रक्षिता साधना – Rakshita Sadhana

संतान की रक्षा
संतान को श्रेष्ठ संस्कार
संतान की तंत्र दोष से सुरक्षा
आप अवश्य सम्पन्न करें
रक्षिता सर्व रक्षिता साधना

 

संतान को गर्भ में चेतना संस्कार देना और गर्भस्थ शिशु को गुरु द्वारा दीक्षा संस्कार प्रदान करवाना माता-पिता का प्रथम कर्त्तव्य है। उसके उपरान्त बालक की रक्षा एवं उचित पालन पोषण हेतु अच्छा सुरक्षात्मक वातावरण देना भी माता-पिता का कर्त्तव्य है। बालकों की श्रेष्ठ वृद्धि हेतु बालपन में ही उचित संस्कार प्रदान करना भी माता-पिता का कर्त्तव्य है, बालक शारीरिक और मानसिक दृष्टि से थोड़े कमजोर होते है। अतः बालपन में उनके लिये सरस्वती संस्कार सम्पन्न किया जाता है। इसी प्रकार बालकों की सुरक्षा हेतु सर्वकालिक रक्षिता साधना भी अत्यन्त आवश्यक है। इससे बालक की नजर दोष, तंत्र दोष आदि से रक्षा होती है। प्रत्येक माता-पिता अपनी संतानों हेतु समय-समय पर यह भाग्योदयकारी साधना अवश्य सम्पन्न करें।

 


जन्म लेने की क्रिया इतनी अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं है, कि उसे विशेष माना जाए, क्योंकि जन्म की प्रक्रिया में माता-पिता का योग ही रहता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि किन स्थितियों में गर्भ धारण हुआ है? वह स्थिति ही तो बालक के व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक होती है। यह भविष्य के गर्भ में ही छुपा रहता है कि बालक आगे जाकर क्या बनेगा और इस संसार में उसका क्या योगदान होगा?
बालक अथवा बालिका के जन्म के साथ ही माता-पिता के हर्ष में वृद्धि होती है और वे बार-बार अपनी ही रचना को देखकर पुलकित और प्रसन्न होते रहते हैं लेकिन बालक के भविष्य का निर्माण करना, उसमें प्रारम्भ से ही वे संस्कार डाल देना जो कि उसके भविष्य का आधार बनते हैं, अत्यन्त ही कठिन और दुःसाध्य कार्य है।

 

इस संसार में विचित्र लीलाएं होती रहती हैं, किसी धनी घर में उत्पन्न हुआ बालक भी आगे जाकर भविष्य में निर्धन, कंगाल बन जाता है और किसी गरीब कुल में जन्म लेने वाला बालक अत्यन्त समृद्धशाली एवं विशेष गुणों से युक्त हो जाता है। ऐसे एक-दो नहीं, हजारों उदाहरण हैं कि उच्च शिक्षा प्राप्त माता-पिता के घर में उत्पन्न हुआ बालक उच्च शिक्षा ग्रहण करना तो दूर, मैट्रिक तक की शिक्षा भी पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं कर पाता और अनपढ़ माता-पिता के घर में उत्पन्न हुआ बालक उद्भट विद्वान बन जाता है।

 

ऐसा क्यों होता है कि जिस घर में कई पीढ़ियों से दरिद्रता निवास कर रही हो, उस घर में एक बालक बड़ा होकर पूरे कुल की दरिद्रता का नाश कर देता है। अशिक्षित ग्रामीण घर में उत्पन्न होकर भी कोई बालक विद्वता में अपना नाम रोशन कर शोभायमान हो जाता है।

 

यह प्रश्‍न जितना जटिल समझा जाता है, उतना अधिक जटिल है नहीं। गर्भ के भीतर रहते हुए जब शिशु को ‘गर्भस्थ शिशु चेतना दीक्षा’ दी जाती है… और यह दीक्षा ज्ञान की उसी कड़ी का एक अंश है, एक भाग है, ठीक वही प्रक्रिया है, जिसके बारे में आपने पढ़ा था कि किस प्रकार अर्जुन ने सुभद्रा को चक्रव्यूह भेदन की कला का ज्ञान कराया और अभिमन्यु ने गर्भ में ही वह ज्ञान प्राप्त कर लिया।

div>लेकिन जिन माता-पिता को यह सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ है, उनके बालकों ने दो वर्ष, पांच वर्ष, दस वर्ष पन्द्रह वर्ष की आयु ग्रहण कर ली है; अब उन बालकों में क्या क्रिया सञ्चारित की जाय कि जिससे उनमें श्रेष्ठ संस्कारों का उदय हो सके, उनके जन्म के साथ जुड़ी न्यूनताएं दूर हो सकें, उनमें श्रेष्ठ मार्ग पर चलने की, आत्मविकास करने की प्रक्रिया बन सके… और यही क्रिया जब बालक के हृदय में, मन में सही समय पर डाल दी जाती है तो बालक श्रेष्ठ गुणज्ञ, शक्तिशाली, व्याधियों से रहित एवं तीव्र बुद्धि वाला बन जाता है। जब बालक योग्य व गुणी बनता है तो सर्वाधिक प्रसन्नता उसके माता-पिता को ही होती है कि वह बालक हमारे नाम को धन्य करेगा, अपनी प्रतिष्ठा के साथ-साथ अपने माता-पिता की और कुल की प्रतिष्ठा में भी वृद्धि करेगा।

 

संतानोत्पत्ति करना एक अलग कार्य है और संतान के भाग्य की रचना करना एक अलग कार्य है। संतान को योग्य बनाने के लिए माता-पिता कुछ ऐसी क्रियाएं, साधनाएं सम्पन्न कर सकते हैं, जिनके द्वारा संतान सुसंस्कृत, भाग्यशाली, उन्नति के पथ पर अग्रसर होने वाली बन सकती है, उनका झुकाव श्रेष्ठ कार्यों की ओर, ज्ञान वृद्धि की ओर, जीवन में सफलता प्राप्त करने की ओर हो सकता है।

 

गर्भ के बालक की चैतन्यता

 

मां का गर्भ अपने आप में पूर्ण ब्रह्माण्ड है, और मां का गर्भ संसार का सबसे सुकोमल, सक्षम और सुरक्षित स्थान है। जब तक वह शिशु मृत्यु लोक में जन्म नहीं ले लेता तब तक वह ब्रह्माण्ड से जुड़ा होता है, क्योंकि उसमें निवास कर रही आत्मा ब्रह्माण्ड के किसी कोने से आई होती है। हो सकता है वह देव लोक से आया बालक हो, हो सकता है वह पितृ लोक से आया बालक हो, हो सकता है कि वह किसी और लोक से आया हुआ बालक हो, जिस लोक से भी वह बालक आया हुआ है, उस लोक से उसका सीधा सम्पर्क और साहचर्य रहता है। यह सम्पर्क में रहने की क्रिया इसलिए होती है, कि उसका सारा शरीर ब्रह्माण्डमय होता है। वह केवल दो कानों से ही नहीं सुनता, वह केवल दो नेत्रों से ही नहीं देखता, अपितु उसके सारे शरीर के हजारों-हजारों रोम देखने, सुनने और समझने के परिपक्व साधन होते हैं, इसलिए गर्भस्थ शिशु अपने आप में ज्यादा समर्थ होता है, वह किसी भी ज्ञान को ग्रहण करने में ज्यादा सक्षम होता है, वह किसी भी क्षेत्र में आसानी से पूर्णता प्राप्त कर सकता है। गर्भावस्था शिुश को पूर्णता देने का श्रेष्ठ काल होता है। 

 

बाहरी जीवन में जो ज्ञान प्राप्त करने में बीस वर्ष लगते हैं, वह ज्ञान, गर्भ में पल रहा शिशु बीस दिन में ही धारण कर सकता है और फिर उसमें विस्मृति की क्रिया नहीं होती अर्थात् जो एक बार सुन लिया, समझ लिया वह शिशु के मानस पर हमेशा के लिए अंकित हो जाता है।

 

गर्भ को चैतन्य किया जा सकता है

 

पूर्ण पुरुष को पैदा करने के लिए यह आवश्यक है कि मां के गर्भ को चैतन्यता प्रदान की जाए। जब शिशु गर्भ में होता है, तभी मंत्र क्रिया के माध्यम से ‘पुंसवन क्रिया’ सम्पन्न की जाती है। पुंसवन संस्कार शास्त्र का एक विधान है, और सोलह संस्कारों में से एक संस्कार है। पुंसवन का तात्पर्य है कि गर्भ को एक ताकत दी जाए, एक क्षमता दी जाए… और इतनी चैतन्यता प्रदान की जाए, कि जन्म लेने वाले बालक के समस्त नेत्र और कर्ण जाग्रत हो सकें। पुंसवन क्रिया के साथ ही बालक को चेतना भी प्रदान की जाती है। यह संस्कार माता, पिता नहीं दे सकते, यह तो गुरु ही प्रदान कर सकते हैं। गर्भस्थ बालक को यह चेतना गुरु के आशीर्वाद से ही प्राप्त हो सकती है या फिर गुरु प्रदत्त दीक्षा द्वारा ही ऐसा संभव है। ‘गर्भस्थ बालक चैतन्य दीक्षा’ को गुरु दीक्षा प्राप्त कोई भी माता अपने शिशु के लिए प्राप्त कर सकते हैं। इस दीक्षा के फलस्वरूप माता के संस्कार जनित दोषों का प्रभाव गर्भ में पल रहे शिशु पर नहीं पड़ता और वह शिशु अपनी चैतन्यता को बनाए हुए गर्भ में ही बहुत कुछ ज्ञान व सुसंस्कार अर्जित कर लेता है।

 

गर्भस्थ चेतना प्राप्त शिशु व अन्य शिशुओं में अंतर

 

इसके बाद होने वाली संतानें कोई सामान्य नर या नारी नहीं अपितु अत्यन्त मेधायुक्त विलक्षण शिशु होते हैं, जो कालान्तर में सुयश प्राप्त करते हैं। गर्भ में सद्गुरु प्रदत्त मंत्र शक्ति व आशीर्वाद से शिशु की कुण्डलिनी जाग्रत अवस्था में रहती है, जिससे वह जन्म लेने के बाद अन्य बालकों से हटकर होता है। वह जल्दी ही किसी भी बात को समझ लेता है, उसकी बुद्धि कुशाग्र होती है, तथा आत्मविश्‍वास भी ऐसे बालकों में अद्भुत रूप से ऊंचा होता है। विद्यालय में ऐसे बालक कीर्ति एवं ख्याति प्राप्त करते हैं। पुरुषार्थ की इनमें कमी नहीं होती है, ये बालक बड़े होकर स्वयं तथा अपने कुल का नाम ऊंचा करते हैं।

 

वास्तव में ‘गर्भस्थ शिशु चैतन्य दीक्षा’ तो हर मां को प्राप्त करनी ही चाहिए, क्योंकि बालक के जीवन निर्माण के लिए जो प्रयास माता-पिता को करना पड़ता है, उस कठोर परिश्रम की अपेक्षा गर्भावस्था में प्रदान की गई यह चेतना अधिक श्रेयस्कर एवं प्रभावी होती है। शिशु के जीवन के लिए माता-पिता की ओर से किया गया यह दूरगामी एवं दूरदर्शितापूर्ण प्रयास है।

 

शास्त्रों में कहा गया है – 

 

‘कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति’

 

अर्थात् पुत्र कुपुत्र हो सकता है, लेकिन माता कभी कुमाता नहीं हो सकती है, कोई भी पिता अपने पुत्र अथवा पुत्री के विरुद्ध सोचने का कार्य नहीं कर सकते, और वेदों में कहा गया है

 

जन्मना जायते शूद्रः संस्कारद् द्विज उच्चते

 

अर्थात् जन्म से तो प्रत्येक बालक अज्ञानी होता है, उसमें ज्ञान का अभाव होता है, तब उसके जीवन की श्रेष्ठ स्थिति निर्मित होती है और उसी के अनुसार वह द्विज अर्थात् ज्ञानी और योग्य बनता है।

 

जन्म के पश्‍चात् क्या संस्कार करें?

 

हर माता-पिता को गर्भस्थ शिशु चेतना संस्कार के बारे में जानकारी नहीं होती है। वे समय पर अपने बच्चों को यह संस्कार प्रदान नहीं कर पाते हैं। आपने ध्यान दिया होगा कि बीमारी का प्रभाव, नजर दोष का प्रभाव सबसे अधिक बच्चों पर ही पड़ता है क्योंकि वे आन्तरिक रूप से पूर्ण पुष्ट नहीं होते हैं। अपने बच्चों की रक्षा, लालन-पालन और उचित संस्कार देना प्रत्येक माता-पिता का कर्त्तव्य है। प्रत्येक माता-पिता की आशाओं का केन्द्र उसकी संतान ही होती है। संतान के आधार पर ही मनुष्य अपने जीवन में अपने आपको परिपूर्ण अनुभव करता है। इसलिये प्रत्येक माता-पिता को अपने बालक को मांत्रिक सुरक्षा, तांत्रिक सुरक्षा और दैहिक सुरक्षा अवश्य प्रदान करनी चाहिए।

 

बालक के जीवन में प्रारम्भ के वर्ष बड़े ही महत्वपूर्ण होते हैं। उस कच्ची उम्र में ही उसमें संस्कार के साथ-साथ बुद्धि का विकास होता है।

 

प्रारम्भिक अवस्था में शरीर निरोगी होने पर उसका स्वास्थ्य पूरे जीवन अनुकूल रहता है। प्रारम्भिक अवस्था में ही वह अपनी मानसिक क्षमता में असीम वृद्धि कर सकता है।

 

अपने बचपन की अवस्था में बालक आस-पास के वातावरण, मित्र, परिचित, सम्बन्धियों से शीघ्र प्रभावित होता है और यह प्रभाव अच्छा और बुरा दोनों हो सकता है लेकिन यदि बालक में स्वयं की प्रज्ञा शक्ति है तो उस पर किसी भी प्रकार का विपरीत प्रभाव नहीं पड़ सकता है।

 

ऐसे संस्कारी बालक के मन में हर समय यह भाव रहता है कि मेरे लिये क्या उचित है और क्या अनुचित है। मुझे अपने जीवन में किस मार्ग पर बढ़ना है।

 

निःसंदेह महान् बनने की क्रिया बचपन में ही शुरु करनी पड़ती है, इसलिये बचपन को महत्वपूर्ण काल माना गया है।

 

प्रत्येक माता-पिता को अपने बालक की आन्तरिक शक्ति जागरण के लिये कुछ विशेष साधनाएं अवश्य करनी चाहिए। ये साधनाएं बालक की उन्नति के लिये आवश्यक हैं।

 

वर्ष में कई प्रकार के व्रत, पर्व, त्यौहार, साधना सिद्धि दिवस आते हैं, इन दिवसों को माता-पिता द्वारा अपनी संतान के लिए यदि साधना सम्पन्न की जाती है, तो वह संतान के लिए भाग्योदय कारक बन जाती हैं, संतान के भाग्य में एक ऐसा विशेष अध्याय जुड़ जाता है जो कि जीवन पर्यन्त उसके लिए सौभाग्यकारक होता है। माता-पिता को अपनी संतान के लिये रक्षिता साधना अवश्य करनी चाहिये।

 

साधना विधान

 

  • किसी भी सिद्ध मुहूर्त अथवा किसी भी शुक्ल पक्ष के रविवार को यह साधना सम्पन्न की जा सकती है। साधना दिवस के दिन प्रातः पति-पत्नी दोनों स्नान कर अपनी संतानों के साथ पूजा स्थान में बैठें। संतान यदि गर्भ में है तो गर्भवती स्त्री साधना में बैठे और संतान के लिये दिये गये विधान को गर्भवती स्त्री स्वयं सम्पन्न करें। सर्वप्रथम सरस्वती का वन्दना करें, जिसका ध्यान मंत्र निम्न है –
ध्यान 
शुद्धस्फटिक संकाशां,  चन्द्रकोटि सुशीतलां। 
अभयां वर हस्तां च, वन्दे वागीश्‍वरीं शिवां॥
  • सरस्वती ध्यान के पश्‍चात् अपने सामने चौकी पर एक पीला वस्त्र बिछाकर गुरु चित्र/विग्रह/यंत्र अथवा पादुका स्थापित करें। संतान रक्षा निखिल के आशीर्वाद के बिना संभव ही नहीं है। इस हेतु हाथ जोड़कर गुरुदेव निखिल का ध्यान करें –
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्‍वरः।
गुरुः साक्षात् पर ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥
  • निखिल ध्यान के पश्‍चात् गुरु चित्र/विग्रह/यंत्र/पादुका को जल से स्नान करावें –
ॐ निखिलम् स्नानम् समर्पयामि॥
  • इसके पश्‍चात् स्वच्छ वस्त्र से पौंछ लें निम्न मंत्रों का उच्चारण करते हुए कुंकुम, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, धूप-दीप से पंचोपचार पूजन करें –
ॐ निखिलम् कुंकुम समर्पयामि।
ॐ निखिलम् अक्षतान समर्पयामि।
ॐ निखिलम्  पुष्पम् समर्पयामि।
ॐ निखिलम् नैवेद्यम् निवेदयामि।
ॐ निखिलम् धूपम् आघ्रापयामि, दीपम् दर्शयामि।              (धूप, दीप दिखाएं)
  • पंचोपचार पूजन के पश्‍चात् तीन आचमनी जल गुरु चित्र/विग्रह/यंत्र/पादुका पर घुमाकर छोड़ दें। इसके पश्‍चात् गुरु मंत्र की एक माला मंत्र जप करें –
ॐ परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः
  • गुरु पूजन के पश्‍चात् गुरुदेव से संतान की सुरक्षा का मानसिक आशीर्वाद प्राप्त करें तथा भगवान सदाशिव का मानसिक पूजन कर उनसे भी संतान की सुरक्षा की प्रार्थना करें।
  • स्वयं चंदन का तिलक करें और संतान को कुंकुम से तिलक करें। गभवर्ती स्त्री हो तो उसे भी कुंकुम से तिलक करें।
  • इसके पश्‍चात् गुरु चित्र के सम्मुख ही एक पात्र में पुष्पों का आसन प्रदान कर ‘प्राण प्रतिष्ठित भाग्योदय कल्प यंत्र’ स्थापित कर दें।
  • भाग्योदय कल्प यंत्र का पंचोपचार पूजन करें।
  • इसके पश्‍चात् बालक-बलिका के दाहिने हाथ में एक -एक ‘रक्षा-गुटिका’ रख कर मुट्ठी बंद करा दें। गर्भवती स्त्री अपने दाहिने हाथ में संतान सुरक्षा स्वरूप ‘रक्षा गुटिका’ रख लें।
  • इसके पश्‍चात् दाहिने हाथ में कलावा बांधें तथा बायें हाथ में एक सुपारी देकर मुट्टी बंद करा दें।
  • माता-पिता दोनों ‘कार्य सिद्धि माला’ से निम्न मंत्र का पांच माला मंत्र जप करें, गर्भवती स्त्री को मंत्र जप की अनिवार्यता नहीं है। गर्भवती स्त्री अपने दाहिने हाथ में ‘रक्षा गुटिका’ तथा बायें हाथ में सुपारी रख कर मानसिक मंत्र जप कर सकती हैं –
मंत्र 
॥ॐ क्षं ऐं क्षीं रक्षायै ऊर्ध्व चेतनाय ॐ फट्॥
  • माता-पिता उसी स्थान पर बैठे-बैठे पूर्ण मंत्र जप सम्पन्न करें।
  • जप की समाप्ति के पश्‍चात् भाग्योदय कल्प यंत्र बालकों के सिर पर स्पर्श करा दें और बालक के हाथ में रखी रक्षा गुटिका को उनके सिर पर ऊपर दिये गये मंत्र का उच्चारण करते हुए तीन बार घुमायें तथा उसे यंत्र पर चढ़ा दें। गर्भवती स्त्री स्वयं पर तीन बार घुमाकर रक्षा गुटिका को यंत्र पर चढ़ा दें।
  • बालकों और गर्भवती स्त्री को यह यंत्र धारण करा दें तथा गुटिका को एक पक्ष अर्थात् पन्द्रह दिन पूजा स्थान में रखने के बाद जल में समर्पित कर दें।
  • जब भी बालक पर कोई संकट आये, पूजा स्थान में प्राणप्रतिष्ठित गुरु चित्र के आगे 21 बार उपरोक्त मंत्र का उच्चारण करें, तो संकट दूर हो जाता है।
  • यह साधना एक ऐसी जीवनोपयोगी साधना है, जो कि माता-पिता द्वारा अपने संतान के लिए की जाती है।
प्रति भाग्योदय कल्प यंत्र धारण योग्य – 240/-
प्रति नग रक्षा गुटिका – 90/-

Ahoi Ashtami

22 October 2016

Protection of Children

Good Values to Children

Protection of Children from Black-Magic

You should definitely perform

Rakshita Sarv Rakshita Sadhana

 

It is the foremost duty of the parents to provide Chetna Sanskaar to the child in the womb, and to arrange for Diksha from Gurudev to the child in the womb. Next, it is also the responsibility of the parents to arrange for a good protective environment for the protection and good up-bringing of the child. It is parents’ duty to provide for the best environment for growth of child’s intelligence, the children are weaker both physically and mentally. Therefore Saraswati Sanskaar rite is conducted in their infancy. Similarly Sarvkaalik Rakshita Sadhana is also very important for protection of the children. It provides protection against evil-eye and black-magic. Every parent should regularly perform this fortune-enhancing Sadhana for their children.


The process of birth is not so important, as it is simply because of coming together of the parents. It is more significant to understand the conditions in which the birth has taken place. These conditions are important for development of the child’s personality. Only the future knows what the child will become and what his contribution to the society will be.

The parents get filled with joy upon the birth of a son or daughter, and they keep getting delighted upon seeing their creation. However it is very difficult and hard task to build the child’s future, and to inculcate the Values-Sanskaars which will shape his or her future.

Strange events occur in this world, a child born of rich parents later become poor and bankrupt; while a child born in poverty later becomes  wealthy and prosperous. There are not just 1-2, but rather thousands of examples that a child born of highly educated parents could not complete even his Metric exam, and a child born of illiterate parents turned into a famous scholar.

How is it possible that a single child is able to eradicate the cycle of poverty running into a house for multiple generations. A child born in an illiterate family illustrates his name and fame due to his intelligence and wisdom.

We think of this as a highly complex question, however it is not so complicated. When a foetus is granted “Garbasth Shishu Chetna Diksha” within the womb… and this Diksha is a link to the same knowledge, is a part of the same process, which you have read about Arjuna imparting the Chakravayuh  knowledge to Subhadra, leading to Abhimanyu acquiring this knowledge in the womb.

However some of the parents who were not so lucky, and their children have now grown up to two years, five years, ten years or fifteen years. What process should be transferred in such children to initiate growth of noble values-Sanskaars, to remove the imperfections associated with their birth, to start the process of self-development by choosing the correct paths… And when such a process is poured into the child’s heart and mind at the right time, then the child grows into a strong, healthy, intelligent person with good qualities. When a child grows into the most qualified and virtuous person, the parents are the most delighted that this child will enhance the name of our family, and will develop the reputation of his family.

Giving birth and shaping the child’s future are two very different processes. The parents can perform some processes and Sadhanas to develop their children, so that their progeny becomes noble, fortunate, successful, with an inclination towards good tasks, enhancing knowledge and achieving all-round success in life.

 

Consciousness of foetus in the womb

The mother’s womb is a complete universe in itself, and it is the most delicate, safe and capable place of the world. A child is fully connected with the universe before taking birth, because the soul within him has come from some remote corner of the universe. It is possible that this child might have originated from the Dev-Lok, or the Pitra-Lok, or from any other Lok. The child has a direct contact and connection with that Lok. It is possible because his entire form is universal. He doesn’t just hear from two ears or sees from two eyes, rather there are thousands of senses in his body to view, listen and understand, so a foetus in the womb is much more capable , he can attain any knowledge or wisdom quickly, and he can achieve completeness easily in any field. The pregnancy is the best time to give Totality to the child.

A foetus in the womb can easily acquire the external knowledge of twenty years within twenty days, and he doesn’t forget any single detail; whatever he has heard or understood, stays imprinted in his mind for ever.

 

Pregnancy can be divinely consciously activated

It is important to provide consciousness to the pregnancy to give birth to a Perfect child. The “Punswan Process” is accomplished through Mantras when the child is in the womb. The Punswan Sanskaar is a part of holy scriptures and is one of the sixteen Sanskaars. The Punswan implies grant of a strength, an ability to the womb… and to provide such a strong divinity consciousness, so that all eyes and ears of the unborn child attain cognizance. The Punswan process provides consciousness to the child. This Sanskaar cannot be done by the parents, only the Guru can do so. A child growing in the womb can attain this consciousness either through Guru’s blessings or through Diksha granted by the Guru. Any pregnant mother can obtain “Garbasth Baalak Cheitanya Diksha” through Guru Diksha for her unborn child. This Diksha insulates the child from the imperfect defects of the mother, and the child can learn a lot of knowledge within the conscious womb.

 

Differences in Garbasth Chetna conscious babies and other babies

Such babies are very intelligent who attain fame later in life. The Mantra-Shakti and blessings imparted by the Guru in the womb activates the Kundalini of the child, and therefore, such a child is very different from the other children. He can easily understand any topic, his mind is very sharp and he has a very high degree of self-confidence. Such children attain name and fame in the school. Such children are full of energy, and such children enhance their family’s name upon growing up.

In reality, every pregnant mother should obtain the divine “Garbasth Shishu Cheitanya Diksha“, because this consciousness is more effective compared to the hard work exerted by the parents to inculcate the life-values to the child. This is a visionary and far-reaching effort from the parents.

 

The Holy scriptures have stated that –

“Kuputro Jaayet Kvachidapi Kumaata Na Bhavati”

i.e. a child can turn into a bad-spoilt brat but a mother cannot become bad, no parent can even think of doing anything against their child, and the Holy Vedas have stated that-

“Janmanaa Jaayate ShudraH Sanskaarad Dwij Uchchate”

i.e. a child is born ignorant, and does not have any knowledge. After attaining knowledge, he becomes capable, able and wise.

 

What Sanskaars to perform after birth?

Every parent is not aware of the Garbasth Shishu Chetna Sanskaar and they are not able to get this done for their children at the right time. You would have noticed that the children are most affected by the diseases and evil-eyes because they are not completely physically healthy.  It is every parents’ duty to provide the required protection, up-bringing and proper Values-Sanskaars to their children. The child is the focus of the parent’s hopes. A person feels himself complete on the basis of his progeny. Therefore each parent should provide Maantrik protection, Taantrik protection and Physical protection to their children.

The initial infancy years are very significant within a child’s life. His intelligence and Values-Sanskaars develop in this early age.

A disease free body in infancy will ensure a good health throughout his life. He can limitlessly grow his mental capacity in these early years.

A child gets easily influenced by the surrounding environment, friends, contacts and relatives and this influence can either be good or bad. However if the child has noble wisdom, then he will not be affected by the bad influence.

Such a Sanskaari child can always differentiate between good and bad, and he can properly decide how to move on in the life.

The childhood period is the most significant time period to start on the path to greatness.

Every parent should perform some special Sadhanas to awaken the inner strengths of their children. These Sadhanas are necessary for a child’s progress.

We get a number of Fasts, events, festivals and Sadhana Siddhi days within the year, the Sadhanas performed by the parents for their children during these days enhance their fortune and change their fortune for the life. The parents should certainly perform Rakshita Sadhana for their children.

 

Sadhana Procedure

  • This Sadhana can be performed on any Siddha Muhurath or on any Sunday of the Shukla (bright) Paksha. On the Sadhana day, both parents should sit with their children in the worship-place after taking fresh bath. If the mother is pregnant, then she should sit in the Sadhana and perform the entire Sadhana procedure herself for the child in the womb. Start with Saraswati Vandana, whose Dhyaan Mantra is –

 

Meditation

Suddhasphaṭika Sankaashaam, Chandrakoti Sushitalaam |

Abhyaam Vara Hastaan Cha, Vande Vaagishwarin Shivaan ||

 

  • After Saraswati meditation, spread a yellow cloth on a wooden board in front of you, and set-up Guru picture/statue/Guru Yantra/ Guru Paduka on it. The child protection is simply not possible without divine blessings of Nikhil. So meditate on the divine form of Gurudev Nikhil with folded hands –

GururBrahmaa GururVishnuH Gururdevo MaheshwaraH |

GuruH Saakshaat Par Brahmaa Tasmei Shree Guruve NamaH ||

 

  • Bathe the Guru Picture / Statue/ Yantra / Paduka with water after Nikhil meditation –

Om Nikhilam Snaanam Samarapayaami ||

 

  • Then wipe with a clean cloth. Perform Panchopchaar worship-poojan with Kumkum (Vermilion), Akshat (Unbroken rice), Pushpa (Flowers), Neivedh (Sweets/Fruit offering), Dhoop (Incense) – Deep (Lamp) chanting following mantras –

Om Nikhilam Kumkum Samarapayaami |

Om Nikhilam Akshtaan Samarapayaami ||

Om Nikhilam Pushpam Samarapayaami ||

Om Nikhilam Neivedhyam Nivedayaami ||

Om Nikhilam Dhoopam Aardhyaapayaami, Deepam Darshayaami ||

(Show Dhoop, Deep)

 

  • Now rotate three Achmaani (spoonfuls) water around the  Guru Picture / Statue/ Yantra / Paduka and drop it on ground. Then chant 1 rosary-round of Guru Mantra with Guru Mala –

Om Param Tatvaaya Naaraayanaaya Gurubhayo Namah

 

  • After Guru-worship, obtain mental blessings from Gurudev for protection of children, and then perform mental worship of God SadaaShiva, also pray to Him for protection of the child.

 

  • Make a mark of Chandan on your forehead and with Kumkum on the child’s forehead. Similarly make a mark of Kumkum on the pregnant lady’s forehead.

 

  • After this, setup “Praan Pratishthit Bhaagyodaya Kalp Yantra” on a seat of flowers in a plate, in front of Guru-picture.

 

  • Perform Panchopchaar Poojan of the Bhagyodaya Kalp Yantra.

 

  • After this, place a “Raksha Gutika” in the right hand of the child, and get the fist closed. The pregnant lady should keep the “Raksha Gutika” in her right hand for protection of the child.

 

  • Then tie the sacred red kalava thread in the right hand, and placing a supari in the left hand, close the fist.

 

  • Both parents should chant the following mantra with “Karya Siddhi Mala“, it is not mandatory for the pregnant lady to chant the mantra. The pregnant lady may chant the mantra mentally keeping the “Raksha Gutika” in her right hand and supari in her left hand.

 

Mantra

 

|| Om Kshyam Ayeim Shreem Rakshaaye Udharva Chetanaaya Om Phat ||

 

  • The parents should complete the entire mantra chanting sitting at the same place.

 

  • After completion of the mantra chanting, get the Bhagyodaya Kalp Yantra touched by the forehead of the children, and after rotating the Raksha Gutika (which was in child’s hand) over the head of the child, whilest chanting the mantra, offer it on the Yantra. The pregnant lady should rotate the Raksha Gutika over her head three times and offer it on the Yantra.

 

  • The children and the pregnant lady should wear this Yantra, and drop the Gutika in running water stream after keeping it in your worship-place for a Paksha (Fifteen Days)

 

  • Whenever the child encounters any danger, chant the above Mantra 21 times in the worship-place in front of Praan-pratishthit Gurudev’s picture, the danger will vanish.

 

  • This is a very useful lifelong Sadhana which parents should perform for their children.

 

Every Wearable Bhagyodaya Kalp Yantra : Rs. 240/-

Every Raksha Gutika item : Rs. 90/-

Share
error: Content is protected !!