस साधना को सिद्ध करके प्राप्त की जा सकती है।

 

विश्‍वामित्र ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘विश्‍वामित्र संहिता’ में बताया है कि ‘विंघ्यवासिनी जीवन की श्रेष्ठ साधनाओं में से एक है।

 

त्रिजटा अघोरी’ के शब्दों में, ‘यह सिद्धाश्रम से सीधा सम्बन्ध स्थापित करने की सर्वश्रेष्ठ साधना है।

 

आद्यशंकराचार्य जैसे योगी और गोरखनाथ आदि उच्चकोटि के साधकों ने इस साधना को गोपनीय एवं अद्वितीय बताया है, और इस साधना को सम्पन्न कर विशेष प्रकार की शक्ति को प्राप्त किया है।

 

विरुद्ध तंत्र से रक्षा

 

विंध्यवासिनी’ मां दुर्गा का ही रक्षा स्वरूप है, जो अपने साधक की हर क्षण रक्षा करती हैं, उसको जीवन की विभिन्न उलझनों से, परेशानियों से मुक्ति दिलाती हैं, और यदि साधक इस सिद्धि को प्राप्त कर ले तो उस पर किसी प्रकार की बाधा का प्रकोप-प्रभाव नहीं पड़ सकता, यहां तक कि कोई तांत्रिक ‘कृत्यावार’ जो एक प्रकार का तांत्रिक प्रयोग होता है, जिसका वार कभी खाली नहीं जाता, उस वार को निष्फल करना कोई आसान बात नहीं होती वह तांत्रिक वार भी इस साधना से निष्फल हो जाता है।

 

यह एक तांत्रोक्त साधना है, और प्रत्येक तांत्रिक उसकी महत्ता अवश्य ही समझता होगा, क्योंकि यह तंत्र का बेजोड़ एवं अचूक सफलतादायक तीव्र प्रयोग है जिसे सम्पन्न करने पर वह साधक, जिसने इस विद्या को सिद्ध कर लिया हो, विशिष्ट शक्तिशाली बन जाता है, क्योंकि ‘विंध्यवासिनी यंत्र’ के द्वारा पूजन सम्पन्न करने पर, उस साधक को एक विशेष प्रकार की तेजस्विता, ऊर्जा-शक्ति प्राप्त होने लगती है, जो एक कवच की भांति ही उसके चारों ओर रक्षक के रूप में हर क्षण कार्य करती रहती है।

 

विंध्यवासिनी – प्रहार शक्ति

 

विंध्यवासिनी तीव्र से तीव्र प्रहारों को भी निष्फल करने की अचूक साधना है, जो बड़े-बड़े ॠषियों-मुनियों के लिए भी दुर्लभ है, इस विद्या को सिद्ध कर लेने के बाद, अन्य साधनाओं में स्वयं ही शीघ्र सफलता मिलने लग जाती है। व्यक्ति या साधक इस विद्या में सिद्धहस्त हो जाने से अपनी सभी मनेच्छाओं को मन ही मन स्मरण कर के, विंध्यवासिनी देवी का ध्यान कर लेने मात्र से ही पूर्ण कर लेता है, इस प्रकार वह शत्रु बाधा, राज्य बाधा, व्यापार बाधा आदि विभिन्न आपदाओं से मुक्ति पा लेता है।

 

यह साधना सूर्य सिद्धान्त की आधारभूत साधना है, इससे सूर्य की किरणों द्वारा पदार्थ परिवर्तन क्रिया स्वतः ही सिद्ध हो जाती है, इसके द्वारा साधक अपनी इच्छानुसार आयु प्राप्त कर सकता है, और सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है, कि इसके द्वारा सिद्धाश्रम में भी प्रवेश पाया जा सकता है।

 

साधना विधान 

 

सामग्री ः विंध्यवासिनी यंत्र, विजय माला, चार लघु नारियल।

 

10 जून 2016 को अरण्य षष्ठी एवं विंध्यवासिनी सिद्धि दिवस है। साधक इस दिन साधना को प्रारम्भ कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त किसी शुक्ल पक्ष की षष्ठी अथवा शुक्रवार को भी यह साधना प्रारम्भ की जा सकती है।

 

साधना वाले दिन साधक प्रातः स्नान कर लाल धोती पहन कर गुरु चादर ओढ़ लें तथा लाल आसन पर दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके बैठ जाएं, अपने सामने लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछायें। उस पर गुरु चित्र/विग्रह/ गुरु यंत्र/ गुरु पादुका स्थापित कर साधना में सफलता के प्रार्थना हेतु दोनों हाथ जोड़कर गुरुदेव निखिल का ध्यान करें –

 

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्‍वरः।
गुरुः साक्षात् पर ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

 

निखिल ध्यान के पश्‍चात् गुरु चित्र/विग्रह/यंत्र/पादुका को जल से स्नान करावें –

 

ॐ निखिलम् स्नानम् समर्पयामि॥

 

इसके पश्‍चात् स्वच्छ वस्त्र से पौंछ लें निम्न मंत्रों का उच्चारण करते हुए कुंकुम, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, धूप-दीप से पंचोपचार पूजन करें –

 

ॐ निखिलम् कुंकुम समर्पयामि।
ॐ निखिलम् अक्षतान् समर्पयामि।
ॐ निखिलम्  पुष्पम् समर्पयामि।
ॐ निखिलम् नैवेद्यम् निवेदयामि।
ॐ निखिलम् धूपम् आघ्रापयामि, दीपम् दर्शयामि।
(धूप, दीप दिखाएं)

 

अब तीन आचमनी जल गुरु चित्र/विग्रह/यंत्र/पादुका पर घुमाकर छोड़ दें। इसके पश्‍चात् गुरु माला से गुरु मंत्र की एक माला मंत्र जप करें –

 

ॐ परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः

 

गुरु पूजन के पश्‍चात् गुरु चित्र के सम्मुख ही एक तांबे की प्लेट में कुंकुम से ‘क्लीं’ बीज मंत्र लिख कर स्थापित करें। ‘विंध्वासिनी यंत्र’ को स्नान करवाकर, पौंछ कर तांबे की प्लेट में लिखे ‘क्लीं’ मंत्र के ऊपर स्थापित करें। ‘लघु नारियलों’ को यंत्र की चारों दिशाओं में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के प्राप्ति स्वरूप स्थापित कर दें।

 

इसके पश्‍चात् यंत्र व नारियलों पर कुंकुम से तिलक करें तथा अक्षत, पुष्प एवं धूप व दीप से पूजन कर ‘विजय माला’ से निम्न मंत्र का 11 माला जप करें –

 

मंत्र 

 

॥ ॐ ह्लीं क्लीं विन्ध्यवासिन्यै फट्॥

 

जप समाप्ति के गुरु आरती सम्पन्न करें। इस प्रकार साधना की पूर्णता के पश्‍चात् सारी सामग्री माला सहित एक लाल कपड़े में बांध कर किसी नदी या तालाब में विसर्जित कर दें।
यह एक दिन की साधना है, साधना के समय में साधक को कई प्रकार के अनुभव होंगे, इससे विचलित होने व घबराने की आवश्यकता नहीं है। प्रत्येक साधक को इसे अपने उपरोक्त दोषों से मुक्ति तथा निश्‍चित मनोकामना सिद्धि हेतु अवश्य ही सम्पन्न करना चाहिए, क्योंकि यह साधना समस्त रोग शोक से हमारी रक्षा करती है।

 

साधना सामग्री – ₹. 550/-
10 June 2016

Vindhyavasini Diwas

Vindhyavasini Sadhana

 

Shatruhanta (Destroyer of Foes), Badhaa Nivarann (Riddance from Obstacles), Tantra Raksha (Cure from Blackmagic), Bhoutik Safalta (Material Success)

Everything is possible through Vindhyavasini Sadhana

 

Mother “Vindhyavasini” is the protector form of Mother Durga, who protects Her Sadhak at each and every moment, liberates him from various obstacles and problems of life, and if the Sadhak accomplishes this Siddhi, then he will obtain complete immunity from any type of obstruction or impediment, even the impact of powerful Tantrik “Krityavaar” which is a type of Tantrik attack, gets completely neutralized.


In our India, the mountains and hills are considered as the abode of the Gods. The vast plains along the banks of various rivers are inhabited by the humans. Seven mountain ranges are famous throughout India, these mountain ranges are –

  1. Himalayas,
  2. Vindhyachal,
  3. Aravali,
  4. Satpura,
  5. Nilgiris,
  6. Western Ghats,
  7. Eastern Ghats

It is clear about the Himalayas that it is the divine Kailash abode of Lord Shiva.

The particular fact about the Vindhyachal mountain range is that this torrid mountain range divides the the Indian plains into two parts, and the rivers Ganga, Kaveri, Krishna, Godavari etc flow in its vicinity.

According to the Puranic scriptures, these mountains performed multiple Sadhana austerities, due to which they obtained divine blessings from Gods and the Gods set up their abode at the base of the mountains.

The Devi Bhagwat scripture contains a story about Vindhyachal mountain which is dated prior to the Dwaapar Yuga. According to this narrative, the size of Vindhyachal mountain near river Ganga was steadily increasing. This inconvenienced the people living on the shore of river Ganga, because the height of  Vindhyachal mountain had started to dim the Sun light. Those residents pondered that at this rate of increase, the Vindhyachal mountain will one day completely block the Sun light. Then how will the flora and fauna of this place survive? In the absence of any solution, a MahaYagya was organized and Sage Agastya was invited as the chief Yagya priest. He got the Yagya accomplished and asked people the reason for their distress. The people related the cause of their suffering to him, and he replied that he had a solution to their predicament. Sage Agastya went to Vindhyachal mountain and Vindhyachal mountain greeted him by bending down. At this, the Rishi blessed him but said that he will give him full blessings only after returning back from his austerities in Rameshwaram. He told the mountain to remain in the same condition until he returns. Sage Agastya did not return back to Vindhyachal after completing his austerities, and the Vindhyachal mountain stayed bent.

As a result of Sage Agastya’s blessings, Jagdamba enthroned on Vindhyachal mountain in Her Tri-power form. Vindhyachal mountain received boon from the sages and ascetics that the Tri-Power MahaKali, MahaLakshmi and MahaSaraswati will be seated there in their full prowess and three significant Shaktipeeth seats will be established in the centre of the mountain. Moreover Vindhyachal mountain also received a boon that completing a full round of Vindhyachal mountain will yield similar fruits as completing a full round of the Himalayas mountain. Any Sadhak performing Sadhana on Vindhyachal mountain will be able to accomplish and fulfil all his wishes and desires.

 

ShreemadBhagwad and Vindhyachal Mountain

All the Sadhaks know fully well the tale of birth of Lord Krishna that how Lord Shree Krishna was born from the womb of Devaki and simultaneously a daughter was born to Yashoda and Nanda in Vrindavan. The doors of the prison cell miraculously opened, Shree Vasudev took Krishna to Nanda’s home, and brought back Nanda’s daughter to the prison in Mathura. Kansa was surprised in the morning with the news of birth of a daughter from Devaki’s womb, instead of a son; because Sage Narada had prophesied that the eighth child of Devaki will be a son, and he will kill him. However, Kansa decided to remove all doubts and kill the baby girl, and when he took the baby in his hand and tried to kill her with a stone, the baby flew out of his hands into the sky. This baby girl was no ordinary child, She was Shaktiroopa Yogmaya. Yogmaya prophesied to Kansa that his death was certain and that his killer had already arrived in the world.

Everyone knows the further facts of this legend. In reality, Lord Shree Krishna requested Shakti in Yogamaya form to exchange because he wanted to introduce the power of Shakti to people, and people in that Yuga had forgotten to worship Shakti. The demonic tendencies had become dominant. It was mandatory for Shakti to appear. Lord Shree Krishna blessed Shakti thus – Hey Shakti! The magnificent task which you have accomplished in this world, will be fruitful as you will be worshipped throughout the world, and you will be established in Lakshmi form on the mountain king Vindhyachal; and GuhyaKali & Eight-armed Saraswati will also be enthroned along with you. Your position on that mountain will enable you to continuously view Ganga and Lord Vishwanath located in Kashi will always face you.

 

Vindhyavasini Temple Shree Chakra Model –

The entire temple campus of Vindhyavasini Shakti is located on Vindhyachal mountain, and if we examine its form minutely, then we will discover that this is in the format of Shree Yantra, the doors are built in the same format, and like the concentrated Bindu form Shakti within centre of Shree Yantra, the Vindhyavasini Shaktipeeth is also located in the similar central location.

In current times, the Shaktipeeth of Mother Vindhyavasini is located on the Vindhyachal mountain near Mirzapur in Uttar Pradesh, and in the same cave Kali temple is located on one side, and Saraswati temple of Eight-armed form is located on the other side. The Maha Lakshmi temple is located on the third side. The entire temple is designed in the form of Shree Chakra. Goddess Vindhyavasini has been considered as a Shakti form of Mountain resident Mother Durga, who adorns Trishul (Trident) and Mund (Head), whose form is very magnificent, who annihilates the enemies and provides pure intelligence to Her devotees.

I have visited many ancient temples in my life, however one can sense energy and power within each nerve of the body upon entering the Vindhyavasini temple campus. It seems that Shakti is present in its fully activated form. The sacrifice ritual used to be practised till some years ago, but now this practice has been stopped. There is a belief that the newly married couples visiting here to obtain blessings, obtain everlasting fortune.

The one Divine Goddess Whose all three forms are fully magnificent, Who can uplift the Sadhak through the medium of action, wisdom and wish, such a Goddess is Goddess Vindhyavasini.

 

Shakti Sadhana is absolutely essential in current times-

It is not easy to survive in the Kaliyuga today, every person tries to dominate the other, and endeavours to prove his strength. Every person has to face difficulties and obstacles, which are related to domestic life, and in such circumstances, he desperately requires a mighty powerful Shakti force, through which he can safeguard his life from various kinds of obstacles and disasters, and there is no better Shakti power than the blessings of Divine Mother, the Aadhya Shakti Paraamba is the basic foundation Shakti, and so he should perform prayer-worship of Divine Goddess to make his material life safe and perfect.

He should also simultaneously enhance his spiritual life along with material life through the Shakti power, because just achieving completeness in material physical life is not enough, a perfect life for an individual is to achieve the elevated heights of spirituality while enhancing his domestic life, and to merge within the Brahma, of Whom is a part of.

Progressing on the spiritual plane while leading the domestic life fully is akin to walking on a  razor’s edge, where legs bleed frequently, however Goddess Bhagwati Vindhyavasini, who is the mighty Full Shakti Power figure in Her Divine form, grants such a mighty weapon to that Sadhak or person treading on that path, to enable him to reach the supreme plane of human life (which is the base goal of human life).

 

Vindhyavasini Aadhya Shakti

The views of Sages

The “Vindhyavasini Sadhana” is one of the most secretive Sadhana practices, it is so perfect, that the Sadhak can achieve same amount of Shakti, as he can achieve through the Mahavidhya Sadhanas.

Vishwamitra has elucidated in his treatise “Vishwamitra Sanhita” that “Vindhyavasini Sadhana is one of the best Sadhana practice of the life“.

According to “Trijata Aghori“,”This is the best Sadhana to establish a direct connection with Siddhashram”.

Yogis like AadhyShankaracharya and supreme Sadhaks like Gorakhnath have termed this Sadhana as the most remarkable and secretive, and have achieved special Shakti by accomplishing this Sadhana.

 

Protection from Viruddh Tantra

Vindhyavasini” is the protective form of Mother Durga, who protects Her Sadhak at each and every moment, who grants him liberation from all kinds of obstacles and problems in life, and if the Sadhak successfully accomplishes this Siddhi, then any kind of obstacle cannot impact him, even the mighty “Krityavaar“, which is a kind of Tantrik attack, which is always effective, it is not easy to counter such a strong attack, even such a Tantrik attack gets neutralized through this Sadhana.

It is a Tantrokt Sadhana practice, and each Tantrik mush comprehend its significance, because this is an unmatchable and accurately successful strong Tantrik practice, upon accomplishment of this by a Sadhak, the Sadhak becomes exceptionally strong, because after completing the worship through “Vindhyavasini Yantra’, She grants such a remarkable unique Shakti power source to the Sadhak, which rotates around the Sadhak like a protective armour shield, defending him at each and every moment.

 

Vindhyavasini – Striking Power

Vindhyavasini is a supreme Sadhana to neutralize the most intense of Tantrik attacks, which are difficult even for great sages and ascetics to counter, upon accomplishing of this Siddhi, one starts to gain success in other Sadhanas rapidly. An accomplished Sadhak or person can fulfil all his desires just by mentally meditating on the Divine form of Goddess Vindhyavasini, and hence he obtains success over various obstacles and barriers like enemy-trouble, government-barriers, business-obstacles etc.

This Sadhana is the basic foundation of Sun principle, it grants automatic ability to convert substances through Sun’s rays, Sadhak can fulfil desire for long life through this Sadhana, and most importantly, it opens the gate of Siddhashram.

 

Sadhana Procedure

Required Materials: Vindhyavashini Yantra, Vijay Mala, 4 Laghu Nariyals.

10 June 2016 is Aranya Shashthi and Vindhyavasini Siddhi Diwas. Sadhaks can initiate Sadhana from this day. Moreover, this Sadhana can also be initiated on any Shashthi of Shukla Paksha, or any Friday.

On the Sadhana day, the Sadhak should wear Red dhoti after bathing in the early morning, and wrap Guru Chaadar, and sit on a Red Asana facing South direction, and cover the wooden Chowki (platform) with a Red cloth. Set up Guru Picture / Statue / Guru Yantra /  Guru Paduka on it and with folded hands, meditate on Gurudev Nikhil to pray for success in the Sadhana –

 

GuruBrahmaa GururVishnuH Gururdevo MaheshwaraH |

GuruH Saakshaat Par Brahma Tasmeyi Shree Guruve NamaH ||

 

After Nikhil Dhyaan, bathe Guru Picture / Statue / Yantra / Paduka with pure water –

Om Nikhilam Snaanam Samarpayaami ||

 

Then wipe with a clean cloth. Perform Panchopchaar poojan with Kumkum (Vermilion), Akshat (Unbroken Rice),

Pushpa (Flowers), Neivedh (Fruits-Sweets) and Dhoop-Deep (incense-lamp) through chanting following mantras –

Om Nikhilam Kumkum Samarpayaami |

Om Nikhilam Akshataan Samarpayaami |

Om Nikhilam Pushpam Samarpayaami |

Om Nikhilam Neivedhyam Samarpayaami |

Om Nikhilam Dhoopam Aaghrapayaami, Deepam Darshaayami |

(Show Dhoop, Deep)

 

Now rotate three achmani (spoonful) water around the Guru Picture / Statue / Yantra / Paduka and drop on ground. Then chant one mala (rosary-round) of Guru Mantra with Guru Mala –

Om Param Tatvaaye Narayanaaye Gurubhayo Namah

 

After Guru Poojan, write “Kleem” Beej Mantra on a copper plate with Kumkum, and set it up. After bathing “Vindhyavaasini Yantra“, and wiping with a cloth, set it up on the “Kleem” Mantra on the copper plate. Set up Laghu Nariyals in the four directions to signify Dharam (Religion), Aarth (Wealth), Kaam (Desires) and Moksha (Liberation).

Then put a red mark on Yantra and Nariyals with Kumkum (Vermilion) and worship through Akshat (Unbroken rice), Pushp (Flowers), Dhoop (Incense) and Deep (Lamp). Chant 11 mala (rosary-rounds) mantras of the following Mantra through “Vijay Mala” –

Mantra

|| Om Hleem Kleem Vindhayevaasinye Phat ||

 

Perform Guru Aarti after completion of Mantra-chanting. After conclusion of the Sadhana, wrap all the materials along with Mala (Rosary) in a red cloth and drop in any river or pond.

This is a single day Sadhana. The Sadhak will sense many different types of experiences during the Sadhana, there is no need to feel afraid or distracted due to them. Every Sadhak should accomplish this Sadhana to obtain liberation from the above mentioned deficiencies, and for fulfilment of his desires; since this Sadhana protects us from all diseases and sorrows.

 

Sadhana Materials : ₹. 550 /-

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