पंचांगुली कल्प साधना (Panchanguli Kalp Sadhana)

पंचांगुली कल्प साधना

 

दिव्य दृष्टि प्राप्त करने की अद्भुत साधना
जब दृष्टि प्रभाव से भूत-भविष्य, वर्तमान का ज्ञान हो जाता है

 

पंचांगुली साधना केवल पांच अंगुलियों और हस्तरेखा सिद्ध करने की साधना नहीं है। पंचांगुली देवी वह शक्ति है, जो साधक के भीतर एक चैतन्य शक्ति जाग्रत करती है, साधक अपने आप में जानकार होता हुआ स्वयं के साथ-साथ, दूसरों के बारे में भी जान सकता है। पंचांगुली मूलतः सम्मोहन की साधना है।

 

भविष्य के अज्ञात रहस्यों को जानने वाली यह विद्या है, जिसे प्रत्येक ॠषि ने सिद्धि किया था। इस विद्या के प्रमुख प्रवर्तक – अंगिरस, कणाद और अत्रेय थे। आज के युग में भी इस साधना को सम्पन्न कर सिद्ध किया जा सकता है। पूज्य सद्गुरुदेव ने अपनी पुस्तक हस्तरेखा और पंचांगुली विज्ञान में इस रहस्य को स्पष्ट किया है।

मनुष्य स्वभावतः इसी बात के लिए उत्सुक रहता है, कि वह अपने भविष्य को जान सके। अनेकों रहस्यमय प्रश्‍न उसके मानस में उठते रहते हैं – क्या ऐसी कोई शक्ति ब्रह्माण्ड मेंे है, जिसका सम्बन्ध हमसे स्थापित हो? क्या ऐसी कोई युक्ति है, जिसके माध्यम से हम अपना भूत, भविष्य और वर्तमान स्पष्ट रूप से देख सकें? ऐसे अनेकों प्रश्‍न उसके मानस पटल पर अंकुरित होते रहते हैं।

 

आज ऐसी कई पद्धतियां बन चुकी हैं, जिनके द्वारा अपने अतीत और भविष्य का आंकलन किया जा सकता है – हस्त रेखा विज्ञान, नेपोलियन थ्योरी, फलित ज्योतिष, टेरो आदि-आदि।

 

इनमें से सबसे ज्यादा प्रचलित विधि है – ‘हस्त रेखा विज्ञान’, जिसके माध्यम से हाथ की लकीरों का, जो देखने में तो कुछ लाइनें ही दिखाई देती हैं, किन्तु सैकड़ों सूक्ष्म तन्तुओं को अपने अन्दर समेटे रहती हैं, जिनका सूक्ष्मातिसूक्ष्म अध्ययन एक अच्छा हस्त विशेषज्ञ ही कर सकता है।

 

संसार में जितने भी पुरुष या स्त्रियां हैं, उनके हाथों की लकीरें कभी एक जैसी नहीं होतीं और उन लकीरों में ही उनका भूत, भविष्य और वर्तमान छिपा होता है, आवश्यकता होती है उस शक्ति के माध्यम से, उन सूक्ष्म रेखाओं को पढ़कर ब्रह्माण्ड से सम्पर्क स्थापित करने की,  क्योंकि जब तक ब्रह्माण्ड में व्याप्त अणुओं से हमारी आत्म-शक्ति का सम्बन्ध नहीं होगा, तब तक हम कालज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते… तभी हमें पहले की, अब की और आने वाले समय की घटनाओं का पूर्णतः ज्ञान प्राप्त हो सकता है।

 

मंत्र और यंत्र ही ऐसी दो अक्षय निधियां हैं, जिनके माध्यम से अपने जीवन में परिवर्तन लाया जा सकता है और सुखी, सफल एवं सम्पन्नतायुक्त जीवनयापन किया जा सकता है।
आज साधना और सिद्धि, कालज्ञान आदि विधाएं केवल ‘साधु-संतों’ तक ही सिमट कर नहीं रह गई हैं। कोई भी इन्हें सम्पन्न कर सफलता तक पहुंच सकता है।

 

सभी की उत्सुकता का केन्द्र ‘भविष्य’ का ज्ञान अर्जित करने के लिए ‘पंचांगुली साधना’ सर्वश्रेष्ठ मानी गई है, जिसके माध्यम से अपने या किसी भी व्यक्ति के भूत, भविष्य और वर्तमान को आसानी से जाना जा सकता है।

 

पंचांगुली देवी कालज्ञान की देवी हैं, जिनकी साधना कर साधक को होने वाली घटनाओं व दुर्घटनाओं का पूर्वानुमान हो जाता है तथा इसी साधना के द्वारा हस्त विज्ञान में पारंगत हुआ जा सकता है और भविष्यवक्ता बना जा सकता है।

 

प्राचीन काल के योगी, साधु, संन्यासी इस साधना को सिद्ध कर लोगों को भविष्य के बारे में बताया करते थे और यश, कीर्ति, वैभव सब कुछ प्राप्त कर लेते थे। धीरे-धीरे कुछ लोगों की चालाकी और कायरता की वजह से, जो ये समझते थे कि यदि किसी को या सभी लोगों को इस साधना की पूर्ण जानकारी हो गई, तो हमें कौन पूछेगा? इसलिए यह ज्ञान एक छोटे से दायरे में ही सिमट कर रह गया। समय ने पलटा खाया और बहुत बड़ा जन समुदाय इस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए प्रयासरत हो गया, जिसके कारण इस साधना का प्रचार-प्रसार होने लगा, जो उन ढोंगी साधु-संतों पर एक तीव्र प्रहार ही था, क्योंकि वे इस विद्या का लाभ उठाकर, दूसरों को आसानी से मूर्ख बनाकर उन्हें अपने अधीन कर लेते थे।

 

इस साधना को सम्पन्न कर ऐसे ढोंगियों पाखण्डियों का पर्दाफाश कर, स्वयं के साथ-साथ समाज का भी कल्याण किया जा सकता है।

 

पंचांगुली साधना के माध्यम से सामने वाले को देखकर उसका भविष्य पूर्णरूप से ज्ञात हो जाता है, वह स्वयं भी अपने आपात्कालीन संकटों का पूर्वाभास कर अपने जीवन की रक्षा आप कर सकता है, किसी भी व्यक्ति के भविष्य के प्रत्येक क्षण को अक्षरशः जान सकता है, और घटित होने वाली दुर्घटनाओं की पूर्व जानकारी देकर उन्हें सावधान कर सकता है।

 

इस साधना को सिद्ध करना जीवन की श्रेष्ठता है तथा किसी भी साधना को करने से पूर्व इस साधना को अवश्य ही कर लेना चाहिए, जिससे कि साधना के अन्तर्गत रह गई त्रुटियों और आने वाली अड़चनों को सुगमता से दूर किया जा सके।

 

महाभारत युद्ध में धृतराष्ट्र नेत्रहीन होने की वजह से उस युद्ध को नहीं देख सकते थे, किन्तु संजय की दिव्य दृष्टि ने उन्हें कौरवों और पांडवों के बीच हुए युद्ध का अक्षरशः विवरण कह सुनाया। लोग उसे दिव्य दृष्टि का ज्ञान कहते थे, किन्तु वास्तव में कुछ भी देख लेने की शक्ति उस दृष्टि के माध्यम से नहीं, अपितु उस शक्ति के माध्यम से प्राप्त हुई थी, जिसे उन्होंने साधना के बल पर प्राप्त किया था, क्योंकि मात्र दृष्टि के माध्यम से भूत, भविष्य एवं वर्तमान का ठीक-ठीक ज्ञान प्राप्त होना कठिन-सी प्रक्रिया है, ज्ञान तो चैतन्य शक्ति के माध्यम से ही प्राप्त होता है, जिसे अपने अन्दर से प्रस्फुटित करना पड़ता है। यदि पंचांगुली मंत्र के साथ-साथ काल ज्ञान मंत्र को भी सिद्ध कर लिया जाय, तो संजय के समान ही दिव्य दृष्टि प्राप्त की जा सकती है, फिर यह जरूरी नहीं, कि जिस व्यक्ति का भूत-भविष्य जानना हो, वह सामने हो ही। पंचांगुली साधना की उच्चतम स्थिति दिव्य दृष्टि सम्पन्न होना है। यहां प्रस्तुत वर्णन ‘पंचांगुली कल्प’ साधना की उसी भावभूमि को अपने में समेटे हुए है।

 

साधना विधान

 

1. इस साधना को करने के लिए ‘पंचांगुली यंत्र व चित्र’ तथा ‘स्फटिक माला’, जो प्राण प्रतिष्ठायुक्त एवं मंत्र-सिद्ध हो, प्रयोग करना आवश्यक होता है।

 

2. यह साधना शुक्ल पक्ष की किसी भी द्वितीया, पंचमी, सप्तमी या पूर्णमासी को की जा सकती है।

 

3. यह साधना प्रातः कालीन है, इसे ब्रह्म मुहूर्त में ही करना चाहिए।

 

4. इस साधना को किसी एकांत स्थल या पूजा स्थल में ही, जहां शोर न हो, सम्पन्न करना चाहिए। यह सात दिन की साधना है।

 

5. पीले आसन पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके, पीले वस्त्र धारण कर तथा गुरु चादर ओढ़ कर बैठ जायें।

 

6. फिर एक बाजोट पर पीला वस्त्र बिछाकर उस पर गुरु चित्र/पादुका/ अथवा यंत्र स्थापित करें। उसी बाजोट पर ‘पंचांगुली देवी का चित्र व यंत्र’ भी स्थापित कर दें। यंत्र को किसी ताम्र प्लेट में रखें।

 

7. सबसे पहले गणपति का ध्यान करें, फिर गुरुदेव निखिल का ध्यान, स्नान, पंचोपचार पूजन सम्पन्न कर, गुरु माला से गुरु मंत्र की 1 माला जप करें।

 

8. गुरु पूजन के पश्‍चात् षोडशोपचार पूजन हेतु यंत्र पर कुंकुम से ‘स्वस्तिक’ का चिह्न बनायें।

 

9. निम्न प्रकार षोडशोपचार विधि से यंत्र का विधिवत् पूजन करें –

 

ध्यान
ॐ भूभुर्वः स्वः श्री पंचांगुली देवीं ध्यायामि।

 

आह्वान
ॐ आगच्छाच्छ देवेशि त्रैलोक्य तिमिरापहे।

 

क्रियमाणां मया पूजां गृहाण सुरसत्तमे॥
ॐ भूर्भुवः स्वः श्री पंचांगुली देवताभ्योः नमः आह्वाहनं समर्पयामि।

 

आसन
रम्यं सुशोभनं दिव्यं सर्व सौख्य करं शुभम्।

 

आसनञ्च मया दत्तं गृहाण परमेश्‍वरीं॥
ॐ भूभुर्वः स्वः श्री पंचांगुली देवताभ्यो नमः आसनं समर्पयामि।

 

स्नान
गंगा सरस्वती रेवा पयोष्णी नर्मदा जलैः।
स्नापिताऽसि मया देवि तथा शान्तिं कुरुष्व मे॥

 

पयस्नान
कामधेनु समुत्पन्नं सर्वेषां जीवनं परम्।
पावनं यज्ञ हेतुश्‍च पयः स्नानार्थमर्पितम्॥

 

दधिस्नान
पयसस्तु समुद्भूतं मधुराम्लं शशिप्रभम्।
दध्यानीतं मया देवि स्नानार्थं प्रति गृह्यताम्॥

 

मधुस्नान
तरुपुष्प समुद्भूतं सुस्वादु मधुरं मधु।
तेजः पुष्टिकरं दिव्यं स्नानार्थं प्रति गृह्यताम्॥

 

घृतस्नान
नवनीत समुत्पन्नं सर्वसन्तोष कारकम्।
घृतं तुभ्यं प्रदास्यामि स्नानार्थं प्रति गृह्यताम्॥

 

शर्करास्नान
इक्षुरस समुद्भूता शर्करा पुष्टिकारिका।
मलापहारिका दिव्या स्नानार्थं प्रति गृह्यताम्॥

 

वस्त्र
सर्वभूषाधिके सौम्ये लोक लज्जा निवारणे।
मयोपपादिते तुभ्यं वाससी प्रति गृह्यताम्

 

गन्ध
श्री खण्ड चन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम्।
विलेपनं सुरश्रेष्ठि चन्दनं प्रति गृह्यताम्॥

 

अक्षत
अक्षताश्‍च सुरश्रेष्ठि कुकुम्माक्ता सुशोभिता।
मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्‍वरि॥

 

पुष्प
ॐ माल्यादीनि सुगंधीनि मालत्यादीनि वै विभे।
मयाहृतानि पुष्पाणि प्रीत्यर्थं प्रति गृह्यताम्॥

 

दीप
साज्यं च वर्तिसंयुक्तं वह्निना योजितं मया।
दीपं गृहाण देवेशि त्रैलोक्य तिमिरापहे॥

 

नैवेद्य
नैवेद्यं गृह्यतां देवि भक्तिं मे ह्यचला कुरु।
ईप्सितं मे वरं देहि परत्रेह परां गतिम्॥

 

दक्षिणा
हिरण्यगर्भ गर्भस्थं हेमबीजं विभावसोः।
अनन्तः पुण्य फलदमतः शांतिं प्रयच्छ मे॥

 

विशेषार्घ्य
नमस्ते देवदेवेशि नमस्ते धरणीधरे।
नमस्ते जगदाधारे अर्घ्यं च प्रति गृह्यताम्।
वरदत्वं वरं देहि वांछितं वांछितार्थदं।
अनेन सफलार्घैण फलादऽस्तु सदा मम।
गतं पापं गतं दुःखं गतं दारिद्र्यमेव च।
आगता सुख सम्पत्तिः पुण्योऽहं तव दर्शनात्॥

 

10. हाथ में जल लेकर मंत्र-जप करने का संकल्प करें।

 

11. निम्नलिखित पंचांगुली मंत्र का ‘स्फटिक माला’ से 7 दिन तक एक-एक माला मंत्र-जप करें।

 

मंत्र
॥ ॐ ठं ठं ठं पंचांगुलि भूत भविष्यं दर्शय ठं ठं ठं स्वाहा ॥

 

12. मंत्र-जप करने का समय निर्धारित होना चाहिए।

 

13. जप काल में ध्यान रखने योग्य बातें –

 

* इस साधना को तभी सम्पन्न करें, जब आप दृढ़ चित्त हों, आपका निश्‍चय पक्का हो और संघर्षों से जूझने की शक्ति हो।*  गृहस्थ साधना काल में स्त्री सम्पर्क न करें, ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करें।*  साधना काल में असत्य भाषण न करें। *  मंत्र जप के समय बीच में उठें नहीं। *  गुरु के प्रति आस्थावान होकर, गुरु पूजन के पश्‍चात् ही साधना सम्पन्न करें।  िं तामसिक भोजन से दूर रहें।*  मंत्रोच्चारण शुद्ध व स्पष्ट हो।*  यदि साधना पूरी होने पर भी सफलता न मिले, तो झुंझलावें नहीं, बार-बार प्रयत्न करें।

 

14. साधना-समाप्ति के पश्‍चात् समस्त सामग्री को किसी नदी या कुंए में विसर्जित कर दें।

 

इस प्रकार पूर्ण विश्‍वास के साथ की गई साधना से मंत्र की सिद्ध होती ही है तथा उस साधक को भूत, भविष्य एवं वर्तमान की सिद्धि हो जाती है।

Panchanguli Kalp Sadhana

Wonderful Sadhana to attain Clairvoyance

When one attains vision to see the past-future and the present

 

Panchanguli Sadhana is not a Sadhana to accomplish just for Five Fingers and the Palmistry. The Panchanguli Mother is the Divine power who initiates a conscious energy into the Sadhak, and the Sadhak attains the power to know about the self, as well as about the others. Panchanguli Sadhana is fundamentally a Hypnotic Sammohan Sadhana practice.

This is the wisdom to learn about the deep mysterious secrets of the future, which was accomplished by each sage. The main promoters of this knowledge were Angiras, Kanaad and Atreya. This Sadhana can be accomplished even in this age. Puyja Gurudev has clarified this in His book “Palmistry and Panchanguli Vigyan”.


A man is naturally curious to know about his future. Many mysterious questions arise in his mind – Is there any Supreme power in this universe, which is connected to us? Is there any way, to see our past, present and future clearly? Many such questions keep arising in his mind.

There are many methods these days to assess the past and future – Palmistry, Napoleon Theory, Astrology, Tarot etc. etc.

The most popular method is – “Palmistry Science“, through which one studies the lines of hand. These lines look very plain and simple, but they contain thousands of deep secrets within themselves. Only an experienced Palmist can analyse these lines deeply.

None of the men or women in the world today have same set of lines on their hands, and the past, present and future is hidden within these lines on palm. It is necessary to make a contact with the universe through an energy-source, after studying these line, because we cannot attain the clairvoyance until our soul-energy connects with the atoms in the universe.. only then we can obtain full knowledge about the past, the present and the future.

The Mantra and the Yantra are two immortal heritages through which we can transform our life, and lead a happy, successful and blessed life.

The Sadhana practices and accomplishments are not limited to just the saints-sages today, anyone can accomplish them and become successful.

The “Panchanguli Sadhana” has been considered as the best Sadhana to obtain knowledge about the future, which everyone wants to have. Anyone can easily get knowledge about the past, present or future about the self or anyone else.

The Panchanguli Goddess is the Divine Goddess of Kaalgyaan, after accomplishing this Sadhana practice, a Sadhak can forecast about the future events and disasters, and can develop expertise in Palmistry, and become clairvoyant.

The yogis, sages and monks of the ancient times used to perfect this practice and tell people about their future and were able to attain fame, glory and honour. Gradually they started to limit this knowledge among a selected few to maintain their own importance. So this knowledge got confined within a small circle. The times changed, and many people became curious to attain this knowledge, and this Sadhana became popular. This was a strike on those fake sage-saints, because they used to easily subdue others by fooling them using this knowledge.

We can expose such hypocrite sage-saints by accomplishing this Sadhana for the welfare of the society.

After accomplishing “Panchanguli Sadhana”, one can accurately predict about someone’s future by seeing them. He can also protect himself by predicting about his own future disasters. He can know about each moment of anyone’s future and can alert them with prior information of future accidents.

Accomplishment of this Sadhana is a major milestone in life and one should perform this Sadhana before doing any other Sadhana, to easily remove the hindrances and faults of Sadhanas.

Dhritarashtra could not see the Mahabharata war due to his blindness, but Sanjay managed to provide him with each literal detail of the war through his sixth sense. People used to call it sixth sense, however he gained this ability not through his vision, but through the energy of the Sadhana. It is difficult to predict correctly about the past, present and future only through the vision, the knowledge comes from the conscious triggered by the Sadhanas. If one accomplishes Kaal Gyan Mantra along with Panchanguli Sadhana, then one can attain the similar Divine-Vision as Sanjay. It is not necessary for the subject to be in front of the Sadhak. The highest level of Panchanguli Sadhana is to attain the Divine-Vision. The following describes the same “Panchanguli Kalp Sadhana”.

 

Sadhana Procedure

  1. Praana consecrated and Mantra sanctified “Panchanguli Yantra and Picture” and “Sfatik Mala” are required for this Sadhana.
  2. This Sadhana can be performed on the Second, Fifth, Seventh or Full-Moon Poornnima of any “Shukla” Paksha.
  3. This is a morning Sadhana, it should be performed during Brahma-muhurath.
  4. This Sadhana should be performed in a secluded place or a place of worship, where noise is absent. This is a seven-day Sadhana.
  5. After wearing Yellow garments, sit on a Yellow asana facing East and adorn Guru-Chadar.
  6. Spread a Yellow cloth of a wooden board and setup Guru Picture / Paduka or Yantra on it. Also setup “Panchanguli Devi Yantra and Picture” on the same wooden board. Place the Yantra in a copper plate.
  7. First meditate on Divine Ganpati, then after meditating on Gurudev Nikhil, Snana (Bathe) and Panchopchaar Poojan, chant 1 mala of Guru Mantra with Guru Mala.
  8. After Guru Poojan, make a mark of “Swastik” on the Yantra with Vermilion for Shodshopchaar Poojan.
  9. Perform Shodshopchaar Poojan on Yantra as follows :

 

Meditation

Om BhoorbhovaH SwaH Shree Panchanguli Devi Dhyaayaami |

 

Aavhaan

Om Aagacchaaccha Deveshi Treilokya Timiraapahe |

Kriyamaanaan Mayaa Poojaam Grihaan Surasattme ||

Om BhoorbhovaH SwaH Shree Panchanguli DevataabhayoH NamaH Aahvaahanam Samarpayaami |

 

Aasana

Ramyam Sushobhanam Divyam Sarva Soukhaya Karam Shubham |

Aasanayach Mayaa Dattam Grihaan Parameshwarim ||

Om BhoorbhovaH SwaH Shree Panchanguli DevataabhayoH NamaH Aasanam Samarpayaami |

 

Snaan

Gangaa Saraswati Revaa Payoshni Narmadaa JaleiH |

Snaapitaaasi Maya Devi Tathaa Shaantim Kurushva Me ||

 

Payasnaan

Kaamadhenu Samutpannam Sarveshaam Jeevanam Param |

Paavanam Yagya Hetuscha PayaH Snaanarthamarpitam ||

 

Dadhisnaan

Payasastu Samudbhootam Madhuraamlam Shashiprabham |

Dadhyaaneetam Maya Devi Snaanaartham Prati Grihyataam ||

 

Madhusnaan

Tarupushp Samudbhootam Susvaadu Madhuram Madhu |

TejaH Pushtikaram Divyam Snaanaartham Prati Grihyataam ||

 

Dhritasnaan

Navaneeta Samutpannam Sarvasantosh Kaarakam |

Dhritam Tubhyam Pradaasyaami Snaanaartham Prati Grihyataam ||

 

Sharkaaraasnaan

Ikshuras Samudbhootaa Sharkaraa Pushtikaarikaa |

Malaapahaarikaa Divyaa Snaanaartham Prati Grihyataam ||

 

Vastra

Sarvbhushaadike Soumayei Loka Lajjaa Nivaraarane |

Mayopapaadite Tubhyam Vaasasi Prati Grihyataam ||

 

Gandha

Shree Khanda Chandanam Divyam Gandhaadayam Sumanoharam |

Vilepanam Surakshreshthi Chandanam Prati Grihyataam ||

 

Akshat

Akshataashch Surakshresthi Kukummaaktaa Sushobhitaa |

Mayaa Niveditaa Bhaktyaa Grihaan Parameshvari ||

 

Pushp

Om Maalyaadini Sugandhini Maalatyaadini Vei Vibhe |

Mayaahytaani Pushpaani Prityartham Prati Grihyataam ||

 

Deep

Saajyam Cha Vartisanyuktam Vahinna Yojitam Mayaa |

Deepam Grihaan Deveshi Treilokya Timiraapahe ||

 

Neivedh

Neivedham Grihyataam Devi Bhaktim Me Hychalaa Kuru |

Ipsitam Me Varam Dehi Paratreha Paraam Gatim ||

 

Dakshina

Hiranyagarbha Garbhastham Hembeejam VeebhavasoH |

AnantaH Punya FaladamataH Shaantim Prayaccha Me ||

 

Visheshaardhya

Namaste Devadeveshi Namaste Dharanidhare |

Namaste Jagadaadhaare Ardhyam Cha Prati Grihyataam |

Varadatvam Varam Dehi Vaanchitam Vaanchitaarthadam |

Anena Safalaargheina Falaadaastu Sadaa Mam |

Gatam Paapam Gatam DuHkham Gatam Daaridrayameva Ch |

Aagataa Sukha SampattiH PunyooHam Tava Darshanaat |

 

  1. Taking water in hand, pledge to perform Mantra japa.
  2. Chant one mala of following Mantra daily for 7 days with “Sfatik Mala“.

 

Mantra

|| Om Tam Tam Tam Panchaanguli Bhut Bhavishyam Darshaya Tam Tam Tam Swaahaa ||

 

  1. The time for Mantra Japa should be regular.
  2. Points to keep in mind during Mantra chanting-

* Accomplish this Sadhana when you are completely determined, have strong will-power and you have energy to fight against the obstacles.

* Do not stay with a woman during Sadhana period, completely follow the Brahmacharya (celibacy).

* Do not tell any lies during the Sadhana period.

* Do not get up during the Mantra chanting.

* Have full faith and devotion towards Gurudev, accomplish Sadhana only after performing Guru poojan.

* Stay away from Taamsik food.

* The Mantra chanting should be correct and clear.

* Do not worry if you don’t achieve success after completion of Sadhana, try again.

 

  1. After completion of Sadhana, drop the Sadhana materials in a river or a well.

 

Sadhana completed with full devotion by this method is always successful, and the Sadhak accomplishes power to see the past, present and future.

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