चौसठ शक्ति तत्व (64 Shakti Elements)

दुर्गा विस्तार स्वरूप 
चौसठ शक्ति तत्व
विशेष साधना
शक्ति साधना के द्वारा ही इस जीवन में इन सब शक्तियों की प्राप्ति हो सकती हैै। इनमें से एक भी शक्ति की कमी रहती है तो जीवन कुछ अपूर्ण सा लगने लगता है। केवल एक ही रूप में साधना करने से शक्ति की सिद्धि सम्भव नहीं है, जीवन में रौद्रता, उग्रता के साथ-साथ शान्ति हो, शत्रुओं के लिये उग्रता, मित्रों के लिये शान्ति, परिवार के लिए लक्ष्मी, ज्ञान के लिये स्मृति, मन के लिये तुष्टि, निर्बल के लिये दया, स्वभाव में नम्रता, क्योंकि नम्र वही हो सकता है, जो शक्ति से परिपूर्ण हो। निर्बल भिक्षुक हो सकता है, याचक हो सकता है, लेकिन सबल अपने स्वभाव को सुरक्षित रखते हुए नम्रता से परिपूर्ण हो सकता है। 

दुर्गा के विभिन्न रूप स्वरूप हैं – ज्ञान भी दुर्गा हैं, विज्ञान भी दुर्गा हैं, तंत्र भी दुर्गा हैं। साथ ही जहां पर भी सात्विक शक्तियां हैं, वे दुर्गा के ही रूप हैं और दुर्गा के राजसिक स्वरूप भी हैं – चंचलता, कला, नृत्य, संगीत, चित्रकारी। ये भी दुर्गा शक्ति के प्रतिबिम्बित स्वरूप हैं।

तंत्र की परंपरा में देवी के हजारों रूप हैं, धारणा है। जिनका पूजन और स्मरण किया जाता है। दुर्गा अपने विभिन्न स्वरूपों में संकटों की निवारक हैं। काली के रूप में वह काल और अहंकार को मारती हैं। सरस्वती के रूप में वह देवी ज्ञान-विज्ञान की दात्री हैं, लक्ष्मी के स्वरूप में वही देवी धन का वरदान देती हैं, सम्पदा और समृद्धि का वरदान देती हैं। इन सभी रूपों में दया, क्षमा, करुणा, वीरता जैसी शक्तिशाली स्पंदनकारी शक्तियों का आह्वान किया जाता है।
तंत्र कहता है मातृ शक्ति ही इस जगत की जननी है। वही देवी शक्ति या पराशक्ति के नाम से जानी जाती हैं। शास्त्रों में ऐसा माना गया कि सभी पदार्थों के मूल रूप में शक्ति ही विराजमान हैं। यह शक्ति हम सब के भीतर है। न केवल हमारी देह बल्कि हमारे मन, हमारी आत्मा में भी विराजमान हैंं। शक्ति का कोई अपना निश्‍चित रूप-स्वरूप नहीं है। यह शक्ति विभिन्न रूपों में प्रकट होती है और यही शक्ति विभिन्न तरंगों में भी प्रतीत होती है। वह निराकार भी है, साकार भी है अर्थात वह पदार्थ भी है, वह ऊर्जा भी है। इसी शक्ति के परिणाम स्वरूप चांद, सूरज हैं। मनुष्यों, पक्षियों, पशुओं, वृक्षों, पत्थरों, पृथ्वी, स्वर्ण, चांदी, पानी, चांद, तारों, ग्रहों आदि सब ओर उसी शक्ति का प्रताप दिखाई देता है।
 हम सब उसी शक्ति के ही व्यक्त रूप हैं। वह स्वयं अव्यक्त रूप हैं। यह शक्ति समूल जगत की मूल हैं और मनुष्य की देह में मूलाधार चक्र में स्थापित हैं और यही शक्ति इस सारे जगत की सृष्टिकर्ता भी हैं।
 सौंदर्य लहरी की प्रथम पंक्ति में देवी की स्तुति की गई है। जिसमें कहा गया है कि – बिना शक्ति के शिव भी अप्रभावकारी होते हैं। ऋषियों ने भी पहले ‘त्वमेव माता’ कहा , फिर कहा ‘च पिता त्वमेव’।
देवी के यह तीन स्वरूप सृष्टि कर्त्ता, पालन कर्त्ता और संहारक हैं और इन्हीं तीन रूपों की विशिष्टता से नवरात्रि के दिनों में पूजन किया जाता है।
जब मनुष्य के मन में धारणा , एकाग्रता की शक्ति पूर्ण हो जाती है, तो यही आगे जाकर ध्यान में परिवर्तित हो जाती है और ध्यान की ऊंची अवस्था को ही समाधि कहा जाता है।
 मूल प्रकृति जिससे यह मन, पदार्थ और भौतिक जगत उत्पन्न हुआ है। उस मूल शक्ति की ओर अपनी अंतर्यात्रा को बढ़ाने का पर्व ही गुप्त नवरात्रि का आध्यात्मिक लक्ष्य है।
गुप्त नवरात्रि वह पर्व है, जिस पर्व में साधक अपने अंदर उस पराशक्ति के साथ एकाकार होने का परिश्रम करता है। गुप्त नवरात्रि देवी शक्ति के चौसठ स्वरूपों से एकाकार होने का श्रेष्ठतम काल है।
दुर्गा शक्ति स्वरूप 
ॐ कालारभ्राभां कटाक्षैररिकुलभयदां मौलिबद्धेनदुरेखां,
शंख चक्रं कृपाणं त्रिशिखमपि करैरुद्वहन्तीं त्रिनेत्राम्।
सिंहस्कन्धाधिरुढां त्रिभुवनमखिलं तेजसा पूरयन्तीं,
ध्यायेद्दुर्गां जयाख्यां त्रिदशपरिवृतां सेवितां सिद्धिकामः। 
हे देवी दुर्गा! आप समस्त राक्षसी वृत्तियों पर जयी होने के कारण जया हैं। आप ॠषि, मुनियों, योगियों, देवगणों एवं सिद्धि प्राप्त करने की इच्छा रखने वाले साधक वृन्दों द्वारा पूजनीय एवं वन्दनीय हैं। आपके शरीर की आभा काले मेघ के समान शान्तिदायक है। आपकी क्रोध दृष्टि शत्रुओं को भयभीत कर देती हैं, श्रीमस्तक पर चन्द्ररेखा एवं चारों हाथों में शंख,चक्र, कृपाण और त्रिशूल हैं। सिंह पर आरूढ़ आपके ही तेज से तीनों लोक परिपूर्ण होते हैं।
मां भगवती दुर्गा का यह स्वरूप शक्ति का साकार स्वरूप है। जहां मां भगवती की आराधना होती है, वहां शक्ति चैतन्य रूप से स्थायी रहती हैं।
शक्ति का तात्पर्य केवल बल नहीं है, शक्ति की जो व्याख्या मार्कण्डेय ॠषि ने दी है, वह शक्ति का पूर्ण स्वरूप है। शक्ति का तात्पर्य है – वृद्धि, सिद्धि, सौम्यता, रौद्रता, जगतप्रतिष्ठा, चैतन्यता, बुद्धि, तृष्णा, नम्रता, शान्ति, श्रद्धा, कान्ति, लक्ष्मी, स्मृति, दया, तुष्टि एवं इच्छा हैं।
शक्ति साधना के द्वारा ही इस जीवन में इन सब शक्तियों की प्राप्ति हो सकती हैै। इनमें से एक भी शक्ति की कमी रहती है तो जीवन कुछ अपूर्ण सा लगने लगता है। केवल एक ही रूप में साधना करने से शक्ति की सिद्धि सम्भव नहीं है, जीवन में रौद्रता, उग्रता के साथ-साथ शान्ति हो, शत्रुओं के लिये उग्रता, मित्रों के लिये शान्ति, परिवार के लिए लक्ष्मी, ज्ञान के लिये स्मृति, मन के लिये तुष्टि, निर्बल के लिये दया, स्वभाव में नम्रता, क्योंकि नम्र वही हो सकता है, जो शक्ति से परिपूर्ण हो। निर्बल भिक्षुक हो सकता है, याचक हो सकता है, लेकिन सबल अपने स्वभाव को सुरक्षित रखते हुए नम्रता से परिपूर्ण हो सकता है।
नवरात्रि ही नहीं जीवन का प्रत्येक दिन साधनाओ के लिये विशेष सिद्धिदायक माना गया है। शक्ति के इन हजारों स्वरूपों में प्रमुख हैं – जीवन में अभय शक्ति, शत्रु बाधा अर्थात् विवाद, मुकदमा षड्यंत्र इत्यादि में विजय और जीवन में प्रेम और रस में निरन्तर अभिवृद्धि। इन शक्तियों का जीवन में पूर्ण समावेश होना आवश्यक है।
शक्ति प्रमोद में विवरण है, कि एक बार कार्तिकेय जी कैलाश पर्वत पर शिव की स्तुति करते हुये बोले – हे देवाधिदेव!  तुम्ही परमात्मा हो, शिव हो, तुम्ही सभी प्राणियों की गति हों, तुम्ही जगत के आधार हो और विश्‍व के कारण हो, तुम्ही सबके पूज्य हो, तुम्हारे बिना मेेरी कोई गति नहीं है। कृपा कर मेरे संशय का निवारण करें। कार्तिकेय ने भगवान शिव से कहा –
किं गुह्यं परमं लोके किमेकंं सर्व सिद्धिम्।
किमेकं परमं श्रेष्ठं को योगः स्वर्ग मोक्षदः।
बिना तीर्थेन तपसा बिना दानैर्विना मखैः।
कस्मादुत्पद्यते सृष्टिः कस्मिंश्च प्रलयो भवेत।
कौन सी वस्तु संसार में समस्त सिद्धियों को देने वाली है? वह कौन सा योग है जो परमश्रेष्ठ है? कौनसा योग है जो स्वर्ग और मोक्ष दोनों देने वाला है? बिना तीर्थ, बिना दान, बिना यज्ञ, लय या ध्यान के मनुष्य किस उपाय से सिद्धि को प्राप्त कर सकता है? यह सृष्टि किससे उत्पन्न हुई? किसमें इसका लय होता है? हे देव! किस उपाय से मनुष्य संसार रूपी सागर को पार उतर सकता है? कृपा कर बतायें।
इसके उत्तर में भगवान शिव बोले कि इस जगत के सभी पदार्थ, जड़-चेतन, सजीव-निर्जीव मात्र तीन गुणों के संयोजन से ही गतिशील होते हैं। मनुष्य की समस्त गतिविधियां, मनुष्य  की जीवन शैली, जीवन में उतार चढ़ाव, गुण-दोष, स्वभाव मात्र इन तीन गुणों अर्थात् सत्य, रज एवं तम से ही बनते हैं। इन तीनों गुणों का जिस पराशक्ति से प्रादुर्भाव होता है वही भगवती आद्याशक्ति है।
शक्ति के अनेकानेक रूप हैं और शक्ति का प्रत्येक स्वरूप अपनी विविधता से युक्त मानव के लिये आवश्यक हैं। एक बार एक शिष्य ने सद्गुरुदेव से प्रश्‍न किया कि  क्या ऐसा सम्भव नहीं है, शक्ति के बहु आयामी स्वरूप की साधना एक साथ कर सकें। 
गुरुदेव ने एक प्रकार शक्ति के बारे में बताते हुए कहा कि – हमारे समक्ष शक्ति के तीन स्वरूप हैं। महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती। इनकी नवरात्रि में विशेष पूजना की जाती है। यह सर्वविदित है लेकिन इन शक्तियों का विस्तार स्वरूप क्या है? दुर्गा शक्ति का विस्तार स्वरूप तो चौसठ कलाएं हैं। जीवन के प्रत्येक पक्ष से सम्बन्धित एक-एक कला है। इन सब कलाओं का पूर्ण स्वरूप दुर्गा है। इसलिये साधक को इन चौसठ शक्ति स्वरूपों की साधना करनी चाहिये, जिससे शरीर और मन का प्रत्येक पक्ष जाग्रत हो सके, यही दुर्गा का आधारभूत स्वरूप है।
सद्गुरुदेव ने अपने शिष्य को आशीर्वाद देते हुए कहा कि – शक्ति की श्रेष्ठ साधना चौसठ शक्ति साधना है, जिसमें बीज मंत्र सहित चौसठ रूप में ध्यान किया जाये तो शक्ति को साधक का वरण करना ही पड़ता है।
साधना सामग्री
इस साधना से लिये निम्न सामग्री  की आवश्यकता होती है- तांत्रोक्त नारियल, चौसठ शक्ति दुर्गा यंत्र तथा विशेष मंत्रों से सिद्ध की गई शक्ति माला। इसके अतिरिक्त कुंकुम, अक्षत, पुष्प, लौंग, दीपक इत्यादि की व्यवस्था पहले से करके रख देनी चाहिए।
गुप्त नवरात्रि चैतन्य शक्ति पर्व शक्ति साधना का श्रेष्ठतम् काल होता है। इसके अतिरिक्त इस साधना को किसी भी माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को सम्पन्न किया जा सकता है।
साधना विधान
साधना वाले दिवस साधक स्नान कर उत्तर दिशा की ओर मुंह करके लाल आसन पर बैठ जाये और स्वयं लाल धोती धारण कर लें। अपने सामने लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछायें। उस पर गुरु चित्र/विग्रह/ गुरु यंत्र/ गुरु पादुका स्थापित कर साधना में सफलता हेतु दोनों हाथ जोड़कर गुरुदेव निखिल का ध्यान करें –
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्‍वरः।
गुरुः साक्षात् पर ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥
निखिल ध्यान के पश्‍चात् गुरु चित्र/विग्रह/यंत्र/पादुका को जल से स्नान करावें –
ॐ निखिलम् स्नानम् समर्पयामि॥
इसके पश्‍चात् स्वच्छ वस्त्र से पौंछ लें निम्न मंत्रों का उच्चारण करते हुए कुंकुम, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, धूप-दीप से पंचोपचार पूजन करें –
ॐ निखिलम् कुंकुम समर्पयामि।
ॐ निखिलम् अक्षतान् समर्पयामि।
ॐ निखिलम्  पुष्पम् समर्पयामि।
ॐ निखिलम् नैवेद्यम् निवेदयामि।
ॐ निखिलम् धूपम् आघ्रापयामि, दीपम् दर्शयामि।
(धूप, दीप दिखाएं)
अब तीन आचमनी जल गुरु चित्र/विग्रह/यंत्र/पादुका पर घुमाकर छोड़ दें। इसके पश्‍चात् गुरु माला से गुरु मंत्र की एक माला मंत्र जप करें –
ॐ परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः
गुरु पूजन के पश्‍चात् गुरु चित्र के सम्मुख ही चावल की ढेरी बनाकर कर, उस पर तांत्रोक्त नारियल तथा सामने ही किसी प्लेट या थाली में पुष्पों का आसन देकर चौसठ शक्ति यंत्र स्थापित कर दें। यंत्र के चारों और तेल के नौ दीपक लगा दें। तांत्रोक्त नारियल का अक्षत, पुष्प आदि से पंचोपचार पूजन करें। इसके पश्‍चात् चौसठ शक्तियों का पूजन किया जाता है, निम्न प्रत्येक मंत्र जप के पश्‍चात् यंत्र पर कुंकुम, अक्षत और एक लौंग चढ़ाएं –
चौसठ शक्तियों के मंत्र –
ॐपिं पिगलाक्ष्यै नमः ॐविं विडालाक्ष्यै नमः 
ॐसं समृद्धयै नमः ॐवृं वृद्धयै नमः 
ॐश्रं श्रद्धायै नमः ॐस्वं स्वाहायै नमः
ॐस्वं स्वधायै नमः ॐमं मातृकायै नमः 
ॐवं वसुंधरायै नमः ॐत्रिं त्रिलोकरात्र्यै नमः 
ॐसं सवित्र्यै नमः ॐगं गायत्र्यै नमः
ॐत्रिं त्रिदशेश्‍वर्यै नमः ॐसुं सुरुपायै नमः 
ॐबं बहुरुपायै नमः ॐसकं स्कन्दायै नमः
ॐअं अच्युतप्रियायै नमः ॐविं विमलायै नमः
ॐअं अमलायै नमः ॐअं अरुणायै नमः 
ॐआं आरुण्यै नमः ॐप्रं प्रकृत्यै नमः 
ॐविं विकृत्यै नमः ॐसृं सृत्यै नमः 
ॐस्थिं स्थित्यै नमः ॐसं सहृत्यै नमः 
ॐसं सन्धायै नमः ॐमं मात्र्यै नमः
ॐसं सत्यै नमः ॐहं हंस्यै नमः
ॐमं मर्दिन्यै नमः ॐरें रंजिकायै नमः 
ॐपं परायै नमः ॐदं देवमात्र्यै नमः 
ॐभं भगवत्यै नमः ॐदं देवक्यै नमः 
ॐकं कमलासनायै नमः ॐत्रिं त्रिमुख्यै नमः 
ॐसं सप्तमुख्यै नमः ॐसुं सुरायै नमः 
ॐअं असुरमर्दिन्यै नमः ॐलं लम्बोष्ठयै नमः 
ॐऊं ऊर्ध्वकेशिन्यै नमः ॐबं बहुशिखायै नमः 
ॐवृं वृकोदरायै नमः ॐरं रथरेखायै नमः
ॐ शं शशिरेखायै नमः ॐअं अपरायै नमः 
ॐगं गगनवेगायै नमः ॐपं पवनवेगायै नमः 
ॐभुं भुवनमालायै नमः ॐमं मदनातुरायै नमः 
ॐअं अनंगायै नमः ॐअं अनंगमदनायै नमः
ॐअं अनंगमेखलायै नमः ॐअं अनंग कुसुमायै नमः 
ॐविं विश्‍वरुपायै नमः ॐअं असुरायै नमः 
ॐअं अपंगसिद्धयै नमः ॐसं सत्यवादिन्यै नमः 
ॐवं वज्ररुपायै नमः ॐशं शुचिवृत्तायै नमः 
ॐवं वरदायै नमः ॐवं वागीश्‍वर्यै नमः 
शक्ति के चौसठ स्वरूपों के आह्वान के पश्‍चात् साधक एकाग्र मन से निम्न मंत्र की ग्यारह माला मंत्र जप करें। यह मंत्र जप सिद्धि माला से ही सम्पन्न करें।
मंत्र
॥ ॐ ह्रीं क्रीं पूर्ण शक्ति स्वरुपायै क्रीं ह्रीं ॐ फट् ॥
मंत्र जप समाप्ति के बाद माला को गले में धारण कर लें तथा यंत्र को अपने पूजा स्थान में स्थापित कर दें। सवा माह तक माला को धारण करके रखें। सवा महीने बाद माला और यंत्र को नदी में प्रवाहित कर दें।
साधक द्वारा एकाग्र मन से यह साधना करने पर एक विशेष अनुभूति प्राप्त होती है। उसके मन के द्वार खुलने लगते है। शक्ति का प्रवाह रोम-रोम में होने लगता है, जब शक्ति का प्रवाह होता है तभी साधक के अपने कर्म द्वारा कार्य पूर्ण होते हैं।
साधना सामग्री – 490/-
Great Durga Expanded Form

Sixty-four Power Elements

Special Sadhana

We can realize all the powers in this life only through Shakti Sadhana. Lack of even one power, causes a feeling of incompleteness in life. The accomplishment Siddhi of Shakti is not possible only by performing Sadhana of a single form of Shakti, the life should be full of Ferocity and Anger  along with Peace, should have Anger for enemies, Peace for friends, Lakshmi Wealth for the family, Memory for knowledge, Satiation for the mind, Compassion for the weak, Humility in nature; because only one who is full of Shakti Power, can stay humble. A weakling may be a beggar, or a pauper, but a strong personality can be full of humility to preserve his nature.

 


There are multiple forms aspects of Durga – She is the Goddess of knowledge, the Goddess of Science, and the Goddess of Tantra. All the pure Saatvik ontological powers, are various forms of Durga, and there are multiple Raajsik forms of Durga as well – versatility, art, dance, music, painting. All of these reflect various forms of Durga Shakti power.

There are thousands of forms and impressions of Goddess in the tradition of Tantra. These are worshipped and remembered. Durga is the annihilator of problems in Her various forms. She destroys Kaal (time) and Ego as Kali form. She is the bestower of Knowledge-Science in Her Saraswati form, the same Goddess grants boons of Wealth in Her Lakshmi form, blesses with Prosperity and Growth. The powerful pulsating forces like mercy, forgiveness, compassion, valor are invoked in all these forms.

Tantra states that the Maternal power is the mother of the universe. The same Goddess is known as Shakti or ParaaShakti (Supreme Power). The scriptures believe that power Shakti is the base within all matter substances. This power is within us. It is present not only within our body, but also within our mind and soul. The power Shakti does not have any definite form. This Shakti appears in different forms, and it also manifests in different waves and vibrations. It is formless as well as full of form. i.e. It is the substance matter as well as the energy. The Moon and the Sun are the resultants of this Shakti power, the majestic power of this Shakti is evident within the humans, birds, animals, trees, stones, earth, gold, silver, water, moon, stars and planets etc.

We all are the expressions of the same Shakti power. She Herself is beyond description. This Shakti is the root of the entire universe and is established within the Muladhaar Chakra of the human body, and this Shakti is the creator of this entire universe as well.

The first line of the Soundarya Lahiri evokes praises of the Goddess, which states that – Even Lord Shiva is ineffective without Shakti. The sages also first stated – “Twamev Mata“, and only after that stated – “Cha Pita Twamev“.

The three aspects of the Divine Goddess are the Creator, the Preserver and the Destroyer, and we perform worship-poojan of these three forms during Navratri.

When the powers of belief and concentration within human mind reach their summit, then it transforms into the Dhyaan, and the highest state of the Dhyaan is termed as the Samadhi.

The basic nature, out of which this mind, body and the physical world is created, the elevation of the core strength within the inner journey towards this basic nature is the spiritual goal of the Gupt (Secret) Navratri festival.

The Gupt Navratri is the festival, when the Sadhak undertakes multiple trials to merger his self with that of Supreme Power ParaShakti. The Gupt Navratri is the best time to merge with the Sixty Four forms of the Goddess Power.

 

Forms of Durga Shakti

Om Kaalaarbhraabhaam Kataaksheirarikulbhayadaam Maulibadhdenadurekham,

Shankh Chakraam Kripaanam Trishikhamapi Kareiruvdahantim Trinetraam |

Sinhaskandhadhirudhaan Tribhuvanamakhilam Tejasa Purayantin,

Dhyaayedadurgam Jayaakhayaam Tridashaparivartaam Sevitaam SiddhikamaH ||

 

Hey Goddess Durga! You are Jaya due to Jayi (Victorious) over all demonic natures. You are revered and worshipped by the Rishis (Sages), Munis (Ascetics), Yogis, Devgunas and Sadhaks desirous of divine accomplishments. The aura of your body grants calmness like the dark clouds. Your angry vision frightens the enemies, the moon-rekha on forehead and the four hands holding Shankh, Chakra, Kripaan and Trishul. The three worlds attain fulfilment only through the glory of you, seated on the lion.

This form of Mother Bhagwati Durga is the realized form of the Shakti power. The Shakti power resides permanently wherever Mother Bhagwati is worshipped.

The Shakti Power does not just imply the basic force, the description of Shakti provided by Rishi Markandeya is the Supreme form of Shakti. The Shakti encompasses – Growth, Accomplishments, Politeness, Anger, Reputation, Consciousness, Intelligence, Desire, Humility, Peace, Faith, Lustre, Wealth, Memory, Mercy, Satiation and Wishes.

We can realize all these powers in this life only through Shakti Sadhana. Lack of even one power, causes a feeling of incompleteness in life. The accomplishment Siddhi of Shakti is not possible only by performing Sadhana of a single form of Shakti, the life should be full of Ferocity and Anger  along with Peace, should have Anger for enemies, Peace for friends, Lakshmi Wealth for the family, Memory for knowledge, Satiation for the mind, Compassion for the weak, Humility in nature; because one who is full of Shakti Power, can stay humble. A weakling may be a beggar, or a pauper, but a strong personality can be full of humility to preserve his nature.

Not just the Navratris, but rather each day of life has been considered especially auspicious to perform Sadhanas. Some of main forms of Shakti out of thousands of forms are – security Shakti power in life, victory in enemy problems i.e. in arguments, court-trials and conspiracies, and continuous steady growth of love in life. It is imperative to include all of these powers in their full form in life.

Shakti Pramod describes, once Kartikeya while praying to Lord Shiva on Mount Kailash stated – Hey God of Gods! You are the Supreme Divine Soul, you are Shiva, you are the Goal of all living, you are the foundation of this cosmos, and you are the cause of this cosmos, you are worshipped by all, my growth is impossible without you. Please clarify my doubts. Kartikeya said to Lord Shiva –

Kim Guhyaam Paramam Loke Kimekam Sarva Siddhim |

Kimekam Paramam Shrestham Ko YogaH Swarga MokshadaH |

Binaa Tirthena Tapsaa Binaa Daaneirvinaa MakheiH |

Kasmaadutpaddhyate ShristiH KasminShra Pralayo Bhaveta |

 

Which item in this world can grant all attainments? Which is the Yoga which is the most excellent? Which is the Yoga which can grant both heaven and liberation? How can an individual obtain accomplishments in absence of pilgrimage, Charity, Yagya, Rhythm or Meditation? How did this cosmos originate? Whose rhythm is this? O God! How can a person cross this vast sea of life?  Kindly explain.

In reply, Lord Shiva stated that the entire matter in this world, the base-consciousness, the living-dead are constituted by combination-permutations of three attributes. All actions of the man, man’s lifestyle, the ups and downs in the life, virtues and vices, the basic nature are all formed by a combinations of these three attributes – Satya, Raj and Tam. The Supreme power from where these three properties emerge, is Bhagwati Aadhyashakti.

There are multiple forms of Shakti power and each diverse form of Shakti is essential for the human spirit. Once a disciple questioned SadGurudev that is it possible, to perform the Sadhanas of all these multiple dimensions of Shakti together, in one Sadhana.

Gurudev answered explaining about the Shakti – There are three forms of Shakti power in front of us. MahaKali, MahaLakshmi and MahaSaraswati. Special worship of these three is performed during Navratri. Everybody knows about this, but what is the expanded form of this Shakti power? There are Sixty-Four attributes in the expanded form of Goddess Durga Shakti. Each of these attribute is related to a definite aspect of life. The merged form of these attributes is the absolute form of Goddess Durga. Therefore, we should perform Sadhana of these Sixty Four Shakti forms of Goddess Durga, so that we can elevate each perspective of our body and mind, this is the basic elemental nature of Goddess Durga.

SadGurudev blessed his disciple and advised him – The best Sadhana of Shakti is the Chousath (Sixty Four) Shakti Sadhana, if one meditates on the Sixty forms including the basic beej form, then Shakti has to inculcate within the Sadhak.

 

Sadhana Materials

Following materials are required for this Sadhana – Tantrokt Nariyal, Chousath Shakti Durga Yantra and Shakti Mala consecrated with special Mantras. Prior arrangement should also be made for Kumkum (Vermilion), Akshat (Unbroken Rice), Pushp (Flowers), Laong (Cloves), Deepak (lamp) etc.

The Gupt (Secret) Navratri Cheitanya Shakti Festival is the most auspicious time for Shakti Sadhana. Additionally, this Sadhana can also be performed on the Shukla Paksha Ashtami (Eighth day of bright lunar fortnight) of any month.

 

Sadhana Procedure

On the Sadhana day, the Sadhak should take a fresh bath, adorn red dhoti and sit on a Red Seat-mat facing North direction. Spread a red cloth on the wooden board in front. Set-up Guru Picture / Statue / Guru-Yantra / Guru-Paduka on it and meditate on the holy form of Gurudev Nikhil while praying with folded hands –

GururBrahmaa GururVishnuH Gururdevo MaheshwaraH |

GuruH Saakshaat Par Brahmaa Tasmei Shree Guruve NamaH ||

 

Bathe the Guru Picture / Statue/ Yantra / Paduka with water after Nikhil meditation –

Om Nikhilam Snaanam Samarpayaami ||

 

Then wipe with a clean cloth. Perform Panchopchaar worship-poojan with Kumkum (Vermilion), Akshat (Unbroken rice), Pushpa (Flowers), Neivedh (Sweets/Fruit offering), Dhoop (Incense) – Deep (Lamp) chanting following mantras –

Om Nikhilam Kumkum Samarpayaami |

Om Nikhilam Akshtaan Samarpayaami ||

Om Nikhilam Pushpam Samarpayaami ||

Om Nikhilam Neivedhyam Nivedayaami ||

Om Nikhilam Dhoopam Aardhyaapayaami, Deepam Darshayaami ||

(Show Dhoop, Deep)

 

Now rotate three Achmaani (spoonful) water around the  Guru Picture / Statue/ Yantra / Paduka and drop it on ground. Then chant 1 rosary-round of Guru Mantra with Guru Mala –

Om Param Tatvaaye Naaraayanaaye Gurubhayo Namah

 

After Guru-worship, make a mound of rice-grains in front of Guru Picture, and set-up Tantrokt Nariyal on it. Also set-up Chousath Shakti Yantra on a plate on a seat of flowers. Light nine oil lamps around the Yantra. Perform Panchopchaar poojan of Tantrokt Nariyal through Akshat, Pushp etc. Thereafter worship-poojan of Chousath Shakti powers is performed, offer Kumkum, Akshat and one Laung on the Yantra with each chanting of the following Mantra –

Mantras of Chousath Shakti powers –

Om Pim Pingalaakshyei NamaH         Om Vim Vidaalaakshyei NamaH

Om Sam Samridhdyei NamaH            Om Vrim Vridhdyei NamaH

Om Shram Shraddhayei NAmaH          Om Swam Swaahaayei NamaH

Om Swam Swadhaayei NamaH            Om Mam Maatrikaayei NamaH

Om Vam Vasundharaayei NamaH         Om Trim Trilokaraatrei NamaH

Om Sam Savitrei NamaH               Om Gam Gaayatrei NamaH

Om Trim Tridasheshvaryei NamaH      Om Soom Soorupaayei NamaH

Om Bam Bahuroopayei NamaH           Om Sakam Skandaayei NamaH

Om Am Achyutpriyaayei NamaH         Om Vim Vimalaayei NamaH

Om Am Amalaayei NamaH               Om Am Arunaayei NamaH

Om Aam Aarunyei NamaH               Om Pram Prakrityei NamaH

Om Vim Vikratyei NamaH              Om Sram Sratyei NamaH

Om Sthim Sthityei NamaH             Om Sam Sahartyei NamaH

Om Sam Sandhaayei NamaH             Om Mam Maatrei NamaH

Om Sam Satyaei NamaH                Om Ham Hansyei NamaH

Om Mam Mardinyei NamaH              Om Reim Ranjikaayei NamaH

Om Pam Paraayei NamaH               Om Dam Devamaatrei NamaH

Om Bham Bhagawatyei NamaH           Om Dam Devakyei NamaH

Om Kam Kamlaasanaayei NamaH         Om Trim Trimukhayei NamaH

Om Sam Saptmukhayei NamaH           Om Sum Suraayei NamaH

Om Am Asuramardinyei NamaH          Om Lam Lamboshthayei NamaH

Om Oom Udharvakeshinyei NamaH       Om Bam Bahushikhaayei NamaH

Om Vrim Vrikodaraayei NamaH         Om Ram Rathrekhaayei NamaH

Om Sam Shashirekhayei NamaH         Om Am Aparaayei NamaH

Om Gaganavegaayei NamaH             Om Pam Pawanavegaayei NamaH

Om Bhum Bhuwanamaalaayei NamaH      Om Mam Madanaaturaayei NamaH

Om Am Anangaayei NamaH              Om Am Anangamadanaayei NamaH

Om Am Anangamekhalaayei NamaH       Om Am Ananga Kusumaayei NamaH

Om Vim Vishwaroopayei NamaH         Om Am Asuraayei NamaH

Om Am Apangasiddhyei NamaH          Om Sam Satyavaadinyei NamaH

Om Vam Vajraroopayei NamaH          Om Sham Shuchivrittayei NamaH

Om Vam Varadaayei NamaH             Om Vam Vaagishwaryei NamaH

 

After invoking the sixty four forms of Shakti, the Sadhak should chant eleven rosary-rounds of following mantra with full concentration. This mantra chanting should be performed with Jap Siddhi Mala only.

 

Mantra

|| Om Hreem Kreem Poorna Shakti Swaroopayei Kreem Hreem Om Phat ||

 

Wear the rosary in your neck after completion of Mantra chanting, and set-up the Yantra is your worship-place. Keep wearing the rosary for 1.25 months. After 1.25 months, drop the rosary and the yantra in a running river.

The Sadhak gets a special sensation while doing this Sadhana with full concentration. The doors of his mind start to open up. The Shakti power starts imbibing in each nerve of his body, and when the Shakti power flows, all of his tasks start getting completed with his actions.

Sadhana Materials – 490 /-

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