लक्ष्मी वर-वरद माल्य (Lakshmi Var-Varad Maalya)

लक्ष्मी वर-वरद माल्य

भगवती लक्ष्मी के चित्र में आपने ध्यान दिया होगा कि उसमें कमल का बाहुल्य होता है। लक्ष्मी और कमल एक दूसरे के पूरक ही तो हैं, लक्ष्मी को यदि समझना है तो कमल से श्रेष्ठ कोई उपमा ही नहीं, ठीक उसी के समान गुलाबी आभा से दैदीप्यमान मुख मण्डल, उसी के समान उज्ज्वल और कोमल स्वरूप, उसी के समान शरीर से निःसृत होती पद्मगंध, ठीक वैसी ही निर्लिप्तता और पद्म के सैकड़ों दलों की भांति सैकड़ों स्वरूप! लक्ष्मी अपने आप में दैवी सौन्दर्य से भरी, नारीत्व की, गरिमा की एक ऐसी देवी हैं, जिसका अभी तक शायद सही मूल्यांकन ही नहीं किया गया। एक ओर जहां उन्हें इस धन-लोलुप समाज ने धन देने वाली देवी मात्र समझ कर उनसे व्यापारिक सा सम्बन्ध जोड़ा, दूसरी ओर कुन्ठित और निराश शास्त्रकारों ने उन्हें उपेक्षा की दृष्टि से देखा, धन को सभी बुराइयों का मूल कहा और लक्ष्मी को चंचला आदि कहा। 

परन्तु वस्तुस्थिति इससे कुछ अलग हटकर ही है, धन की अधिष्ठात्री यह देवी मूल रूप से नारी ही तो है, …जिस प्रकार एक नारी स्वभावतः कोमल, स्नेहशील, दयालु और ममत्व से भरी होती है, किन्तु प्रबल स्वाभिमानी भी। वह इस बात की इच्छुक और आतुर होती है कि उसकी सराहना की जाए और सप्रयास उसे कोई जीवन में लाए, उसी प्रकार इस तथ्य को हम लक्ष्मी साधना के सन्दर्भ में भी कह सकते हैं। नारी या तो प्रबल पौरुष के माध्यम से अथवा प्रबल प्रेम के माध्यम से ही वशीभूत होती है, अन्य कोई उपाय है ही नहीं। इस तथ्य को ध्यान में रखकर जहां एक ओर तांत्रोक्त रूप में लक्ष्मी को वश में करने के उपाय खोजे गए हैं और विश्‍वामित्र सरीखे, हठीले ॠषियों ने उन्हें चुनौतीपूर्वक, पौरुषतापूर्वक अपने आश्रम में बंधकर रहने को विवश कर दिया, वहीं दूसरी और वैदिक काल में यज्ञ के माध्यम से, स्तोत्र रचना के माध्यम से उनकी अभ्यर्थना की गई और उनके स्थापन की कामना की गई। भगवती महालक्ष्मी को दस महाविद्याओं में एक महाविद्या कमला के रूप में प्रतिष्ठित कर एक प्रकार से उनके प्रति सम्मान ही व्यक्त किया गया। यंत्र के माध्यम से भी उनके स्थापन में आबद्धीकरण के प्रयास किए गए। श्रीयंत्र, कनकधारा यंत्र एवं अन्य विशिष्ट यंत्रों की रचना कर उनके आबद्धीकरण का ही प्रयास किया गया, सर्वथा निर्लिप्त रहने वाले और मोह-माया से परे रहने वाले औघड़ों ने भी उनके वशीकरण के उपाय ढूंढ़े।

लक्ष्मी – जीवन की आभा, व्यक्ति का प्रभामण्डल

लक्ष्मी ऐसी श्रेष्ठ देवी हैं जिसके स्पर्श मात्र से ही व्यक्ति में पूर्णता का प्रादुर्भाव हो जाता है। यदि लक्ष्मी को केवल धन का प्रतीक न मानें वरन् सम्पूर्ण जीवन के पूर्णत्व का आधार मानें तो एक पुरुष में पौरुष और आत्मविश्‍वास प्रदान करने की मूलभूत शक्ति, देवी लक्ष्मी ही हैं। एक पुरुष के जीवन में लक्ष्मी – आगमन से ही न केवल उसकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होकर उसे मानसिक सबलता देती है वरन् लक्ष्मी अपने विविध स्वरूपों से जिस प्रकार से उसके प्रत्येक पक्ष को स्पर्श कर जाती है, उससे व्यक्ति सहज ही आत्मविश्‍वास से भर उठता है। लक्ष्मी की उपेक्षा ही व्यक्ति को जीवन में दरिद्र और अपमानित बनाती है। लक्ष्मी सम्पूर्ण रूप से जीवन की आभा है, व्यक्ति का प्रभामण्डल है, आन्तरिक रूप से मिली तृप्ति का प्रकटीकरण है। लक्ष्मी को जीवन में और शरीर में समाहित कर लेना, सारे जीवन, तन और मन को पद्मगंध की दिव्य गन्ध से सुगन्धित कर लेने की क्रिया है। सम्मोहन की ऐसी गुलाबी आभा को अपने तन-मन में समा लेने की बात है कि ऐसे व्यक्ति के प्रभामण्डल से कोई अछूता रह ही नहीं सकता। जिनके शरीर में लक्ष्मी का समाहितीकरण हो जाता है वे स्वतः ही ऐसे सम्मोहन से युक्त हो जाते हैं, जो कि शायद किसी अन्य प्रकार से सम्भव नहीं। जैसे दूर …कहीं किसी छोटे से तालाब में कोई कमल खिला हो और उसकी मादक गंध से वातावरण भीगा-भीगा हो, ठीक उसी तरह जिनके शरीर में लक्ष्मी समाहित हो जाती है, उनकी आभा और सम्मोहन से सारा वातावरण भीगा-भीगा, आनन्दप्रदायक हो जाता है। जिससे लोग खिंच खिंच कर उनके पास आने लगते हैं। उन्हें सप्रयास किसी को अपनी ओर आकर्षित नहीं करना पड़ता, और इसी में जीवन की श्रेष्ठता है।

लक्ष्मी के एक सौ आठ स्वरूप

लक्ष्मी का तो अत्यन्त विस्तृत क्षेत्र है। पत्नी को भी लक्ष्मी स्वरूपा माना गया है, कहते हैं कि जिस व्यक्ति की पत्नी में लक्ष्मी तत्व समाविष्ट हो जाए, वह व्यक्ति स्वतः ही विष्णु-तुल्य बन पूर्ण राजसी सुख का भोग करता है। केवल पत्नी ही नहीं, वाहन-लक्ष्मी, आयु-लक्ष्मी, भू-लक्ष्मी, पुत्र-लक्ष्मी, धरा-लक्ष्मी, धान्य-लक्ष्मी, लक्ष्मी के तो सैकड़ों स्वरूप निर्धारित किए गए हैं। व्यक्ति के जीवन में जो कुछ भी ‘श्री’ वृद्धि करे, उसे लक्ष्मी कहा गया है, जिनमें से 108 विशिष्ट लक्ष्मी स्वरूपों के मंत्रों को भी साक्षात् लक्ष्मी ही माना गया है। स्थानाभाव के कारण लक्ष्मी के सभी एक सौ आठ स्वरूपों का वर्णन यहां कर पाना कठिन है, किन्तु इसका अनुमान तो आप स्वयं जीवन में पग-पग पर लगा ही सकते हैं। जहां भी आपको लगे कि काश! मेरे जीवन में यह होता, तो बस उसके पीछे लक्ष्मी का ही कोई स्वरूप छुपा है। उसी रूप में आप लक्ष्मी से वह वरदान व्यक्त अथवा अव्यक्त रूप में मांग रहे होते हैं।

लक्ष्मी के विविध स्वरूपों को जान भी लें फिर भी मुख्य प्रश्‍न तो शेष रह ही जाता है कि हम इन्हें जीवन में कैसे प्राप्त करें? यह जीवन इतना बड़ा नहीं होता और न ही व्यक्ति में इतनी सामर्थ्य होती है कि वह सप्रयास अपने जीवन में लक्ष्मी के विविध स्वरूपों को उतार सके। येन-केन-प्रकारेण व्यक्ति जीवन में मात्र चार या पांच प्रकार की लक्ष्मी का अर्जन ही कर पाता है और उनका भी केवल अर्जन मात्र, उपयोग नहीं। जबकि जीवन में होना तो यह चाहिए कि हम अपनी अर्जित वस्तु का सुख भी प्राप्त कर सकें। व्यक्ति अर्जित कर लेने के पश्‍चात् भी इस रूप में असफल रह जाता है कि वह उसे जीवन में धारण किए रह सके। लक्ष्मी का अर्थात् जीवन में सुख और ‘श्री’ का उपभोग न कर पाना, उसे बचा कर न रख पाना, एक प्रकार से उसे न प्राप्त करने के समान ही है।

इस तथ्य को लेकर पर्याप्त समय से मंत्रवेत्ता और श्रेष्ठ साधक शोध कर रहे थे कि ऐसा क्या उपाय प्राप्त किया जाए कि व्यक्ति के जीवन में लक्ष्मी तत्व के समावेश के साथ ही साथ उसे स्थायित्व भी दिया जा सके। श्री यंत्र, कनकधारा यंत्र, अष्टलक्ष्मी यंत्र एवं कई अन्य यांत्रिक एवं मांत्रिक उपाय प्रचलित तो हैं लेकिन महत्वपूर्ण बात तो यह है कि ऐसा कौन सा उपाय हो कि व्यक्ति के शरीर में ही लक्ष्मी के समस्त एक सौ आठ स्वरूपों को स्थापित किया जा सके और उसे अक्षुण्ण बनाये रखा जा सके। इन्हीं शोधों के परिणाम स्वरूप जो उपाय सामने आया, उसका नाम है लक्ष्मी-वर-वरद माल्य। जिसके माध्यम से सदा-सदा के लिए व्यक्ति के शरीर में लक्ष्मी का स्थायी निवास हो सके, उसके जीवन में ऐसा हो कि लक्ष्मी उसके साथ छाया की भांति रहे।

लक्ष्मी वर-वरद – माल्य
केवल माला नहीं, आपकी पूंजी है –

विचित्र व अद्भुत मनकों से बनी लक्ष्मी आबद्धीकरण की क्रिया से युक्त इस दुर्लभ माला में कुल 108 मनके होते हैं। जिनमें से आवश्यकता तो केवल सौ मनकों की ही होती है लक्ष्मी के सौ स्वरूपों को स्थापित करने के लिए, आठ मनके विशेष सौन्दर्य प्रभाव के लिए प्रदान किए जाते हैं साधक के शरीर में। इसका प्रत्येक मनका लक्ष्मी मंत्रों से सिद्ध कर, प्रत्येक मनके में लक्ष्मी के किसी एक विशेष स्वरूप का स्थापन किया जाता है एवं ‘श्री सूक्त’ में गुह्य रूप से वर्णित गोपनीय पद्धति से ऐसा विशेष प्रभाव दिया जाता है कि व्यक्ति के जीवन में लक्ष्मी के एक सौ आठ स्वरूपों का स्थायी निवास हो सके। ऐसी माला केवल धारण करने वाले व्यक्ति के लिए ही नहीं, उसके पुत्रों-पौत्रों और वंशजों के लिए भी उसी प्रकार से उपयोगी रहती है। स्पष्ट रूप से कहा जाए तो यह केवल एक माला नहीं अपितु धरोहर है आगामी पीढ़ियों के लिए। आप जिस प्रकार अपने पुत्र-पौत्रों के लिए धन-संचय, भूमि व मकान के रूप में अपनी याद छोड़ जाते हैं, ठीक उसी प्रकार आने वाली पीढ़ियां कृतज्ञता से गद्गद् हो उठेंगी कि उनके पूर्वज उनके लिए कैसा अनोखा उपहार छोड़कर गए हैं। यह ऐसी माला नहीं है कि इसे जब चाहें तब बाजार में  जाकर खरीद लें और धारण कर लें। इस प्रकार की माला को तो बिरले ही सिद्ध करना जानते हैं।
लक्ष्मी वर-वरद-माल्य से व्यक्ति का चिन्तन ही बदल जाता है 

इस माला को धारण करने से व्यक्ति के शरीर में भगवती लक्ष्मी अपने एक सौ आठ स्वरूपों के साथ पूर्णता से प्रवेश कर स्थापित होने के लिए बाध्य हो जाती हैं। इन मनकों के व्यक्ति के शरीर से स्पर्श करते रहने के कारण धीरे-धीरे उसके जीवन में परिवर्तन आने लगते हैं। लक्ष्मी-तत्व के स्पर्श से उसका चिन्तन भी बदल जाता है। आर्थिक दरिद्रता के साथ-साथ दैन्यता और कायरता समाप्त हो जाती है। उसके जीवन में सही अर्थों में आध्यात्मिकता का पूर्ण-सुख, सौभाग्य और मानसिक शान्ति का समय प्रारम्भ हो जाता है। लक्ष्मी भी अन्य देवी-देवताओं के समान मूल रूप में आध्यात्मिक स्वरूपा ही हैं। आध्यात्मिकता की प्रचलित परिभाषा के कारण उन्हें समझ नहीं पाए क्योंकि आध्यात्मिकता का अर्थ, भगवे वस्त्र धारण करने तक सीमित जो कर दिया गया है। घर में पुत्र हो, पौत्र हो, सुलक्षणा पत्नी हो, परस्पर मेल मिलाप हो, अतिथि सत्कार हो, आत्मीय मित्रों के संग हास्य-विनोद के क्षण हों, साधु-संतजनों का सत्कार व दान हो, धार्मिक स्थानों की यात्राएं हों और फिर भी मन निरन्तर प्रभु चिन्तन में ही लीन रहे, यही आध्यात्मिकता की सही परिभाषा है।
लक्ष्मी वर-वरद-माल्य प्रदान करने की शक्ति

पूज्यपाद गुरुदेव ने एक अवसर पर स्पष्ट किया था कि वर-वरद का तात्पर्य होता है हम किसी को कुछ प्रदान कर सकें। केवल अपने ही लिए अर्जित व संचित न करें। यह विशिष्ट माला इसी लक्ष्य की पूर्ति करती है कि आप अपने आप को तो समृद्ध करें ही, अपना जीवन सुख-पूर्वक व्यतीत कर निश्‍चिन्त भाव से प्रभु चरणों में लीन हो सकें – ताकि जो आपके सम्पर्क में आए उसे भी आप कुछ प्रदान करने हेतु सामर्थ्य युक्त बन सकें।

यह निश्‍चित है कि आध्यात्मिक उन्नति तभी हो सकती है, जब पारिवारिक समृद्धि एवं उन्नति हो। पारिवारिक उन्नति के अभाव में गृहस्थ की कठिनाइयों के साथ चलते व्यक्ति अपने जीवन में श्रेष्ठता नहीं ला सकता। यह माला पारिवारिक जीवन में आने वाली ऐसी ही अनेक कठिनाइयों का निदान प्रस्तुत करती है। पारिवारिक जीवन में तो कभी बच्चों की तबीयत खराब होती है, तो कभी किसी संकट में संचित धन अचानक व्यय हो जाता है, साथ ही नित्य भरण-पोषण के पक्ष तो होते ही हैं। सचमुच जो व्यक्ति गृहस्थ में रहते हुए साधना करता है, उसका प्रयास प्रशंसनीय है क्योंकि वह किन्हीं जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ कर केवल अपनी उन्नति में लीन होने वाला स्वार्थी प्राणी नहीं होता। 

लक्ष्मी वर-वरद-माल्य – यश लक्ष्मी-राज्य लक्ष्मी

पारिवारिक उन्नति के साथ-साथ, व्यक्ति का सामाजिक जीवन भी समानान्तर रूप से चलता रहता है। उस पर गृहस्थ का दोहरा दायित्व होता है। उसे सामाजिक भी होना ही पड़ता है। सामाजिक जीवन में अनावश्यक विवाद, शत्रु-बाधा, सहयोगियों से तनाव जैसी कई समस्याओं से उनको नित्य-प्रति के जीवन में उलझना पड़ता है। यह माला ऐसे अवसरों के लिए पूर्ण रूप से सफलतादायक है, क्योंकि जिस व्यक्ति में लक्ष्मी तत्व समाहित हो जाता है, उसे स्वतः ही ‘यश-लक्ष्मी’ प्राप्त होती है, उसे ‘राज्य-लक्ष्मी’ भी प्राप्त होती है, और लक्ष्मी के इन श्रेष्ठ स्वरूपों के रहते व्यक्ति के सामाजिक जीवन में फिर बाधाएं उपस्थित हो ही नहीं सकतीं। यदि कोई विरोध करता भी है तो स्वतः ही वह निस्तेज हो उठता है। घोर से घोर विरोधी भी ऐसी माला धारण करने वाले के सामने हकलाने से लग गए देखे गए हैं।

व्यक्ति के सम्पूर्ण क्रिया – कलापों को किसी परिभाषा में नहीं बांधा जा सकता। यह नहीं कहा जा सकता कि व्यक्ति को जीवन में केवल इतने-इतने कार्यों, इतनी-इतनी बाधाओं से ही निपटना होगा। नित्य जटिल होते जा रहे पारिवारिक व सामाजिक जीवन में एक के बाद नित्य नए पहलू प्रकट हो रहे हैं, किन्तु इनका निदान तो एक उपाय से किया जा सकता है और उसका उपाय है जीवन में ऐसे श्रेष्ठ दैवी बल का प्रवेश, जो सभी बाधाओं को एक ओर झटक दे। लक्ष्मी वर-वरद माल्य शरीर व मानस में निरन्तर ऐसी ही दैवी ऊर्जा प्रवाहित करने की क्रिया है।

व्यापार वृद्धि के क्षेत्र में भी इस माला का अद्भुत प्रभाव देखा गया है। अनुभव में आया है कि व्यापारी बन्धुओं ने (अथवा जिन साधकों एवं शिष्यों का जीवनयापन किसी व्यवसाय से होता है) उन्होंने, इस माला को धारण करने के पश्‍चात् न केवल अपने आप को सम्मोहन से भर लिया, वरन् ऐसा लगता है कि उन्होंने मनकों के रूप में लक्ष्मी को भी अपनी दुकान में बांध सा लिया है। जो प्रभाव उन्हें श्री यंत्र, कनकधारा यंत्र, कुबेर यंत्र स्थापित करने से मिले थे, उससे भी कहीं अधिक तीव्र प्रभाव इस माला के धारण करने से प्राप्त हुए हैं।

इस माला के अनेक लाभ सम्भव हैं, जिनसे व्यक्ति का जीवन सुखी एवं सफल हो उठता है। ऐसी माला का नित्य दर्शन और धारण अपने-आप में पुण्यदायी कार्य है, जिसमें न किसी लम्बी-चौड़ी साधना की आवश्यकता है और न किसी आडम्बर की। यह तो एक ऐसी विशिष्ट माला है कि इसे घर का प्रत्येक सदस्य धारण करे। घर के मुखिया के साथ-साथ उसकी पत्नी को यही माला धारण करना अति-आवश्यक रहता है,  क्योंकि लक्ष्मी स्त्री स्वरूपा हैं और इसी से वह घर की स्वामिनी में सहज रूप से समाकर घर का सर्वांगीण विकास करती हैं। यह माला न केवल व्यक्ति को धन-धान्य और लक्ष्मी के विविध स्वरूपों में लाभदायक सिद्ध होती हैं, वरन् ऐसी माला का निरन्तर वक्षस्थल पर स्पर्श उसे नव-जीवन प्रदायक और रोगों से मुक्ति के साथ ही साथ आध्यात्मिक लाभ भी देने वाला है। भारतीय चिन्तन के अनुसार नाभि से लेकर कंठ प्रदेश तक का सारा शरीर, भगवान विष्णु का क्षेत्र है अतः इस स्थान पर निरन्तर लक्ष्मी का, वर-वरद माल्य का सुखद व पवित्र स्पर्श, व्यक्ति के जीवन में, लक्ष्मी-नारायण की संयुक्ति का पुण्य देता है। वक्षस्थल का प्रदेश न केवल भगवान विष्णु का क्षेत्र है, वरन् इसी प्रदेश में ही समस्त देवी-देवताओं का भी निवास है।

लक्ष्मी वर-वरद-माल्य – ₹.750/-

Lakshmi Var-Varad Maalya

108 Forms of Lakshmi

Sanctified with 108 Mantras of Goddess Lakshmi

Wearing of which, Mantra-Chanting through which,  is the absolute invocation and consecration, of the one who controls the three worlds

You will have noticed an abundance of lotus flower in a picture of Bhagwati Lakshmi. Lakshmi and Lotus complement each other, there is no better metaphor than lotus to understand Lakshmi, just like the pink aura emanating from the beaming Divine face, a similar bright and delicate form, a similar Padamgandh fragrance radiating out of the body, the similar nature, and hundreds of patterns like hundreds of lotus petals. Mother Lakshmi is so full of divine beauty, femininity, dignity, that no-one has been able to fully comprehend Her yet. While the greedy ambitious society has considered Her merely as a wealth-bestower, connecting Her to business-world; the disappointed frustrated scriptures ignored Her, proclaimed money as the root of all evil and called Her by various names like fleeting Chanchala etc.

But the reality is completely different, This deity certainly is the Goddess of Wealth, … but gentle, affectionate, kind and maternal like a woman, along with strong self-respect. She is willing and eager to be appreciated and desire for a suitable suitor to bring Her into life with due efforts, we can state the same fact in the context of Lakshmi Sadhana. A woman can be attracted only through either strong dominant masculinity or charmed through love; there is no other way. Comprehending this fact, while many practices have been discovered in Tantra to control Lakshmi, and rebellious passionate ascetics like Vishwamitra forced Her to remain confined to their ashram through strong controlling measures, on the other hand, during Vedic times sacrificial Yagyas and Strota-compositions were done to appeal to Her, and to wish for Her placement. The inclusion of Goddess MahaLakshmi as Kamala Mahavidhya within the ten Mahavidhyas is a form of expressing respect towards Her. Various attempts were made to confine her within the specific Yantras, even the utterly detached natural-living Aghoris tried to attract Her.

 

Lakshmi – The aura of life, the halo of a person

The Goddess Lakshmi is such magnificent Goddess, that a mere touch from Her initiates perfection and completeness within a person. If instead of treating Her as a Goddess of Wealth, we consider Her as a bestower of Complete Totality in life, then Goddess Lakshmi is the sole basic Goddess to grant the confidence and strength to a person. The ingress of Goddess Lakshmi into a person’s life not only  gives him mental-intensity by strengthening his financial situation, rather it also quickly enhances his self-confidence by touching all facets of his life through Her multiple forms. Only the disregard of Goddess Lakshmi causes poverty and humiliation in a person’s life. Lakshmi is the aura in complete form, She is the halo around the person, She is a manifestation of inner-satisfaction. The absorption of Lakshmi into life and body, is the process of imbibing sweet Divine Padamgandh fragrance into the life, body and mind. The benefit of merging such sweet pink aura of hypnotic attraction into the body-soul is that, no-one can remain untouched by the magnificence of this halo. Those whose body merges with Goddess Lakshmi, they automatically gain a fascination which is not possible to get in any other way… Like a little lotus blossoming in a distant small pond emanating sweet heady fragrance in the environment, similarly, when Goddess Lakshmi is imbibed and absorbed within a person, the entire dewy-wet environment becomes sweetened with the attractive aura. Folks start to get attracted to him. He does not need to put in any effort to draw them towards him, and this is the superiority of life.

 

The One Hundred Eight Forms of Lakshmi

The profile of Goddess Lakshmi spans across very wide arena. A person’s wife has also been considered as a form of Lakshmi. It is said that a person whose wife imbibes the Goddess Lakshmi element, such a person transforms automatically into Lord Vishnu form and enjoys divine joys. Not only the wife, the vehicle-Lakshmi, age-Lakshmi, land-Lakshmi, son-Lakshmi, earth-Lakshmi, food-Lakshmi, hundreds of different forms of Goddess Lakshmi have been identified. Whatever leads to an enhancement of “Shree” in a person’s life, that attribute has been classed as Lakshmi, and the mantras of the 108 special Lakshmi forms have been considered akin to Lakshmi Herself. It is difficult to elucidate about all 108 forms of Lakshmi here due to lack of space, but you can yourself comprehend it at each step of your life. Whenever you feel that I wish I had that in my life, be assured that a form of Lakshmi is lurking behind that wish. You are implicitly or explicitly seeking that particular boon from that form of Goddess Lakshmi.

We can understand these diverse forms of Goddess Lakshmi, but the moot question still remains that how to obtain it in life? The life is not so long, and a person does not have adequate capability to imbibe the multiple forms of Goddess Lakshmi in his life through only his own efforts. A person is able to absorb just four or five kinds of Lakshmi in his life through various means and exertions, and he can only obtain Them, not utilize Them. We should be able to enjoy the pleasures of anything we acquire in the life. Even after acquiring Her, a person fails to imbibe Her in his life. The meaning of Lakshmi is Happiness in life; and inability to utilize “Shree”, inability to store It, is just similar to not obtaining it.

The Mantra scientists and advanced Sadhaks had been researching for a long time to discover out a process through which a person can establish Lakshmi in his life, along with acquiring It. Shree Yantra, Kanakdhara Yantra, Ashta Lakshmi Yantra and many other Yantras and Mantrik procedures are generally prevalent, however the significant question is to identify a process through which all One Hundred Eight forms of Goddess Lakshmi can be imbibed permanently eternally into a person’s body. The result of all those researches is Lakshmi Var Varad Maalya. The medium through which Lakshmi can permanently reside in a person’s body, and Goddess Lakshmi should stay with him like a shadow in his entire life.

 

Lakshmi Var Varad Maalya

Not just a rosary, your own treasure

This rare rosary made from unique and amazing beads sanctified with Lakshmi Aabadhikaran persistent process has 108 beads. Only 100 beads are required to establish the Hundred forms of Lakshmi in a person’s body; the rest Eight beads provide special aesthetic benefits to the Sadhak’s body. Each bead of this rosary is consecrated with Lakshmi mantras, a unique form of Lakshmi is sanctified in each bead, and a special benefit is provided through mysterious secret occult process described in a confidential manner in “Shree Sukt“; to ensure permanent absorption of One Hundred Eight forms of Goddess Lakshmi in the person’s life. Such a rosary is useful not only for the wearer, rather it is similarly beneficial to his children, grand-children and future progeny. Frankly speaking, it is not just a plain rosary, rather it is a divine heritage for the future generations. As you bequeath wealth, land and property assets to your children-grand-children, similarly the coming generations will be elated with gratitude, for the wonderful gift provided by their ancestors. It is not a rosary which you can purchase from any shop in the market. Only very few know how to consecrate such a rosary.

 

Change of perspective due to Lakshmi Var-Varad Maalya

Wearing of this rosary coerces Goddess Lakshmi to imbibe in the body of the wearer with totality in Her One Hundred Eight forms. Constant touching of these beads with the person’s body leads to slow steady changes in his life. His manner of thinking also alters due to constant touch of Lakshmi element. The exiguity and fear also disappears along with financial poverty. This initiates the beginning of spiritual complete happiness, fortune and peace of mind in his life. The basic form of Goddess Lakshmi is also spiritual like other Gods and Goddesses. We have not been able to comprehend Her within the spiritual framework, because we have limited the meaning of spirituality to just adornment of saffron robes. The correct definition of spirituality is presence of sons, grandsons, an ideal wife, cordial relationships, hospitality, intimate moments of fun and joy with close friends, hospitality and charity towards monks and ascetics, pilgrimages to religious sites, and continuous thoughts of God in the mind.

 

The power to provide Lakshmi Var-Varad Maalya

Pujypaad Gurudev had once explained that Var-Varad signifies the potential to offer something to someone. Our capability should not be limited to earn and save just for ourselves. This remarkable rosary fulfils the desire that apart from enhancing our own wealth, apart from focussing on worship while leading a joyous life, we should be capable to offer anything to anyone who comes in our contact.

It is certain that spiritual progress can only be achieved after progression and prosperity in family life. A person cannot achieve completeness in his life while facing difficulties in domestic life, in the absence of any progress in family life. This rosary presents a solution to such problems arising in family life. While leading a domestic life, sometimes children fall ill, or sometimes sudden expenses consume emergency savings, apart from regular living and maintenance expenses. In reality, a person who is able to perform Sadhana while leading a domestic family life, is worthy of admirable commendation, because he is not the selfish one to turn away from his responsibilities to focus only on his own progress.

 

Lakshmi Var-Varad Maalya Fame-Lakshmi Authority-Lakshmi

A person’s social life also runs in parallel along with the progress in his domestic family life. He has a dual responsibility in family. He has to live within the society. He has to also regularly involve himself in multiple social problems like unnecessary arguments, enemy-troubles, stress with colleagues etc. This rosary is astoundingly beneficial in such situations, because when the Lakshmi element gets imbibed in a person, he automatically obtains Fame-Lakshmi, he also absorbs Authority-Lakshmi, and the presence of these remarkable forms of Lakshmi ensure that he does not face any such problems in the society. Anyone trying to oppose him, automatically becomes languid. Even mightier and powerful opponents have been found to be stuttering in the presence of such a person.

All the tasks and actions of an individual cannot be bound in a single definition. It cannot be specified that a particular person will face only a particular specific set of troubles and problems. New complexities are regularly arising in the increasingly complicated domestic and social life, but there is only one measure to resolve these problems, and that measure is entrance of a superior divine force in the life, which can shake out all these obstacles. Lakshmi Var-Varad Maalya is a process to steadily absorb such a divine energy into the body and mind.

Amazing benefits of this rosary have been seen in the growth of business. It has been experienced that the trading brothers (those Sadhaks and disciples who conduct business for a living), not only sated themselves with hypnotic attraction after adorning this remarkable rosary, rather it seems that through these beads, they have transfixed and tied Goddess Lakshmi to their shops. They have realized much improved benefits by adorning this rosary, compared to setting up Shree Yantra, Kanakdhara Yantra and Kuber Yantra.

This rosary has a potential to provide many different kinds of benefits, which lead to success and happiness in the life. The daily view and adornment of this rosary is a virtuous task in itself, which does not require any complicated Sadhana or rite-ritual. This is such a amazing rosary that every member of the family should wear it. It is mandatory for the wife to wear it, apart from the head of the family, since Lakshmi is a feminine form, and through this, She can easily merge with the owneress and continue to steadily accomplish all round development of the house. This rosary will not only grant benefits in the spheres of wealth-prosperity and multiple Lakshmi forms; rather continuous touch of this divine rosary on the chest will grant life-transformation and riddance from diseases along with spiritual upliftment to the wearer. According to the Indian philosophy, the whole body from the navel to the neck is the realm of Lord Vishnu, so the continuous touch of Lakshmi, the pure pious contact of Var-Varad Maalya, grants the virtuous boon of Lakshmi-Narayan union in his life. This region of chest is not only the realm of Lord Vishnu, rather it is the abode of all Gods and Goddesses.

Lakshmi Var-Varad Maalya – ₹. 750/-

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