धन्वंतरि साधना – Dhanvantri Sadhana

रोगों से रक्षा
निरोगी काया और दीर्घ पुष्ट जीवन
धन्वंतरि साधना

 

धनवन्तरी का प्रादुर्भाव समुद्र मंथन से त्रयोदशी के दिन हुआ था और उसके हाथ में अमृत कलश था, भगवान धनवन्तरी द्वारा सभी प्राणियों को आरोग्य सूत्र प्रदान किये गये, इसीलिये धन त्रयोदशी के दिन धनवन्तरी पूजा का विशेष विधान है। इससे परिवार के सभी रोग शोक का जड़ से नाश होता है और पुष्ट शरीर की प्राप्ति होती है।

 


भगवान धन्वंतरि आयुर्वेद के आदि प्रवर्तक व स्वास्थ्य के अधिष्ठाता देवता होने से विश्‍व वैद्य हैं। सनातन धर्म के अनुसार भगवान विष्णु ने जगत त्राण हेतु 24 अवतार धारण किए हैं जिनमें भगवान धन्वंतरि 12 वें अंशावतार हैं अर्थात धन्वंतरि साक्षात् विष्णु अर्थात श्री हरि के रूप हैं।

 

आयुर्वेद जगत के प्रणेता भगवान धन्वंतरि आरोग्य, सेहत, आयु और तेज के आराध्य देव हैं। सर्वभय व सर्वरोग नाशक देव चिकित्सक आरोग्य देव धन्वंतरि प्राचीन भारत के एक महान चिकित्सक थे, जिन्हें देव पद प्राप्त हुआ था। भगवान विष्णु के अवतार धन्वंतरि का पृथ्वी लोक में अवतरण समुद्र मंथन के समय हुआ था। शरद पूर्णिमा को चंद्रमा, कार्तिक द्वादशी को कामधेनु गाय, त्रयोदशी को धन्वंतरी, चतुर्दशी को कल्पवृक्ष और अमावस्या को भगवती लक्ष्मी जी का समुद्र मंथन से प्रादुर्भाव हुआ था। 

 

दीपावली के दो दिन पूर्व कार्तिक त्रयोदशी अर्थात् धन त्रयोदशी को आदि प्रणेता, जीवों के जीवन की रक्षा , स्वास्थ्य, स्वस्थ जीवन शैली के प्रदाता के रूप में प्रतिष्ठित ऋषि धन्वंतरि और आरोग्य, सेहत, आयु और तेज के आराध्य देवता भगवान धन्वंतरि का अवतरण दिवस मनाया जाता है।

 

धन्वंतरि से प्रार्थना की जाती है कि वे समस्त जगत को निरोग कर मानव समाज को दीर्घायुष्य प्रदान करें। पुरातन धर्मग्रन्थों के अनुसार देवताओं के वैद्य धन्वंतरि की चार भुजायें हैं। ऊपर की दोंनों भुजाओं में शंख और चक्र धारण किये हुये हैं। जबकि दो अन्य भुजाओं में से एक में औषध तथा दूसरे में अमृत कलश धारण किये हुए हैं।

 

पुराणों के अनुसार अमृत-प्राप्ति हेतु देवताओं और असुरों ने जब समुद्र मंथन किया तब उसमें से  अत्यन्त दिव्य कान्ति युक्त, आभूषणों से सुसज्जित, सर्वांग सुन्दर, तेजस्वी, हाथ में अमृत कलश लिये हुए एक अलौकिक पुरुष प्रकट हुए। वे ही आयुर्वेद के प्रवर्त्तक भगवान धन्वंतरि के नाम से विख्यात हुए। इनका आविर्भाव कार्तिक कृष्णा त्रयोदशी को हुआ और इसीलिये इनकी जयन्ती आरोग्य देवता के रूप में प्रति वर्ष कार्तिक पक्ष त्रयोदशी जिसे धन त्रयोदशी कहा जाता है, संपन्न की जाती है।

 

भगवान धन्वंतरि ने ही देव और मनुष्यों के जीवन के लिये और स्वास्थ्य के लिये आयुर्वेद शास्त्र का उपदेश ॠषि विश्‍वामित्र के पुत्र सुश्रुत को दिया। रोग के सम्पूर्ण नाश के लिये भगवान धन्वंतरि द्वारा रचित धन्वंतरि संहिता आयुर्वेद का आधार ग्रंथ है।

 

भगवान धन्वंतरि विष्णु के अंश हैं और उनका नाम मात्र लेने से रोगों का नाश हो जाता है। 

 

आयुर्वेद शास्त्र में धन्वंतरि ॠषि द्वारा दिये हुए ज्ञान से ही भारद्वाज, अश्‍विनी कुमार, सुश्रुत, चरक आदि ॠषियों ने इस धारा को आगे बढ़ाया तथा मनुष्य के जीवन को स्वस्थ एवं निरोग, आनन्द युक्त रखने के लिये विभिन्न शास्त्रों की रचना की।

 

संसार के सारे चिकित्सा-शास्त्र आयुर्वेद से निकले हैं और जो व्यक्ति आयुर्वेद को अपना लेता है, वह मानसिक एवं शारीरिक रूप से पूर्ण रूप से स्वस्थ रहता है।

 

वर्तमान युग में जीवन का सबसे बड़ा दुःख रोग ही है। जीवन में हम कई कारणों से व्यथित रहते हैं, और धीरे-धीरे यह व्यथा रोग का रूप ले लेती है। यह व्यथा समाजिक हो या अन्य प्रकार की, हमारे दैनिक जीवन में इसका प्रभाव हमारे शरीर पर भी पड़ता है। आज के प्रदूषित वातावरण में पूर्ण स्वस्थ रहना तो एक आश्‍चर्यजनक घटना है।

 

अन्यान्य चिकित्सा विधियों में विभिन्न प्रकार के रोगों का कोई स्थायी इलाज नहीं है, वरन् ये रोग दवाओं के माध्यम से दबा दिये जाते हैं या फिर रोग को उत्पन्न करने वाले कीटाणुओं को दवाओं के माध्यम से निष्क्रिय कर देते हैं, लेकिन पुनः कुछ समय बाद दूषित वातावरण पाकर वह रोग पुनः उभर आता है या फिर दवाओं के नियमित प्रयोग से अनेक व्याधियां उत्पन्न हो जाती हैं, जिससे एक प्रकार से रोगों की श्रृंखला ही निर्मित हो जाती है। एक रोग समाप्त होता है, तो दूसरे रोग के लक्षण दिखने लग जाते हैं। वर्तमान चिकित्सा कुछ इस प्रकार की ही है।

 

लेकिन हम पूर्वकाल की ओर लौटें, तो पायेंगे, कि उस समय लोग वर्तमान समय से ज्यादा स्वस्थ थे, लेकिन वर्तमान युग में 40 या 45 वर्ष की आयु पूरा करते ही व्यक्ति में धीरे-धीरे जीवन की प्रत्याशा क्षीण हो जाती है। 55 या 60 वर्ष की आयु तक, तो वह स्वयं वृद्ध तथा जर्जर अवस्था में पहुंच जाता है, उसके अन्दर का जोश, उमंग, उल्लास समाप्त हो जाता है, वह सिर्फ देह की समाप्ति की प्रतीक्षा करने लगता है। मानसिक रूप से वह स्वयं को अशक्त तथा असहाय अनुभव करने लगता है।

 

आज मानव इस प्रकार का जीवन जी रहा है, कि उसे ज्ञात नहीं होता है, कब उस पर यौवनकाल आता है, कब उसकी शैशवावस्था समाप्त हो जाती है, कब वह प्रौढ़ बन जाता है। यदि सर्वेक्षण किया जाए तो मानव के अन्दर का उल्लास, जोश मात्र 25 या 30 वर्ष की अवस्था तक ही रहता है।

 

…लेकिन हम यदि अपने पूर्वजों को देखें, तो वे 100 वर्ष की आयु पूर्ण करके भी थके नहीं, जीवन से निरुत्साहित नहीं हुए।

 

आखिर क्या कारण है, कि हमारे पूर्वज दीर्घायु होते थे, उनकी कार्य-क्षमता आज के व्यक्ति से कहीं अधिक थी, क्योंकि उनके पास ऐसी चिकित्सा पद्धति थी, जिसका वे प्रयोग कर अपनी बीमारियां ठीक कर लेते थे। ऐसा तो है नहीं, कि वे रोग-ग्रस्त नहीं होते थे, रोग तो पहले भी थे।

 

आज भी आदिवासी क्षेत्रों में, जहां आधुनिक सुविधायें नहीं पहुंच सकी हैं, वहां पर रोगों का इलाज मंत्रों, जड़ी-बूटियों के माध्यम से तथा उनके अपने प्रयोगों के माध्यम से होता है तथा वे प्रयोग पूर्ण रूप से प्रभावी भी होते हैं।

 

…लेकिन चिकित्सा विज्ञान इसको स्वीकार कर पाने में असमर्थ है। वह मंत्र शक्ति के उपयोग को भली प्रकार से नहीं जान पाया है। मंत्र तथा साधना के बल से हम अपने आपको आज भी पूर्ण रूप से युवा बना सकते हैं।

 

अभी भी कुछ ऐसी साधनाएं हैं, जिनको सम्पन्न कर आज भी संन्यासी जन शून्य कन्दराओं में रहने के बाद भी स्वस्थ रहते हैं। उनके पास उपलब्ध अनेकों साधनाओं में से एक अद्वितीय रोग मुक्ति हेतु साधना है ‘धन्वंतरि सिद्धि प्रयोग’, जिसे सम्पन्न कर व्यक्ति समस्त प्रकार के रोगों से दूर रह सकता है। यह प्रयोग हमारे ॠषियों की ओर से हमें वरदान स्वरूप प्राप्त हुआ है। यह प्रयोग एक अत्यन्त उच्चकोटि के योगी के द्वारा प्राप्त हुआ है। उन्होंने बताया, कि यह प्रयोग अत्यन्त विलक्षण प्रयोग है। धन्वंतरि अपने काल के सर्वश्रेष्ठ चिकित्सक व आयुर्वेदज्ञ रहे हैं। धन्वंतरि ने अपने काल में भयानक से भयानक रोगों को समाप्त किया है। उन्होंने यह भी बताया है, कि अनेक ॠषियों, संन्यासियों ने इस साधना को सम्पन्न कर अपने आपको निरोगी रखा।

 

इस साधना को सम्पन्न करने वाला व्यक्ति सदैव ही प्रसन्न और जोशीला तथा उत्साहित रहता है, उसकी कार्य-क्षमता बढ़ जाती है तथा रोग उसके पास नहीं फटकते हैं।

 

साधना विधान 

 

इस साधना में आवश्यक सामग्री धन्वंतरि यंत्र, अश्मिना तथा धन्वंतरि माला है।

 

यह साधना धन त्रयोदशी, 28 अक्टूबर 2016 को प्रातः काल सूर्योदय के पश्‍चात् अथवा किसी भी माह की शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को सम्पन्न की जा सकती है।

 

साधक यदि साधना सम्पन्न करने के लिये एक बार आसन पर बैठे, तो फिर मंत्र जप पूर्ण करके ही आसन से उठें। यदि बीच में उठें, तो पुनः हाथ-पैर-मुंह धोकर ही आसन पर बैठें। साधना करते समय मन एकाग्रचित्त ही रखें। साधक यथासम्भव कम बोलें।
साधक जिस स्थान पर साधना करें, उस स्थान को साफ, स्वच्छ करें तथा स्वयं भी स्नान कर पीले वस्त्र धारण करें। साधक स्वयं के लिये भी पीले रंग का ऊनी आसन लें।

 

रोग से मुक्ति से पहले रोग से रक्षा आवश्यक है। हमारे यहां खान-पान वातावरण प्रदूषण का प्रभाव इतना अधिक है कि रोग लग ही जाते हैं लेकिन यदि शरीर पुष्ट प्रबल और मजबूत है, उसकी रोग-निरोधक क्षमता तीव्र है तो रोग लग ही नहीं सकता है।

 

रोग रक्षा के लिये धन्वंतरि साधना, महामृत्युन्जय साधना का ही स्वरूप है। इस साधना को स्वयं कर सकते हैं और किसी और के लिये भी यह साधना कर सकते हैं यदि आप अपने परिवार के सदस्य को रोग मुक्त करना चाहते हैं तो उसके नाम का संकल्प लेकर साधना सम्पन्न कर सकते हैं।

 

पीले रंग का वस्त्र बिछाकर उस पर गुरु चित्र/विग्रह/यंत्र अथवा पादुका स्थापित करें। आरोग्य प्राप्ति हेतु धन्वंतरि साधना की सिद्धि हेतु दोनों हाथ जोड़कर गुरुदेव निखिल का ध्यान करें –

 

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्‍वरः।
गुरुः साक्षात् पर ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

 

निखिल ध्यान के पश्‍चात् गुरु चित्र/विग्रह/यंत्र/पादुका को जल से स्नान करावें –

 

ॐ निखिलम् स्नानम् समर्पयामि॥

 

इसके पश्‍चात् स्वच्छ वस्त्र से पौंछ लें निम्न मंत्रों का उच्चारण करते हुए कुंकुम, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, धूप-दीप से पंचोपचार पूजन करें –

 

ॐ निखिलम् कुंकुम समर्पयामि।
ॐ निखिलम् अक्षतान समर्पयामि।
ॐ निखिलम्  पुष्पम् समर्पयामि।
ॐ निखिलम् नैवेद्यम् निवेदयामि।
ॐ निखिलम् धूपम् आघ्रापयामि, दीपम् दर्शयामि।              (धूप, दीप दिखाएं)

 

पंचोपचार पूजन के पश्‍चात् तीन आचमनी जल गुरु चित्र/विग्रह/यंत्र/पादुका पर घुमाकर छोड़ दें। इसके पश्‍चात् गुरु माला से गुरु मंत्र की एक माला मंत्र जप करें –

 

ॐ परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः
गुरु पूजन के पश्‍चात् संकल्प करें –

 

संकल्प 

 

दाहिने हाथ में जल लें –

 

ॐ विष्णु र्विष्णु र्विष्णुः श्रीमद् भगवते महापुरुषस्य विष्णो राज्ञया प्रवर्त मानस्य, श्री श्‍वेत वाराह कल्पे, कलियुगे कलिप्रथम चरणे, जम्बूद्वीपे भरत खण्डे भारत वर्षे देशान्तर्गते (क्षेत्र का नाम बोलें) क्षेत्रे (महीने का नाम बोलें) मासे (पक्ष का नाम बोलें) पक्षे (तिथी बोलें) तिथौ (दिन का नाम बोलें) वासरे, श्रुति स्मृति पुराणेक्त फल प्राप्ति निमित्तं अमुक (अपना गोत्र बोलें) गोत्रोत्पन्नोऽहं अमुक शर्माऽहं (अपना नाम बोलें) मम् सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य दीर्घायु आरोग्य प्राप्ती सकल रोग शोक दुःख दारिद्र्य कष्ट पीड़ा नाशय-नाशय सुख सौभाग्य निमित्तं धन्वंतरि साधना अहं करिष्ये॥

 

संकल्प के पश्‍चात् जल भूमि पर छोड़ दें।

 

विनियोगः

 

दाहिने हाथ में जल, अक्षत, पुष्प लें, निम्न संदर्भ को पढ़ें-

 

ॐ अस्य श्री धन्वंतरि मंत्रस्य रूद्र ॠषि, गायत्री छन्दः, शिवो देवता रं बीजम् महाशक्ति, आरोग्य प्रीत्यर्थे मंत्र जपे विनियोगः।

 

विनियोग हेतु हाथ में लिए हुए जल को भूमि पर या किसी पात्र में छोड़ दें।

 

संकल्प-विनियोग के पश्‍चात् धन्वंतरि साधना हेतु गुरु चित्र के सम्मुख ही किसी प्लेट में ‘धन्वंतरि यंत्र’ को स्थापित करें, यंत्र का पूजन पंचोपचार विधि से करें।

 

यंत्र की बांयी ओर कुंकुम से रंग कर चावल की ढेरी बनाकर, उस पर ‘अश्मिना’ स्थापित करें। ‘अश्मिना’ का पूजन कर, घी का दीपक जलावें।

 

धन्वंतरि का ध्यान करते हुए यंत्र पर पुष्प अर्पित करें –

 

सत्यं च येन निरतं रोगं विधूतं,
अन्वेषितं च सविधिं आरोग्यमस्य।
गूढं निगूढं औषध्यरूपम्,
धन्वन्तरीं च सततं प्रणमामि नित्यं॥
धन्वंतरि माला से निम्न मंत्र की नित्य 21 माला मंत्र जप करें –

 

मंत्र 

 

॥ ॐ रं रुद्र रोगनाशाय धन्वंतर्यै फट् ॥

 

साधना समाप्त करने के दिन ही मिट्टी के पात्र में यंत्र, अश्मिना तथा माला रख कर उसमें दो मुट्ठी चावल रखें और उसे जल में प्रवाहित कर दें।

 

साधना सामग्री – 375/-
Dhanvantari Jayanti

28 October 2016

Protection from diseases

Healthy physique and long active life

Dhanvantari Sadhana

Lord Dhanvantari appeared on Trayodashi during Divine ocean-churning and He held a nectar pot in His hand. Lord Dhanvantari granted healing rules to all creatures, therefore there is a special significance to perform Dhanvantari Poojan on Dhan Trayodashi. This destroys all diseases and provides a healthy and fit physique to all family members.


God Dhanvantari is the pioneer of Aayurvedic science. He is called doctor of the entire universe as He is the God of Health. According to Sanatan Dharma, Lord Vishnu has taken 24 incarnations to save the world. Lord Dhanvantari is the 12th incarnation, which means that Lord Dhanvantari is another form of God Vishnu.

God Dhanvantari, the founder of Ayurveda is God of Healing, Health, Longevity and Vigour. The destroyer of all fears and illnesses, Dhanvantari was a famous doctor in the ancient times, who later attained divinity. Lord Dhanvantari, an incarnation Avatar of Lord Vishnu appeared during divine ocean-churning. Lord Moon on Sharad Poornima, divine wish-fulfilling Kamdhenu cow on Kartik Dwadishi, Lord Dhanvantari on Trayodashi, Wish-fulfilling divine KalpVriksh on Chaturdashi and Goddess Lakshmiji on Amaavasya appeared during divine ocean-churning.

On Kartik Trayodashi, two days before Diwali, Dhan Trayodashi is celebrated as incarnation day of Sage Dhanvantari, blesser of life of creatures, provider of good health and God Dhanvantari, God of Healing, Health, Longevity and Vigour.

We pray to God Dhanvantari to bless the human race with longevity by healing all the sick. According to ancient scriptures, Lord Dhanvantari, doctor of the Gods has four hands. The top hands hold Counch and Chakra, while one of the lower hand holds a medicine and the second holds a pot of divine nectar.

According to the Puranas, during the ocean-churning by the Gods and Demons to attain divine nectar, a supernatural personality with extremely divine aura, decorated with beautiful jewels,  stunningly handsome appeared holding a pot of divine nectar. He later became famous as God Dhanvantari, the founder of Ayurveda. He appeared on Kartik Krishna Chaturdashi and therefore His Jayanti (birthday) is celebrated as God of Health, on Kartik Krishna Paksh Trayodashi, which is also known as Dhan Trayodashi.

God Dhanvantari granted the knowledge of Ayurveda science to Sukshrut, son of Sage Vishwamitra for long life and good health of Gods and humans. The treatise Dhanvantari Sanhita written by God Dhanvantari, for total elimination of illnesses  is the foundation book of Ayurveda science.

God Dhanvantari is a form of God Vishnu, and one gets rid of diseases just by uttering His name.

The original Ayurvedic science knowledge of Sage Dhanvantari was later expanded by other sages like Bhardwaj, Ashwani Kumar, Sukshrut, Charak etc., and many texts were composed to keep the human body healthy, disease-free and joyful.

All medical sciences in this world have been derived out of Ayurvedic-science, and anyone adapting Ayurveda stays completely healthy mentally and physically.

Illness is the biggest sadness in these current times. We are always distressed in our life due to various reasons, and gradually this agony take the form of a disease. This agony of society or others, definitely impact our body. In fact it is amazing to remain fully healthy in these polluted environments.

The modern medical sciences do not offer any permanent cure to a disease, rather it either treats the symptoms, or disables the microbes through medicines. However, the disease recurs again after some time, finding a favourable environment. Repeated use to medicines also cause various side effects, and thus, this results in a series of multiple diseases. The symptoms of a new disease comes up after treatment of previous disease. This is the result of the modern medicine.

If we look back, we will find that the people were much healthier than the current times. A person’s life expectancy starts fading gradually, as a person reaches the age of 40 or 45. The person reaches an older and worn-out state at 55 or 60. All of his energy, excitement and enthusiasm saps out, and he seems to be waiting for the end of the life. He start feeling disabled and helpless mentally.

In today’s kind of life, it is difficult to ascertain the dawn of youth, the ending of infancy, the start of adulthood. If we do a survey, we will find that the inner energy and passion stays only for 25-30 years.

… But if we look at our ancestors, we realize that they never felt tired of, never got worn-off, even at the age of 100.

After all, what is the reason of longevity of our ancestors, their better performance compared to today’s person. This is so because they they have had a medical practice to treat their diseases. It is not that they never fell ill, the diseases were present even then.

Even today in the tribal regions, where modern facilities have not reached, the diseases are treated through using mantras, herbs-shrubs; and these techniques are fully effective.

… But medical science is unable to accept it. It has not yet understood the utility of Mantra power. We can transform ourselves into youth through Mantras and Sadhanas, even today.

There are still some Sadhanas, through which the ascetics remain completely healthy living in solitary caves. One unique Sadhana to treat diseases, from their treasure-trove of Sadhanas, is “Dhanvantari Siddhi Prayog”, using which the person can stay completely healthy. This is a boon to us from our sages. We have received this Prayog from a high level Yogi. He explained that this is a very unique and potent Prayog. Dhanvantari has been the best doctor and Ayurvedic-expert in His times. He eliminated many horrible diseases during that time. He also stated that many sages and ascetics have accomplished this Sadhana to stay healthy.

The person who accomplishes this Sadhana practice, always stays cheerful, energetic and excited, his productivity enhances, and diseases do not dare touch him.

 

Sadhana Procedure

 

The required materials in this Sadhana are Dhanvantari Yantra, Ashmina and Dhanvantari Mala.

This Sadhana can be started from the morning, after sunrise of Dhan Trayodashi, 28 October 2016 or any Shukla Paksha Trayodashi of any month.

Once seated to perform Sadhana, the Sadhak should get up only after completing entire Mantra chanting. If he gets up in-between, then he should sit again only after washing his face-hands-legs. The mind should be completely focussed. The Sadhak should try to speak as less as possible.

The place where the Sadhak is to perform the Sadhana, should be pure and clean. The Sadhak should bathe and adorn yellow garments. The Sadhak should sit on a Yellow asana.

It is necessary to seek protection from the diseases, before eliminating these diseases. We get ill due to the food-air pollution which we live with-in. However, if the body is healthy, strong and sturdy, if the immunity is high, then there is no chance to get sick.

The Dhanvantari Sadhana for protection from diseases, is another form of Mahamrityunjaya Sadhana. You can do it for yourself, or you can do it for someone else. If you wish to perform this Sadhana for a family-member, then you may perform it by taking a pledge in his name.

First, spread a yellow cloth on a wooden board in front of you, and set-up Guru picture/statue/Guru Yantra/ Guru Paduka on it. Meditate on the divine form of Gurudev Nikhil with folded hands to obtain success in Dhanvantari Sadhana for protection from diseases –

GururBrahmaa GururVishnuH Gururdevo MaheshwaraH |

GuruH Saakshaat Par Brahmaa Tasmei Shree Guruve NamaH ||

 

Bathe the Guru Picture / Statue/ Yantra / Paduka with water after Nikhil meditation –

Om Nikhilam Snaanam Samarapayaami ||

 

Then wipe with a clean cloth. Perform Panchopchaar worship-poojan with Kumkum (Vermilion), Akshat (Unbroken rice), Pushpa (Flowers), Neivedh (Sweets/Fruit offering), Dhoop (Incense) – Deep (Lamp) chanting following mantras –

Om Nikhilam Kumkum Samarapayaami |

Om Nikhilam Akshtaan Samarapayaami ||

Om Nikhilam Pushpam Samarapayaami ||

Om Nikhilam Neivedhyam Nivedayaami ||

Om Nikhilam Dhoopam Aardhyaapayaami, Deepam Darshayaami ||

(Show Dhoop, Deep)

 

Now rotate three Achmaani (spoonfuls) water around the  Guru Picture / Statue/ Yantra / Paduka and drop it on ground. Then chant 1 rosary-round of Guru Mantra with Guru Mala –

Om Param Tatvaaya Naaraayanaaya Gurubhayo Namah

 

Take sankalp (pledge) after performing Guru-worship.

 

Sankalp

Take water in right hand-

Om Vishnu Rvishnu RvishnuH Shreemad Bhagawate Mahaapurushasya Vishno Raagyaa Pravarta Maanasya, Shree Shweta Vaaraaha Kalpe, Kaliyuge Kalipratham Charane, Jhambudweepe Bharata Khande Bhaarata Varshey Deshaantrgate (speak name of area) Kshetre (speak name of month) Maase (speak name of Paksha) Pakshe (speak number of Tithi) Tithou (speak name of Day) Vaasare, Shruti Smariti Puraanevakta Fala Praapti Nimitam Amuk (speak your Gotra) Gotrotpannooham  Amuk Sharmaaham (speak your name) Mam Sakutumbasya Saparivaarasya Dirghaayu Aarogya Praapti Sakala Roga Shouka Dukha Daaridraya Kashta Peedaa Naashaya-Naashaya Sukha Shoubhagya Nimitam Dhanvantari Sadhana Aham Karishaye ||

 

After resolution, drop water on earth.

 

ViniyogaH

Take water, Akshat and flowers in right hand, read below text-

Om Asya Shree Dhanvatari Mantrasya Rudra Rishi, Gaayatri ChandaH, Shivo Devataa Ram Beejam Mahaashakti, Aarogya Preetyarthe Mantra Jape ViniyogaH |

 

Drop the water taken in hand for ViniyogaH on ground or in any vessel.

 

After Sankalp-Viniyog, setup Dhanvantari Yantra in a plate in front of Guru-picture for Dhanvantari Sadhana, worship Yantra as per the rites.

Make a mound of rice colored with Kumkum, towards the left of the Yantra, setup Ashmina on it. After worshipping Ashmina, light ghee lamp.

 

Meditating on the divine form of Lord Dhanvantari, offer flowers on the Yantra-

Satyam Cha Yen Niratam Rogam Vidhutam,

Anveshitam Cha Savidhim Aarogyamasya |

Goodam Nigoodam Aushadhyaroopam,

Dhanvantarim Cha Satatam Pranamaami Nityam ||

 

Chant 21 mala rounds of below-mentioned Mantra with Dhanvantari Mala

 

Mantra

 

|| Om Ram Rudra Roganaashaay Dhanvantaryei Phat ||

 

On the day of Sadhana-completion, put Yantra, Ashmina and Mala in an earthen pot, place two fistfull of rice on them and immerse it in a running stream of water.

 

Sadhana Materials: Rs. 375/-

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