पीताम्बरा शक्ति बगलामुखी (Pitambara Shakti Bagalamukhi)

पीताम्बरा शक्ति बगलामुखीउत्पत्ति – स्वरूप – प्रभावविस्तृत विवेचन

लोक कल्याण के लिए मां बगलामुखी का अवतरण हुआ। तंत्र शास्त्र में बगलामुखी ही स्तम्भन शक्ति के नाम से जानी जाती हैं। बगलामुखी को ‘ब्रह्मास्त्र’ के नाम से भी जाना जाता है। शत्रुओं पर विजय आदि के लिए बगलामुखी की उपासना से बढ़कर और कोई उपासना नहीं है।

काली तारा महाविद्या षोडशी भुवनेश्‍वरी।

भैरवी छिन्नमस्ता च विद्या धूमावती तथा।

बगला सिद्ध विद्या च मातंगी कमलात्मिका

एता दश महाविद्याः सिद्धविद्या प्रकीर्तिताः॥

शाक्त संप्रदाय में दस महाविद्याओं की उपासना का विस्तृत रूप से वर्णन है। ये महाविद्याएं सिद्ध मानी गयी हैं। इनके मन्त्र स्वतः सिद्घ हैं। इनका जप पुरश्‍चरण करके साधक सब कुछ प्राप्त कर सकता है। दस महाविद्याओं में अष्टम् महाविद्या बगलामुखी हैं।

शत्रुनाशिनी श्री बगलामुखी का परिचय भौतिकरूप में शत्रुओं का शमन करने की इच्छा रखने वाली तथा आध्यात्मिक रूप में परमात्मा की संहार शक्ति हैं। पीताम्बरा विद्या के नाम से विख्यात बगलामुखी की साधना प्रायः शत्रु भय से मुक्ति और वाक् सिद्धि के लिए की जाती है।

दस महाविद्याओं में भी बगलामुखी के बारे में विशेष लिखा गया है और कहा गया है कि यह शिव की त्रि-शक्ति है –

सत्य काली च श्री विद्या कमला भुवनेश्‍वरी।

सिद्ध विद्या महेशनि त्रिशक्तिबर्गला शिवे॥

दुर्लभ ग्रंथ ‘मंत्र महार्णव’ में भी लिखा है कि –

ब्रह्मास्त्रं च प्रवक्ष्यामि सदयः प्रत्यय कारणम।

यस्य स्मरण मात्रेण पवनोऽपि स्थिरायते॥

बगलामुखी मंत्र को सिद्ध करने के बाद मात्र स्मरण से ही प्रचण्ड पवन भी स्थिर हो जाता है। भगवती बगलामुखी को ‘पीताम्बरा’ भी कहा गया है। इसलिए इनकी साधना में पीले वस्त्रों, पीले फूलों व पीले रंग का विशेष महत्व है किन्तु साधक के मन में यह प्रश्‍न उठता है, कि इस सर्वाधिक प्रचण्ड महाविद्या भगवती बगलामुखी का विशेषण पीताम्बरा क्यों? वह इसलिए कि यह पीताम्बर पटधारी भगवान् श्रीमन्नारायण की अमोघ शक्ति, उनकी शक्तिमयी सहचरी हैं।

सांख्यायन तन्त्र के अनुसार बगलामुखी को सिद्घ विद्या कहा गया है।

तंत्र शास्त्र में इसे ब्रह्मास्त्र, स्तंभिनी विद्या, मंत्र संजीवनी विद्या तथा प्राणी प्रज्ञापहारका एवं षट्कर्माधार विद्या के नाम से भी अभिहित किया गया है।

सांख्यायन तंत्र के अनुसार कलौ जागर्ति पीताम्बरा अर्थात् कलियुग के तमाम संकटों के निराकरण में भगवती पीताम्बरा की साधना उत्तम मानी गई है। अतः आधि व्याधि से त्रस्त मानव मां पीताम्बरा की साधना कर अत्यन्त विस्मयोत्पादक अलौकिक सिद्घियों को अर्जित कर अपनी समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण कर सकता है।

बगलामुखी के ध्यान में बताया गया है कि – ये सुधा समुद्र के मध्य स्थित मणिमय मंडप में रत्नमय सिंहासन पर विराजमान हैं। ये पीत वर्ण के वस्त्र, पीत आभूषण तथा पीले पुष्पों की माला धारण करती हैंं इनके एक हाथ में शत्रु की जिह्वा और दूसरे हाथ में मुद्गर है।

इन्हीं की शक्ति पर तीनों लोक टिके हुए हैं। विष्णु पत्नी सारे जगत की अधिष्ठात्री ब्रह्म स्वरूप हैं। तंत्र में शक्ति के इसी रूप को श्री बगलामुखी महाविद्या कहा गया है।

इनका आविर्भाव प्रथम युग में बताया गया है।

हरिद्रा झील से उत्पत्ति

मां बगलामुखी के संदर्भ में एक कथा बहुत प्रचलित है जिसके अनुसार एक बार सतयुग में महाविनाश उत्पन्न करने वाला ब्रह्माण्डीय तूफान उत्पन्न हुआ, जिससे सम्पूर्ण विश्‍व नष्ट होने लगा। इससे चारों ओर हाहाकार मच गया और सभी लोक संकट में पड़ गए और संसार की रक्षा करना असंभव हो गया। यह तूफान सब कुछ नष्ट भ्रष्ट करता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था, जिसे देखकर भगवान विष्णु चिंतित हो गए । इस समस्या का कोई हल न पाकर वे भगवान शिव का स्मरण करने लगे तब भगवान शिव ने उनसे कहा कि शक्ति के अतिरिक्त अन्य कोई इस विनाश को रोक नहीं सकता । अत: आप उनकी शरण में जाएं तब भगवान विष्णु ने सौराष्ट्र क्षेत्र के हरिद्रा सरोवर के निकट पहुंचकर कठोर तप किया। भगवान विष्णु ने तप करके महात्रिपुरसुंदरी को प्रसन्न किया। देवी शक्ति उनकी साधना से प्रसन्न हुईं और सौराष्ट्र क्षेत्र की हरिद्रा झील में जलक्रीड़ा करती महापीत देवी के हृदय से दिव्य तेज उत्पन्न हुआ । उस तेज ने इधर-उधर फैलकर उस भीषण तूफान का अंत कर दिया। जिस रात्रि को देवी के हृदय से वह तेज निकला, उस रात्रि का नाम वीर रात्रि पड़ा। उस समय आकाश तारों से अत्यंत सुशोभित था। उस दिन चतुर्दशी और मंगलवार था। पंच मकार से सेवित देवी जनित तेज से दूसरी त्रैलोक्य स्तम्भिनी विद्या ब्रह्मास्त्र विद्या उत्पन्न हुई। उस ब्रह्मास्त्र विद्या का तेज विष्णु से उत्पन्न तेज में विलीन हुआ और फिर वह तेज विद्या और अनु विद्या में विलीन हुआ। इस प्रकार लोक कल्याण के लिए मां बगलामुखी का अवतरण हुआ।

विनाश का स्तम्भन

उस समय चतुर्दशी की रात्रि को आद्या शक्ति देवी बगलामुखी के रूप में प्रकट हुई, त्रैलोक्य स्तम्भिनी महाविद्या भगवती बगलामुखी ने प्रसन्न होकर विष्णु को इच्छित वर दिया और तब सृष्टि का विनाश रुक सका। देवी बगलामुखी को वीर रति भी कहा जाता है क्योंकि देवी स्वयं ब्रह्मास्त्र रूपिणी हैं, इनके शिव को एकवक्त्रं महारुद्र कहा जाता है इसीलिए देवी सिद्ध विद्या हैं। तांत्रिक इन्हें स्तंभन की देवी मानते हैं, गृहस्थों के लिए देवी समस्त प्रकार के संशयों का शमन करने वाली हैं।

वस्तुतः यह ब्रह्मशास्त्र विद्या है तथा श्रीविद्या से अभिन्न है। ‘आम्नाय भेद’ तंत्र शास्त्र में इसका पूर्ण वर्णन है। साधक अपनी साधना द्वारा अपनी कामना को पूर्ण करता हुआ ब्रह्म सायुज्यता प्राप्त करता है। इसीलिए कहा गया है देवी पादयुगार्चकानां भोगश्‍च मोक्षश्‍च करस्थ एव।

इस कलिकाल में यही सिद्घ विद्या है तथा भक्तों के कष्टों का निवारण करने में समर्थ हैं। देवी पीताम्बरा की साधना दैहिक, दैविक एवं भौतिक तापों के शमन के साथ ही सृष्टि में महापरिवर्तन लाने में समर्थ है।

बगला शब्द संस्कृत भाषा के वल्गा का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ होता है दुल्हन है अत: मां के अलौकिक सौंदर्य और स्तम्भन शक्ति के कारण ही इन्हें यह नाम प्राप्त है ।

इस विद्या का उपयोग दैवीय प्रकोप की शांति और समृद्धि के लिए पौष्टिक कर्म के साथ-साथ आभिचारिक कर्म के लिए भी होता है।

तंत्र का ब्रह्मास्त्र

यजुर्वेद की काष्ठक संहिता के अनुसार दसों दिशाओं को प्रकाशित करने वाली, सुंदर स्वरूपधारिणी विष्णु पत्नी त्रिलोक जगत् की ईश्‍वरी मानोता कही जाती हैं। स्तम्भनकारिणी शक्ति व्यक्त और अव्यक्त सभी पदार्थों की स्थिति का आधार पृथ्वीरूपा शक्ति हैं। बगला उसी स्तम्भनशक्ति की अधिष्ठात्री देवी हैं। शक्तिरूपा बगला की स्तम्भन शक्ति से द्युलोक वृष्टि प्रदान करता है। इसी शक्ति से आदित्य मंडल ठहरा हुआ है और इसी से स्वर्ग लोक भी स्तम्भित है।

तंत्र में वही स्तम्भन शक्ति बगलामुखी के नाम से जानी जाती है। जिसे ‘ब्रह्मास्त्र’ के नाम से भी जाना जाता है। ऐहिक या पारलौकिक देश अथवा समाज में अरिष्टों के दमन और शत्रुओं के शमन में बगलामुखी के मंत्र के समान कोई मंत्र फलदायी नहीं है। चिरकाल से साधक इन्हीं महादेवी का आश्रय लेते आ रहे हैं। इनके बड़वामुखी, जातवेदमुखी, उल्कामुखी, ज्वालामुखी तथा बृहद्भानुमुखी पांच मंत्र भेद हैं। ‘कुंडिका तंत्र’ में बगलामुखी के जप के विधान पर विशेष प्रकाश डाला गया है। ‘मुंडमाला तंत्र’ में तो यहां तक कहा गया है कि इनकी सिद्धि के लिए नक्षत्रादि विचार और कालशोधन की भी आवश्यकता नहीं है। बगला महाविद्या ऊर्ध्वाम्नाय के अनुसार ही उपास्य हैं। इस आम्नाय में शक्ति केवल पूज्या मानी जाती हैं, भोग्या नहीं।

यह महारुद्र की शक्ति हैं। इस शक्ति की आराधना करने से साधक के शत्रुओं का शमन तथा कष्टों का निवारण होता है। यों तो बगलामुखी देवी की उपासना सभी कार्यों में सफलता प्रदान करती है, परंतु विशेष रूप से युद्ध, विवाद, शास्त्रार्थ, मुकदमे, और प्रतियोगिता में विजय प्राप्त करने, अधिकारी या मालिक को अनुकूल करने, अपने ऊपर हो रहे अकारण अत्याचार से बचने और किसी को सबक सिखाने के लिए बगलामुखी देवी का वैदिक अनुष्ठान सर्वश्रेष्ठ, प्रभावी एवं उपयुक्त होता है। असाध्य रोगों से छुटकारा पाने, बंधनमुक्त होने, संकट से उबरने और नवग्रहों के दोष से मुक्ति के लिए भी इस मंत्र की साधना की जा सकती है।

वैदिक एवं पौराणिक शास्त्रों में श्री बगलामुखी महाविद्या का वर्णन अनेक स्थलों पर मिलता है। शत्रु के विनाश के लिए जिन कृत्यों (टोना-टोटका) को भूमि में गाड़ देते हैं, उनका नाश करने वाली महाशक्ति श्री बगलामुखी ही हैं। श्री बगला देवी को शक्ति भी कहा गया है।

ॠषियों की बगलामुखी साधना

शत्रुओं पर विजय आदि के लिए बगलामुखी की उपासना से बढ़कर और कोई उपासना नहीं है। इसका प्रयोग प्राचीनकाल से ही हो रहा है। श्री प्रजापति ने इनकी उपासना वैदिक रीति से की और वह सृष्टि की रचना करने में सफल हुए। उन्होंने इस विद्या का उपदेश सनकादिक मुनियों को दिया। फिर सनत्कुमार ने श्री नारद को और श्री नारद ने यह ज्ञान सांख्यायन नामक परमहंस को दिया। संख्यायन ने बगला तंत्र की रचना की जो 36 अध्यायों में विभक्त है। श्री परशुराम जी ने इस विद्या के विभिन्न स्वरूप बताए। महर्षि च्यवन ने इसी विद्या के प्रभाव से इंद्र के वज्र को स्तम्भित किया था। श्रीमद् गोविन्द पादाचार्य की समाधि में विघ्न डालने वाली रेवा नदी का स्तंभन श्री शंकराचार्य ने इसी विद्या के बल पर किया था। तात्पर्य यह कि इस तंत्र के साधक का शत्रु चाहे कितना भी प्रबल क्यों न हो, वह साधक से पराजित अवश्य होता है। अतः किसी मुकदमे में विजय, षड्यंत्र से रक्षा तथा राजनीति में सफलता के लिए इसकी साधना अवश्य करनी चाहिए।

इनकी आराधना मात्र से साधक के सारे संकट दूर हो जाते हैं, शत्रु परास्त होते हैं और श्री वृद्धि होती है। बगलामुखी का जप साधारण व्यक्ति भी कर सकता है, लेकिन इनकी तंत्र उपासना किसी योग्य व्यक्ति के सान्निध्य में ही करनी चाहिए।

कलियुग में आसुरी शक्तियों के बढ़ जाने से अशांति व अनेक उत्पात हो रहे हैं। इनके नाश व दुष्टों का स्तम्भन करने में श्री पीताम्बरा की उपासना करना ही श्रेष्ठ है।

बगलामुखी महाविद्या दस महाविद्याओं में से एक हैं। इन्हें ब्रह्मास्त्र विद्या, षड्कर्माधार विद्या, स्तम्भिनी विद्या, त्रैलोक्य स्तम्भिनी विद्या आदि नामों से भी जाना जाता है। माता बगलामुखी साधक के मनोरथों को पूरा करती हैं। जो व्यक्ति मां बगलामुखी की पूजा-उपासना करता है, उसका अहित या अनीष्ट चाहने वालों का शमन स्वतः ही हो जाता है। मां भगवती बगलामुखी की साधना से व्यक्ति स्तंभन, आकर्षण, वशीकरण, विद्वेषण, मारण, उच्चाटन आदि के साथ अपनी मनचाही कामनाओं की पूर्ति करने में समर्थ होता है।

मां बगलामुखी की मुख्य पीठ दतिया (मध्य प्रदेश) में ग्वालियर व झांसी के मध्य है। यह पीतांबरा शक्तिपीठ के नाम से प्रसिद्ध है। इसके अतिरिक्त हिमाचल प्रदेश में वनखंडी, गंगरेट और कोटला में, मध्य प्रदेश में नलखेड़ा में, छत्तीसगढ़ में राजनांदगांव में, उत्तर प्रदेश में वाराणसी में और महाराष्ट्र में मुंबई में मुम्बादेवी नाम से इनके मुख्य शक्तिपीठ हैं।

बगलाशक्ति का मूल सूत्र है ‘अथर्वा प्राण सूत्र’। ये प्राण सूत्र प्रत्येक प्राणी में सुप्त अवस्था में होता है और सिद्धि द्वारा इसे चैतन्य किया जा सकता है। जब यह प्राण सूत्र जाग्रत हो जाता है, तो व्यक्ति अपने सामने बैठे व्यक्ति पर ही नहीं अपितु किसी दूरस्थ स्थान पर स्थित व्यक्ति को सम्मोहित कर सकता है। बगलामुखी सिद्धि द्वारा ही इस अथर्वा प्राण सूत्र को जाग्रत किया जा सकता है। जब यह सूत्र जाग्रत हो जाता है, तो व्यक्ति अपने जीवन में स्तम्भन, वशीकरण और कीलन की शक्ति प्राप्त कर सकता है।
Pitambara Power Baglamukhi
Genesis – Description – Effect
Detailed Description

Mother Baglamukhi manifested for the welfare of society. Baglamukhi is also called as “Restraining Power” in Tantra scriptures. Baglamukhi is also known as ‘Brahmaastra‘. There is no better worship than Baglamukhi worship to obtain triumph over enemies, etc.

Kaali Tara Mahavidhya Shodashi Bhuvaneshwari |

Bheiravi Chinnmasta cha Vidhya Dhoomavati Tatha ||

Bagla Siddh Vidhya cha Matangi Kamlatmika |

Etaa Das Mahavidhya Siddhvidhya Prakirtita ||

The Shakta cult describes the worship of ten Mahavidhyas in full detail. These Mahavidhyas have been considered as proven Siddhis. Their mantras are self Siddh. Sadhak can achieve everything by accomplishing their Jap Purashcharan. The eighth Mahavidhya in these ten Mahavidhyas is Baglamukhi.

The introduction of enemy-slayer Shree Baglamukhi in material world is the one desirous of vanquishing all foes, and in the spiritual world is the God’s own destructive force. The Baglamukhi Sadhana eminently known as Pitambara Sadhana is often practiced to obtain freedom from fear of enemies and accomplishing Speech Prophecy.

The ten Mahavidhyas especially cite Baglamukhi and mention that this is tri-power of Lord Shiva-

Satya Kaali cha Shree Vidhya Kamla Bhuvaneshwari |

Siddh Vidhya Maheshani Trishaktibargala Shive ||

The exceptional scripture “Mantra Mahaarnav” ” declares that-

Brahmaastram cha Pravakshyami Sadya Pradya Karanam |

Yasya Smaran Matren Pawanopi Sthiraayate ||

After accomplishing Baglamukhi Mantra, even typhoon storm wind can be tamed and made inactive by just recitation. Bhagwati Baglamukhi is also known as “Pitambara”. Therefore the yellow garments, yellow flowers and yellow color have a special significance in this Sadhana, but the Sadhak may have a basic question in his mind – Why Yellow Pitambar color has such a big influence in this most powerful Bhagwati Baglamukhi Mahavidhya? This is so because she is the unfailing power, the power consort of Pitambar Patdhari Bhagwan Shreemannarayan.

Shankyanan Tantra has termed Baglamukhi as Siddh Vidhya.

The Tantra scriptures have designated Her as Brahmaastra (the ultimate weapon with potency of entire Universe), Stambhini Vidhya (Annihilate Foes), Mantra Sanjeevani Vidhya & Praani Pragyapharka (Protection and Rejuvenation) and Shatkarmadhar Vidhya (Basic Foundation Knowledge).

Shankyanan Tantra states “Kalo Jaagrati Pitambara” i.e. Bhagwati Pitambara Sadhana is the best Sadhana to obtain riddance from all the troubles and obstacles of Kaliyuga. Therefore, a person afflicted with multiple difficulties, can fulfill all of his desires by obtaining supernatural mystic Siddhis by performing Mother Pitambara Sadhana.

The Baglamukhi Dhyaan describes – She is seated on a jeweled throne in the center of the ocean of nectar. She is adorned with yellow garments, yellow ornaments and garland of yellow flowers. She holds the tongue of enemy by one hand, and the other hand holds a hammer sword.

The three realms are sustained by Her power and energy. Lord Vishnu’s consort presides over the entire universe. This system of energy is called Mother Baglamukhi Mahavidhya in Tantra.

Her manifestation happened in the first Golden era.

Origin from Haridra Lake

One traditional story about Mother Baglamukhi is very popular, according to which – Once a cosmic storm capable of universe destruction occurred in the Golden Age, which began to destroy the cosmos. This catastrophe caused huge turmoil and threatened the entire realms and protection of the universe became impossible. This storm was moving ahead destroying everything in its path, and this concerned Lord Vishnu. Unable to find any solution to this problem, He prayed to Lord Shiva. Lord Shiva advised that none but Divine Energy can stop this destruction. So, He should go to Her refuge. Lord Vishnu performed tough meditations near Haridra lake in the Saurashtra region. He pleased MahaTripurSundari with His supplications. The Divine Energy became pleased with His Sadhana and divine glory arose from the heart of MahaPeet Devi frolicking in the Haridra lake in the Saurastra region. This divine glory destroyed the wild storm. The night when the divine glory arose from heart of Devi, that night was termed Veer Ratri. The sky was brilliantly lit with stars on that night. The day was Tuesday, and it was fourteenth day of the lunar month (Chaturdashi). This glory of Goddess served by five makars created the second Trilokya Stambhini knowledge called Brahmaastra Knowledge. This Brahmaastra glory merged with the glory of Lord Vishnu, and then it dissolved into the glory of Vidhya and Anu-Vidhya. Thus Mother Baglamukhi manifested for the welfare of the public.

Halt of Destruction

The Aadhya Shakti appeared as Mother Baglamukhi on that night of Chaturdashi, the Trilokya Stambhini Mahavidhya Mother Baglamukhi bestowed the desired boon to Lord Vishnu, and the destruction of the universe could be halted. Goddess Baglamukhi is also called as Veer Rati because the Goddess is Herself in the form of Brahmaastra. Her Shiv is called Ekvastram Maharudra, and therefore the Goddess is Siddh Vidhya. Tantriks know Her as Stambhan (cessation) and She suppresses all doubts and problems of Grihasth (wordly) people.

Essentially, this is Brahmaastra-Vidhya, and is identical to Shree-Vidhya. The “Aamnaye Bhed” Tantra scripture describes this in full. The sadhak fulfills his desired wishes through this Sadhana and achieves Brahma Saayujyata (divine merger). Thus it is said –

Devi Padayugarchkanan Bhogashch Mokshshch Karasth Ev

This is the Siddh Vidhya of this Kali-kaal and is fully adept to resolve the grievances of devotees. The Sadhana of Goddess Pitambara is capable of making huge changes to the universe, apart from mitigating the physical, divine and material difficulties.

The word “Bagla” is a corruption of the Sanskrit word “Valga”, which means a newly married bride. So, Mother has this name due to Her supernatural beauty and restrictive power.

This knowledge is used for freedom from divine wrath to obtain peace and prosperity as well as for aabhicharik uses.

The Brahmaastra of Tantra

According to the Kaashthak Sanhita of Yajurveda, the radiance of the ten directions, the divine beautiful form, Lord Vishnu’s consort is called the Almighty form of the three realms. The restraining energy is the basic Earth element foundation for all form and formless substances. Bagla is the presiding deity of the same restraining energy. This sky provides this rain due to this restrictive energy of energized Bagla. The universe is formed from this energy and the heaven is also controlled by the same restraining energy.

The same Restrictive Power is called as Baglamukhi in Tantra. It is also known as “Brahmaastra”. There is no other similarly fruitful mantra like Baglamukhi Mantra for suppression or elimination of enemies in the society, country or in the terrestrial or extraterrestrial domains.

The Sadhaks have been taking refuge under this Great-Goddess from times immemorial. There are five divisions of Her Mantras – Badwamukhi, Jatvedmukhi, Ulkamukhi, Jwalamukhi and Bhrhadhwaanumukhi. The “Kundika Tantra” has shed a special light on the procedure to perform Baglamukhi Mantra chanting. “Mundmala Tantra” has even stated that there is no need to verify muhuraths, nakshatras or auspicious time-moments for Its Siddhi. Bagla Mahavidhya is worship-able only as per Urdhwamnaye. The Shakti (power) is considered only for worship, and not to enjoy in this Aamnaye.

She is the power of Maharudra. The Sadhak can destroy his enemies and resolve his grievances by worshipping this power. The worship of Goddess Baglamukhi grants success in all spheres, but the Vedic Anusthaan of Goddess Baglamukhi is the best, effective and appropriate for, especially, victory in battle, conflict, debate, litigation and competitions, adapting officer or owner as per desire, escaping from unreasonable tyranny and to teach someone a lesson. The Sadhana of this mantra can be performed to obtain riddance from incurable diseases, for emancipation, to overcome the crisis and obtain freedom from malefic effects of the Nine-planets.

Vedic and Purannic scriptures mention Shree Baglamukhi Mahavidhya at many sites. In the process of the destroying the enemy (sorcery-empiricism) by burying items in ground; the main destructive power in all these is Shree Baglamukhi. Shree Baglamukhi is also termed as power-energy.

Baglamukhi Sadhana of Ascetics

There is no better worship than Baglamukhi Sadhana to triumph over enemies, etc. It has been in use since the ancient times. Shree Prajapati worshipped Her through Vedic process and he succeeded in the creation of the universe. He preached this Vidhya to Sankadik sages. Then Sanatkumar passed this knowledge to Shree Naarad and Shree Naarad transferred to Paramhans named Sankhyayan. Sankhyayan composed Baglamukhi Tantra which has 36 chapters. Shree Parsuram described the different forms of this Vidhya. Maharishi Chyavana was able to stun and restrict Indra’s Vajra (thunderbolt) though this knowledge. Shree Shakaracharya was able to utilize the force of this Vidhya to restrain Rewa river from disturbing the Samadhi of Shreemad Govinda Padacharya. This means that no matter how strong the enemy of the Sadhak is, he is always vanquished by the Sadhak. Thus this Sadhana should be performed for victory in litigation, protection from conspiracy and success in politics.

All the obstacles of the Sadhak disappear with this worship, the enemy gets defeated, and Shree grows. Any ordinary person can chant Baglamukhi mantra but its Tantra worship should be performed only under guidance of a learned person.

The increase of demoniac powers in Kaliyuga is causing unrest and numerous violence incidents. The worship of Shree Pitambara is the most superior mode to eradicate these and restrain the wicked. Baglamukhi Mahavidhya is one of the ten Mahavidhyas. These are also known as Brahmaastra Vidhya, ShadkarmaadharVidhya, Stambhini Vidhya, Treilokya Stambhini Vidhya etc. Mother Baglamukhi fulfills all the wishes and desires of the Sadhak. All the enemies of a Mother Baglamukhi worshipper, desiring to hurt or harm him, automatically get destroyed. A person is able to fulfill his desired wishes along with gaining abilities of Stambhan, Aakarshan, Vashikaran, Vidhweshan, Maaran and Uchchatan through Sadhana of Mother Bhagwati Baglamukhi.

The main seat of Mother Baglamukhi is located in Datia (MP) is between Gwalior and Jhansi. This place is famous as Pitambara Shaktipeeth. In addition, Vankhandi in Himachal Pradesh, Gangret and Kotla, Nalkheda in Madhya Pradesh, Rajnandgaon in Chhattisgarh, Varanasi in Uttar Pradesh and Mumbadevi in Mumbai,Maharashtra are some major Shaktipeeths.

The basic principal of Baglashakti is ‘Atharva Life Principal’. This Life energy is present in a dormant state in every creature, and it can be awakened by Siddhi. When this energy gets activated, then the person can hypnotize not just the person in front, but any person at a remote location can be hypnotized. This “Atharva Life Energy” can be activated only by Baglamukhi Siddhi. After activation of this specific energy, the person can gain restraining, hypnotism and captivation powers.

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