बगलामुखी मानस दीक्षा (Bagalamukhi Manas Diksha)

बगलामुखी मानस दीक्षा

बगलामुखी जयन्ती 14 मई 2016
(वैशाख शुक्ल अष्टमी,  शनिवार)
साधना – दीक्षा काल – प्रातः 7:16 बजे से 8:56 बजे तक

जो व्यक्ति मां बगलामुखी की पूजा-उपासना करता है, उसका अहित या अनीष्ट चाहने वालों का शमन स्वतः ही हो जाता है। मां भगवती बगलामुखी की साधना से व्यक्ति स्तंभन, आकर्षण, वशीकरण, विद्वेषण, मारण, उच्चाटन आदि के साथ अपनी मनचाही कामनाओं की पूर्ति करने में समर्थ होता है।


शास्त्रों का महाउद्घोष है कि संसार की सर्वश्रेष्ठ क्रिया गुरुदेव द्वारा दीक्षा प्रदान करना और शिष्य द्वारा दीक्षा लेना है। दीक्षा काल ही सर्वश्रेष्ठ काल है। शक्तिपात द्वारा शिष्य को गुरुदेव का प्रसाद प्राप्त होता है, पराशक्ति का आशीर्वाद प्राप्त होता है। दीक्षा प्राप्त करने पर ही शिष्य ‘तत्व ज्ञान’ का अधिकारी बन जाता है। दीक्षा प्राप्त होने पर शिष्य मनुष्यत्व से शिवत्व के स्तर तक पहुंच सकता है।
शास्त्रों में पांच प्रकार की दीक्षा का विशेष विवेचन आया है।

1. स्पर्श दीक्षा, 2. चाक्षुषी (दृष्टि) दीक्षा, 3. वाचिकी शब्द दीक्षा, 4. मानसी (ध्यान) दीक्षा, 5. आणवी दीक्षा। 

जैसा कि प्रत्येक दीक्षा के नाम से स्पष्ट है कि – ‘दीक्षा’ स्पर्श द्वारा, दृष्टिपात द्वारा, शब्द द्वारा और ध्यान द्वारा प्रदान की जाती है। प्रथम तीन दीक्षाओं में शिष्य का गुरु के पास होना अथवा गुरु का शिष्य के पास होना आवश्यक है। गुरु और शिष्य का मिलन आवश्यक है।

मानसी दीक्षा तो गुरु की महाकृपा का स्वरूप है

इसी विषय में भगवान शंकर ने शक्तिपात की व्याख्या करते हुए, आद्या शक्ति पार्वती को स्पष्ट किया कि – ‘स्पर्श दृष्टि और शब्द से भी विराट् दीक्षा, मानसी (ध्यान) स्मार्ति दीक्षा है।

गुरु और शिष्य का मिलन मूल रूप से विचारों का ही मिलन है। जब गुरु के विचार, शिष्य के शरीर को भेद कर उसके मानस में आज्ञा चक्र और सह्रसार को संस्पर्शित करते हैं तो उसके मानस पर छाये हुए अज्ञान की काली छाया समाप्त होती है और उसका मानस विशुद्ध हो जाता है।

गुरु के विचारों को अपने भीतर समाहित कर देने से एक आवरण समाप्त हो जाता है और साधक की स्वयं की शक्ति जो नाभि स्थान में स्थित मणिपुर चक्र प्राण में स्थापित होती है। वह शक्ति ऊपर उठती है, दूसरे अनाहत चक्र प्राण को स्पर्श करती है और उससे और ऊपर उठती हुई विशुद्ध चक्र (कण्ठ) / आज्ञा चक्र (ललाट) / सहस्रार चक्र ( मस्तिष्क) प्राण चक्र को स्पर्श करती है।

मूलाधार (गुदा और लिंग के बीच में) और स्वाधिष्ठान चक्र (लिंग से चार अंगुल ऊपर) नाभि से नीचे स्थित है।

इस मानसिक क्रिया में स्थान भेद बिल्कुल समाप्त हो जाता है, विचारों के मिलन के कारण शिष्य के भीतर शक्ति का एक प्रचण्ड विस्फोट होता है और इस विस्फोट के द्वारा वह अपनी सारी अशुद्धियों को स्वयं नष्ट कर देता है। उसके भीतर प्रखर चेतना  का स्रोत फूट पड़ता है।

बगलामुखी दीक्षा – मानसी दीक्षा सबसे प्रबल

किस समय, किस प्रकार की विचार दीक्षा अर्थात् मानसी, स्मार्ति दीक्षा प्राप्त की जाएं यह सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। शिष्य के द्वारा यह चयन नहीं हो सकता है। शिष्य हर समय अपने विचारों की उलझन में ही उलझा हुआ, अपनी कामनाओं की पूर्ति में ही संलग्न रहता है, इस कारण उसके विचार एकांगी होते हैं। जिस प्रकार कपूर ज्वलनशील होते हुए भी अपने आप नहीं जल सकता है, उसी प्रकार शिष्य केवल अपने विचारों के द्वारा साधारण शब्दों द्वारा, अपने मंत्र उच्चारण द्वारा अपने भीतर शक्ति का विस्फोट नहीं कर सकता है। उसे अपने भीतर शक्ति विस्फुरण के लिये गुरु रूपी तत्व की प्रबल शक्ति की आवश्यकता रहती है। जिस प्रकार चकमक का एक पत्थर स्वयं अग्नि उत्पन्न नहीं कर सकता है, जिस प्रकार सूर्य की किरणें फैली हुई होने के कारण अग्नि उत्पन्न नहीं कर सकती हैं। अग्नि उत्पन्न करने के लिये एक लैंस के माध्यम से उन किरणों को केन्द्रिभूत करना आवश्यक है।

गुरु आपके विचार केन्द्रिभूत करते हैं – 

ठीक इसी प्रकार गुरु द्वारा शिष्य की शक्ति किरणों को केन्द्रिभूत किया जाता है जिससे वे प्रबल ज्वाला का रूप धारण कर सकती हैं और यह ज्वाला वास्तव में सूर्य का ही तो लघु रूप है अर्थात्  एक सूर्य को दूसरे सूर्य की उत्पत्ति के लिये किरणों को केन्द्रीभूत करने आवश्यकता होती है। इसी प्रकार गुरु अपने शिष्य को अपनी विचार शक्ति की तीव्रता के द्वारा उसके ऊपर जन्मजन्मांतर के मल-पाक-विक्षेप को जला देते हैं।

यह हमारा सौभाग्य है कि गुरुदेव इस बार अपने शिष्यों को बगलामुखी मानसी दीक्षा, बगलामुखी स्मार्ती दीक्षा प्रदान कर रहे हैं, जिससे शिष्य इस आणवी विद्या को प्राप्त कर सकें।
बगलामुखी मानसी दीक्षा प्राप्त करने के पश्‍चात् उस का नियमित मंत्र जप करने से बगलामुखी का पूर्ण स्वरूप साकार होता है। बगलामुखी मानसी दीक्षा से पहले और पश्‍चात् – बगलामुखी मंत्र जप अवश्य करना चाहिये।

शक्तिपात युक्त बगलामुखी मानसी दीक्षा एक ऐसा द्वार है, जिसे प्राप्त कर साधक स्वयं के तंत्र संसार में प्रवेश करने का अधिकारी हो जाता है।

इस दीक्षा के माध्यम से ही शिष्य के अन्दर मानस शुद्धि, शरीर शुद्धि और आत्म शुद्धि की क्रिया जाग्रत होती है, जिससे उसका मानस बल प्रबल हो जाता है, शरीर बल प्रबल हो जाता है, आत्म बल प्रबल हो जाता है और जब ये तीनों बल प्रबल हो जाते हैं तो उसके जीवन, मन, मस्तिष्क एवं विचार से भय रूपी अंधकार समाप्त हो जाता है।

बगलामुखी मानस दीक्षा द्वारा साधक भय से रहित होकर अपने कार्यों को गति देता है। भय से रहित होकर इस संसार में जीवन जीता है। भय से रहित होकर बाधाओं और शत्रुओं पर विजय यात्रा प्रारम्भ करता है।

गुरु और शिष्य के मानस का एकाकार

बगलामुखी मानस दीक्षा में गुरुदेव द्वारा शिष्य के मानस पर तीव्र गति से प्रहार किया जाता है, जिससे एक बार तो शिष्य के अहंकार का अस्तित्व आंशिक या पूर्ण रूप से विचलित हो जाता है। वह कुछ क्षणों के लिये चित्तभ्रम में पड़ जाता है क्योंकि ऐसा तीव्र शक्ति का प्रवाह उसने कभी अनुभव किया नहीं होता है और जो अनुभव किया हुआ नहीं होता है उसे बुद्धि तत्काल ग्रहण नहीं कर पाती है। बुद्धि भी  चकित रह जाती है कि यह क्या क्रिया हो रही है। प्रथम कुछ क्षणों में बुद्धि गुरु द्वारा प्रदत्त इस मानसी शक्ति को रोकने का प्रयत्न करती है लेकिन गुरु शक्ति का प्रवाह इतना तीव्र, तीक्ष्ण और तत्कालिक होता है कि वह शिष्य की बुद्धि को भेद कर उसके मानस में तीव्र गति से प्रवेश कर जाती है और कुछ क्षणों के लिये गुरु का मानस शिष्य का मानस एक हो जाता है। इन क्षणों में शिष्य अपनी देह की सुध-बुध खो देता है और वह चकित, विस्मृत होता हुआ शक्ति के इस प्रवाह को देखकर ध्यान शून्य हो जाता है, उसकी चेतना संज्ञा शून्य हो जाती है। कई स्थितियों में शरीर गिर पड़ता है।

जिन क्षणों में गुरु द्वारा यह तीव्र शक्तिपात की क्रिया होती है। वे क्षण सबसे महत्वपूर्ण होते हैं क्योंकि उन क्षणों में ही साधक,  शिष्य का नवनिर्माण होता है।

बगलामुखी अलौकिक शक्ति

जब मानसी दीक्षा प्राप्त कर पुनः अपने इष्ट बगलामुखी देवी का ध्यान और मंत्र जप करता है तो उसे अपने चारों ओर बगलामुखी ही बगलामुखी , शक्ति ही शक्ति का अलौकिक भाव, अलौकिक स्वरूप का अनुभव, आभास होता है। प्रत्येक शिष्य के लिये यह एक अनुठा निराला अनुभव होता है। जो उसके शरीर के चक्रों ( मूलाधार चक्र, स्वाष्ठिान चक्र, मणिपुर चक्र, अनाहत चक्र, विशुद्ध चक्र और आज्ञा चक्र) को भेदता हुआ, सहस्रार चक्र में स्थापित हो जाता है।

यह ध्यान रहे कि समर्थ गुरु ही अपने शिष्य को यह महान् दीक्षा प्रदान कर सकते हैं। इस दीक्षा क्रिया में –

* मूलाधार में कम्पन होना, 
* शरीर में अत्यन्त स्फूर्ति उत्पन्न होना, 
* स्वत: ही कुम्भक लग जाना, 
* आखों के तारे घूमना तथा दृष्टि का भ्रूमध्य की तरफ आकर्षित होना, 
* हर समय मस्ती में रहना, 
* आंखें बन्द करते ही गर्दन तथा शरीर का चक्राकार घूमना, 
* अनेक भाषाऐं (ज्ञात-अज्ञात) बोल सकने की क्षमता उत्पन्न होना तथा स्तोत्रादि, कीर्तन के शब्द स्वत: ही उच्चरित होने लगना, 
* ध्यान में बैठते ही भविष्य की घटनाओं का पूर्वाभास होने लगना, 
* कम समय में वेदों तथा उपनिषदों का सार तत्व समझ लेना, दिन, प्रात: सांय एवं रात्रि में पूजा-ध्यान का समय होते ही शरीर, मन तथा प्राण में आनन्दमय स्थिति उत्पन्न हो जाना। 

स्पष्ट है कि सद्गुरु से प्राप्त शक्तिपात सम्पन्न साधक शीघ्र ही मनुष्यत्व से देवत्व की तरफ अनायास ही अग्रसर होने लग जाता है।

यह हम शिष्यों का सौभाग्य है कि गुरुदेव समय-समय पर हमें यह मानसी दीक्षा प्रदान करते हैं। यह गुरुदेव द्वारा दिया गया  दान है और दीक्षा का सामान्य अर्थ ही दया + ईकक्षण अर्थात् दया करके शिष्य के पापों, दोषों का हरण।

आप सभी वैशाख शुक्ल अष्टमी, 14 मई 2016 के लिये अपने आपको शरीरिक रूप से, मानसिक रूप से, यांत्रिक रूप से, मांत्रिक रूप से तैयार कर लें।
गुरुदेव ने स्प्ष्ट कहा है कि – इस दीक्षा संस्कार से पहले उचित साधना सामग्री पर साधक जितने अधिक मंत्र जप कर लेगा वह उतना ही श्रेष्ठ रूप से मेरी विचार शक्ति को ग्रहण कर सकेगा। उन कुछ क्षणों में ही मेरे साथ भगवती बगलामुखी के साथ एकाकार हो सकेगा।

आपके लिये कितने ही महत्वपूर्ण कार्य हो लेकिन बगलामुखी जयन्ती के अवसपर पर प्रातः 7.16 से 8.56 बजे के बीच बगलामुखी मानस दीक्षा अवश्य प्राप्त करें।

– राम चैतन्य शास्त्री। 

Gurudev Gurudev

Our Good Fortune

Baglamukhi Manas Diksha

Baglamukhi Jayanti 14 May 2016

(Vaishakh Shukla Ashtami, Saturday)

Sadhana – Diksha Time – Morning 7:16 am to 8:56 am

Any person who performs worship-Sadhana of mother Baglamukhi, his enemies or tormentors automatically get decimated. A person attains capability to terminate, charm, captivate, disunite, annihilate, disconnect or to fulfil any other desire.


The scriptures proclaim that the best task in the world is conferring of Diksha by Gurudev, and obtaining Diksha by a disciple. The best time is the Diksha-moment. The disciple obtains graces from Gurudev, and obtains blessings from the Divine. The disciple attains right to learn “Tatva Gyaan” only after Diksha-conferment. The disciple can progress from Humanity to Shivtatva after attaining Diksha.

The scriptures describe five types of Diksha initiations.

  1. Touch Initiation,
  2. Chakshusi (Vision) Initiation,
  3. Vachiki (Verbal) Initiation,
  4. Mansi (Dhyaan) Initiation
  5. Aanvi Initiation.

As is clear from the name of each Diksha-initiation – the Diksha can be granted through touch, sight, words and meditation. It is necessary for the disciple to be with Guru or for Guru to be with the disciple for the initial three Dikshas. The union of Guru and disciple is essential.

 

Mansi Diksha is the form of Divine Blessings of Guru –

On this topic, Lord Shankar while describing Shaktipaat, has clarified to Aadhya Shakti Parvati that the Mansi (Dhyaan) Smaarti Diksha is much more significant and remarkable Diksha than the Diksha granted through touch, sight or words.

The basic form of Guru-disciple union is the merger of their thoughts and ideas. When the Divine thoughts of Gurudev pierce the disciple’s body and stimulate the Aagya Chakra and Sahastraar within disciple’s psyche; then the darkness of ignorance in disciple’s mind vanishes, leading to purification of his psyche.

The absorption of Guru’s thoughts within the self terminates the outer layer, and the Sadhak’s energy which was previously encased in the Manipur Chakra Praana within navel area, lifts upwards, stimulates the second Anaahat Chakra Praana, and still continuing its upwards path, stimulates the Vishuddh Chakra (Neck), Aagya Chakra (Forehead) and Sahastraar Chakra (Brain) Praana Chakra.

The Muladhaar is located in perineum between the anus and sexual-organs; and the Swadhisthaan Chakra is located four fingers above sexual-organs below the navel.

The physical location differentiation gets completely eliminated during this mental process, the merger of thoughts causes a massive blast of energy within the disciple, and he himself destroys all of his impurities and faults through this strong explosion. The source of inner consciousness initiates within him.

 

Baglamukhi Diksha Initiation  – Mansi Diksha, the mightiest

The timing and the form of the thought Diksha, i.e. granting of Mansi Smaarti Diksha is highly significant. The Sadhak cannot choose these factors. A disciple is always engrossed in his own tangle of ideas, and is engaged only in fulfilment of his wishes and desires, therefore his thoughts are directed in a single direction only. As a highly inflammable piece of camphor cannot burn on its own, similarly a disciple cannot initiate an explosion of energy within his self only through his thoughts, his plain words or chanting mantras. He definitely requires Guru form element to initiate the energetic explosion within self. As a flint-stone cannot generate fire on its own, similarly  the spreading rays of Sun cannot generate fire on their own. It is important to concentrate these rays of Sun through a lens to generate fire.

 

Guru focusses your thoughts –

In a  similar manner, the rays of energy of the disciple are concentrated together, so that they may take the form of an intense flame, and this intense flame is anyway a miniature form of the Sun; i.e. for a Sun, it is mandatory to focus and concentrate the rays, in order to create another Sun. Similarly Guru destroys the sins-faults-waste of prior lives of the disciple through intense focussed concentration of thoughts.

It is our good fortune that this time, Gurudev is granting the Baglamukhi Mansi Diksha, the Baglamukhi Smaarti Diksha to the disciples, so that the disciples can obtain this elemental Aanvi knowledge.

Regular Mantra chanting after obtaining Baglamukhi Mansi Diksha generates the full form of Baglamukhi. The chanting of Baglamukhi Mantra should be performed both before and after obtaining the Baglamukhi Mansi Diksha initiation.

The Shaktipaat yukt Baglamukhi Mansi Diksha is a major door, after obtaining this, the Sadhak gains eligibility to enter the Tantra world himself.

This Diksha initiates purification of the mind, the body and the spiritual psyche, which enhances his mental power, physical body power and the spiritual power. Enhancements of these three powers cause termination of the darkness of the fear from his life, mind, psyche and thoughts.

The Sadhak starts progressing on his tasks fearlessly through Baglamukhi Manas Diksha. He leads his life in this world without any fear. He embarks on his victorious journey over obstacles and foes fearlessly.

 

Mental Merger of the Guru and the disciple –

The Gurudev strikes a hard blow on the disciple’s psyche during Baglamukhi Manas Diksha, causing partial or complete distraction of disciple’s ego. He gets into delirium for a few moments because he would never have experienced such a strong intense energy flow. The mind intellect cannot quickly absorb what it has never experienced. The mind also gets astonished at this intense process. The mind intellect initially tries to block this flow of Mansi energy from Gurudev; but the intensity of this Guru-energy is so strong, quick and acute  that it pierces the disciple’s mind to enter into his psyche quickly and the psyches of both Guru and disciple merge for few moments. The disciple loses his physical consciousness during these moments, and his mind becomes devoid of any thought or cognizance during these stupefying amazing moments of this energy flow. Sometimes he falls down on the ground.

The moments of this intense Shaktipaat energy flow are highly significant, since the creation and rejuvenation of the disciple Sadhak progresses during those moments.

 

Baglamukhi Supernatural Power

When the disciple resumes meditation and Mantra-chanting of his favourite Baglamukhi Mother Goddess after obtaining Mansi Diksha; then he experiences and feels a strong presence of supernatural forms and senses of Baglamukhi power all around him.  This is a unique incredible experience for each disciple. The energy pierces through all of his body Chakras (Muladhaar Chakra, Swadhisthaan Chakra, Manipur Chakra, Anaahat Chakra, Vishuddh Chakra and Aagya Chakra) and settles up in the Sahastraar Chakra.

Please remember, that only a capable Guru can grant this magnificent Diksha to his disciple. During this Diksha period you may experience –

* Vibrations in Muladhaar,

* Intense energy in the body,

* Automatically achieve Kumbhak state,

* Feeling stars around eyes and attraction of vision to third-eye

* Be energetic joyful at all times,

* Wondering around of neck and body immediately upon closure of eyes,

* Gaining ability to speak in multiple (known and unknown) languages, and automatically generation of strotas, verses and hymns,

* Premonitions of future immediately upon sitting in meditation,

* Quick comprehension of basic essence of Vedas and Upanishads, generation of a joyful state in body, mind and psyche at the worship-meditation timings in morning, evening or night.

It is clear that the Sadhak automatically progresses from human to Divine form upon accomplishment of Shaktipaat from Gurudev.

It is our fortune that Gurudev grants us this Mansi Diksha initiation from time to time. This is a merciful blessing from Gurudev, and the general meaning of the word Diksha is Daan + Ikshan i.e. termination of defects and sins of disciple through blessings.

All of you should prepare yourself physically, mentally, mechanically and spiritually for Vaishakh Shukla Ashtami 14 May 2016.

Gurudev has explicitly stated –  The more mantra chanting a Sadhak performs through appropriate Sadhana materials before this Diksha-Sanskaar, the more effectively he will be able to absorb my thought-power. He will be able to merge with Bhagwati Baglamukhi within those few moments.

You may have many important tasks, but you should definitely obtain Baglamukhi Manas Diksha on Baglamukhi Jayanti from 7:16 am to 8:56 am.

– Ram Cheitanya Shastri

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