जीवन के सात सुख (Seven pleasures of life) – जीवन इन्द्रधनुष के सात रंग

क्या आप सुखी है?
देखिये अपने जीवन का प्रवाह
अवश्य प्राप्त होगें
जीवन के सात सुख
जीवन इन्द्रधनुष के सात रंग
बिखरें सभी आनन्द सुख
यदि किसी व्यक्ति से पूछा जाये कि वह अपने जीवन में सुखी है अथवा दुःखी तो उसका यही उत्तर होगा कि मैं अपने जीवन में पूर्णतः सुखी नहीं हूं। उससे पूछा जाए कि दुःख क्या है? तो कहेगा कि – मेरे पास धन की कमी है, आय से ज्यादा व्यय हो रहा है। इस कारण मेरे ऊपर कर्जा बना रहता है। इसलिये मैं दुःखी हूं। कोई कहेगा कि – नौकरी, व्यवसाय तो अच्छा है लेकिन शरीर मेरा साथ नहीं देता है। कोई न कोई बीमारी लगी ही रहती है। किसी को डायबिटिज, किसी को उच्च रक्तचाप, तो कोई पेट की बीमारी से परेशान है, कोई कहता है कि धन और शरीर तो ठीक है लेकिन घर में सुख-शांति नहीं है। मेरे और पत्नी के बीच वैचारिक मतभेद चलता रहता है। दिनभर के बाद घर आता हूं तो घर में कलह बना रहता है।

 

इसी प्रकार कोई कहता है कि सब ठीक-ठाक चल रहा है लेकिन मेरा लड़का मेरे कहने में नहीं है अथवा मेरी पुत्री की शादी अनुकूल जगह नहीं हो रही है। कोई कहता है कि मेरा बच्चा उच्छृंखल होता जा रहा है। उसकी संगत अच्छी नहीं है, पढ़ाई की ओर ध्यान नहीं देता है। चिन्ता है कि आगे चलकर क्या करेगा?

 

इसी तरह कोई कहता है कि सब ठीक-ठाक चल रहा है लेकिन मुझे मेरे धन के अनुसार जो मान मिलना चाहिए, यश, प्रतिष्ठा मिलनी चाहिए नहीं मिलती है। इस कारण बहुत ही उदासी रहती है, तो कोई कहता है कि मेरे व्यक्तित्व में जो प्रभाव होना चाहिए वह कम है। दूसरे व्यक्ति मुझसे प्रभावित नहीं होते। मुझे अपनी बात बार-बार समझानी पड़ती है। मैं धन भी खर्च करता हूं लेकिन उसके बावजूद भी मुझे उचित फल प्राप्त नहीं होता है। कोई कहता है कि मेरे अनावश्यक शत्रु बनते रहते हैं, हर कोई मेरे मार्ग में बाधाएं डालना चाहता है। मैं चाहता हूं कि मैं शत्रुओं पर विजय प्राप्त करूं, इसी से मुझे अपने खर्च का उचित फल मिल सकेगा।

 

कोई कहता है कि मेरे पास सब कुछ है लेकिन ऐसा लगता है कि जीवन में कुछ खाली-खाली है न घर में मन लगता है, न पूजा में, न मंदिर और न भजन में मन लगता है।

 

तो फिर सुखी कौन है? इन सब बातों से तो ऐसा लगता है कि जीवन का वास्तविक सुख केवल धन संचय करने या प्रभुत्व स्थापित करने में ही नहीं है, एक पक्ष को ही उन्नत करने से मनुष्य का पूर्ण विकास नहीं हो पाता, उसको चाहिए कि वह जीवन के सभी क्षेत्रों में उन्नति करे, सफलता प्राप्त करे और पूर्णता ग्रहण करे।

 

जब हम अपने परिवार को और समाज के अन्य परिवारों को देखते हैं और गहराई के साथ उनका विश्‍लेषण करते हैं तो पता चलता है, कि प्रत्येक व्यक्ति थोड़ा बहुत दुःखी है ही, कोई अपने शरीर में उत्पन्न रोगों से दुखी है, तो कोई पत्नी की बीमारी से परेशान है, किसी के घर में संतान नहीं है, तो वह दुःखी है और किसी के घर में यदि पुत्र है और वह आज्ञाकारी नहीं है, उच्छृंखल हो गया है तो उसके पिता और परिवार दुःखी है, कोई शत्रुओं के भय से पीड़ित है तो कोई राज्य के भय से। मेरे कहने का तात्पर्य है कि प्रत्येक व्यक्ति कहीं न कहीं पर दुःखी अवश्य है, कहीं न कहीं उसके अपने जीवन में आनन्द, उमंग और पूर्ण सुख नहीं है, ऐसी स्थिति में व्यक्ति अपने मन के किसी कोने में रिक्तता अनुभव करता है।

 

बहुत ही कम लोग ऐसे होंगे जो सभी दृष्टियों से पूर्ण सुखी कहे जा सकते हैं, शास्त्रों में भी कहा गया है कि कुल मिलाकर सात सुख होते हैं और जिनके जीवन में सातों सुख होते हैं, उसे अपने आप में पूर्ण कहा जा सकता है, ऐसे व्यक्ति का ही जीवन सुखी और सफल कहा जा सकता है।

 

वैसे देखा जाये तो हर व्यक्ति के जीवन में कोई न कोई दुःख अवश्य है। तो क्या केवल दुःख के बारे में ही विचार किया जाय अथवा दुःख को समाप्त कर सुख प्राप्त करने के लिये प्रयास किया जाय?

 

हर किसी की कामना होती है कि उसका परिवार सुखी हो। परिवार के सभी सदस्य स्वस्थ हों, इसीलिए कहते हैं, ‘पहला सुख निरोगी काया।’ परिवार के सुखी रहने का पहला सोपान है – आरोग्यता। ज्ञान और समृद्धि प्राप्ति की भी पहली शर्त है – स्वास्थ्य। स्वास्थ्य जीवन की ऊर्जा है। जो व्यक्ति तन-मन से स्वस्थ होता है, वह हर क्षण आनंद की अनुभूति करता है। आज तनावपूर्ण जीवन, विश्राम की उपेक्षा तथा अनियमित जीवन शैली के कारण अनेक प्रकार के रोग हो रहे हैं। कुपथ्य, कुसंग, प्रमाद, व्यसन और आवेग आदि को नियंत्रित कर ही हम सही अर्थों में ‘आरोग्य’ को प्राप्त कर सकते हैं।

 

आरोग्य के बाद सुखी परिवार का दूसरा सोपान है- ‘घर में माया।’ गरीबी जीवन का सबसे बड़ा उपहास है। आवश्यकता से अधिक धन जहां जीवन में कुरीतियां प्रकट करता है, वहीं उसका अभाव विकट परिस्थितियां पैदा कर देता है। हमारे आपके जीविका के साधन कुछ भी हों, चाहे व्यापार करते हैं या नौकरी, अपनी चादर के अनुसार ही पैर फैलाएं। याद रखें कि आय के स्रोत नैतिक होंगे तभी बिना किसी भय के हम जीवन-यापन कर सकेंगे। अनैतिक साधनों से प्राप्त संपदा के कारण परिवार में हर समय अनावश्यक भय समाया रहता है।

 

सुखी परिवार का तीसरा सोपान है- ‘सुलक्षणा नारी।’ नारी परिवार की आधारशिला है। परिवार का सौंदर्य, समृद्धि और गौरव उसी के कारण स्थिर है। नारी के अनेक रूप हैं -माता, पत्नी, बहन, बेटी आदि। वह हर रूप में पूजनीय है। नारी परामर्श में मंत्री, गृहकार्य में प्रबंधक, धर्म कार्य में पत्नी, सहिष्णुता में पृथ्वी, गृह-व्यवस्था में लक्ष्मी, ममता में माता, विलास में रंभा और क्रीड़ा में मित्र की भूमिका निभाती है। नारी का एक महत्वपूर्ण रूप है शिक्षिका का – बच्चों को संस्कारी बनाने से लेकर परिवार के हर सदस्य को सन्मार्ग की ओर ले जाने वाली वही होती है।

 

सुखी परिवार का चौथा सोपान है – ‘गुरु और भगवान में विश्‍वास।’ किसी भी साध्य की प्राप्ति के लिए किसी न किसी सहारे की आवश्यकता रहती है। गुरु और भगवान हमें अवलंबन प्रदान करते हैं। आस्था के बिना पुरुषार्थ फलता नहीं और पुरुषार्थ के बिना आस्था स्थिर नहीं होती। पुरुषार्थ को जगाने का पहला सूत्र है – आस्था। यह संजीवनी शक्ति है। आज उपासना के नाम पर प्रतिदिन जो कर्मकांड, हिंसा, धोखा और स्वार्थ विकसित हो रहा है, वह आस्था नहीं है। जो आस्था और उपासना को चरित्र से अलग मानते हैं, उनकी उपासना दोषपूर्ण रहती है।

 

सुखी परिवार का पांचवां सोपान है –  ‘सार्वजनिक प्रतिष्ठा और श्रेष्ठ मित्रों का होना।’ श्रेष्ठ मित्रों के होने का तात्पर्य है कि व्यक्ति के जीवन में शत्रु बाधा न रहे। ईर्ष्यावश अनेकानेक लोग शत्रु हो जाते हैं लेकिन यदि आपके जीवन में श्रेष्ठ मित्र हैं और आपका व्यक्तित्व सुदृढ़ है तो शत्रु अपने आप निस्तेज हो जाते हैं। आप उन पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। व्यक्ति की साफ – सुथरी छवि परिवार के लिए उन्नतिप्रदायक और यशदायी होती है। जब तक व्यक्ति में प्रमाणिकता, ईमानदारी, सच्चार्ई आदि गुण नहीं होंगे, तब तक वह समाज में सच्ची प्रतिष्ठा नहीं पा सकेगा। अधिकारों की मांग करना मौलिक अधिकार है, किंतु कर्त्तव्यों का पालन करना भी उतना ही आवश्यक है। जीवन की मूल आवश्यकताओं को पूरा करने वाले लोग उतने भ्रष्टाचारी नहीं होते, जितने वे लोग होते हैं जो सुख-सुविधाओं को भोगने के लिए भ्रष्टाचार में लिप्त रहते हैं।

 

सुखी परिवार का छठा सोपान है – ‘सामाजिक यश’ व्यक्ति का सारा जीवन समाज सापेक्ष होता है और वह सहकार पर ही टिका रहता है। समाज के प्रति हमारा कर्त्तव्य है। हमें समाज के विकास के लिए आगे आना ही होगा। सेवा मानवीय मूल्यों की मिठास है।

 

सुखी परिवार का अंतिम और सातवां सोपान है – ‘व्यक्तित्व विकास। व्यक्ति के साथ अभेद्य रूप से जुड़ा हुआ तत्व है उसका व्यक्तित्व। आज व्यक्तित्व को विकसित करने की, व्यक्तित्व को निखारने की अनेक प्रयोगशालाएं खुली हुई हैं। जीवन अनंत संभावनाओं की कच्ची मिट्टी है। उसको वांछित स्वरूप देकर ऊंचाइयों तक उठाना मनुष्य का काम है। महत्वाकांक्षी और स्वप्नदर्शी होने को कभी बुरा नहीं कहा गया। किंतु निरर्थक महत्वाकांक्षा, पतन की राह पर ले जाती है।

 

व्यक्तित्व विकास घर परिवार में पूर्ण सुख-शांति होने से ही संभव है। संतान योग्य हो, सुयोग्य हो। संतान के साथ सामंजस्य उचित हो, सब व्यक्ति आपस में एक दूसरे के सहयोगी हों तभी व्यक्तित्व पूर्ण विकसित हो सकता है। संतान आपसे अधिक उन्नति प्राप्त करे और अपने स्वयं का व्यक्तित्व स्थापित करें इसी से ही पूरे कुल की, वंश की प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है और व्यक्तित्व खिल उठता है।

 

हमारे ॠषि मुनियों ने इस प्रश्‍न पर गंभीरता से विचार किया और उन्होंने विशेष प्रकार के मंत्रों की रचना की, विशेष प्रकार के साधना उपकरणों को सिद्ध किया और यह सिद्ध कर दिया कि प्रकृति और मनुष्य में आपस में सामंजस्य बिठाने से मनुष्य के जीवन में पूर्ण सुख की स्थिति अवश्य प्राप्त हो सकती है।

 

हर वस्तु का कोई न कोई उपयोग अवश्य होता है आवयश्कता केवल इस बात की है कि हम जान सकें कि उसका उचित उपयोग क्या है। कई बार विष भी औषधी के रूप में प्रयुक्त होता है। इसी प्रकार प्रकृति में उत्पन्न विभिन्न प्रकार के वृक्ष, पौधों, जीव-जन्तुओं का भी साधनात्मक उपयोग है। शंख, सीपी, मोती शंख, नारियल और एकाक्षी नारियल, सुपारी इत्यादि का जीवन में विशिष्ट उपयोग है।

 

इस बार आपके लिये सात विशिष्ट प्रकार की साधनाएं प्रकृति के इन उपकरणों से सज्जित प्रस्तुत है, जिन सातों साधनाओं को आप एक साथ भी सम्पन्न कर सकते है। आपके पूजा स्थान में, आपके घर में इन सातों साधनात्मक उपकरणों का स्थापन होना आवश्यक है।

 

नववर्ष के शुभारम्भ में इन उपकरणों को अपने पूजा स्थान में घर में स्थापित कर जीवन के सभी सात सुखों को प्राप्त करने की प्रक्रिया, प्रारम्भ कर दें। जब आप क्रिया प्रारम्भ कर देंगे तो उसका फल गुरु कृपा से निश्‍चित तौर पर प्राप्त होगा।

 

Are you Happy?

 

View the progress of your life

  

Will certainly obtain Seven Pleasures of Life

 

The seven colors of the life rainbow
Disperse Joy and Happiness all around

 

If a person is asked if he is happy or unhappy in his life, his reply will be that I am not happy in my life completely. If we ask him the reason for his sorrow,  his reply will be – I have a paucity of wealth, income is more than expenses. This leads me to debt. So I’m sad. Someone will state – job, business is good, but my body is not supporting me. I keep on getting ill. Some have diabetes, or high blood pressure, someone is upset with stomach ailments; others state that wealth and the body is fine, but there is no peace at home. There are constant differences of opinion between me and my wife; I get into strife and discords at home after working hard whole day.

Similarly, someone remarks that all is going well, but my children do not listen to me or daughter’s marriage is not getting fixed at appropriate place. Some state that my child is becoming ill-mannered and disorderly. His company is not good, and he does not focus on studies. I am concerned about his future?

Similarly,  others say that everything is going fine but I am not getting the fame and prestige as per my wealth. This causes much sadness, if someone says that the effect of my personality is less than expected. I am not able to influence other people. I have to repeatedly explain my points. I spend the money but I still do not receive the proper results. Some says that the enemies are growing without any reason,  and everyone wants to put obstacles and troubles in my way. I want to conquer my foes, as this will be a suitable fruit of my investment.

Others state that, I have everything, but there is emptiness in life. My mind is not at peace, not even in worship; neither temple nor hymns bring peace.

Then who is happy? All of these situations point to only  one fact – the  real aim of life is not to accumulate wealth or to establish dominance; one-sided growth will not lead to complete development of a person, he needs to progress in all areas, to achieve success and obtain Totality & Fulfillment.

When we look at our family and other families in the community, and do an in-depth analysis, then we realize that each person is sad in one way or another, sad due to diseases in body, or worried about spouse’s illness, someone  is miserable due to absence of birth of progeny; and someone  who has a child, is disturbed since the child is not obedient or has become defiant causing grief to the father and family, someone  is suffering from fear of enemies and others have fear of the Government. I mean to say is that each person is suffering in one way or another, somehow the joy, enthusiasm and happiness are not complete in their life, and in such cases the person feels emptiness in some corner of his mind.

There are very few people who can be called completely happy in all respects. Scriptures also state that there are altogether seven types of happiness, only such a life can be called complete in itself, such person’s life can be happy and successful.

Well, actually, there is some pain and suffering in the life of every person. So should we just worry about pain, or should we consider an attempt to achieve happiness or abolish this sorrow?

Everyone wishes for complete happiness of his family. All family members should be healthy, so they state –”First Pleasure – A Disease-Free Body” The first step to become a happy family is – health. Wisdom and prosperity is also a result of – health. A healthy body is the energy of life. A person who is healthy in body and soul, he enjoys every moment of his life. Today’s stressful life, neglect of relaxation and irregular lifestyle are causing many diseases. We can truly achieve “Health” by controlling junk food, bad company, laziness, addiction and impulses.

After health, the second step to achieve  happy family is – “Prosperity at Home”. Poverty is the greatest mockery of life. While excess money leads to evils in life, its absence causes acute shortcomings. Whatever be the means of  your livelihood, whether you do business or a job, spend only as per your capacity. Always remember that only if our sources of income are moral, then only we can live without any fear. Wealth obtained through immoral and unethical methods cause unabated, unnecessary fear in the family .

The third step for a happy family is “Worthy Spouse”. A woman is the cornerstone of home. A family attains continuous beauty, prosperity and glory only due to her. A woman has multiple roles – mother, wife, sister, daughter, etc. She is revered in every form. A woman advises like a minister, manages home like an able administrator, partners during worship, tolerates like the earth, keeps house like Goddess Lakshmi, gives maternal affection of mother, co-habits like the Rambha Nymph and is the closest companion at play. She has an important responsibility of a teacher – she is the one to inculcate moral values into children and ensure a cultured virtuous path by every member of the family.

The fourth step of happy family – “Complete Trust in Guru and God”, One always requires some support to achieve any goal. Guru and God are always dependable and reliable. Efforts will not yield result without faith and faith is not stable without effort. The initial step to activate action is – faith. This the elixir of life. The ritual worship, violence, deception and selfishness, which is growing these days in the name of religion,  is not faith. Those who consider faith and worship as a different entity from character and values, their worship is faulty.

The fifth step of happy family – “Having an excellent public reputation and good friends “. Good friends implies that the person does not have any enemy in life. Many people get jealous and become foes, but if you have good friends and a strong personality, then those foes automatically get vanquished. You can conquer them easily. A clean and transparent image of a person is vital for glory and growth of family. Unless the person possesses clean character, honesty and truth, he will not obtain a good reputation in the society. It is a moral right to claim fundamental rights, but one must equally abide by duties. People who are satisfied by the basic needs of life are not as corrupt, as those who indulge in corruption to relish the comforts and luxuries.

“Social Standing” is the sixth step of a happy family. Man is a social being and his entire life is based on cooperation with society. We have a  duty to our society. We will have to come forward for the development of society. Service is the essence of human values.

The final and seventh step of happy family is – ‘personality development”. An individual’s personality is intrinsically connected with his being. One has access to many workshops and laboratories these days to develop and refine personality. Life is like a clay, with a potential for infinite possibilities. It is a person’s responsibility to develop and take it to the desired heights. Ambition and Vision have never been considered bad. But futile ambition leads us to the road of ruin.

A peaceful family home is the basic ingredient for development of personality. A child should develop properly and  appropriately. A fully developed personality can grow only in an atmosphere of appropriate coordination with children,  and suitable cooperation among everyone. Your child should rise higher than you, and reach heights on their own,  only this will lead to an enhancement of overall reputation of the family and a bloom in personality development.

Our sages have seriously pondered over this issue and created special mantras and consecrated special Sadhana materials to prove that if nature and human beings collaborate, then one can obtain full happiness in the life.

Every item in this world is useful, we only need to understand the proper method to use it. The poison is also sometimes used as medicine. Similarly, different types of beings occurring in nature like trees, plants, animals also have Sadhanatmak efficacy. Conch, shell, pearl shell, coconut, Ekakshi coconut, betel nut etc have specific utility in life.

We have brought seven different Sadhanas using such natural articles, you may perform these seven Sadhanas together as well. It is important to setup these seven distinct Sadhana articles in your place of worship at your home.

You should setup these seven Sadhana articles in your home at the onset of the New Year to initiate the process to obtain these seven pleasures in life. You will certainly receive good results with divine blessings of Gurudev, if you start this process.

जीवन के सात सुख (Seven pleasures of life) – जीवन इन्द्रधनुष के सात रंग
1. पहला सुख – आरोग्य (Health)
2. दूसरा सुख – घर में माया (Wealth in home)
3. तीसरा सुख – सुयोग्य संतान (Worthy Child)
4. चौथा सुख – राज्य सम्मान, राज मे पासा (Honors and Glory by Government)
5. पांचवां सुख-श्रेष्ठ गृहस्थ जीवन (Excellent Family Life)
6. छठा सुख – बाधाओं पर विजय – शत्रु मर्दन (Triumph over Obstacles)
7. सातवां सुख – गुरु देवता और ईश्‍वर की कृपा (Divine Blessings of Guru and Almighty God)
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