गुरु ही शिव, शिव ही गुरु (Guru is Shiv, Shiv is Guru)

शिव तो अमृत दाता है
गुरु ही शिव, शिव ही गुरु
सद्गुरु अमृत वचन

 

अर्थ
यश
अध्यात्म
आरोग्य

 

गृहस्थ जीवन की पूर्णता – शिव 
गृहस्थ जीवन में चार बातें मुख्य रूप से होनी अति आवश्यक हैं – आरोग्यता, सम्पन्नता, ऐश्‍वर्य-यश और आध्यात्मिक उन्नति। जीवन के इन चारों सोपानों का पान भगवान शिव के अतिरिक्त अन्य किसी देवी-देवता के वश की बात ही नहीं है। सद्गुरुदेव ने इन्हीं चारों बातों को जीवन का आधार बताया है।

एक बार सद्गुरुदेव जोधपुर में शिष्यों के साथ बैठे मनोविनोद कर रहे थे। शिष्य अपनी जिज्ञासाएं पूछ रहे थे और गुरुदेव उनकी जिज्ञासाओं का समाधान कर रहे थे। कुछ शिष्यों ने पूछा कि – कुण्डलिनी जागरण क्या होता है? किसी ने पूछा – ब्रह्म का स्वरूप क्या है? क्या मनुष्य का पुनर्जन्म होता है? क्या इस जीवन में साक्षात् देवताओं के दर्शन होते हैं? गुरुदेव ने एक-एक की जिज्ञासाओं का समाधान किया। इस चर्चा में गुरुदेव ने शिष्यों को साधना एवं जीवन के महत्वपूर्ण आयामों से अवगत कराया।

 

इसी चर्चा को आगे बढ़ाते हुए गुरुदेव ने कहा कि – ‘तुममें से ज्यादातर गृहस्थ हो और जो कोई बाकी हैं उनकी भी दो-चार साल में शादी हो जायेगी।’ मैं तुमसे पूछता है कि – ‘जीवन की वे कौनसी कामनाएं हैं जिनके होने से संसार में सब कुछ प्राप्त हो जाता है और जिनके नहीं होने से संसार में सब कुछ व्यर्थ हो जाता है।

 

गुरुदेव द्वारा पूछे गये इस प्रश्‍न का जवाब सभी शिष्यों ने अपने-अपने हिसाब से दिया। प्रत्येक शिष्य के लिये जीवन में कामनाएं अलग-अलग थीं, शिष्यों द्वारा बताई गई प्रमुख कामनाएं थीं – संतान प्राप्ति, घर का निर्माण, सौ वर्ष की आयु, अप्सरा सिद्धि, सिद्धाश्रम प्राप्ति, वशीकरण-सम्मोहन शक्ति, कुण्डलिनी जागरण… इत्यादि। प्रत्येक शिष्य ने अपने चिन्तन एवं अनुभव के आधार पर जीवन की उन महत्वपूर्ण कामनाओं के बारे में बता दिया, जो उनके लिये प्राथमिक थीं।

 

गुरुदेव ने सभी शिष्यों के जवाब जानने के बाद कहा कि –  मेरे विचार से जीवन में केवल चार सबसे महत्वपूर्ण कामनाएं हैं, इन कामनाओं की पूर्ति, गुरुकृपा और साधना से हो जाती है तो तुम्हारे जीवन में पूर्णत्व है। तब तुम्हें सब कुछ प्राप्त है, देवताओं को भी तुम्हारे भाग्य से ईर्ष्या होगी। ये चार कामनाएं पूर्ण नहीं हैं तो इस संसार में तुम घिसट-घिसट कर चल रहे हो, न तुम्हारे जीवन में कोई लक्ष्य है और न ही कोई गति।

 

ये चार कामनाएं हैं – आरोग्यता, सम्पन्नता, यश-ऐश्‍वर्य और आध्यात्मिकता।’

 

आगे गुरुदेव ने कहा कि शाम को आरती के पश्‍चात् मैं तुम्हें जीवन की इन चार कामनाओं के बारे में विस्तार से बताऊंगा।

 

शाम को आरती के पश्‍चात् गुरुदेव ने शिष्यों को सम्बोधित करते हुए कहा कि – आज आप सभी का जीवन की उन चार कामनाओं से परिचय करा रहा हूं, जिनकी पूर्णता ही मानव जन्म का ध्येय है। तुम सभी मेरे शिष्य हो और इस जीवन में ही तुम सभी को उन कामनाओं की पूर्णता प्राप्त करनी है।

 

कुछ समय शांत रहने के पश्‍चात् गुरुदेव ने मुस्कुराते हुए पूछा कि – ‘आप दो सौ लोग बैठे हैं इन दो सौ लोगों में दुःखी कौन है?’ सब गर्दन झुकाए बैठे रहे और धीरे-धीरे अपने हाथ उठा लिये।

 

गुरुदेव ने कहा कि – ‘आप सभी दुःखी हैं।’ फिर गुरुदेव ने पूछा कि – ‘मेरे पास आने से आपमें से कितने लोगों को लगता है कि आपके दुःख दूर हो जायेंगे?’

 

तत्काल सभी ने मुस्कुराते हुए हाथ उठा लिये और कहा कि – ‘हमें विश्‍वास है, आपके पास आने से हमारे सारे दुःख दूर हो जायेंगे।’

 

गुरुदेव ने कहा कि – क्या तुम्हें सुख और दुःख की परिभाषा भी मालूम है? क्या तुम जिन्हें दुःख कह रहे हो वे वास्तव में दुःख हैं या समस्याएं हैं? दुःख का तात्पर्य है, ऐसी पीड़ा जिसका कोई समाधान न हो, जो मन को परास्त कर दे और जिससे तुम्हारे जीवन का अर्थ ही समाप्त हो जाए। उसे दुःख कहते हैं।

 

दूसरी बात है समस्या। समस्या का तात्पर्य है बाधा और प्रत्येक मनुष्य के जीवन में नित्य एक नवीन बाधा, समस्या अवश्य आती है। प्रत्येक बाधा का कोई न कोई मूल कारण अवश्य है और उसके मूल कारण में जाकर उसका निदान करने से उस समस्या का समाधान प्राप्त किया जा सकता है। गुरुदेव ने स्पष्ट तौर पर कहा कि – समस्या का समाधान हो जाने पर तुम्हें लग सकता है कि तुम सुख को प्राप्त कर लोगे लेकिन सुख का एक मन का एक ऐसा भाव है जो संसार में किसी भी व्यक्ति को पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं होता है। तुम्हारा कार्य है तुम्हें अपनी समस्याओं का मूल कारण जानकर उनका समाधान प्राप्त करना। उस संतोष को, उस शांति को प्राप्त करना जिसे सांसारिक भाषा में सुख कहा गया है। गुरुदेव ने कहा कि – मैं सुख में विश्‍वास नहीं करता, शांति और संतोष में विश्‍वास करता हूं। जिस दिन तुम लोगों के चित्त में शांति प्राप्त हो जायेगी उस दिन संतोष का कल्पवृक्ष तुम्हारे भीतर उगने लगेगा और उस संतोष के कल्पवृक्ष में तुम्हें जीवन की कामनाएं पूर्ण अनुभूत होंगी।

 

आगे गुरुदेव ने कहा कि चार क्रियाओं पर प्रत्येक मनुष्य का जीवन टिका हुआ है। ये चारों क्रियाएं एक दूसरे से जुड़ी हैं। यदि तुम्हें अपने जीवन में पूर्ण सुख, आनन्द चाहिए तो इन चारों कामनाओं की पूर्णता के लिये निरन्तर कर्म करते रहो। इन चारों कामनाओं का स्वरूप इस प्रकार है –

 

1. आरोग्य – इस संसार में सबसे बड़ा सुख आरोग्य है। जिसके जीवन में निरोगता नहीं है, शरीर बीमार रहता है, मन में चिन्ता रहती है तो वह रोगी है। रोगी व्यक्ति में कार्य करने की क्षमता निरन्तर घटती जाती है। इस शरीर को काया कहा गया है और इस काया को शुद्ध रखते हुए इसमें स्वभाविक ओज प्राप्ति का एक ही उपाय है कि हम रोग को अपने भीतर घुसने ही नहीं दें। रोग जब आता है तो शरीर के किसी भी द्वार से लघु रूप में लेकिन यदि समय से उसका निदान नहीं किया जाए तो वह धीरे-धीरे पूरी देह पर अधिकार जमा लेता है। पहला सुख निरोगी काया। रोग तुम्हारा सबसे बड़ा शत्रु है और उस शत्रु को समाप्त करने के लिये मैं तुम्हारा सहयोगी हूं। आज आरती में यह संकल्प लेना है कि रोग जहां भी हैं, शरीर में है, मन में है उसे अपने स्वयं के भीतर नहीं रहने देना।

 

2. सम्पन्नता – दूसरी स्थिति है जीवन में अर्थ की कमी। गुरुदेव ने कहा कि तुमने अर्थ को केवल और केवल कुछ सिक्कों, रुपयों में सोच लिया है। क्या वास्तव में अर्थ का तात्पर्य रुपये ही हैं अथवा अर्थ का तात्पर्य लम्बा-चौड़ा है। मेरे विचार से धन तो एक तुलनात्मक स्थिति है। किसी के पास पांच हजार रुपये हैं और किसी के पास पांच लाख हैं। यदि तुम दुःखी रहना चाहते हो तो कितना भी धन प्राप्त हो जाए, तुम दुःखी रह सकते हो, यह तो तुम्हारे मन की गति है। यदि तुम सुखी रहना चाहते हो, तो मेरे विचार से शांति और संतोष को प्राप्त करने के लिये इस जीवन के वास्तविक अर्थ को समझना पड़ेगा।

 

आज यह विचार करो कि धन तुम्हारे जीवन को चला रहा है, या जीवन को चलाने के लिये तुम धन का उपयोग कर रहे हो। क्या धन तुम्हारी बुद्धि में घुसा हुआ है अथवा वह तुम्हारे अधीन है। धन अर्थात् सम्पन्नता का उपयोग यही है कि तुम्हारे हाथ किसी को देने के लिये आगे बढ़ें, न कि मांगने के लिये आगे बढ़ें। तुम किसी को आशीर्वाद स्वरूप में, दाता बन सको, देने वाले बन सको, देवता बन सको। जो धन तुम्हें श्रेष्ठ कार्य को संतोष के साथ करने से प्राप्त होता है वही तुम्हारे जीवन की सम्पन्नता है, तुम्हारे मन की सम्पन्नता है। तुम कितने सम्पन्न हो, इसके बारे में किसी दूसरे से तुलना मत करो, अपने आप अपने मन में विचार करते रहो कि मुझे मेरे धन से शरीर में आरोग्यता प्राप्त हो रही है और मेरे धन से मुझे संतोष प्राप्त हो रहा है, मैं अपने धन को सही रूप से व्यय कर रहा हूं। यह धन मुझे आनन्द दे रहा है। जब धन तुम्हें आनन्द दे वही वास्तविक सम्पन्नता है।

 

3. यश-ऐश्‍वर्य – शरीर और धन के पश्‍चात् तीसरी स्थिति आती है यश और ऐश्‍वर्य। यश का भागी वही होता है, जिसने अपने शरीर का सही उपयोग किया है। जिसके शरीर में रोगों ने स्थान नहीं बनाया है, जिसने अपने धन का उपयोग किया है और जो केवल अपने लिये ही नहीं जीता है, वह अपनी देह से अपने, धन से दूसरों के लिये भी कार्य करता है। याद रखिये एक डॉक्टर आपको चैक कर बता सकता हैं कि आप कितने स्वस्थ हैं। आपका बैंक बैलेन्स बता सकता है कि आप कितने सम्पन्न हैं लेकिन यश और ऐश्‍वर्य आपका समाज और दूसरे लोग ही बताएंगे। जब आपको देखकर दूसरों के चेहरों पर मुस्कान आए, आपके प्रति आत्मीयता का भाव आए, कोई आपकी बात को ध्यान से सुने, कोई आपको आदर भाव दे, कोई आपको स्पर्श कर प्रसन्न हो, कोई यह कहे कि यह मेरा आदर्श है, कोई यह कहे कि आपके चेहरे पर कितना ओज है …यह वास्तव में यश और ऐश्‍वर्य है। यश के लिये आपको किसी प्रकार का दिखावा करने की आवश्यकता नहीं है। यश तो वायु की तरह है आपके किसी स्थान पर जाने से पहले पहुंच जाता है। यह यश ही सबसे बड़ी पूंजी है, धन भी यश के अधीन है।

 

4. अध्यात्म – गुरुदेव ने आगे कहा कि आज मैं तुम्हें शरीर, धन, यश से भी आगे एक स्थिति को बताना चाहता हूं जिसके अन्तर्गत ये तीनों क्रियाएं चलती हैं। जिस दिन तुम मानसिक रूप से मुक्त हो जाओगे, अपने आप को गुलाम अनुभव नहीं करोगे, गुरु का ध्यान कर, ईश्‍वर का ध्यान कर अपने आपको आनन्दित अनुभव करोगे, जब तुम्हारा स्वयं की सांसों पर नियन्त्रण हो जायेगा, जब शरीर से आगे बढ़कर अपने मन और आत्मा के बारे में विचार करोगे, भौतिकता में जीते हुए एक संन्यस्त साक्षी भाव रखोगे वह तुम्हारा आध्यात्म भाव है, मुक्त भाव है और संसार के सारे सुख इस मुक्त अध्यात्म भाव और मोक्ष भाव के अधीन हैं।

 

गुरुदेव ने कहा कि मैं इस विषय पर तुम्हें घंटों समझा सकता हूं लेकिन ये जो चार बातें हैं इनमें ही सारी समस्याओं का समाधान छुपा है। इसके लिये कर्म भी आवश्यक है, इसके लिये भक्ति भी आवश्यक है, इसके लिये साधना भी आवश्यक है और तुम्हारे सामने सबसे बड़ा आदर्श हजारों-हजारों वर्षों से भगवान शिव का स्वरूप है, जो दिगम्बर होते हुए भी, श्मशान वासी होते हुए भी सदैव शक्ति के साथ हैं। शक्ति उन्हें छोड़कर कभी जा नहीं सकती है, जो गले में समस्याओं की विषमाला पहने हुए हैं और वे विषैली समस्याएं बार-बार फुंकार करती रहती हैं और शिव उन्हें अपने नियन्त्रण में ही रखते हैं। उन सर्प रूपी समस्याओं से अपने आपको विचलित नहीं होने देते। वे गणेश और कार्तिकेय के पिता बनकर इस संसार में मनुष्यों और देवताओं दोनों को अपने अधीन रखते हैं। वे हर समय चिन्ता से मुक्त रहते हैं। अपने परिवार में मोर, चूहा, शेर, बैल, इत्यादि विरोधाभासी प्राणियों के होते हुए भी कभी क्रोध में नहीं आते, सदैव आनन्द नृत्य में मग्न रहते हैं। शीतल चन्द्रमा को धारण किये रहते हैं। कंठ में विष को धारण किये रहते हैं लेकिन मृत्यु के अधिपति यमराज उनके सामने नतमस्तक रहते हैं।

 

गुरुदेव ने कहा कि आज से तुम अपने जीवन में हजार समस्याओं के बारे में मत सोचो। तुम्हारे जीवन में ये चार पक्ष हैं – इन चार पक्षों को कैसे सुदृढ़ बना सकते हो, इस पर निरन्तर विचार करते हुए, गुरु के पास आओ। साधना के मार्ग पर आगे बढ़ो।

 

शिव की साधना वास्तव में इन चार लक्ष्यों को क्रमबद्ध रूप में प्राप्त करने की साधना। ‘ॐ नमः शिवाय’ करने से शिव की साधना नहीं होती है। शिव की साधना उस शिव को पूर्ण रूप से नमन करने से होती है जो इन चारों लक्ष्यों को प्राप्त करने की क्रिया है। शिव आदर्श रूप हैं, गृहस्थ रूप हैं, योगी रूप हैं, शक्ति सम्पन्न स्वरूप हैं। मनुष्य तो क्या, देवताओं और राक्षसों के भी अधिपति पशुपति नाथ हैं।

 

जीवन के इन चारों लक्ष्यों, कामनाओं (आरोग्य, सम्पन्नता, यश-ऐश्‍वर्य और आध्यात्म) को प्राप्त करने का मार्ग शिव साधना से ही प्रारम्भ होता है। रोम-रोम में शिव स्थापित हों। आगे श्रावण मास आ रहा है, इस मास में विशेष पूजन प्रति सोमवार करें, शिव का कोई न कोई विशेष मंत्र प्रतिदिन करें और निरन्तर यही प्रार्थना करते रहें कि मेरा जीवन ‘सत्यम् शिवम् सुन्दरम्’ अर्थात् सत्य भाव के साथ शांत और शिव भाव के साथ सुन्दरतम् बनता जाये। मेरे ऊपर समस्याएं हावी नहीं हों, मेरे साथ आरोग्य, सम्पन्नता, यश-ऐश्‍वर्य और अध्यात्म रहे। 

Shiva provides divine elixir

Guru is Shiva, Shiva is Guru

Divine words of SadGuru

Health

Wealth

Fame

Spirituality

Perfection of family life – Shiva

Four matters are very important mainly in family life – Health-Wellness, Prosperity, Fame-Opulence and Spiritual Advancement. Except Lord Shiva, no other deity has the capability to satiate these four aspects of life. SadGurudev has termed these four contexts as the very basis of life.


Once SadGurudev was sitting and chatting with the disciples in Jodhpur. The disciples were asking their questions, and Gurudev was satisfying their curiosities. Some disciples asked – What is Kundalini Awakening? Others queried – What is the form of Brahma? Do humans reincarnate? Can one see Gods in this life? Gurudev patiently answered each and every one of their queries. Gurudev also introduced significant dimensions of Sadhana and life during this discussion.

Progressing this discussion further, Gurudev stated – “Most of you are married with a family, and those who are currently bachelors, will also get married in next 2-4 years.” I ask you that – “What are the desires in fulfilling of which, one gets everything in life; and absence of which renders the entire world as waste?

All the disciples answered this question in their own way. Every disciple had different desires in life, the main wishes expressed by the disciples were – progeny, building own home, a hundred years of age, Apsara (nymph) accomplishment, entrance into Siddhashram, Attraction-Hypnotism Power, Kundalini awakening … and more. Each disciple, based on his thinking and life experience expressed the important desires of life , which for him, was primary.

After listening to all the responses, Gurudev stated that – “In my opinion, there are only four most important desires in life, if you can fulfil these desires through Guru-blessings and Sadhanas, then your life will become perfect. Then you will own everything, even Gods will be envious of your good fortune. If these four desires remain incomplete then you will lead a suffering life in this world, there will be neither any goal, nor any meaning of your life.

These four desires are – Good-Health, Wealth, Fame-Opulence and Spirituality.

Gurudev further stated that today in the evening after the Aarti, I shall explain about these four desires of life in detail.

 

After evening prayers-Aarti, Gurudev explained while addressing disciples – Today I am introducing you to those four desires of life, whose completion-perfection is the goal of human life. All of you are my disciples, and all of you have to attain perfection in those desires in this life itself.

After staying quiet for some moments, Gurudev smilingly queried – “You two hundred people are sitting here, how many of you two hundred are unhappy? ” All of them continued to sit with bowed head and slowly everyone lifted their hand up.

Gurudev asked – ‘All of you are full of grief”. Then Gurudev further questioned – “How many of you feel that your griefs will disappear after coming to meet me?”.

Immediately, everyone smilingly raised their hands  and said that – “We believe that all of our pains and sorrows  will terminate after coming to you. ‘

Gurudev stated – Do you know the definition of pleasure and pain? What you are terming as pain, in reality, is it a pain or a problem? Sorrow implies a problem which has no solution, which defeats the mind, and which terminates the meaning-basis of your life. Such thing is called sorrow.

The second thing is the problem. A problem means obstruction, and each person faces a new obstacle, or a problem regularly. There is a root cause for each and every obstruction, and fixing this root issue after analysing it, will resolve the problem. Gurudev clearly stated – After resolution of the problem, you may feel that you will attain pleasure, but the pleasure is such a specific feeling in the mind, that no-one in the world achieves complete pleasure. Your job is to resolve the problem after understanding its root cause. It is obtaining the contentment, the peace, which has been termed as happiness in the worldly context. Gurudev said – I do not believe in happiness, I believe in peace and contentment. When you people attain peace in your mind, the seed of contentment will start germinating inside your mind, and you will realize all desires of life under the shade of that contentment tree.

Gurudev further continued that the life of each human being is based on four actions. These four actions are connected with each other. If you desire complete happiness and joy in your life, then you should continuously perform actions to complete these desires. The form of these four passions are –

  1. Health – Health is the greatest pleasure in the world. A person whose life is unhealthy, whose body remains ill, whose mind is full of worries, such a person is a sick-patient. The ability of a sick-patient to perform any function constantly decreases. This body has been termed as Kaya (structural mass) and the only way to keep it pure and full of natural vigour is to ensure that we do not let any disease enter it. A disease enters through any of the body-gates in a tiny form, but if not treated properly and timely, this disease grows and starts to control the body. The First Happiness is – Healthy Body. Disease is your biggest enemy and I am your ally in terminating that enemy. Today, you should resolve during Aarti that wherever there is a diseases, within the body, or the mind, that disease should not be let to stay inside.
  2. Prosperity – The second situation is lack of wealth in life. Gurudev said that you have reduced the meaning of wealth as just some coins and notes. Does the wealth mean only currency-notes in reality, or does it have any extended meaning. In my opinion, wealth is a comparative position. Someone has Five Thousand rupees and someone else has Five Lacs rupees. If you wish to remain sad, then you will stay unhappy irrespective of whatever money you earn, this is a condition of your mind. If you wish to remain happy then I think that you will have to realizer the real meaning of this life after obtaining peace and contentment.

Think carefully whether the money is running your life, or are you utilizing money to lead the life. Has wealth entered your mind, or are you controlling it. The core utility of wealth i.e. prosperity is that your hands should extend to give someone, and not to take. You become a giver, a bless-er, a donor, a God. The wealth which you obtain by performing a good task with contentment, is the real prosperity of your life, is the prosperity of your mind. How prosperous are you, do not compare about this topic with others, keep on pondering within your mind whether the wealth is enhancing the health of my body, and if I am obtaining contentment through this wealth, and I am spending this money properly. This money is giving me joy. When wealth starts giving you joy, that is the real prosperity.

  1. Fame-Opulence – After health and wealth, the third situation is fame and luxury. Only one who has utilized his body properly, is entitled to fame. One whose body is not afflicted with diseases, who has utilized his wealth, and one who does not live just for self, but rather performs tasks for others through his body and his wealth. Remember, a doctor can check and tell you how healthy you are. Your bank balance can tell you how prosperous you are. However only the people in the society-community can evaluate your fame and opulence. When others start smiling upon seeing you, they feel a sense of solidarity with you, someone attentively listens to whatever you say, someone gives you respect, someone feels glad upon touching you, someone states that you are his role-model, someone notices the aura and vigour on your face… this in reality is the fame and opulence. You do not need to put up pretences to become famous. Fame is like air, it reaches everywhere before you. This fame is the biggest asset, wealth is also subject to fame.
  2. Spirituality – Gurudev further stated that today I wish to explain to you a condition beyond the body, wealth and fame, under whose control all of these processes operate. The day you obtain mental freedom, you do not feel like a slave, get joy upon meditating upon the Guru, and the God, when you gain ability to exert control over your own breath, then you will think beyond the body, about the mind and the soul, you will stay like a detached spectator while living in materialism, that is your spiritual sense, the liberating emotion, and all the pleasures of this world are subject to these spiritual and salvation senses.

Gurudev stated that I can explain to you for hours on this subject, but these four topics, contain the resolution to all these problems. To achieve this, action is necessary, devotion is necessary, Sadhana is necessary, and the greatest role-model in front of you for thousands of years, is the divine appearance of Lord Shiva, who is forever with Shakti inspite of being Digambar, and a resident of shamshaan (cremation ground). The Shakti power can never leave Him, He who wears the toxic garland of problems in his neck, and these poisonous problems keep activating, and Lord Shiva keeps them in control. He does not let those snake like problems to distract him. He, the father of Ganesh and Kartikeya, exerts control over both humans and Gods in this world. He always remains free from worries. He never gets angry inspite of presence of mutual enemies like peacock, mouse, lion, ox etc. in His family, and He is always engaged in a joyous dance. He wears the cool moon on His head, carries toxic poison in His neck, but Lord Yama, God of death stays within His control.

Gurudev advised that from today, you should not think about thousands of problems in your life.There are four aspects in your life – how can you make them stronger, persistently think about these, and come to Guru for advice. Progress ahead on the Sadhana path.

The Sadhana of Lord Shiva is in reality the Sadhana to sequentially achieve these four goals. Chanting “Om Namah Shivaaye” is not the Sadhana of Lord Shiva. The accomplishment of Shiva Sadhana is done by totally bowing to the perfect form of Lord Shiva, which is the process to achieve these four goals. Lord Shiva is a role model, He is in a domestic-householder form, He is in a Yogi form, He has full control over Shakti powers. Lord Pashupati Nath is God not just of the humans, but also of the Gods and the Demons.

The route to achievement of the four goals-desires of life (health, wealth, fame-glory and spirituality) starts from the Shiva Sadhana. Lord Shiva should be embedded in each nerve of yours. Shraavan month is approaching, perform special worship on each Monday, chant any special Mantra of Lord Shiva daily and continuously pray that my life should transform through “Satyam Shivam Sundaram” peaceful with Satya (truth) sense and beautiful with Shivam sense. I should not be overwhelmed with the problems, may Health, Wealth, Fame-Opulence and Spirituality constantly accompany me.

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