धनदा रतिप्रिया यक्षिणी (Danada Ratipriya Yakshini)

चन्द्र ग्रहण – 16 सितम्बर 2016
दारिद्रय नाशिनी यक्षिणी तंत्र

धनदा रतिप्रिया यक्षिणी
शिव पार्वती संवाद आगम तंत्र आधारित
धनेश्‍वरी आबद्ध विद्या

दारिद्र्य नाशिनी पाप खंडिनी यक्षिणी विद्या के अन्तर्गत धनदा रतिप्रिया यक्षिणी साधना साधक को सम्पन्न करनी चाहिए, यह देवी लक्ष्मी का सर्वोत्तम और एकमात्र स्वरूप है, जिसमें तांत्रोक्त विधान द्वारा सिद्धि प्राप्त की जा सकती है।

इस साधना में सबसे विशेष बात यह है कि लक्ष्मी के जितने स्वरूप होते हैं, उन सभी स्वरूपों का आह्वान तथा विशेष पूजा की जाती है, प्राण प्रतिष्ठा प्रक्रिया सम्पन्न की जाती है। साधना के पहले दसों दिशाओं का कीलन किया जाता है, जिससे किसी प्रकार की बाहरी बाधा से विघ्न न पड़े और जो संकल्प साधक करे, उसका फल तत्काल अवश्य ही प्राप्त हो।

इस महान तांत्रोक्त साधना में प्राण प्रतिष्ठा आवश्यक है। यह विषय गुह्यतम रहा है, क्योंकि प्राण प्रतिष्ठा से ही शक्तियां चैतन्य होती हैं।

रुद्रयामल तंत्र में स्पष्ट लिखा है कि पूर्ण विधान से यह तंत्र साधना सम्पन्न की जाय, तो कोई कारण नहीं कि देवी तत्काल आकर साधक के मनोरथों को पूर्ण न करें।

इस साधना में मूल विधान तो एक है, परन्तु आगे आर्थिक समस्या के सम्बन्ध में अलग-अलग मंत्र जप हैं।

साधना सामग्री 

इस विशेष तांत्रोक्त साधना में तांत्रोक्त मंत्रों से प्राण प्रतिष्ठित धनदा रतिप्रिया यक्षिणी यंत्र की स्थापना की जाती है, इसके साथ लक्ष्मी के 36 स्वरूपों हेतु 36 तांत्रोक्त लक्ष्मी रत्न बीज जो कि दारिद्र्य नाशिनी पाप खंडिनी यक्षिणी विद्या के बीज मंत्रों से सिद्ध लक्ष्मी तांत्रोक्त रत्न हैं, जिनके बिना यह साधना अपूर्ण है, आवश्यक हैं तथा मंत्र जप के लिए तांत्रोक्त यक्षिणी माला आवश्यक है, इस माला का प्रयोग केवल लक्ष्मी से सम्बन्धित तांत्रोक्त साधनाओं में ही किया जाना चाहिए।

साधना समय – 

यह साधना चन्द्र ग्रहण 16 सितम्बर 2016 को रात्रि 10:27 से रात्रि 2:24 के मध्य सम्पन्न करनी है। इस साधना को किसी भी शुभ मुहूर्त पर भी सम्पन्न किया जा सकता है। धनदा रतिप्रिया यक्षिणी लक्ष्मी के विशिष्ट स्वरूप की साधना है, जो अपने साधक को अभिष्ट फल अवश्य प्रदान करती हैं।

तांत्रोक्त साधना विधान

ग्रहण काल से पूर्व ही स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण कर साधक पूजा स्थान में गुरु चादर ओढ़ कर बैठ जाएं तथा गुरुदेव और भगवान सदाशिव का ध्यान करें।

ग्रहण काल प्रारम्भ होने के साथ ही साथ साधक साधना प्रारम्भ कर दें। साधक अपने पूजा स्थान में दक्षिण दिशा की ओर मुंह कर लाल आसन पर बैठ जाएं। साधना की सभी सामग्री की व्यवस्था पहले से कर लें, जिससे कि कोई व्यवधान उपस्थित न हो। सर्वप्रथम अपने सामने एक लकड़ी के बाजोट पर लाल वस्त्र बिछाकर उस पर गुरु चित्र/विग्रह/ गुरु यंत्र/ गुरु पादुका स्थापित कर लें। अपने ललाट पर चन्दन का तिलक लगायें और साधना में सफलता हेतु दोनों हाथ जोड़कर गुरुदेव निखिल का ध्यान करें –

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्‍वरः।
गुरुः साक्षात् पर ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

निखिल ध्यान के पश्‍चात् गुरु चित्र/विग्रह/यंत्र/पादुका को जल से स्नान करावें –

ॐ निखिलम् स्नानम् समर्पयामि॥

इसके पश्‍चात् स्वच्छ वस्त्र से पौंछ लें निम्न मंत्रों का उच्चारण करते हुए कुंकुम, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, धूप-दीप से पंचोपचार पूजन करें –

ॐ निखिलम् कुंकुम समर्पयामि।
ॐ निखिलम् अक्षतान् समर्पयामि।
ॐ निखिलम्  पुष्पम् समर्पयामि।
ॐ निखिलम् नैवेद्यम् निवेदयामि।
ॐ निखिलम् धूपम् आघ्रापयामि, दीपम् दर्शयामि।  (धूप, दीप दिखाएं)

अब तीन आचमनी जल गुरु चित्र/विग्रह/यंत्र/पादुका पर घुमाकर छोड़ दें। इसके पश्‍चात् गुरु माला से गुरु मंत्र की एक माला मंत्र जप करें –

ॐ परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः

गुरु पूजन कर गुरु आज्ञा एवं आशीर्वाद से आगे की साधना में रत हों, साधना स्थल में पूर्ण शुद्धता होनी आवश्यक है।

धनदा रतिप्रिया यक्षिणी साधना में कुबेर पूजन अनिवार्य है, इस हेतु गुरु चित्र के सम्मुख ही चावलों की ढेरी बनाकर ‘कुबेर यंत्र’ स्थापित कर दें और हाथ जोड़कर कुबेर का ध्यान करें –

मनुजबाह्यविमान वरस्थितं 
गरुड़रत्ननिभं निधिनायकम्।
शिवसखं मुकुटादिविभूषितं 
वरगदे दधतं भज तुंदिलम्॥

और कुबेर यंत्र पर पुष्प, कुंकुम अक्षत अर्पित करें। कुबेर यंत्र पर चन्दन का तिलक कर तांत्रोक्त यक्षिणी माला से एक माला निम्न कुबेर मंत्र का जप करें –

कुबेर मंत्र

॥ॐ यक्षाय कुबेराय धनधान्याधिपतये धन-धान्य समृद्धि मे देहि दापय स्वाहा॥

कुबेर पूजन के पश्‍चात् एक थाली में ‘ॐ ह्रीं सर्व शक्ति कमलासनाय नमः’ लिखें और उस पर पुष्प की पंखुड़ियां रखें, तत्पश्‍चात् इस पर ‘धनदा रतिप्रिया यक्षिणी यंत्र’ स्थापित कर चन्दन लेपन करें और सुगन्धित पुष्प अर्पित कर संकल्प विनियोग सम्पन्न करें।

विनियोग

ॐ अस्य श्रीधनदेश्‍वरीमंत्रस्य कुबेर ॠषिः पंक्तिश्छन्दः श्रीधनदेश्‍वरी देवता धं बीजं स्वाहा शक्तिः श्रीं कीलकं श्रीधनदेश्‍वरीप्रसाद सिद्धये समस्त दारिद्र्यनाशाय श्रीधनदेश्‍वरीमंत्रजपे विनियोगः॥

प्राण प्रतिष्ठा प्रयोग

प्राण प्रतिष्ठा के द्वारा जीव स्थापना की जाती है और साक्षात् यक्षिणी का आह्वान किया जाता है, इसमें अपने चारों ओर जल छिड़कें तथा निम्न मंत्रों द्वारा आह्वान करें –

ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं शं षं सं हं सः सोऽहं श्रीधनदेश्‍वरीयंत्रस्य प्राण इह प्राणाः।
ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं षं सं हं सः सोऽहं श्रीधनदेश्‍वरीयंत्रस्य जीव इह स्थितः।
ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं षं सं हं सः सोऽहं श्रीधनदेश्‍वरीयंत्रस्य सर्वेन्द्रियाणि इह स्थितानि।
ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं षं सं हं सः सोऽहं श्रीधनदेश्‍वरीयंत्रस्य वाङ्मनस्त्वक्चक्षु श्रीत्रजिह्वा घ्राणपाणि पाद पायूपस्थानि इहैआगत्य सुखं चिरं तिष्ठन्तु स्वाहा॥

श्रीधनदेश्‍वरी इहागच्छेहतिष्ठ॥

यह प्राण प्रतिष्ठा प्रयोग साधना का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है, यह अपनी साधना में प्राण तत्व भरने की प्रक्रिया है।

अब धनदा रतिप्रिया यक्षिणी लक्ष्मी के 36 स्वरूपों की पूजा कर उनका आह्वान किया जाता है, प्रत्येक स्वरूप का आह्वान कर ‘एक तांत्रोक्त लक्ष्मी रत्न बीज’ स्थापित करें, धनदा यक्षिणी के 36 स्वरूपों पर चन्दन चढ़ाएं, प्रत्येक तांत्रोक्त लक्ष्मी फल के आगे एक-एक दीपक जलाएं तथा पुष्प की एक-एक पंखुड़ी रखें, आह्वान क्रम निम्न प्रकार से है –

ॐ धनदायै नमः ॐ मंगलायै नमः
ॐ दुर्गायै नमः ॐ त्रिनेत्रायै नमः
ॐ चंचलायै नमः ॐ त्वरितायै नमः
ॐ मंजुघौषायै नमः ॐ सुगन्धायै नमः
ॐ पद्मायै नमः ॐ वाराह्यै नमः
ॐ महामायै नमः ॐ कराल भैरव्यै नमः
ॐ सुन्दर्यै नमः ॐ सरस्वत्यै नमः
ॐ रुद्राण्यै नमः ॐ चामर्यै नमः
ॐ वज्रायै नमः ॐ हरिप्रियायै नमः
ॐ कमलायै नमः ॐ वरदायै नमः
ॐ अभयदायै नमः ॐ सुपट्टिकायै नमः
ॐ उमायै नमः ॐ महालक्ष्म्यै नमः
ॐ कामदायै नमः ॐ क्षुधायै नमः
ॐ महाबलायै नमः ॐ धनुर्धरायै नमः
ॐ कामप्रियायै नमः ॐ गुह्येश्‍वर्यै नमः
ॐ चपलायै नमः ॐ लीलायै नमः
ॐ सर्वशक्त्यै नमः ॐ भ्रामर्यै नमः
ॐ सर्वश्‍वर्यै नमः ॐ माहेश्‍वर्यै नमः

इस प्रकार पूजन कर साधक यक्षिणी का ध्यान करें तथा यक्षिणी यंत्र के सामने खीर का भोग लगायें, इसके अतिरिक्त घी, मधु तथा शर्करा (शक्कर) का भोग लगायें।

कुछ ग्रन्थों में लिखा है कि धनदा रतिप्रिया यक्षिणी यंत्र के नीचे साधक अपना चित्र रखें, अथवा अष्टगन्ध से कागज पर अपना नाम लिख कर अवश्य रखें।

इसके पश्‍चात् वीर मुद्रा में बैठ कर मंत्र जप तांत्रोक्त यक्षिणी माला से प्रारम्भ करें और ग्रहण काल में अधिक से अधिक मंत्र जप संकल्प लेकर साधक मंत्र जप प्रारम्भ करें। साधक 11-21-51-101 माला मंत्र जप का संकल्प कर सकता है। ग्रहण काल में किया गया मंत्र सहस्र गुणा फल प्रदान करता है। मंत्र जप पूरा हो जाने के पश्‍चात् ही अपने स्थान से उठें। 

मंत्र

॥ॐ रं श्रीं ह्रीं धं धनदे रतिप्रिये स्वाहा॥

मंत्र जप के पश्‍चात् साधक लक्ष्मी आरती, गुरु आरती सम्पन्न करें तथा अगले दिन सम्पूर्ण साधना सामग्री को जल में विसर्जित कर दें।

इस महाविद्या के सम्बन्ध में लिखा है कि –

पूजान्ते च समयाति रात्रौ देवी धनदेश्‍वरी।
सर्वालंकारमुत्सृज्य दत्वा यति निजालये॥
धन चविपुलं दत्वा साधकस्य मनोरथान्॥

अर्थात् पूजा के समापन के समय धनदेश्‍वरी देवी अवश्य आती हैं और अपने विशेष स्वरूप द्वारा साधक को विपुल धन देकर उसके मनोरथों को पूर्ण करती हैं, जो नित्य प्रति धनदा रतिप्रिया यक्षिणी का पूजन एवं मंत्र जप करता है, उसकी दरिद्रता तो उसी प्रकार नष्ट हो जाती हैं, जैसे कपूर अग्नि में जल कर भस्म हो जाता है। 

भगवान शिव का कथन है कि मेरी प्रिय धनदा रतिप्रिया यक्षिणी साधना में न तो अंगन्यास है, न करन्यास और न छन्द है, यदि कुबेर का मंत्र न भी हो तो भी इसकी पूजा साधना करने से पूर्ण फल अवश्य प्राप्त होता है।

साधना सामग्री – 600/-

जो साधक धनदा रतिप्रिया यक्षिणी साधना को ग्रहण काल में सम्पन्न नहीं कर सकें, वे इस साधना को किसी भी शुक्रवार या शुभ मुहूर्त में साधना प्रारम्भ कर सकते हैं।
विशेष दिवसों के अतिरिक्त किसी अन्य दिवस पर धनदा रतिप्रिया यक्षिणी साधना को ब्रह्ममुहूर्त में सम्पन्न किया जा सकता है। ब्रह्म मुहूर्त में भी निम्न बताये गये विधान अनुसार ही साधना सम्पन्न करनी है। शास्त्रों में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि सामान्य दिवसों में धनदा रतिप्रिया यक्षिणी साधना ग्यारह दिवसों में पूर्ण होती है। प्रति दिन साधक को 10 माला मंत्र जप सम्पन्न करना होता है तथा ग्यारहवें दिन जब साधना पूर्ण हो जाए तो साधना सामग्री को जल में विसर्जित कर दें।
प्रथम दिन पूर्ण पूजन के पश्‍चात् नित्य क्रम में केवल मंत्र जप ही सम्पन्न किया जाता है। ग्यारह दिन तक सामग्री को अपने स्थान से इधर-उधर नहीं करना है, प्रतिदिन मंत्र जप के पश्‍चात् लक्ष्मी आरती अवश्य सम्पन्न करें।
सद्गुरुदेव की ओर से यह साधना तो उपहार स्वरूप ही है। इस साधना को आप संजोकर रख सकते हैं तथा जब भी आप अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु प्रयोग करना चाहें अथवा किसी श्रेष्ठ मुहूर्त में श्रेष्ठ साधना सम्पन्न करना चाहें तो आप इस विशिष्ट साधना को सम्पन्न कर सकते हैं।
 Lunar Eclipse – September 16, 2016

Dhandaa Ratipriya

based on the Shiv Parvati dialog Aagam Tantra

Dhaneshwar Aabaddh Vidhya

 

The Dhandaa Ratipriya Yakshini Sadhana under Daaridraya Naashini Paap Khandini Yakshini Vidhya should be performed by the Sadhak, this is the best and only form of Goddess Lakshmi, through which one may attain Siddhi through Tantrik process.

The most peculiar fact about this Sadhana is that in this Sadhana, all forms of Lakshmi are invoked, and a special worship is performed for each form, and the praana pratishtha (consecration) is accomplished. All ten directions are bound-frozen before the Sadhana, to avoid any kind of interference from any external obstacle, and whatever the Sadhak resolves for, he immediately obtains that result.

The Praan Pratishtha is mandatory in this grand Sadhana. This topic has generally been mysterious, as all the Shakti powers become active through Praana Pratishtha.

The Rudrayaamal Tantra clearly states that if this Sadhana is performed with proper procedure, then there is no absolutely reason for the Goddess not to manifest and fulfil the Sadhak’s wishes.

There is only a single main procedure in this Sadhana, however there are different mantras for various financial obstacles.

 

Sadhana Materials

The Dhandaa Ratipriya Yakshini Yantra consecrated Praan-Pratishthit with special Tantrokt mantras is setup in this Sadhana, in addition, 36 Tantrokt Lakshmi Ratna Beej for 36 forms of Goddess Lakshmi, which are Siddh Lakshmi Tantrokt Ratna consecrated with Beej root mantras of Daaridraya Naashini Paap Khandini Yakshini Vidhya, without which this Sadhana is incomplete; are mandatory and Tantrokt Yakshini Mala is required for Mantra chanting, this mala should be used solely in the Lakshmi related Tantrokt Sadhanas.

 

Sadhana Time

This Sadhana should be accomplished during Chandra-Grahan (Luna Eclipse) 16 September 2016 in the night between 10:27 pm and 2:24 am. This Sadhana can be performed on any auspicious Muhurath. The Dhandaa Ratipriya Yakshini is Sadhana of a special form of Goddess Lakshmi, and it always grants  beneficial fruits to the Sadhaks.

 

Tantrokt Sadhana Procedure –

Before the commencement of the Lunar Eclipse, the Sadhak should sit in the worship-place wearing Guru Chadar, after taking bath and adorning clean-fresh clothes, and meditate on the divine forms of Gurudev and Lord Sadaashiv.

The Sadhak should initiate Sadhana with the commencement of the Eclipse period. The Sadhak should sit facing South direction on a red asana-mat in his worship-place. All the Sadhana articles should be arranged in advance, to prevent any interruption. First, spread a red cloth on a wooden board in front of you, and set-up Guru picture/statue/Guru Yantra/ Guru Paduka on it.  Make a mark on your forehead with Chandan, and meditate on the divine form of Gurudev Nikhil with folded hands to obtain success in Sadhana –

GururBrahmaa GururVishnuH Gururdevo MaheshwaraH |

GuruH Saakshaat Par Brahmaa Tasmei Shree Guruve NamaH ||

 

Bathe the Guru Picture / Statue/ Yantra / Paduka with water after Nikhil meditation –

Om Nikhilam Snaanam Samarapayaami ||

 

Then wipe with a clean cloth. Perform Panchopchaar worship-poojan with Kumkum (Vermilion), Akshat (Unbroken rice), Pushpa (Flowers), Neivedh (Sweets/Fruit offering), Dhoop (Incense) – Deep (Lamp) chanting following mantras –

Om Nikhilam Kumkum Samarapayaami |

Om Nikhilam Akshtaan Samarapayaami ||

Om Nikhilam Pushpam Samarapayaami ||

Om Nikhilam Neivedhyam Nivedayaami ||

Om Nikhilam Dhoopam Aardhyaapayaami, Deepam Darshayaami ||

(Show Dhoop, Deep)

 

Now rotate three Achmaani (spoonfuls) water around the  Guru Picture / Statue/ Yantra / Paduka and drop it on ground. Then chant 1 rosary-round of Guru Mantra with Guru Mala –

Om Param Tatvaaya Naaraayanaaya Gurubhayo Namah

 

Continue in the Sadhana ahead, after accomplishing Guru-worship, and obtaining permission and blessings from Gurudev, maintaining complete purity is essential at the Sadhana site.

 

The Kuber poojan is mandatory in Dhandaa Ratipriya Yakshini Sadhana, for this, setup Kuber Yantra on a mound of Akshat rice in front of Gurudev’s picture, and meditate on the divine form of Lord Kuber with folded hands –

 

Manujabaahyaavimaan Varasthitan

Garudratnanibham Nidhinaayakam |

Shivsakham Mukutaadivibhushitam

Varagade Dadhatam Bhaj Tundilam ||

 

And offer flowers, Kumkum and Akshat on the Kuber Yantra. After making a mark of Chandan (sandalwood) on Kubar Yantra, chant one mala of following Kuber Mantra using Tantrokt Yakshini Mala

 

Kuber Mantra

|| Om Yakshaaya Kuberaaya Dhandhaanyaadhipataya Dhan-Dhaanya Samriddhi Me Dehi Daapaya Swaaha ||

 

After Kuber poojan-worship, write “Om Hreem Sarva Shakti Kamalaasanaaya NamaH” in a plate and place flower petals on it, then after setting up “Dhandaa Ratipriya Yakshini Yantra” on it, spread Chandan (sandalwood) and after offering fragrant flowers, perform Sankalp Viniyoga Resolution.

 

Viniyoga

Om Asya Shreedhanadeshwarimantrasya Kuber RishiH PanktishchandaH Shreedhanadeshwari Devataa Dhan Beejam Swaaha ShaktiH Shreem Keelakam Shreedhanadeshwariprasaada Siddhaye Samasta Daaridrvyaanaashaaya Shreedhanadeshwarimantrajape ViniyogaH ||

 

Praana Pratishtha Prayoga

The Praana Pratishtha process is done to enliven, and Yakshini Herself is invoked in it; to perform this, sprinkle water in all four directions around you and invoke through following mantras –

 

Om Aam Hreem Kroum Yam Ram Lam Vam Sham Ksham Sam Ham SaH Souham Shreedhanadeshwariyantrasya Praana Iha PraanaaH ||

Om Aam Hreem Kroum Yam Ram Lam Vam Ksham Sam Ham SaH Souham Shreedhanadeshwariyantrasya Jeeva Iha SthitaH ||

Om Aam Hreem Kroum Yam Ram Lam Vam Ksham Sam Ham SaH Souham Shreedhanadeshwariyantrasya Sarvendriyaani Iha Sthitaani ||

Om Aam Hreem Kroum Yam Ram Lam Vam Ksham Sam Ham SaH Souham Shreedhanadeshwariyantrasya Vaangmanastvakchakshu Shreevrajihvaa Ghraanapaani Paada Paayupasthaani Iheaagatya Sukham Chiram Tishthantu Swaaha ||

Shreedhanadeshwari Ihaagacchehatishtha ||

 

This Praana Pratishtha prayog is the most significant component of this Sadhana, this is the process to imbibe the Praana element within our Sadhana.

 

Now the 36 forms of Dhandaa Ratipriya Yakshini Lakshmi are worshipped and invoked, after invoking each form, setup one “Tantrokt Lakshmi Ratna Beej” , offer Chandan on the 36 forms of Dhandaa Yakshini, light a lamp in front of each Tantrokt Lakshmi Phal, and offer a flower petal, the order of invocation is –

Om Dhandaayei NamaH                            Om Mangalaayei NamaH

Om Durgaayei NamaH                               Om Trinetraayei NamaH

Om Chanchalaayei NamaH                       Om Tvaritaayei NamaH

Om Manjughokshaayei NamaH               Om Sugandhaayei NamaH

Om Padmaayei NamaH                             Om Vaaraahyei NamaH

Om Mahaamaayei NamaH                       Om Karaala Bheiravyei NamaH

Om Sundaryei NamaH                               Om Saraswatyei NamaH

Om Rudraanyei NamaH                             Om Chaamaryei NamaH

Om Vajraayei NamaH                                Om Haripriyaayei NamaH

Om Kamalaayei NamaH                            Om Varadaayei NamaH

Om Abhayadaayei NamaH                       Om Supattikaayei NamaH

Om Umaayei NamaH                                 Om Mahaalakshmyei NamaH

Om Kaamadaayei NamaH                        Om Kshudhaayei NamaH

Om Mahaabalaayei NamaH                     Om Dhanurdharaayei NamaH

Om Kaampriyaayei NamaH                      Om Guhyeshvaryei NamaH

Om Chapalaayei NamaH                           Om Leelaayei NamaH

Om Sarvshaktyei NamaH                          Om Bhraamaryei NamaH

Om Sarvshvaryei NamaH                          Om Maaheshvaryei NamaH

 

After performing poojan, meditate on the divine form of Yakshini and offer “Kheer” to “Yakshini Yantra“, moreover also offer ghee, honey and Shakkar (sugar).

Some texts state that the Sadhak should place his own photo below the Dhandaa Ratipriya Yakshini Yantra, or place a paper containing his name written using Ashtgandha.

Thereafter, sitting in Veer mudra posture, start the mantra chanting with the Tantrokt Yakshini mala, and resolving to chant the maximum possible mantra chanting, the Sadhak should start chanting mantra. The Sadhak can resolve to chant 11-21-51-101 mala mantra chanting. The mantra japa performed during the eclipse period yields thousand time more benefits. Get up from your asana-seat only after completion of the mantra japa.

 

Mantra

|| Om Ram Shreem Hreem Dhan Dhanade Ratipriye Swaaha ||

 

After completion of Mantra japa, the Sadhak should accomplish Lakshmi Aarti, Guru Aarti and immerse the entire Sadhana materials into running-water next day.

 

It is written in context  of this Mahavidya that –

Poojaante Cha Samayaati Raatrou Devi Dhanadeshwari |

Sarvaalankaaramutsrjya Datvaa Yati Nijaalaye ||

Dhana Chavipulam Datvaa Saadhakasya Manorathaan ||

 

meaning Goddess Dhanadeshwari certainly comes at the conclusion of the worship, and fulfils the expectations-wishes of the Sadhak by granting him exuberant wealth through Her special form, one who daily performs poojan and Mantra japa of Dhandaa Ratipriya Yakshini Goddess, his poverty gets eliminated in the same way as Karpoor (camphor) gets consumed and burnt in the fire.

 

Lord Shiva has stated that my dear Dhandaa Ratipriya Yakshini Lakshmi Sadhana includes neither Angnyaas, nor Karnyaas, nor Chanda, and even if the Kuber Mantra is not included, even then one obtains full fruits from this poojan-Sadhana.

Sadhana Materials – 600 /-


Those Sadhaks who could not accomplish the Dhandaa Ratipriya Yakshini Sadhana during the eclipse period, may start this Sadhana on any Friday or any other auspicious muhurath.

Apart from the special days, the Dhandaa Ratipriya Yakshini Sadhana can be accomplished on any other day during the Brahma muhurtha. The Sadhana should be performed as per the above mentioned procedure during the Brahma Muhurtha. The holy scriptures clearly state that the Dhandaa Ratipriya Yakshini Sadhana gets accomplished during normal days in eleven days. The Sadhak should chant 10 mala mantra japa daily and on the eleventh day, after completion of the Sadhana, immerse the Sadhana articles in running-water.

After the complete poojan on the first day, only the mantra japa is regularly required. The Sadhana articles should not be disturbed for eleven days from their location, the Lakshmi Aarti should be done daily after conclusion of the mantra japa.

This Sadhana is a gift from SadGurudev. You can cherish this Sadhana and whenever you desire to perform a prayog to fulfil your wishes, or are looking to perform a special Sadhana during auspicious muhurath, you may accomplish this exceptional Sadhana.


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