भैरव विवेचन (Bhairav Interpretation)

जिनसे काल भी भयभीत रहता है
भैरव
रक्षाकारक देव
भय का नाश करने वाले देव
रोग-शोक दूर करने वाले देव
तांत्रिक बाधाओं से रक्षा देने वाले देव
शनि कुप्रभाव को समाप्त करने वाले देव
मंगल दोष को समाप्त करने वाले देव

 

विस्तृत विवेचन
लौकिक और अलौकिक शक्तियों के द्वारा मानव जीवन में सफलता पायी जा सकती है, लेकिन लौकिक शक्तियां जहां स्थिर रहती हैं, वहीं अलौकिक शक्तियां हर पल, हर क्षण मनुष्य के साथ-साथ रहती हैं। अलौकिक शक्तियों को प्राप्त करने का स्रोत मात्र देवी देवताओं की साधना, उपासनाएं हैं जो शीघ्र फलदायी मानी गई हैं। कालभैरव भगवान शिव के पांचवें स्वरूप हैं तो विष्णु के अंश भी हैं। इनकी उपासना मात्र से ही सभी प्रकार की दैहिक, दैविक, मानसिक परेशानियों से शीघ्र मुक्ति मिलती है। कोई भी मानव इनकी पूजा, आराधना, उपासना से लाभ उठा सकता है। आज के विषमता भरे युग में मानव को कदम-कदम पर बाधाओं, विपत्तियों और शत्रुओं का सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में मंत्र साधना ही इन सब समस्याओं पर विजय दिलाती है। शत्रुओं का सामना करने, सुख-शान्ति समृद्धि प्राप्ति में भैरव साधना अति उत्तम है। शिव पुराण में वर्णित भैरव साधना पर आधारित विस्तृत आलेख –
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भैरव जहां भगवान शिव के गण के रूप में जाने जाते हैं, वहीं वे दुर्गा के अनुचारी माने गए हैं। साथ ही भैरव रात्रि के देवता माने जाते हैं।

 

शास्त्रों के अनुसार भगवान शिव के दो स्वरूप बताए गए हैं। एक स्वरूप में महादेव अपने भक्तों को अभय देने वाले विश्‍वेश्‍वर स्वरूप हैं वहीं दूसरे स्वरूप में भगवान शिव दुष्टों को दंड देने वाले काल भैरव स्वरूप में विद्यमान हैं। शिवजी का विश्‍वेश्‍वर स्वरूप अत्यंत ही सौम्य और शांत है यह भक्तों को सुख, शांति और समृद्धि प्रदान करता है। वहीं भैरव स्वरूप में वे रौद्र रूप वाले हैं, इनका रूप भयानक और विकराल होता है। कलियुग में काल के भय से बचने के लिए कालभैरव की आराधना सबसे अच्छा उपाय है।

 

भैरव शब्द का अर्थ ही होता है- भीषण, भयानक, डरावना। भैरव को शिव के द्वारा उत्पन्न हुआ या शिवपुत्र माना जाता है। भगवान शिव के आठ विभिन्न स्वरूपों में से भैरव एक हैं। वे भगवान शिव के प्रमुख योद्धा हैं। भैरव के आठ स्वरूपों का वर्णन शास्त्रों में आता है। जिनमे प्रमुखत: काला और गोरा भैरव अति प्रसिद्ध हैं।

 

भूत, प्रेत, पिशाच, पूतना, कोटरा और रेवती आदि की गणना शिव के अन्य गणों में की जाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो भैरव विविध रोगों और आपत्तियों, विपत्तियों के निवारण के अधिदेवता हैं। शिव प्रलय के देवता हैं, अत: विपत्ति, रोग एवं मृत्यु के समस्त दूत और देवता उनके अपने सैनिक हैं। इन सब गणों के अधिपति या सेनानायक हैं – महाभैरव। सीधी भाषा में कहें तो भैरव वह सेनापति है जो बीमारी, विपत्ति और विनाश के पार्श्‍व में उनके संचालक के रूप में सर्वत्र ही उपस्थित दिखायी देता है।
भय स्वयं तामस-भाव है, तम तो अज्ञान का प्रतीक है। यह वह भाव है जो विवेकपूर्ण है एवं जानता है कि समस्त पदार्थ और शरीर पूरी तरह नाशवान हैं इसलिये मनुष्य को आत्मा के अमरत्व को समझ कर प्रत्येक परिस्थिति में निर्भय बने रहना है। जहां विवेक तथा धैर्य का प्रकाश है वहां भय का प्रवेश हो ही नहीं सकता। वैसे भय केवल तामस-भाव ही नहीं, वह अपवित्र भी होता है।
काल भैरव का नाम सुनते ही एक अजीब-सी भय मिश्रित अनुभूति होती है। एक हाथ में ब्रह्माजी का कटा हुआ सिर और अन्य तीनों हाथों में खप्पर, त्रिशूल और डमरू लिए भगवान शिव के इस रुद्र रूप से लोगों को डर भी लगता है, लेकिन ये बड़े ही दयालु – कृपालु और जन का कल्याण करने वाले हैं।
कालभैरव की उत्पत्ति की कथा शिवपुराण में इस तरह है –
एक बार मेरु पर्वत के सुदूर शिखर पर ब्रह्मा विराजमान थे, तब सब देव और ऋषिगण उत्तम तत्व के बारे में जानने के लिए उनके पास गए। तब ब्रह्मा ने कहा वे स्वयं ही उत्तम तत्व हैं यानि कि सर्वश्रेष्ठ और सर्वोच्च हैं। किन्तुु भगवान विष्णु इस बात से सहमत नहीं थे। उन्होंने कहा कि वे ही समस्त सृष्टि से सर्जक और परमपुरुष परमात्मा हैं, तभी उनके बीच एक महान ज्योति प्रकट हुई। उस ज्योति के प्रभा मंडल में उन्होंने पुरुष का एक आकार देखा। तब तीन नेत्र वाले महान पुरुष शिव स्वरूप में दिखाई दिए। उनके हाथ में त्रिशूल था और उन्होंने सर्प और चंद्र के अलंकार धारण किए हुए थे। तब ब्रह्मा ने अहंकार से कहा कि आप पहले मेरे ही ललाट से रुद्ररूप में प्रकट हुए हैं। उनके इस अनावश्यक अहंकार को देखकर भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो गए और उस क्रोध से भैरव नामक पुरुष को उत्पन्न किया। यह भैरव बड़े तेज से प्रज्जवलित हो उठा और साक्षात काल की भांति दिखने लगा।
इसलिए वह कालराज के नाम से प्रसिद्ध हुआ और भयंकर होने से भैरव कहलाने लगा। स्वयं काल भी उनसे भयभीत हो गया इसलिए वह कालभैरव कहलाने लगे। दुष्ट आत्माओं का नाश करने वाला यह आमर्दक भी कहा गया। काशी नगरी का अधिपति भी उन्हें बनाया गया। उनके इस भयंकर रूप को देखकर बह्मा और विष्णु, शिव की आराधना करने लगे और गर्वरहित हो गए।
दूसरी कथा है कि ब्रह्मा जी ने पूरी सृष्टि की रचना की। ऐसा मानते हैं कि उस समय प्राणी की मृत्यु नहीं होती थी। पृथ्वी के ऊपर लगातार भार बढ़ने लगा। पृथ्वी परेशान होकर ब्रह्मा के पास गई।  पृथ्वी ने ब्रह्मा जी से कहा कि मैं इतना भार सहन नहीं कर सकती। तब ब्रह्मा जी ने मृत्यु को लाल ध्वज लिए स्त्री के रूप में उत्पन्न किया और उसे आदेश दिया कि प्राणियों को मारने का दायित्त्व ले। मृत्यु ने ऐसा करने से मना कर दिया और कहा कि मैं ये पाप नहीं कर सकती। ब्रह्माजी ने कहा कि तुम केवल इनके शरीर को समाप्त करोगी लेकिन जीव तो बार-बार जन्म लेते रहेंगे। इस पर मृत्यु ने ब्रह्माजी की बात स्वीकार कर ली और तब से प्राणियों की मृत्यु शुरू हो गई।
समय के साथ मानव समाज में पाप बढ़ता गया। तब शंकर भगवान ने ब्रह्मा जी से पूछा कि इस पाप को समाप्त करने का आपके पास क्या उपाय है। ब्रह्माजी ने इस विषय में अपनी असमर्थता जताई। शंकर भगवान शीघ्र कोपी हैं। उन्हें क्रोध आ गया और उनके क्रोध से काल भैरव की उत्पत्ति हुई। काल भैरव ने ब्रह्माजी के उस मस्तक को अपने नाखून से काट दिया जिससे उन्होंने असमर्थता जताई थी। इससे काल भैरव को ब्रह्म हत्या लग गयी।
काल भैरव तीनों लोकों में भ्रमण करते रहे लेकिन ब्रह्म हत्या से वे मुक्त नहीं हो पाए। ऐसी मान्यता है कि जब काल भैरव काशी पहुंचे, तब ब्रह्म हत्या ने उनका पीछा छोड़ा। उसी समय आकाशवाणी हुई कि तुम यहीं निवास करो और काशीवासियों के पाप-पुण्य के निर्णय का दायित्त्व संभालो तब से भगवान काल भैरव काशी नगरी में स्थापित हो गए।

 

भैरव: पूर्ण रूपोहि शंकर परात्मन: 
भूगेस्तेवैन जानंति मोहिता शिव भामया:।

 

देवताओं ने श्री कालभैरव की उपासना करते हुए बताया है कि काल की तरह रौद्र होने के कारण यह कालराज हैं। मृत्यु भी इनसे भयभीत रहती है। यह कालभैरव हैं इसलिए दुष्टों और शत्रुओं का नाश करने में सक्षम हैं। 
तंत्र शास्त्र के प्रवर्तक आचार्यों ने प्रत्येक उपासना कर्म की सिद्धि के लिए किए जाने वाले जप पाठ, आदि कर्मों के आरंभ में भगवान भैरवनाथ की आज्ञा प्राप्त करने का निर्देश दिया है।
अतिक्रूर महाकाय, कल्पानत-दहनोपय, भैरवाय नमस्तुभ्यमेनुझां दातुमहसि। 
इससे स्पष्ट है कि सभी पूजा, पाठों की आरंभिक प्रक्रिया में भैरवनाथ का स्मरण, पूजन, मंत्र जाप आवश्यक होते हैं। श्री काल भैरव का नाम सुनते ही बहुत से लोग भयभीत हो जाते हैं और कहते हैं कि ये उग्र देवता हैं। अत: इनकी साधना वाम मार्ग से होती है इसलिए यह हमारे लिए उपयोगी नहीं हैं। लेकिन यह मात्र उनका भ्रम है। प्रत्येक देवता सात्विक, राजसिक और तामसिक तीनों स्वरूपों वाले होते हैं, और ये स्वरूप देवताओं द्वारा भक्तों-साधकों के कार्यों की सिद्धि के लिए ही धारण किये जाते हैं। श्री काल भैरव इतने कृपालु एवं भक्तवत्सल हैं कि सामान्य स्मरण एवं स्तुति से ही प्रसन्न होकर भक्तों के संकटों का तत्काल हरण कर लेते हैं। 
तांत्रिक पद्धति में भैरव शब्द की निरूक्ति उनका विराट रूप प्रतिबिम्बित करती है। वामकेश्वर तंत्र की योगिनी हृदयदीपिका टीका में अमृतानंद नाथ कहते हैं- ‘विश्वस्य भरणाद् रमणाद् वमनात् सृष्टि-स्थिति-संहारकारी परशिवो भैरवः।
भ- से विश्‍व का भरण, र- से रमण, व- से वमन अर्थात सृष्टि की उत्पत्ति पालन और संहार करने वाले शिव ही भैरव हैं। तंत्रलोक की विवेक-टीका में भगवान शंकर के भैरव रूप को ही सृष्टि का संचालक बताया गया है।
श्री तत्वनिधि नाम तंत्र-मंत्र में भैरव शब्द के तीन अक्षरों के ध्यान से उनके त्रिगुणात्मक स्वरूप का सुस्पष्ट परिचय मिलता है, क्योंकि ये तीनों शक्तियां उनमें समाविष्ट हैं।
‘भ’ अक्षरवाली जो भैरवी शक्ति है वह श्यामला हैं एवं भद्रासन पर विराजमान हैं तथा उदय कालिक सूर्य के समान सिंदूरवर्णी उनकी कांति है। वह एक मुखी विग्रह अपने चारों हाथों में धनुष, बाण वर तथा अभय धारण किए हुए हैं।
‘र’ अक्षरवाली भैरवी शक्ति श्याम वर्णां हैं। उनके वस्त्र लाल हैं। सिंह पर आरूढ़ वह पंचमुखी देवी अपने आठ हाथों में खड्ग, खेट (मूसल), अंकुश, गदा, पाश, शूल, वर तथा अभय धारण किए हुए हैं।
‘व’ अक्षरवाली भैरवी शक्ति के आभूषण और वस्त्र नरवरफाटक के समान श्‍वेत हैं। वह देवी समस्त लोकों का एकमात्र आश्रय हैं। विकसित कमल पुष्प उनका आसन है। वे चारों हाथों में क्रमशः दो कमल, वर एवं अभय धारण करती हैं।
ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृति खंडान्तर्गत दुर्गोपाख्यान में आठ पूज्य भैरव निर्दिष्ट हैं- महाभैरव, संहार भैरव, असितांग भैरव, रूरू भैरव, काल भैरव, क्रोध भैरव, ताम्रचूड भैरव, चंद्रचूड भैरव। लेकिन इसी पुराण के गणपति- खंड के 41वें अध्याय में अष्टभैरव के नामों में सात और आठ क्रमांक पर क्रमशः कपालभैरव तथा रूद्र भैरव का नामोल्लेख मिलता है। तंत्रसार में वर्णित आठ भैरव असितांग, रूरू, चंड, क्रोध, उन्मत्त, कपाली, भीषण संहार नाम वाले हैं।
भारतीय संस्कृति प्रारंभ से ही प्रतीकवादी रही है और यहां की परम्परा में प्रत्येक पदार्थ तथा भाव के प्रतीक उपलब्ध हैं। यह प्रतीक उभयात्मक हैं – अर्थात स्थूल भी हैं और सूक्ष्म भी। सूक्ष्म भावनात्मक प्रतीक को ही देवता कहा जाता है। चूंकि भय भी एक भाव है, अत: उसका भी प्रतीक है – उसका भी एक देवता है, और उसी भय के देवता हैं महाभैरव।
देवी महाकाली, काल भैरव और शनि देव ऐसे देवता हैं जिनकी उपासना के लिए बहुत कड़े परिश्रम, त्याग और ध्यान की आवश्यकता होती है। तीनों ही देव बहुत कड़क, क्रोधी और कड़ा दंड देने वाले माने जाते हैं। धर्म की रक्षा के लिए देवगणों की अपनी-अपनी विशेषताएं हैं। किसी भी अपराधी अथवा पापी को दंड देने के लिए कुछ कड़े नियमों का पालन जरूरी होता ही है। लेकिन ये तीनों देवगण (महाकाली, भैरव और शनि) अपने उपासकों, साधकों की मनाकामनाएं भी पूरी करते हैं। कार्य सिद्धि और कर्म सिद्धि का आशीर्वाद अपने साधकों को सदा देते रहते हैं।
श्री भैरव भगवान शिव का एक रूप माना जाता है। पुराणों तथा तंत्र शास्त्र में भैरव जी के अनेक रूपों का वर्णन प्राप्त होता है। इनके प्रमुख रूप इस प्रकार हैं – असितांग भैरव, चण्ड भैरव, रुरु भैरव, क्रोध भैरव, कपालि भैरव, भीषण भैरव, संहार भैरव एवं उन्मत्त भैरव इत्यादि। 
भगवान भैरव की साधना शक्ति का स्वरूप होती है। शत्रुओं से बचाती है तथा समस्त भय का नाश करने वाली होती है। भगवान भैरव का प्रात: काल स्मरण करने मात्र से सभी संकट दूर होते हैं। भैरव, भीम, कपाली, शूर, शूली, कुण्डली, व्यालोपवीती, कवची, भीमविक्रम तथा शिवप्रिय नामों का स्मरण करने से व्यक्ति को बल एवं साहस प्राप्त होता है उसे कोई यातना एवं पीड़ा नहीं सताती। 

 

भैरव साधना के रूप – 
नित्यषोडशिकार्णव की सेतुबन्ध नामक टीका में भी भैरव को सर्वशक्तिमान बताया गया है- भैरव: सर्वशक्तिभरित:। शैवों में कापालिक सम्प्रदाय के प्रधान देवता भैरव ही हैं। ये भैरव वस्तुत:रुद्र-स्वरूप सदाशिव ही हैं। शिव-शक्ति एक दूसरे के पूरक हैं। एक के बिना दूसरे की उपासना कभी फलीभूत नहीं होती। यतिदण्डैश्वर्य-विधान में शक्ति के साधक के लिए शिव-स्वरूप भैरवजी की आराधना अनिवार्य बताई गई है। रुद्रयामल में भी यही निर्देश है कि तन्त्र शास्त्रोक्त दस महाविद्याओं की साधना में सिद्धि प्राप्त करने के लिए उनके भैरव की भी अर्चना करें। उदाहरण के लिए कालिका महाविद्या के साधक को भगवती काली के साथ कालभैरव की भी उपासना करनी होगी। इसी तरह प्रत्येक महाविद्या-शक्ति के साथ उनके शिव (भैरव) की आराधना का विधान है। दुर्गा सप्तशती के प्रत्येक अध्याय अथवा चरित्र में भैरव-नामावली का सम्पुट लगाकर पाठ करने से आश्‍चर्यजनक परिणाम सामने आते हैं, इससे असम्भव भी सम्भव हो जाता है। श्री यंत्र के नौ आवरणों की पूजा में दीक्षा प्राप्त साधक देवियों के साथ भैरव की भी अर्चना करते हैं।
भैरव देव जी के राजसिक, तामसिक एवं सात्विक तीनों प्रकार के साधना तंत्र प्राप्त होते हैं। बटुक भैरव जी के सात्विक स्वरूप का ध्यान करने से रोग दोष दूर होते हैं तथा दीर्घ आयु की प्राप्ति होती है। इनके राजसिक स्वरूप का ध्यान करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं तथा इनके तामसिक स्वरूप का ध्यान करने से सम्मोहन, वशीकरण इत्यादि का प्रभाव समाप्त होता है। भैरव साधना स्तंभन, वशीकरण, उच्चाटन और सम्मोहन जैसी तांत्रिक क्रियाओं के दुष्प्रभाव को नष्ट करने के लिए की जाती है। इनकी साधना करने से सभी प्रकार की तांत्रिक क्रियाओं के प्रभाव नष्ट हो जाते हैं।
भैरव कलियुग के जाग्रत देवता हैं। शिव पुराण में भैरव को महादेव शंकर का पूर्ण रूप बताया गया है। इनकी आराधना में कठोर नियमों का विधान भी नहीं है। ऐसे परम कृपालु एवं शीघ्र फल देने वाले भैरवनाथ की शरण में जाने पर जीव का निश्चय ही उद्धार हो जाता है।
भैरव के नाम जप मात्र से मनुष्य को कई रोगों से मुक्ति मिलती है। वे संतान को लंबी उम्र प्रदान करते हैं। अगर आप भूत-प्रेत बाधा, तांत्रिक क्रियाओं से परेशान हैं, तो आप शनिवार या मंगलवार कभी भी अपने घर में भैरव पाठ का वाचन करने से समस्त कष्टों और परेशानियों से मुक्त हो सकते हैं।
जन्मकुंडली में अगर आप मंगल ग्रह के दोषों से परेशान हैं तो भैरव की पूजा करके पत्रिका के दोषों का निवारण आसानी से कर सकते हैं। राहु केतु के उपायों के लिए भी इनका पूजन करना अच्छा माना जाता है।
भैरव की पूजा-अर्चना करने से परिवार में सुख-शांति, समृद्धि के साथ-साथ स्वास्थ्य की रक्षा भी होती है। तंत्र के ये जाने-माने महान देवता काशी के कोतवाल माने जाते हैं। आप भैरव तांत्रोक्त, बटुक भैरव कवच, काल भैरव स्तोत्र, बटुक भैरव ब्रह्म कवच आदि का नियमित पाठ करके अपनी अनेक समस्याओं का निदान कर सकते हैं। भैरव कवच से असामायिक मृत्यु से बचा जा सकता है।
भैरव अपने भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूर्ण करके उनके कर्म सिद्धि को अपने आशीर्वाद से नवाजते हैं। भैरव उपासना जल्दी फल देने के साथ-साथ क्रूर ग्रहों के प्रभाव को समाप्त कर देती है।
शिव के अवतार श्री कालभैरव अपने भक्तों पर तुरंत प्रसन्न हो जाते हैं। साथ ही इनकी आराधना करने पर हमारे कई अवगुण स्वत: ही समाप्त हो जाते हैं। आदर्श और उच्च जीवन व्यतीत करने के लिए कालभैरव से भी शिक्षा ली जा सकती हैं। जीवन प्रबंधन से जुड़े कई संदेश श्री भैरव देते है।
Even Death gets frightened fromBhairav .

The Ever-Protective God

The God of destruction of fear

The God of eradication of illness-sadness

The God of protection from black magic

The God of removal of malefic effects of Saturn planet

The God of removal of evil effects of Mars planet

 

Detailed explanation

One may achieve success in human life through worldly and cosmic powers, but while the worldly powers remain stationary, the cosmic powers accompany each and every moment of human life.

The only method to obtain cosmic supernatural powers is Sadhana-worship of Gods and deities, which yield results quickly. Kaal Bhairava is the fifth nature of Lord Shiva along with being a minute form of Lord Vishnu as well. His worship provides all riddance from all kinds of physical, divine and mental problems. Any person can benefit from His worship, adoration and Sadhana. One has to encounter obstacles, problems and enmities at every step of this poisoned age. Mantra Sadhana is a sure way to obtain victory over all these problems. Bhairav Sadhana is an excellent Sadhana to destroy enemies and obtain wealth, prosperity and peace. Detailed description of Bhairav Sadhana extracted from Shiva Puraana –

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Bhairav while ​​known as the warrior of Lord Shiva, is also considered as an adherent of Mother Durga. He is also considered as God of night.

The scriptures detail two different forms of Lord Shiva. The Vishveshwara form is to provide protection to His devotees, while the Bhairav form is to punish the wicked. The Visveshwara form of Shiva is very gentle and calm,  and it grants peace, prosperity and joy to devotees. The Bhairav ​​form is of furious rage, and He is terrible and ghastly. Kaal-Bhairava Sadhana is the best solution in Kali yuga to overcome fear of death.

The very word Bhairav signifies – dreadful, horrible, scary. Bhairav is considered to have originated from, or as an offspring of Lord ​​Shiva. Bhairav is one of the eight natures of Lord Shiva. He is a major warrior of Lord Shiva. The scriptures describe eight forms of Lord Bhairav, of which Kala and Gora Bhairav are more significant.

Ghost, vampires, Putana, Kotra and Revathi etc. are considered to be other Ganas of Lord Shiva. In other words, Lord  Bhairav is the deity to eradicate various diseases, problems and troubles. Lord Shiva is the God of the Holocaust, and so problems, disease and various angels and messengers of death are His own troops. The general or leader of all these Ganas is Lord Maha Bhairav. In simple terms, Lord Bhairav ​​is the commander who is always present with sickness, misery and destruction as their main operator.

Fear itself is an Tamas-expression, Tam indicates ignorance. The wise person understand that all materials and bodies in this world are fully perishable, so man should be fearless in each situation considering the immortality of the human soul. Fear cannot enter where there is light of wisdom and patience. Actually, fear is not only a Tamas-state, it is also impure.

One gets an inexplicable fearsome sensation upon hearing the name of Lord Bhairav. The fuming Lord Shiva with Brahma’s severed head in one hand and Khapar, Trident and Drum in the other three hands, invokes fear among the  people, but He is very kind and benevolent for public welfare.

 

The story of  origin of Kaal Bhairava in Shivpuraan –

Once Lord Brahma was seated on the summit of Mount Meru, and all the Gods and sages went to Him to understand about the Best element. Then Lord Brahma stated that He alone is the Best form i.e He is most exquisite and Paramount. However Lord Vishnu did not agree to this viewpoint.  He replied that He is the creator and preserver of this entire creation. Then a great light appeared between them. A person’s image was visible in the aura of its flame. Then the three-eyed Lord Shiva became visible. He had a trident in one hand and He was adorned with both snake and moon. Then the haughty Lord Brahma stated that you have appeared from my own forehead. Lord Shiva got incensed with this unnecessary ego and His anger generated Bhairav personality. This Bhairav ​manifested very quickly started looking like death.

So, He became famous as Kaalraaj and became known as Bhairav due to fearsome personality. Even Kaal or Death got afraid of Him, and so He was also known as Kaal-Bhairav. He was also called as Aamardak since He destroyed evil spirits. He was given the governorship of the city of Kaashi. After seeing this ghastly image, both Brahma and Vishnu started worshipping Lord Shiva and became free of ego.

The second story states that Lord Brahma created the entire universe. It is believed that nobody used to die at that time. The load on earth started increasing  continuously. The frustrated earth went to Brahma. The earth prayed to Lord Brahma that she cannot bear so much weight. Then Lord Brahma created death in the form of a red flag holding woman and ordered her to take charge of killing the creatures. The death  refused to do so and stated that she does not want to commit this sin. Lord Brahma explained that you will only terminate their bodies but the spirit will continue to take births again and again. Then death accepted to Lord Brahma’s request and the creatures started dying.

The cycle of sin started to increase with the flow of time. Then Lord Shankar asked Lord Brahma for a method to end these sins. Lord Brahma expressed His inability to find such a solution. Lord Shiva gets incensed quickly. He became angry and Kaal Bhairav was born from His anger. Using His nails, Kaal-Bhairav cut off Lord Brahma’s head which had stated inability to find such a solution. Then he got afflicted with Brahma-murder sin.

Kaal Bhairav toured all the three realms but He could not obtain freedom from the Brahma-murder sin. It is believed that He got absolved of this Brahma-murder sin when He reached Kaashi. A celestial voice commanded Him to stay in Kaashi and to judge the virtues and sins of Kaashi-public. Thus Lord Kaal Bhairav established in the city of Kashi.

 

|| BhairavaH Poorn Roopohi Shankar ParatmanaH

Bhugesteven Jaananti Mohita Shiv BhamyaaH ||

The Gods while worshipping Shree Kaal-Bhairav have directed that He is Kaalraaj as He is as full of rage as Death itself. Even death is scared of Him. He is Kaal-Bhairav and so He is fully capable to destroy the wicked and the enemies.

 

Various teachers of Tantric scriptures have instructed to obtain Lord Bhairavnath’s permission before starting mantra chanting for  worship or realization.

 

Atikrur Mahakaaya, Kalpaant-Dahnopaye, Bhairavaaye Namastubhaymenujhan Daatumahasi ||

 

This make it clear that Lord Bhairavnath’s invocation, worship and mantra-chanting are required in the initiation of all worship and prayers. Many people get afraid after hearing the name of Shree Kaal-Bhairav and say that He is a fury God. So His Sadhana process is Vaam-margi and it is not useful for us. But this is only their illusion. Each God has Saatvik (Virtuous), Rajasik (Royal) and Taamasik (Darkness) natures; and Gods possess these natures only for accomplishments of Sadhaks-devotees. Shree Kaal-Bhairav is so benevolent and kind that He immediately eradicates the problems of His devotees upon just normal remembrance and prayer.

 

The presence of Bhairav word in various tantric practices reflects His greatness. Amritanand Nath states in Yogini Hridyadipika Teeka of “Vaamkeshwar Tantra that Vishwasaya Bharnaad Ramnaad Vamnaat Shristi-Sthiti-Sanhaarkaari Parshivo BhairavaH ||

 

The syllable Bha signifying filling the world, Ra signifying travelling the world and Va signifying destroying the world indicates that the Creator, Preserver and Destroyer of the Universe Lord Shiva Himself is Bhairava. The Vivek-Teeka of Tantraloka has described the Bhairav form of Lord Shiva as the supreme Director of the universe.

The Tantra-Mantra of Shree Tatvanidhi introduces the three cosmic powers from meditation on the three syllables of Bhairav word, because all these three powers are contained in them.

 

The Bhairavi Shakti of syllable “Bha”  is  dark and is seated in Bhadraasana and Her aura glows with radiance of rising sun. This single face deity holds the bow, arrow, Var (boon) and Abhaye (fearlessness) in Her four hands.

The Bhairavi Shakti of syllable “Ra” is dark-complexioned. She wears red clothes. This five-faced deity seated on a lion holds sword, Khet (pestle), goad, mace, loop, spear , Var (boon) and Abhaye (fearlessness) in Her eight hands.

The Bhairavi Shakti of syllable “Va” wears white colored jewelry and clothes. She is the only sanctuary in the three realms. The blooming Lotus flower is Her seat. She holds two lotus, Var (boon) and Abhaye (fearlessness) in Her Four hands.

 

The Prakriti Khandaantargat Durgopaakhyaan of Brahmavervat Puraan specifies eight sacred Bhairavas – Maha-Bhairav, Sanhaar-Bhairav, Asitaang-Bhairav, Ruru-Bhairav, Kaal-Bhairav, Krodh-Bhairav, Taamrachood- Bhairav and  Chandrachood-Bhairav. But the Chapter 41 of Ganpato-Khand of this puraan specifies Kapaal-Bhairav and Rudra-Bhairav as seventh and eighth form of AshtaBhairav. The eight Bhairavs described in Tantrasaar are Asitang, Ruru, Chand, Krodh, Unmatt, Kapali, Bhishna and Sanhaar.

The Indian culture  focuses on symbolisms and various symbols for substances and sensations are available  traditionally.  These symbols are both visible i.e. major and subtle. The subtle emotional symbol is called a God. Since fear is a sense, therefore, it is also a symbol – It has a God, and the God of fear is MahaBhairav.

Goddess Mahakali, Kaal Bhairav ​​and Lord Saturn are those Gods whose worship requires hard work, sacrifice and constant attention. All these three deities are considered as very hard taskmasters, hot-tempered and they pronounce stiff penalties. The deities have their own specific characteristics to protect religion. Every sinner or criminal is required to follow some strict rules. But these three Gods (Mahakali, Bhairav ​​and Saturn) also fulfill the wishes of their seekers and worshippers. They always grant blessings for attainment of goals and completion of tasks to their Sadhaks.

Shree Bhairav is considered as a form of Lord Shiva. Various Forms of Lord Bhairav are described in mythology and Tantra scriptures. The primary forms are – Asitang Bhairav, Chand Bhairav, Ruru Bhairav, Krodh Bhairav, Kapali Bhairav, Bhishan Bhairav, Sanhaar Bhairav and Unmatt Bhairav etc.

The Sadhana of Lord Bhairav ​​is a form of worship of Shakti. It protects from enemies and destroys all fears. Mere recalling Lord Bhairav ​in the morning causes all problems to vanish. A person obtains strength and courage by remembering Bhairav, Bhima, Kapali, Shur, Shuli, Kundli, Vyalopaviti, Kavachi, Bimvikram and Shivapriya forms, and no pain or agony troubles him.

 

Forms of Lord Bhairav Sadhanas​​-

Setbandh Teeka of Nitysodshikaarnav also described Lord Bhairav as Almighty –  BhairavaH SarvshaktibharitaH. The primary head God of Kapalik sect of Saivaites is Lord Bhairav. Lord Bhairav is essentially Rudra-swarooop Sadashiv. Shiva-Shakti complement each other. One’s Sadhana doesn’t yield fruits without accomplishment of other’s Sadhana. Yatidandeshwarya-vidhaan has recommended to worship Shiva swaroop Lord Bhairav for a Shakti Sadhak. Rudryamal Tantra also instructs to worship Lord Bhairav to obtain success in the Ten Mahavidhya Tantra Sadhanas. For example, a Kalika Mahavidhya Sadhak should worship Kaal-Bhairav along with Goddess Kali. Similarly, there is a specific process to worship Shiva (Bhairav) for each Mahavidhya-Shakti Sadhana. Astonishing results are obtained by encapsulating Bhairav-Namavali during recitation of each chapter or nature of Durga Saptshati, even impossible tasks gets completed. Bhairav worship is also performed along with Goddess worship during the nine forms of Shree Yantra worship by Dikshit Sadhaks.

The Sadhana processes are available for all three forms Raajsik, Taamsik and Saatvik of Lord Bhairav. The meditation of Saatvik form of Batuk Bhairav leads to curing of illness and longevity. Meditation on the Raajsik form leads to fulfillment of wishes and the malefic influence of hypnosis, mesmerism, etc. terminates by meditating on His Taamsik form. Lord Bhairav Sadhana is performed to destroy evil effects of Tantric rituals like stambhan, vashikaran, uchchatan and sammohan. All malevolent impacts of Tantric processes are destroyed by Lord Bhairav Sadhana.

Lord Bhairav is the active God of Kaliyuga. Lord Bhairav has been explained as full form of Mahadev Shankar in  Shiva Puraana. There are no strict rules in this Sadhana. The person surely gets blessed by taking sanctuary with such an indulgent, kind and quick-fruitful deity.

Chanting of Bhairav names causes riddance from many diseases. It provides longevity to a child. If you are afflicted with black-magic or ghost-tantric rituals, then you can obtain freedom from all these sufferings and troubles by reciting Bhairav Paath on any Saturday or Tuesday.

If your horoscope is stricken by  malefic effects of Mars planet, then you can easily resolve these horoscope defects by worshipping Lord Bhairav. This Sadhana also bestows good results for Rahu-Ketu afflictions.

Worship and prayer of Lord Bhairav at home leads to increase of peace-harmony and wealth-prosperity along with protection from diseases. This famous deity of Tantra is also considered as the Kotwal (policing chief) of Kaashi. You can resolve your various problems by regularly reciting Bhairav Tantrokt, Batuk Bhairav Kavach, Kaal Bhairav Strota, Batuk Bhairav Brahma Kavach etc. Bhairav Kavach also protects against untimely death.

Lord Bhairav blesses His devotees by fulfilling all their wishes and accomplishing their goals. The worship of Lord Bhairav is quick-fruitful apart from granting riddance from malefic planets.

Lord Shiva’s incarnate form Shree Kaal Bhairav gets pleased with His devotees quickly. Moreover, many of our vices also get demolished by this worship. One can obtain direction from Kaal Bhairav to lead a noble and honorable  life. Shree Bhairav also provides many guiding messages for managing the life.

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