निखिलेश्‍वरानंद दस दिशा चैतन्य महापूजन (Nikhileshwaranand Das Disha Mahapujan)

सिद्धाश्रम सिद्धि दिवस पर विशेष

 

सद्गुरु निखिल आह्वान पूजन
निखिलेश्‍वरानंद दस दिशा चैतन्य महापूजन
सिद्धाश्रम योग निखिल जागरण

 

साधक को कई बार प्रयत्न करने पर भी साधनाओं सफलता नहीं मिल पाती, इसका एक मात्र कारण साधक के दोष-विकार और मलिनताएं है। इन दोषों का शमन केवल और केवल गुरु कृपा, गुरु भक्ति द्वारा ही संभव है। गुरु भक्ति द्वारा ही मन-वचन और कर्म में शुद्धता स्थापित की जा सकती है जो कि साधना के क्षेत्र में पूर्णता प्राप्त करने के लिये एक अनिवार्य तत्व है।

सद्गुरुदेव अपनी कृपा दृष्टि एवं दिव्यपात द्वारा शिष्य के दोषों का हरण कर उसे पूर्णता प्रदान करते हैं। इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में मात्र गुरु ही ऐसी शक्ति है जो शिष्य का कल्याण कर उसके जीवन को सार्थक कर सकते हैं। गुरु से दिव्यपात प्राप्त करने हेतु शिष्य को सुपात्रता सिद्ध करनी होती है।

 

जब तक शिष्य अपनी सुपात्रता सिद्ध न कर दे, उसे शिष्य रूप में मानना न तो उचित है और न तर्क संगत ही। शिष्य के लिये ‘शारदा तिलक’ में स्पष्ट कहा है –

 

शिष्यः कुलीनः शुद्धात्मा पुरुषार्थ परायणः।
अधीतवेदः कुशलो दूर मुक्त मनोभवः।
हितैषी प्राणिनां नित्य मस्तिकस्त्यक्त नास्तिकः।
स्वधर्म निरतो भक्त्या पितृमातृ हितोद्यतः।
वाङ्मनः कायवसुर्भिगुरुशुश्रूवणे रतः।
त्यक्ताभिमानो गुरुषु जाति विद्या धनादिभिः।
गुर्वाज्ञा पालनार्थं हि प्राण व्यय रतोद्यतः।
विहत्य च स्वकार्याणि गुरुः कार्य रतः सदा।
दासवन्निवसेद्यस्तु गुरौ भक्त्या सदाशिशुः।
कुर्वन्नाज्ञां दिवारात्रौ गुरु भक्ति परायणः।
आज्ञाकारी गुरोः शिष्यो मनोवाक्काय कर्मभिः।
यो भवेत्स तदा ग्राह्यो नेतरः शुभकांक्षया।
मंत्र पूजा रहस्यानि यो गोपयति सर्वदा।
त्रिकालं यो नमस्कुर्यादागमाचारतत्ववित॥
स एव शिष्य कर्तव्यो नेतरः स्वल्प जीवनः।
एतादृशगुणोपेतः शिष्यों भवति नापरः॥
शिष्य में ये गुण होने आवश्यक है

 

जो कुलीन वंश का हो, सदाचारी हो, पुरुषार्थ करने वाला हो, वेदों में आस्था रखने वाला हो, चतुर हो तथा काम वासना से रहित हो।

 

जो आस्तिक होकर समस्त प्राणियों का हित चिन्तन करता हो, नास्तिक का साथ नहीं देता हो, स्वधर्म रत हो, माता-पिता का भक्त हो तथा तन-मन-धन से गुरु के सामने जाति-पद-धन का अहंकार न करता हो तथा गुरु आज्ञा पालन में प्राणों को न्यौछावर करने में भी नहीं हिचकिचाता हो।

 

जो गुरु के पास दास की तरह लगा हो तथा अपना काम छोड़कर भी गुरु के कार्य में रत हो, शिशुवत् अहर्निश गुरु भक्ति में लीन हो तथा मन, वाणी व शक्ति से गुरु आज्ञा पालन में तत्पर रहता हो। ऐसा व्यक्ति शिष्य कहलाने का अधिकारी है।

 

जो मंत्र तथा रहस्यों को गुप्त रखता हो, शास्त्रीय आचार तत्त्व को जानता हो तथा विवेकवान हो, वही शिष्य कहलाने का अधिकारी है और ऐसे व्यक्ति को ही शिष्य बनाना चाहिए।
यही नहीं, शास्त्रों में यह भी बताया गया है कि गुरु के सामने शिष्य को कैसे रहना चाहिए –

 

प्रणम्योपविशेत्पार्श्‍वे तथा गच्छेदनुज्ञया।
मुखावलोका सेवेत कुर्यादादिष्ट मादरात्।
असत्यं न वदेदग्रे न बहु प्रलपेदपि।
कामं क्रोधं तथा लोभं मानं प्रहसनं स्तुतिम्।
चापलानि च जिह्वानि कार्याणि परिदेवनम्।
ॠणदानं तथा दानं वस्तूनां क्रय विक्रयम्।
न कुर्याद् गुरुणं सार्द्धं शिष्यो भूष्णुः कदाचन।

 

आते ही प्रणाम करके गुरु के पास बैठे; जाना हो, तो आज्ञा लेकर जाय; उनकी आज्ञा की प्रतीक्षा अधीरता से करे, आदर से उनकी आज्ञा का पालन करे, न झूठ बोले, न जरूरत से ज्यादा बोले। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मान, हंसी, स्तुति, कुटिलता न करे, न रोवे और न चिल्लावे। गुरु से न ॠण की याचना करे और न क्रय-विक्रय करे।

 

साधक को कई बार प्रयत्न करने पर भी साधनाओं सफलता नहीं मिल पाती, इसके कई कारणों में से एक कारण साधक शिष्य द्वारा मन, वचन एवं कर्म द्वारा ऐसे कार्यों को सम्पन्न करना हो जो न्याय संगत नहीं हो, जो धर्म के अनुसार नहीं हो। उन कर्मों का प्रभाव चाहे-अनचाहे भी जीवन पर निरन्तर पड़ता रहता है। इन दोषों का शमन केवल और केवल गुरु कृपा, गुरु भक्ति द्वारा ही संभव है। गुरु भक्ति द्वारा ही मन-वचन और कर्म में शुद्धता स्थापित की जा सकती है जो कि साधना के क्षेत्र में पूर्णता प्राप्त करने के लिये एक अनिवार्य तत्व है। शुद्ध भाव एवं शुद्ध क्रिया द्वारा ही श्रेष्ठ जीवन प्राप्त किया जा सकता है।

 

साधना कब करें –
शिष्य के दोषों का शमन केवल और केवल गुरु कृपा द्वारा ही संभव है और गुरुदेव तो शिष्य पर हर क्षण कृपा दृष्टि बनाए रखते हैं। इस विशिष्ट साधना को शिष्य-साधक किसी भी शुभ मुहूर्त अथवा किसी भी गुरुवार को सम्पन्न कर सकते हैं। आगे आने वाले दिनों में सिद्धाश्रम सिद्धि दिवस (29 जून 2016) एक ऐसा ही अद्वितीय अवसर है, जब शिष्य अपनी साधना, भक्ति द्वारा गुरु कृपा प्राप्त कर सकता है। इस विशिष्ट दिवस पर निश्‍चित ही शिष्यों-साधकों द्वारा गुरु कृपा प्राप्ति हेतु ‘निखिलेश्‍वरानन्द दस दिशा महापूजन’ सम्पन्न करना चाहिए।

 

पूजन हेतु प्राण प्रतिष्ठित सामग्री

 

इस साधना में ‘रुद्र मंत्रों से प्राण प्रतिष्ठा युक्त निखिलेश्‍वर यंत्र’ तथा ‘गुरु तत्वाभिषेक रुद्राक्ष माला’ आवश्यक है।

 

अन्य सामग्री
गुरु चित्र, धूप, दीप, अगरबत्ती, पुष्प, माला, नैवेद्य, कुंकुम, अक्षत इत्यादि।

 

साधना विधान
इस साधना को सम्पन्न करने में समय की बाध्यता नहीं है। अतः साधक अपनी सुविधानुसार दिन अथवा रात में इस साधना को सम्पन्न कर सकता है। साधक स्नान कर पीली धोती धारण कर पूर्व की ओर मुंह कर बैठ जाए, सामने पूज्य गुरुदेव का अत्यन्त आकर्षक और सुन्दर चित्र स्थापित करे तथा उनकी भक्तिभाव से पूजा करे। उन्हें नैवेद्य समर्पित करे, सुगन्धित अगरबत्ती प्रज्वलित करे, घी का दीपक लगावें।
सर्वप्रथम आचमन हेतु साधक तीन बार दाहिने हाथ में जल लेकर पी लें और उसके बाद हाथ धोकर गुरुदेव को प्रणाम करें। आचमन के पश्‍चात् दाहिने हाथ में जल कुंकुम, पुष्प लेकर निम्न संकल्प मंत्र का उच्चारण करें –

 

ॐ विष्णु र्विष्णु र्विष्णु देश कालौ संकीर्त्य अमुक गौत्रस्य उमक शर्माऽहम् ममोपरि इह जन्म गत जनम स्वकृत परकृत-कारित क्रियमाण कार-यिष्यमाण-भूत-प्रेत पिशाचादि मन्त्र-तन्त्र-यन्त्र त्रोटकादिजन्यसकलदोष बाधा निवृत्ति पूर्वक पूर्ण सिद्धि दीर्घायुआरोग्यैश्‍वर्यादि-प्राप्त्यर्थं शमन साधना प्रयोग करिष्ये।

 

संकल्प मंत्र उच्चारण के पश्‍चात् जल भूमि पर छोड़ दें और रुद्राक्ष माला से गुरु मंत्र की एक माला जप करें –
ॐ परमतत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नम:
मंत्र जप करने के बाद रुद्राक्ष माला को गले में धारण कर लें। इस साधना में दसों दिशाओं में गुरुदेव संकल्प, मंत्र जप सम्पन्न किया जाता है। दस दिशाएं – पूर्व, अग्नि (पूर्व और दक्षिण के मध्य), दक्षिण, नैॠत्य (दक्षिण और पश्‍चिम के मध्य), पश्‍चिम, वायव्य (पश्‍चिम और उत्तर के मध्य), उतर, ईशान (उत्तर और पूर्व के बीच), उर्ध्व और पाताल दिशा में क्रमबद्ध रूप से पूजन मंत्र जप सम्पन्न किया जाता है।
प्रत्येक दिशा में मंत्र जप सम्पन्न करने के पश्‍चात् रुद्राक्ष माला को पुनः गले में धारण कर लें।

 

पूर्व दिशा
पूर्व दिशा की ओर ही मुख किए हुए ही हाथ में जल लेकर संकल्प करें –
ॐ मे पूर्वंवत इह गत: पाप्मा पापकेनिह कर्मणा इन्द्र साक्षी भूतं निखिलेश्‍वरानंदम् मम समस्त दोष पाप भंजयतु भंजयतु मोहयतु नाशयतु भारयत कलिं तस्मै प्रयच्छतु कृतं मम (अपना नाम उच्चारण करें) गुरु शान्ति: स्वस्त्ययनंचास्तु।
जल भूमि पर छोड़ दें तथा गले में पहनी हुई रुद्राक्ष माला से निम्न पूर्व दिशाकृत गुरु मंत्र की एक माला मंत्र जप करें –

 

पूर्वदिशाकृत गुरु मंत्र
॥ॐ श्रीं निखिलेश्‍वराय श्रीं ॐ॥
अग्नि दिशा
साधक अपने आसन पर ही अग्निकोण की ओर मुंह कर बैठ जाए और पुनः हाथ में जल लेकर संकल्प करें –
ॐ योमे पूर्वंगत इह गत पाप्मा पापकेनेह कर्मणा अग्नि साक्षी भूतं निखिलेश्‍वरानंदम् मम समस्त दोष पाप भंजयतु मोहयतु नाशयतु मारयतु कलिं तस्मै प्रयच्छतु कृतं मम (अपना नाम उच्चारण करें) गुरु शांति: स्वस्त्ययनचास्तु।
अग्निकोण दिशा में संकल्प के पश्‍चात् निम्न अग्नि दिशा कृत गुरु मंत्र की एक माला मंत्र जप करे और मंत्र जप के पश्‍चात् माला पुनः गले में धारण कर लें।
अग्नि दिशा कृत गुरु मंत्र
॥ ॐ ऐं ऐं निखिलेश्‍वराय ऐं ऐं नम:॥

 

दक्षिण दिशा
दक्षिण दिशा की ओर मुंह कर बैठ जाएं और हाथ में जल लेकर संकल्प करें –
ॐ योमे पूर्वंगत इह गत पाप्मा पापकेनेह कर्मणा दक्षिण यमदेव साक्षी भूतं निखिलेश्‍वरानंदम् मम समस्त दोष पाप भंजयतु भंजयतु मोहयतु नाशयतु भारयतु कलिं तस्मै प्रयच्छतु कृतं मम (अपना नाम उच्चारण करें) गुरु शान्ति – स्वस्तयनंचास्तु।
दक्षिण दिशा में संकल्प के पश्‍चात् जल भूमि पर छोड़ दें तथा गले में धारण की हुई रुद्राक्ष माला गले से निकाल कर, उस रुद्राक्ष माला से निम्न दक्षिण दिशा कृत गुरु मंत्र की एक माला मंत्र जप करें और मंत्र जप की पूर्णता के पश्‍चात् माला को पुनः गले में धारण कर लें –
दक्षिण दिशा कृत गुरु मंत्र
॥ ॐ ह्रीं परमतत्वाय निखिलेश्‍वराय ह्रीं नम:॥

 

नैॠत्य दिशा
इसके बाद नैऋत्य दिशा की ओर मुंह कर संकल्प करें-
ॐ योमे पूर्वंगत इह गत पाप्मा पापकेनेह कर्मणा नैऋत्य रक्षराज साक्षी भूतं निखिलेश्‍वरानंदम् मम समस्त दोष पाप भंजयतु भंजयतु मोहयतु नाशयतु मारयतु कलिं तस्मै प्रयच्छतु कृतं मम (अपना नाम उच्चारण करें) गुरुं शान्ति स्वस्त्ययनंचास्तु।
संकल्प के पश्‍चात् नैऋत्य दिशा मंत्र का रुद्राक्ष माला से एक माला मंत्र जप करें और मंत्र जप के पश्‍चात् माला गले में धारण कर लें –
नैऋत्य दिशा कृत गुरु मंत्र
ॐ क्लीं क्लीं निखिलेश्‍वराय क्लीं क्लीं नम:॥

 

पश्‍चिम दिशा
नैॠत्य दिशा के पश्‍चात् पश्‍चिम दिशा की ओर मुंह करें और हाथ में जल लेकर संकल्प करें –
ॐ योमे पूर्वंगत इह गत पाप्मा पापकेनेह कर्मणा पश्‍चिम सोम वरुण विप्रराज साक्षी भूतं निखिलेश्‍वरानंदम् मम समस्त दोष पाप भंजयतु भंजयतु मोहयतु नाशयतु मारयतु कलिं तस्मै प्रयच्छतु कृतं मम (अपना नाम उच्चारण करें) गुरुं शांति:स्वस्त्ययनंचास्तु।
पश्‍चिम दिशा की ओर मुंह किये हुए ही रुद्राक्ष माला से निम्न गुरु मंत्र की एक माला से मंत्र जप करें।
पश्‍चिमी दिशा कृत गुरु मंत्र
॥ॐ क्रीं निखिलेश्‍वराय क्रीं ॐ॥

 

वायव्य दिशा –
इसके बाद वायव्य दिशा की ओर मुंह कर संकल्प करें-
ॐ योमे पूर्वंगत इह गत पाप्मा पापकेनेह कर्मणा वायव्य वायु यक्षराज साक्षी भूतं निखिलेश्‍वरानंदम् मम समस्त दोष पाप भंजयतु भंजयतु मोहयतु नाशयतु मारयतु कलिं तस्मै प्रयच्छतु कृतं मम (अपना नाम उच्चारण करें) गुरु शान्ति: स्वस्त्ययनंचास्तु।
संकल्प के पश्‍चात् रुद्राक्ष माला से निम्न गुरु मंत्र जप करें और मंत्र जप के पश्‍चात् माला गले में धारण कर लें।
वायव्य दिशा कृत गुरु मंत्र
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं निखिलेश्‍वराय श्रीं ह्रीं ऐं ॐ॥

 

उतर दिशा
इसके बाद साधक उत्तर दिशा की ओर मुंह कर लें और हाथ में जल लेकर संकल्प करें –
ॐ योमे पूर्वंगत इह गत पाप्मा पापकेनेह कर्मणा उत्तर दिशा कुबेर साक्षी भूतं निखिलेश्‍वरानंदम् मम समस्त दोष पाप भंजयतु भंजयतु मोहयतु नाशयतु मारयतु कलिं तस्मै प्रयच्छतु कृत मम (अपना नाम उच्चारण करें) गुरु शान्ति: स्वस्त्ययनचास्तु।
संकल्प के पश्‍चात् रुद्राक्ष माला से निम्न गुरु मंत्र की एक माला मंत्र जप करें-
उत्तर दिशाकृत गुरु मंत्र
ॐ श्रीं श्रीं श्रीं निखिलेश्‍वराय श्रीं श्रीं श्रीं नम:॥

 

ईशान दिशा –
उतर दिशा में मंत्र जप के पश्‍चात् उसी क्रम में  ईशान दिशा की ओर मुंह कर हाथ में जल लेकर संकल्प करें-
ॐ योमे पूर्वंगत इहगत पाप्मा पापकेनेह कर्मणा ईशान पृथुरत्न ईश साक्षी भूतं निखिलेश्‍वरानंदम् मम समस्त दोष पाप भंजयतु भंजयतु मोहयतु नाशयतु मारयतु कलिं तस्मै प्रयच्छतु कृतं मम (अपना नाम उच्चारण करें) गुरु शान्ति: स्वस्त्ययनंचास्तु।
इसके बाद ईशान कोण की ओर मुख किये हुए ही रुद्राक्ष माला से निम्न गुरु मंत्र की एक माला मंत्र जप करें-
ईशान दिशा कृत गुरु मंत्र
ॐ ह्रीं निखिलेश्‍वराय ह्रीं नम:॥

 

उर्ध्व दिशा –
ईशान कोण में गुरु मंत्र जप के पश्‍चात् पूर्व दिशा की ओर मुंह कर आकाश से गुरु कृपा प्राप्ति हेतु ऊपर उर्ध्व (आकाश) दिशा की ओर मुंह कर हाथ में जल लेकर संकल्प करें –
ॐ योमे मपूर्वंगत इह गत पाप्मा पापकेनेह। कर्मणा ब्रह्मा सृष्टिराज साक्षी भूतं निखिलेश्‍वरानंदम मम समस्त दोष पाप भंजयतु भंजयतु मोहयतु नाशयतु मारयतु कलिं तस्मै प्रयच्छतु, कृतं मम (अपना नाम उच्चारण करें) गुरु शान्ति स्वस्त्ययनंचास्तु।
उर्ध्व (आकाश) दिशा में गुरु पूजन हेतु साधक ऊपर आकाश की ओर मुंह किये किये हुए ही रुद्राक्ष माला से निम्न गुरु मंत्र की एक माला से मंत्र जप करें, मंत्र जप के पश्‍चात् माला गले में धारण कर लें।
उर्ध्व (आकाश) दिशा कृत गुरु मंत्र
॥ ॐ ‘‘निं’’ निखिलेश्‍वर्यै ‘‘निं’’ नम:॥

 

पाताल दिशा –
उर्ध्व दिशा में गुरु पूजन के पश्‍चात् भूमि की ओर अर्थात् सिर झुका कर हाथ में जल लेकर संकल्प करें-
ॐ योमे पूर्वंगत इह गत पाप्मा पापकेनेह कर्मणा अध: नागराजो सह अनन्त साक्षी भूतं निखिलेश्‍वरानंदम् मम समस्त दोष पाप भंजयतु भंजयतु, मोहयतु नाशयतु मारयतु कलिं तस्मै प्रयच्छतु, कृतं मम (अपना नाम उच्चारण करें) गुरु शान्ति स्वस्त्ययनंचास्तु।
इसके बाद साधक भूमि की ओर मुंह किये किये ही अपने गले में पहनी रुद्राक्ष माला से निम्न गुरु मंत्र जप करें-
अध: (भूमि) दिशाकृत गुरु मंत्र
ॐ निखिलं निखिलेश्‍वर्यै निखिलं नम:।
इस प्रकार दसों दिशााओं में गुरुदेव निखिल का पूजन करने के पश्‍चात् साधक पुनः रुद्राक्ष माला को हाथ में लेकर एक माला गुरु मंत्र का जप करें –

 

ॐ परमत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नम:
दसों दिशाओं में गुरुदेव का पूजन सम्पन्न कर, गुरु आरती सम्पन्न करें तथा गुरुदेव को अर्पित नैवेद्य स्वयं ग्रहण कर, परिवार के सदस्यों में भी बांट दें।
इस प्रकार यह दुर्लभ और अद्वितीय पूजन-साधना सम्पन्न हो जाती है और इसके बाद साधक पूर्णत: पवित्र, दिव्य, तेजस्वी, प्राणश्‍चेतना युक्त एवं सिद्धाश्रम का अधिकारी होता हुआ, गुरु का अत्यन्त प्रिय शिष्य हो जाता है, और साथ ही साथ उसके पिछले जीवन और इस जीवन के सभी प्रकार के पाप दोष समाप्त हो जाते हैं।
यह दुर्लभ साधना अपने आप में अद्वितीय है और सभी साधकों को इस का अवश्य ही लाभ उठाना चाहिए।

 

साधना सामग्री – ₹480/-
Siddhashram Siddhi Diwas (29 June 2016) Special

SadGuru Nikhil Invocation Worship

Nikhileshwaranand Ten Direction Energization Grand Worship

Siddhashram Yog Nikhil Jagran

 

Despite repeated attempts, a Sadhak in unable to achieve success in Sadhanas, the sole reason for this is the defect-faults and inadequacies of the Sadhak. The only method to mitigate these defects is through Guru grace-blessings, and Guru devotion. The Guru devotion incorporates purity in thoughts-words and actions, which is a mandatory requirement to achieve perfection in Sadhana practices.


SadGuru eliminates the defects of the disciple through his grace-vision and Diwyapaat. Guru is the only power in this entire universe, Who can improve disciple’s life and make it meaningful. The disciple has to prove his eligibility to receive the Diwyapaat from the Guru.

It is neither fair nor reasonable to consider the disciple as a proper disciple unless he proves his eligibility. The “Sharada Tilak” clearly elucidates –

ShishyaH KooleenaH Sudhaatma Purushaarth ParaayanaH |

AdhitvedaH Kushlo Door Mukt ManobhavaH |

Hiteshi Praaninaan Nitya Mastikstyakt NaastikaH |

Swadharma Nirato Bhaktyaa Pitrmaatr HitodhataH |

VaagmanaH KaayavasurbhigurushukshruvaneH RataH |

Tyaktaabhimano Gurushu Jaati Vidhya DhanaadhibhiH |

Gurvaagyaa Paalanaarth Hi Praan Vyaye RatodhataH |

Vihatya Cha Swakaaryaani GuruH Kaarya RataH Sadaa |

Daasvannivasedhatastu Guro Bhaktyaa SadaashishuH |

Kurvannagyaan Diwaaraatro Guru Bhakti ParayanaH |

Aagyakaari GuroH Shishyo Manovaakykaaya KarmabhiH |

Yo Bhawetsa Tadaa Graahyo NetaraH Shubhkaankshyaan |

Mantra Pooja Rahasyaani Yo Gopayati Sarvadaa |

Trikaalam Yo Namaskuryaadaagamaachaartatvvit ||

Sa Ev Shishya Kartvayo NetaraH Swalap JeewanaH |

EtaadrishgunopetaH Shishyon Bhawati NaaparaH ||

 

A disciple should have following quality attributes –

One who is of noble descendant, is virtuous, is industrious, has faith in the Vedas, is astute and is devoid of passion-desires.

One who as a God-believer thinks about welfare of all beings, who does not favour the atheist, is ethical and moral, is devoted to his parents, and serves his Guru with body-mind-wealth, is devoid of ego about his birth-race-position-wealth, and does not hesitate to sacrifice his life for Guru.

Who lives with Guru like a slave and is engaged in Guru’s work ignoring his own personal tasks, is devotedly unflinchingly absorbed in Gurudev’s devotion, and is ever-ready to obey the Guru through his mind, speech and energy.

Such an individual is qualified to be termed as a disciple.

Who retains secrecy about Mantras and mysteries, understands the scripture based conduct, is intelligent and wise, only such a person is entitled to be called as a disciple, and only such a person should be made as a disciple.

Moreover, the scriptures also clarify how the disciple should conduct himself to the Guru –

Pranamyopavishetpaarshve Tatha Gacchedanugyayaa |

Mukhaavalokaa Sevet Kuryaadaadishta Maadaraata |

Asatyam Na Vadedagre Na Bahu Pralapedapi |

Kaamam Krodham Tatha Lobham Maanam Prahasanam Stutitam |

Chaapalaani Cha Jinhvaani Karyaani Paridevanam |

Krindaanan Tatha Daanan Vastuna Kriya Vikrayam |

Na Kuryaad Gurunam Saaddhran Shishyo BhushnuH Kadaachana |

 

One who sits near the Guru after greeting immediately upon arrival, takes consent when needs to leave, waits patiently for His command, follows His orders with respect, does not tell any lies, and does not speak more than necessary. Does not engage in lust, anger, greed, infatuation, pride, laughter, flattery, and does not connive, cry or shout. Does not solicit any loan from Guru and does not engage in any commercial trade.

The Sadhak does not achieve success in Sadhana practices despite repeated attempts, one of the reason out of multiple reasons is that the Sadhak-disciple engages in such practices through mind, words or actions, which are ethically and morally inappropriate. Such actions do affect the life, whether we like it or not. Such defects can only be mitigated only and only through Guru’s grace and devotion to Guru. The devotion to Guru can ensure purity in mind, words and actions, which is an essential element to obtain perfection in Sadhanas. A glorious life can only be attained through pure mind and pure actions.

 

When to perform Sadhana –

The extenuation of flaws is possible only and only through the grace of Guru, and Guru maintains a constant blessed vigil on the disciple. The disciple-Sadhak can perform this special Sadhana at any auspicious moment or any Thursday. The approaching Siddhashram Siddhi Diwas (29 June 2016) is one such unique day when a Sadhak can obtain grace of Guru through his Sadhana and devotion. The disciples-Sadhaks should definitely accomplish Nikhileshwaranand Das Disha Mahapoojan on this special day to obtain Guru’s grace.

 

Praana Pratisthit (Enlivened Consecrated) Materials for Poojan-worship –

The “Nikhileshwaranand Yantra sanctified with Rudra Mantras” and “Guru Tatwaabhishek Rudraaksh Mala (Rosary)” are essential for this Sadhana.

 

Other Materials-

Guru Picture, dhoop, deep (lamp), incense sticks, flowers, garland, Neivedhya offerings, Kumkum (vermilion), Akshat (unbroken rice) etc.

 

Sadhana Process

There is no specific binding time to perform this Sadhana. Thus the Sadhak can accomplish this Sadhana either during day or night, as per convenience. After bathing and adorning yellow dhoti, the Sadhak should sit facing East direction, set-up a highly attractive and beautiful pujya Gurudev’s photo in front of him and pray to Him with full devotion. Offer Neivedhya, light fragrant incense and ghee lamp.

First the Sadhak should perform Aachman by taking water in right hand three times and drink it, and then bow to Gurudev with folded hands. After Aachman, taking water, vermilion and flowers in right hand, chant following Sankalp Mantra –

 

Om Vishnu Rvishnu Rvishnu Desh Kaalou Sankitarya Amook Gotrasya Amook Sharmaaham Mamopari Iha Janma Gat Janam Swakrit Parkrit-Kaarit Kriyamaan Kaar-Yishyamaan-Bhoot-Pret Pishaachaadi Mantra-Tantra-Yantra Krotkaadijanyasakaldosh Badhaa Nivrati Poorvak Poorna Siddhi Dirghaayuaarogayeishwaryaadi-praaptyartham Shaman Sadhana Prayog Karishaye |

 

After chanting the above Sankalp mantra, drop the water on ground, and chant 1 mala rosary-round of Guru Mantra using Rudraksha rosary –

 

Om Paramtatvaaye Naarayanaaye Gurubhayo NamaH

 

After mantra chanting, wear the rosary around your neck. We accomplish the Gurudev Sankalp, and Mantra-chanting in all ten directions in this Sadhana. The ten directions – Poorva (East), Agni (South-East), Dakshin (South), Neikatriya (South-West), Paschim (West), Vaayavaya (North-West), Uttar (North), Ishaan (North-East), Udharva (Top) and Paataal (Bottom). The Worship Mantra chanting is performed in all these directions turn by turn.

The Rudraksh rosary should be worn in the neck after completing the Mantra chanting in each direction.

 

East direction –

Make a resolution by taking water in hand, continuing to sit facing East direction –

 

Om Me Poorvmavat Iha GataH Paapmaa Paapkeniha Karmanaa Indra Saakshi Bhootam Nikhileshwaranandam Mam Samast Dosh Paap Bhanjayatu Bhanjayatu Mohayatu Naashayatu Bhaarayat Kalim Tasme Prayachchatu Kritam Mam (utter your name) Gurum ShaantiH Swastyayananchaastu |

 

Drop the water on the ground, and taking out the Rudraksh rosary from the neck, chant 1 mala rosary-round of below mentioned Poorva Dishaakrit Guru Mantra –

Poorva Dishaakrit Guru Mantra-

|| Om Shreem Nikhilshwaraaye Shreem Om ||

 

South-East Direction –

The Sadhak should sit on his Asana-seat facing South-East direction and make resolution by taking water in hand –

 

Om Yome Poorvamgat Iha Gat Paapma Paapkeneha Karmanaa Agni Saakshi Bhootam Nikhileshwaranandam Mam Samast Dosh Paap Bhanjayatu Mohayatu Naashayatu Maarayatu Kalim Tasme Prayachchatu Kritam Mam (utter your name) Gurum ShaantiH Swastyayananchaastu |

 

After pledging in South direction, chant 1 mala rosary-round of the following Agni Disha Krit Guru Mantra, and after completion of Mantra chanting, wear back the rosary in your neck –

Agni Dishaa Krit Guru Mantra –

||Om Ayeim Ayeim Nikhileshwaraaye Ayeim Ayeim NamaH ||

 

South Direction –

Sit facing the South direction and resolve by taking water in hand –

 

Om Yome Poorvamgat Iha Gat Paapma Paapkeneha Karmanaa Dakshin Yamdev Saakshi Bhootam Nikhileshwaranandam Mam Samast Dosh Paap Bhanjayatu Bhanjayatu Mohayatu Naashayatu Bhaarayatu Kalim Tasme Prayachchatu Kritam Mam (utter your name) Gurum ShaantiH Swastyayananchaastu |

 

After making the pledge in South direction, drop the water on ground, and taking out the Rudraksh rosary from the neck, chant 1 mala rosary round of the following Dakshin Disha Krit Guru Mantra, and after completion of the mantra chanting, wear the rosary again in your neck –

Dakshin Dishaa Krit Guru Mantra –

|| Om Hleem Paramtatvaaye Nikhileshwaraaye Hleem Namah ||

 

South-West Direction –

After this, make a resolution facing South-West direction –

 

Om Yome Poorvamgat Iha Gat Paapma Paapkeneha Karmanaa Neiketriya Raksharaaj Saakshi Bhootam Nikhileshwaranandam Mam Samast Dosh Paap Bhanjayatu Bhanjayatu Mohayatu Naashayatu Maarayatu Kalim Tasme Prayachchatu Kritam Mam (utter your name) Gurum ShaantiH Swastyayananchaastu |

 

After making the pledge in South-West direction, chant 1 mala rosary round of following Neikatriya Disha Mantra, and after completion of the mantra chanting, wear the rosary again in your neck –

Neikatriya Dishaa Krit Guru Mantra –

|| Om Kleem Kleem Nikhileshwaraaye Kleem Kleem Namah ||

 

West Direction –

After South-West direction, sit facing West direction and make resolution taking water in hand –

 

Om Yome Poorvamvagat Iha Gat Paapma Paapkeneha Karmanaa Pashchim Soma Varuna Vipraraaj Saakshi Bhootam Nikhileshwaranandam Mam Samast Dosh Paap Bhanjayatu Bhanjayatu Mohayatu Naashayatu Maarayatu Kalim Tasme Prayachchatu Kritam Mam (utter your name) Gurum ShaantiH Swastyayananchaastu |

 

Still facing the West direction, chant 1 mala rosary-round of following Guru Mantra with Rudraksh rosary –

Pashchami Dishaa Krit Guru Mantra –

|| Om Kreem Nikhileshwaraaye Kreem Om ||

 

North-West Direction –

After this, sit facing North-West direction and make resolution –

 

Om Yome Poorvamvagat Iha Gat Paapma Paapkeneha Karmanaa Vaayavaya Vaayu Yaksharaaj Saakshi Bhootam Nikhileshwaranandam Mam Samast Dosh Paap Bhanjayatu Bhanjayatu Mohayatu Naashayatu Maarayatu Kalim Tasme Prayachchatu Kritam Mam (utter your name) Guru ShaantiH Swastyayananchaastu |

 

After making the resolution, chant following Guru Mantra with Rudraksh rosary and wear the rosary in your neck after completion of Mantra chanting –

Vaayavaya Dishaa Krit Guru Mantra –

|| Om Ayeim Hreem Shreem Nikhileshwaraaye Shreem Hreem Ayeim Om ||

 

North Direction –

After this, the Sadhak will sit facing North direction and make resolution taking water in hand-

 

Om Yome Poorvamvagat Iha Gat Paapma Paapkeneha Karmanaa Uttar Disha Kuber Saakshi Bhootam Nikhileshwaranandam Mam Samast Dosh Paap Bhanjayatu Bhanjayatu Mohayatu Naashayatu Maarayatu Kalim Tasme Prayachchatu Kritam Mam (utter your name) Guru ShaantiH Swastyayananchaastu |

 

After making the resolution, chant 1 mala rosary of following Guru Mantra with Rudraksh rosary –

Uttar Dishaa Krit Guru Mantra –

|| Om Shreem Shreem Shreem Nikhileshwaraaye Shreem Shreem Shreem NamaH ||

 

North-East Direction –

After completing Mantra-chanting in North direction, sit facing North-East direction and make resolution taking water in hand-

 

Om Yome Poorvamvagat Iha Gat Paapma Paapkeneha Karmanaa Ishaan Prithuratna Iisha Saakshi Bhootam Nikhileshwaranandam Mam Samast Dosh Paap Bhanjayatu Bhanjayatu Mohayatu Naashayatu Maarayatu Kalim Tasme Prayachchatu Kritam Mam (utter your name) Guru ShaantiH Swastyayananchaastu |

 

After this, still facing North-East direction, chant 1 mala rosary of following Guru Mantra with Rudraksh rosary –

Ishaan Dishaa Krit Guru Mantra –

|| Om Hreem Nikhileshwaraaye Hreem NamaH ||

 

Top direction –

After completing Guru Mantra-chanting in North-East direction, sit facing East direction, and looking at the sky, to obtain blessings from Guru, make a resolution taking water in hand, facing the sky –

 

Om Yome Mapoorvamvagat Iha Gat Paapma Paapkeneha Karmanaa Brahmaa Srishtiraaj Saakshi Bhootam Nikhileshwaranandam Mam Samast Dosh Paap Bhanjayatu Bhanjayatu Mohayatu Naashayatu Maarayatu Kalim Tasme Prayachchatu Kritam Mam (utter your name) Guru ShaantiH Swastyayananchaastu |

 

To perform Guru worship in Top (Sky) direction, the Sadhak should chant 1 mala rosary-round of following Guru Mantra with Rudraksha rosary facing the sky direction, after mantra-chanting wear the rosary in your neck –

Top (Sky) Dishaa Krit Guru Mantra –

|| Om “Neem” Nikhileshwaryei “Neem” NamaH ||

 

Bottom direction –

After completing Guru worship in Top direction, looking at the ground i.e. with bowed head make a resolution taking water in hand-

 

Om Yome Poorvamvagat Iha Gat Paapma Paapkeneha Karmanaa AdhaH Naagraajo Saha Anant Saakshi Bhootam Nikhileshwaranandam Mam Samast Dosh Paap Bhanjayatu Bhanjayatu Mohayatu Naashayatu Maarayatu Kalim Tasme Prayachchatu Kritam Mam (utter your name) Guru ShaantiH Swastyayananchaastu |

 

After this, the Sadhak will chant following Guru Mantra with the Rudraksha rosary worn in neck, with a bowed head –

Bottom (Ground) Dishaa Krit Guru Mantra –

|| Om Nikhilam Nikhileshwaryei Nikhilam NamaH ||

 

Thus after performing Gurudev Nikhil worship in ten directions, the Sadhak will again take Rudraksha rosary in his hand and chant 1 mala rosary-round of Guru Mantra –

Om Param Tatvaaye Narayanaaye Gurubhayo NamaH

 

After accomplishing Gurudev worship in ten directions, perform Guru Aarti and after partaking the Neivedhya offered to Gurudev, also distribute it among the family members.

Thus this rare and remarkable poojan-sadhana is accomplished and after this, the Sadhak becoming perfectly pure, divine, stunning, praana-awakened, Siddhashram-eligible, turns into a dear disciple of Guru, and moreover all the faults and sins of this and past lives get eliminated.

This rare Sadhana practice is unique in itself and all Sadhaks should obtain benefits from this.

Sadhana Materials – 480/-

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